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गर्ल्स हॉस्टल, राजकुमारी और बालकांड!

मुझे ऐसा लगता है कि दुनिया में जितने भी... अजी! रुकिए अगर आप लड़के हैं तो यह पढ़ना स्किप कर सकते हैं, हो सकता है आपको इस लेख में कुछ भी ख़ास न लगे और आप इससे बिल्कुल भी जुड़ाव महसूस न करें। इसलिए आपको पहले ही यह कहे दे रही हूँ।

हाँ... तो मुझे ऐसा लगता है कि सारी दुनिया में जितने भी देश हैं, वहाँ रहने वाली जितनी भी लड़कियाँ हैं—उनका अपने प्रेमी, पति, बच्चों, बहन-माँ-बेटी से जितना आत्मीय रिश्ता है, उससे भी कहीं ज़्यादा आत्मीय रिश्ता उनका अपने बालों से है। हाँ जी! आपने एकदम सही पढ़ा, लड़कियों का बहुत गहरा रिश्ता होता है अपने बालों के साथ। कितना गहरा? इतना कि सारी दुनिया में अकेली पड़ जाने के बाद भी, यह बाल उनको असीमित आत्मविश्वास और हिम्मत से भर देते हैं। उसके असंख्य केश जो कभी खुले, कभी वेणी में, तो कभी किसी जूड़े में सज्जित होते हैं, तरह-तरह के फूल जैसे—मोंगरे, रजनीगंधा, गुलाब, गेंदें आदि से सजते हैं, तो कभी चाँदी, सोने के आभूषणों से, कभी-कभी जल्दबाज़ी में केवल एक पेंसिल या पेन की मदद से बेतरतीबी से खोंसकर जिनका जुड़े जैसा कुछ बना दिया जाता है।

अपने बालों से मेरा कैसा रिश्ता है, इसका पता मुझे तब चला जब मैं दस साल की हुई और तब ही शुरू हुआ ‘बालकांड’ का पहला अध्याय। हुआ यूँ कि जब मैं दस साल की थी, तब नवोदय विद्यालय में पढ़ने के लिए मेरा चयन हुआ। हमको निर्देशित किया गया था कि लड़कियों के बाल छोटे होने चाहिए, क्योंकि नवोदय एक आवासीय स्कूल था और वहाँ छोटी बच्चियों के लिए अपने बाल संभाल पाना बड़ा ही कठिन कार्य है। अब मेरे बाल कमर के नीचे तक लंबे थे, उनको एकाएक कान तक छोटे करवा देते तो मेरी माँ को बहुत दुख होता और देखने में भी अच्छा नहीं लगता—इसलिए पिताजी ने मेरे बाल पीठ तक और फिर कुछ दिनों में कान तक छोटे करवाए। हालाँकि माँ को तब भी उतना ही दुख हुआ और गाँव के बच्चों के बीच मेरा मज़ाक़ बना सो अलग।

बालकांड के अध्याय दो की शुरुआत होती है—मेरे नवोदय आने से। यहाँ लड़कियों के हॉस्टल दो विंग में बँटे थे—जी-वन और जी-टू। जी-वन में सीनियर लड़कियाँ रहती थी और जी टू में मिडल स्कूल वाली जूनियर लड़कियाँ। हर दो महीनों में हमारे स्कूल में एक नाई जी-टू में पढ़ने वाली लड़कियों के बाल कतरने आता था। किसी जूनियर लड़की के बाल कान से बढ़कर गले तक पहुँच पाए हों, ऐसा जी-टू हॉस्टल के इतिहास में कभी नहीं हुआ। अगर किसी के बाल तेज़ी से बढ़ते थे तो उस महीने नाई भैया पता नहीं कैसे जल्दी आ जाते थे। जी-टू हॉस्टल की हाउस मास्टर इस मामले में बड़ी कड़क थी। हमें हमेशा यही लगता था कि किसी महीने नाई भैया को किसी शादी, समारोह या कार्यक्रम में जाना पड़ा तो उस महीने हमारी जी-टू की वार्डन मैम ख़ुद ही कैंची लेकर लड़कियों के बाल काटने लग जाएँगी। कई-कई बार तो मेरे बाल इतने ज़्यादा काट दिए गए कि मेरे छोटे भाई के बाल भी मुझसे लंबे होते। जी-वन में आते ही हमको थोड़ी छूट मिली, हम अपने बाल लंबे कर सकती थीं—पर हमको अब चोटी बनाकर स्कूल जाना होता था। बारहवीं पास होते तक मेरे बाल कंधे तक ही थे, कॉलेज में कंधों से उतरकर पीठ को पहुँचने लगे। चूँकि अब छोटे बालों की आदत हो चुकी थी तो मैं पीठ तक के बालों को कंधे तक कटवाने की ज़िद करती और मेरी माँ उन्हें बढ़ाकर कमर तक लाने पर अड़ी रहतीं। आज तक भी माँ और मेरे बीच बालों के कटाने को लेकर यह तनातनी जारी है।

बालकांड का तीसरा अध्याय शुरू होता है—जब मैं इक्कीस की हुई और मैंने अपने बाल अपने हिसाब से अपनी माँ से बहुत लड़ने-मनाने के बाद कटवाए। मुझे तब ऐसा लगा कि अपने बालों को लेकर अगर आप कोई फैसला लेते हैं—एकदम छोटा ही फैसला—तब भी यह बहुत बड़ी जंग जीतने वाली बात जैसी ही है। लोग कहते हैं कि आपके बाल यादें क़ैद करके रखती हैं, आपकी भावनाएँ और बहुत हद तक आपकी आज़ादी भी। मैं आपको शब्दों में बता नहीं सकती हूँ कि हर बार जब भी मैं अपने बाल कटवाती हूँ तो मुझे कितना हल्का लगता है, कितना आज़ाद महसूस होता है! ऐसा लगता है जैसे मैंने अपने बालों के साथ दूसरों की मुझसे बंधी बेबात की उम्मीदें भी काट दी हैं, अपने सफ़र में सामान कुछ कम कर लिया है।

बचपन से ही मुझे एक राजकुमारी की कहानी बहुत पसंद है, जिसके बाल सुनहरे जादुई थे, जिसके बालों में अमरत्व की शक्ति थी, कोई भी उस जादुई बालों वाली राजकुमारी के पास रहता तो हमेशा के लिए अमर हो सकता था। एक तांत्रिक औरत ने इसी लालच में राजकुमारी को बंदी बनाकर घने जंगल के बीच एक ऊँची मीनार में क़ैद कर रखा था। अठारह साल तक राजकुमारी उस मीनार में क़ैद रही, उसके बाल उस तांत्रिक को जवान और ख़ूबसूरत बनाते रहे। फिर एक दिन राजकुमारी निकल गई मीनार से, एक आज़ाद लड़के से मिली, उससे प्यार किया, अपने जादुई बाल उसने ख़ुद ही काट डाले और एक आम लड़की में तब्दील हो गई। राजकुमारी को अपनी आज़ादी मिल गई, वह अपनी ज़िंदगी का फैसला ख़ुद ही करना सीख गई। 

मुझे नहीं पता कि बालकांड में अभी और कितने अध्याय का जुड़ना बाक़ी हैं, पर मैं इस बात का आश्वासन आपको अवश्य दे सकती हूँ कि इसके सारे अध्याय मैं ख़ुद अपने हिसाब से लिखूँगी।

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