दूरी रहस्य से भरपूर है।
जगहों की दूरी आदिकाल से मानव को चिढ़ाती आई है। दूर-दूर जाने की इच्छा उतनी ही बलवती रही है जितनी दूरियों को घटाने की कोशिश।
अभिमानी व्यक्ति की शान और उसके अपयश के बीच केवल एक पग की दूरी है।
जिस तरह हम भूख लगने का निर्णय नहीं लेते हैं, उसी तरह पुरुष भी दूर जाने का निर्णय नहीं लेता है। यह स्वचालित और सहज बोध से उत्पन्न होने वाली आकांक्षा है।
क़स्बे अब शहर बन गए हैं पर महानगरों के पास आने की जगह और दूर चले गए हैं, भले नई संचार व्यवस्था यह दावा करते नहीं थकती कि उसने भौगोलिक और सामाजिक दूरियाँ मिटा दी हैं।
हे धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होने पर धुआँ फेंकती हैं और एक साथ होने पर प्रज्वलित हो उठती हैं। इसी प्रकार जाति-बंधु भी आपस में फूट होने पर दुख उठाते हैं और एकता होने पर सुखी रहते हैं।
दूर हुए बिना कोई वास्तव में समीप हो ही कैसे सकता है?
किसी संबंध से बचने के लिए अभाव जितना बड़ा कारण होता है, अभाव की पूर्ति उससे बड़ा कारण बन जाती है।