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शहर पर कविताएँ

शहर आधुनिक जीवन की आस्थाओं

के केंद्र बन गए हैं, जिनसे आबादी की उम्मीदें बढ़ती ही जा रही हैं। इस चयन में शामिल कविताओं में शहर की आवाजाही कभी स्वप्न और स्मृति तो कभी मोहभंग के रूप में दर्ज हुई है।

भटक रही है आग भयानक

ओसिप मंदेलश्ताम

सफ़ेद रात

आलोकधन्वा

बनारस

केदारनाथ सिंह

कूफ़ा

सादी यूसुफ़

ज़रूर जाऊँगा कलकत्ता

जितेंद्र श्रीवास्तव

अजनबी शहर में

संजय कुंदन

उसी शहर में

ध्रुव शुक्ल

चौराहा

राजेंद्र धोड़पकर

वर्षा की दुपहर

सेसर वायेखो

वापसी

यानिस रित्सोस

इलाहाबाद

संदीप तिवारी

तुम्हारा होना

राही डूमरचीर

शिमला

अखिलेश सिंह

असंगत

व्लादिमीर गोलेव

इक लावारिस सवाल

रमेश क्षितिज

रोम

एज़रा पाउंड

शहर की हवा

शाम्भवी तिवारी

अकाल

केशव तिवारी

तुम देखते हो...

अलेक्सांद्र ब्लोक

नदी

जॉन एशबेरी

असंभव

ऑलॉदार लास्लोफ़्फ़ी

रंग

फेदेरीको गार्सिया लोर्का

कामगार

ज्याँ आर्थर रम्बो

लेंगुएल नगर की यात्रा

बोगोमिल ग्युजेल

भोर

फेदेरीको गार्सिया लोर्का

पेरिस में

मारीना त्स्वेतायेवा

हुगली

अय्यप्प पणिक्कर

अश्वारोही का गान

फेदेरीको गार्सिया लोर्का

जेरुसलेम

नज़्वान दर्विश

आदमी का गाँव

आदर्श भूषण

न्यू इंग्लैंड : 1967

होर्खे लुइस बोर्खेस

शहर का नाम

कुमार विकल

फिर चाँद

स्मृति झा

दांते की समाधि के पास

निकोलाय ज़बोलोत्स्की

लिगुआरिया में ख़ामोशी

जुज़ेपे उंगारेत्ती

पतझर की शाम

रेनर मरिया रिल्के

बहुत बुरे हैं मर गए लोग

चंडीदत्त शुक्ल

'पीसा' की साँझ

पी. बी. शेली

मेट्रो में रोना

अविनाश मिश्र

मेट्रो से दुनिया

निखिल आनंद गिरि

सफ़ेदी

चेस्लाव मीलोष

कौन जाग रहा है

सुभाष मुखोपाध्याय

अफ़्रीक़ा की याद

जुज़ेपे उंगारेत्ती

सब कुछ

अन्ना अख्मातोवा