
एक साधारण बेटी के संग यदा-कदा पहचान को बदल देने से बेटे का निर्माण नहीं हो जाता।

सत्य अक्षुण्ण है, अतएव यह ख़ुद की पहचान नहीं कर सकता। जो भी इसे पहचानने का दावा करता है, उसे असत्य होना होगा।

एक पदच्युत राष्ट्रपति का एकमात्र पहचान-पत्र उसका मृत्यु प्रमाण-पत्र होना चाहिए।

जलती हुई आग से सुवर्ण की पहचान होती है, सदाचार से सत्य पुरुष की, व्यवहार से श्रेष्ठ पुरुष की, भय प्राप्त पर शूर की, आर्थिक कठिनाई में धीर की और कठिन आपत्ति में शत्रु एवं मित्र की परीक्षा होती है।

जिस चिह्न से जो देश युक्त होता है और जिससे जिसकी पहचान होती है, विद्वानों का कहना है कि उस देश का वही नाम रखना चाहिए।

धर्मवस्तु को एक दिन हम लोगों ने जैसे दल बाँधकर मतलब गाँठकर पकड़ना चाहा था, वैसे उसे नहीं पकड़ा जा सकता। ख़ुद पकड़ाई दिए बग़ैर शायद उसे पाया ही नहीं जा सकता। परम दुःख की मूर्ति के रूप में जब वह मनु्ष्य की चरम वेदना की धरती पर पैर रखकर अकेला आ खड़ा हो, तब तो उसे पहचान ही लेना चाहिए। ज़रा भी भूल-भ्राँति उससे सही नहीं जाती, ज़रा में मुँह फेरकर लौट जाता है।

स्वयं को दूसरों में पहचानो।

ईश्वर की तो हमेशा कृपा ही होती है। हम उस कृपा को न पहचान सकें, यह हमारी मूर्खता है।

हिंदुस्तान में पढ़े-लिखे लोग कभी-कभी एक बीमारी के शिकार हो जाते हैं। उसका नाम ‘क्राइसिस ऑफ़ कांशस’ है। कुछ डॉक्टर उसी में 'क्राइसिस ऑफ़ फेथ' नाम की एक दूसरी बीमारी भी बारीकी से ढूँढ़ निकालते हैं। यह बीमारी पढ़े-लिखे लोगों में आमतौर से उन्हीं को सताती है जो अपने को बुद्धिजीवी कहते हैं और जो वास्तव में बुद्धि के सहारे नहीं, बल्कि आहार-निद्रा-भय-मैथुन के सहारे जीवित रहते हैं (क्योंकि अकेली बुद्धि के सहारे जीना एक नामुमकिन बात है)। इस बीमारी में मरीज़ मानसिक तनाव और निराशावाद के हल्ले में लंबे-लंबे वक्तव्य देता है, ज़ोर-ज़ोर से बरस करता है बुद्धिजीवी होने के कारण अपने को बीमार और बीमार होने के कारण अपने को बुद्धिजीवी साबित करता है और अंत में इस बीमारी का अंत कॉफ़ी-हाउस की बहसों है, शराब की बोतलों में, आवारा औरतों की बाँहों में, सरकारी नौकरी में और कभी-कभी आत्महत्या में होता है।

किसी यथार्थ के मिट जाने पर यह आवश्यक नहीं है कि उससे संबंधित शब्द भी मिट जाए, उस मृत यथार्थ का बोध कराने वाला शब्द—किसी दूसरे यथार्थ का बोधक बन जाता है।

श्रीकृष्ण का लोकरक्षक और लोकरंजक रूप गीता में और भागवत पुराण में स्फुरित है। पर धीरे-धीरे वह स्वरूप आवृत्त होता गया है और प्रेम का आलंबन मधुर रूप ही शेष रह गया।

शिशु के जीवन में अनेक पथ अज्ञात रहते हैं, वहाँ पर कल्पना की अबाध गति देखने को मिलती है और प्रत्येक शिशु इसी अज्ञात को अपने-अपने चरित्र और क्षमता के अनुसार, अनेक और विभिन्न मूर्तियों के माध्यम से पहचानता हुआ चलता है।

माँ-बाप बड़े हुलास से अपने बच्चों को जो नाम देते हैं, कभी-कभी वह नाम समाज द्वारा बदल दिया जाता है। समाज द्वारा दिया हुआ नाम शक्तिशाली होता है और मूल नाम को धकियाकर अपने द्वारा ही आदमी की पहचान उजागर करने लगता है।

जिनकी करुणा का प्रसार-क्षेत्र जितना अधिक होता है, श्री भगवान के साथ उनका तादात्म्य भी उतना ही गंभीर रहता है।

जिस किसी रूप में वस्तु का संबोधन प्रचलित है, उसके अलावा उसका कोई दूसरा संबोधन हो ही नहीं सकता और जो वस्तु है, उसे किसी अन्य शब्द के द्वारा व्यक्त किया ही नहीं जा सकता।

अशुभ है गँवई पहचान को मारकर गाँवों की शोभा बढ़ाना, संवेदना से छूँछ होकर समृद्धि का दंभ ढ़ोना।

असाधारण प्रतिभा को चमत्कारिक वरदान की आवश्यकता नहीं होती और साधारण को अपनी त्रुटियों की इतनी पहचान नहीं होती कि वह किसी पूर्णता के वरदान के लिए साधना करे।

नदी, नाग-फण और सोमकला ये तीन जम्बूद्वीप के देवाधिदेव के ललाट की शनाख़्त या पहचान रचते हैं।

पेट में जब तक दीनता के पिल्ले कूँ-कूँ करते रहेंगे, मनुष्य को अपनी पहचान अपने आप न होगी, वह किसी ऊँची बात का अर्थ नहीं समझ सकता।

आप किसी सुअर को हमेशा उसकी घुरघुराहट से पहचान सकते हैं।