आवाज़ पर कविताएँ

वाणी, ध्वनि, बोल, पुकार,

आह्वान, प्रतिरोध, अभिव्यक्ति, माँग, शोर... अपने तमाम आशयों में आवाज़ उस मूल तत्त्व की ओर ले जाती है जो कविता की ज़मीन है और उसका उत्स भी।

मेरे भीतर की कोयल

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

चौराहा

राजेंद्र धोड़पकर

जड़ें

राजेंद्र धोड़पकर

जाल, मछलियाँ और औरतें

अच्युतानंद मिश्र

सब कुछ कह लेने के बाद

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

काव्‍य-मर्यादा

नवीन रांगियाल

पहुँचने के लिए

रामकुमार तिवारी

ज्ञ

प्रकाश

पूरी रात

केशव तिवारी

अलविदा

विजय देव नारायण साही

आवाज़ तेरी है

राजेंद्र यादव

पृथ्वी पर

आदित्य शुक्ल

शेष सत्य

सुमेर सिंह राठौड़

बसंत की देह

ज्याेति शोभा

हम्म्म

नाज़िश अंसारी

आवाज़ दो

केशव तिवारी

सौरभ अनंत

आवाज़

कृष्ण कल्पित

बे-आवाज़

वीरू सोनकर

पोंऽऽऽ

व्योमेश शुक्ल

आदमी और सीटी

साैमित्र मोहन

लड़ाई

अवधेश कुमार

आवाज़

नीलाभ

आवाज़ की भंगिमा

निर्मला गर्ग

बीच-बहस

वीरू सोनकर

वाक्पटु

प्रकाश

श्राप

संगीता गुंदेचा

पुकार

कृष्णमोहन झा

चुप्पी

रविशंकर उपाध्याय

अँधेरा और रोशनी

गिरिराज किराडू

कविता

चंद्रशेखर

आवाज़ कट रही है

सिद्धेश्वर सिंह

बहरे लोग

हरि मृदुल

पिछली रात के स्वर

श्रीराम वर्मा
बोलिए