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शहर पर ग़ज़लें

शहर आधुनिक जीवन की आस्थाओं

के केंद्र बन गए हैं, जिनसे आबादी की उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं। इस चयन में शामिल कविताओं में शहर की आवाजाही कभी स्वप्न और स्मृति तो कभी मोहभंग के रूप में दर्ज हुई है।

काहे उनका अभी

सूर्यदेव पाठक ‘पराग’

खूब शहर में गस्ती बा

रमाकान्त मुकुल

कहे के रहत बानी

मिथिलेश ‘गहमरी’

चाल देशी ना

जौहर शफियाबादी

घर अन्हरिया के सुरूज

मिथिलेश ‘गहमरी’

बस नजाकत, तकल्लुफ

गहबर गोवर्द्धन

ये शहर

डॉ. वेद मित्र शुक्ल