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पहचान पर उद्धरण

मैं उनमें से नहीं हूँ जो नाम को केवल नाम समझते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

एक साधारण बेटी के संग यदा-कदा पहचान को बदल देने से बेटे का निर्माण नहीं हो जाता।

गर्ट्रूड स्टाइन

जलती हुई आग से सुवर्ण की पहचान होती है, सदाचार से सत्य पुरुष की, व्यवहार से श्रेष्ठ पुरुष की, भय प्राप्त पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।

वेदव्यास

जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिए।

वेदव्यास

धर्मवस्तु को एक दिन हम लोगों ने जैसे दल बाँधकर मतलब गाँठकर पकड़ना चाहा था, वैसे उसे नहीं पकड़ा जा सकता। ख़ुद पकड़ाई दिए बग़ैर शायद उसे पाया ही नहीं जा सकता। परम दुःख की मूर्ति के रूप में जब वह मनु्ष्य की चरम वेदना की धरती पर पैर रखकर अकेला खड़ा हो, तब तो उसे पहचान ही लेना चाहिए। ज़रा भी भूल-भ्राँति उससे सही नहीं जाती, ज़रा में मुँह फेरकर लौट जाता है।

शरत चंद्र चट्टोपाध्याय

स्वयं को दूसरों में पहचानो।

नदीन गोर्डिमर

ईश्वर की तो हमेशा कृपा ही होती है। हम उस कृपा को पहचान सकें, यह हमारी मूर्खता है।

महात्मा गांधी

हमारे देश के साहित्य-विचार में, व्यक्ति के परिचय को अलग श्रेणी के परिचय पर ही अधिक ज़ोर दिया जाता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

हिंदुस्तान में पढ़े-लिखे लोग कभी-कभी एक बीमारी के शिकार हो जाते हैं। उसका नाम ‘क्राइसिस ऑफ़ कांशस’ है। कुछ डॉक्टर उसी में 'क्राइसिस ऑफ़ फेथ' नाम की एक दूसरी बीमारी भी बारीकी से ढूँढ़ निकालते हैं। यह बीमारी पढ़े-लिखे लोगों में आमतौर से उन्हीं को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं और जो वास्तव में बुद्धि के सहारे नहीं, बल्कि आहार-निद्रा-भय-मैथुन के सहारे जीवित रहते हैं (क्योंकि अकेली बुद्धि के सहारे जीना एक नामुमकिन बात है)। इस बीमारी में मरीज़ मानसिक तनाव और निराशावाद के हल्ले में लंबे-लंबे वक्तव्य देता है, ज़ोर-ज़ोर से बरस करता है बुद्धिजीवी होने के कारण अपने को बीमार और बीमार होने के कारण अपने को बुद्धिजीवी साबित करता है और अंत में इस बीमारी का अंत कॉफ़ी-हाउस की बहसों है, शराब की बोतलों में, आवारा औरतों की बाँहों में, सरकारी नौकरी में और कभी-कभी आत्महत्या में होता है।

श्रीलाल शुक्ल

किसी यथार्थ के मिट जाने पर यह आवश्यक नहीं है कि उससे संबंधित शब्द भी मिट जाए, उस मृत यथार्थ का बोध कराने वाला शब्द—किसी दूसरे यथार्थ का बोधक बन जाता है।

विजयदान देथा

श्रीकृष्ण का लोकरक्षक और लोकरंजक रूप गीता में और भागवत पुराण में स्फुरित है। पर धीरे-धीरे वह स्वरूप आवृत्त होता गया है और प्रेम का आलंबन मधुर रूप ही शेष रह गया।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

माँ-बाप बड़े हुलास से अपने बच्चों को जो नाम देते हैं, कभी-कभी वह नाम समाज द्वारा बदल दिया जाता है। समाज द्वारा दिया हुआ नाम शक्तिशाली होता है और मूल नाम को धकियाकर अपने द्वारा ही आदमी की पहचान उजागर करने लगता है।

कृष्ण बिहारी मिश्र

शिशु के जीवन में अनेक पथ अज्ञात रहते हैं, वहाँ पर कल्पना की अबाध गति देखने को मिलती है और प्रत्येक शिशु इसी अज्ञात को अपने-अपने चरित्र और क्षमता के अनुसार, अनेक और विभिन्न मूर्तियों के माध्यम से पहचानता हुआ चलता है।

अवनींद्रनाथ ठाकुर

जिनकी करुणा का प्रसार-क्षेत्र जितना अधिक होता है, श्री भगवान के साथ उनका तादात्म्य भी उतना ही गंभीर रहता है।

गोपीनाथ कविराज

अशुभ है गँवई पहचान को मारकर गाँवों की शोभा बढ़ाना, संवेदना से छूँछ होकर समृद्धि का दंभ ढ़ोना।

कृष्ण बिहारी मिश्र

जिस किसी रूप में वस्तु का संबोधन प्रचलित है, उसके अलावा उसका कोई दूसरा संबोधन हो ही नहीं सकता और जो वस्तु है, उसे किसी अन्य शब्द के द्वारा व्यक्त किया ही नहीं जा सकता।

विजयदान देथा

नदी, नाग-फण और सोमकला ये तीन जम्बूद्वीप के देवाधिदेव के ललाट की शनाख़्त या पहचान रचते हैं।

कुबेरनाथ राय
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असाधारण प्रतिभा को चमत्कारिक वरदान की आवश्यकता नहीं होती और साधारण को अपनी त्रुटियों की इतनी पहचान नहीं होती कि वह किसी पूर्णता के वरदान के लिए साधना करे।

महादेवी वर्मा

पेट में जब तक दीनता के पिल्ले कूँ-कूँ करते रहेंगे, मनुष्य को अपनी पहचान अपने आप होगी, वह किसी ऊँची बात का अर्थ नहीं समझ सकता।

सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

आप किसी सुअर को हमेशा उसकी घुरघुराहट से पहचान सकते हैं।

निकोलाई गोगोल