अविश्वासी हो रहे हो प्रेम!
बेबी शॉ
14 फरवरी 2026
मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पाती हूँ। मैं इसे समझ पा रही हूँ कि मैं क्यों किसी से प्यार नहीं कर पा रही हूँ, लेकिन लोग इसे समझ नहीं पा रहे हैं। मेरी आँखों में अब किसी के लिए आँसू नहीं आते। सिर्फ़ एक अजीब-सा डर है। मैं जिन्हें अपने बहुत क़रीब मानती हूँ, मुझे उनके लिए डर लगता है। मुझे ख़ुद के लिए भी डर लगता है।
मुझे सबकी आँखों में एक अज्ञात अविश्वास, संदेह, भय दिखता है। सुबह से लेकर रात तक लोग सिर्फ़ डर में हैं कि झूठे प्रेम की बात बोलकर कहीं कोई फँसा न ले, कहीं कोई बिना वजह किसी की हत्या न कर दे, कहीं यौन-संबंध बनाने से इनकार करने के ‘अपराध’ में कोई स्त्री बलात्कार की शिकार न हो जाए, कहीं प्यार की बात कहते-कहते कोई किसी की क्रूर तरीक़े से हत्या न कर दे, उसके शरीर को काट-काटकर इधर-उधर न बिखेर दे, कहीं अपने ही देश में उसकी ज़मीन-जायदाद न छीन ली जाए; कहीं दरवाज़े पर दस्तक देकर कोई यह न पूछ ले कि तुम्हारा धर्म क्या है, जाति क्या है, नागरिकता क्या है! कहीं धर्मों-जातियों-देशों के बीच युद्ध न शुरू हो जाए, कहीं प्यार के गहरे पलों में घर के अंदर कोई कैमरा न घुस आए!
अब कहीं किसी की कोई गोपनीयता नहीं है। अब कहीं किसी का कोई एकांत नहीं है। अब निजी पल चुरा लेते हैं लोग! अब आँखों में आँखें डालकर कहते हैं लोग कि प्यार नहीं चाहिए, बस चूमने की चाह है... टाइम-पास की!
मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पाती हूँ। मुझे भी कोई प्रेम कर सकता है या नहीं, मुझे संदेह है। मैं अब किसी पर विश्वास नहीं कर पाती। मुझे पर भी कोई विश्वास नहीं कर पा रहा है। मेरे रक्त में घुल गया है—अविश्वास, संदेह और अधिकार का वायरस। प्यार नहीं, अधिकार हासिल करना ही मुख्य विषय है। इंसान जैसे ज़मीन हो और उस ज़मीन का अधिग्रहण करने के लिए तैयार हैं—अज्ञात, विचित्र, अदृश्य लोग। मैं उन्हें नहीं जानती। वे मुझे जानते हैं या नहीं, पता नहीं! मैं सिर्फ़ समझती हूँ कि वे तैयारी कर रहे हैं। वे मेरे घर के अंदर घुस गए हैं। वे मेरे मस्तिष्क के अंदर घुस गए हैं। मैं किसी का हाथ नहीं थाम पा रही, किसी की छाती में सिर छिपाकर निश्चिंत नहीं रह पा रही। मैं धीरे-धीरे अकेली होती जा रही हूँ—भयानक अकेली। मृत्यु के बाद इंसान शायद ऐसे ही अकेला हो जाता है।
मेरी यह अनुभूति क्या तुम्हारी भी है? शायद तुम्हारी भी। शायद तुम भी मुझ पर संदेह कर रहे हो। मैं प्यार करते-करते तुम्हारी हत्या भी कर सकती हूँ। मैं तुम्हें सिर्फ़ एक शरीर के रूप में देख सकती हूँ, जैसे तुम मुझे देख रहे हो! मैं कहूँगी, देखो, प्यार का दिन आ रहा है। तुम कहोगे, प्यार के लिए कोई एक दिन कैसे निर्धारित हो सकता है? नहीं, तुम नहीं कहोगे। मैं कहूँगी। मैं कहूँगी, यह दिन वास्तव में युद्ध का है, प्रतिरोध का है, विरोध का है।
प्यार से युद्ध का क्या संबंध? प्रेम से विरोध का क्या संबंध? बताओ, मैं कैसे प्यार करूँ, अगर मैं विरोध नहीं कर सकती? और अगर मैं प्रेमिका न बनूँ, तुम मेरे प्रेमी बनो, तो तुम कैसे विरोध करोगे?
आज सब तरफ़ प्रेम की ही ज़रूरत है। मैं आज स्वीकार करती हूँ कि मैं प्यार करना चाहती हूँ। प्यार मेरे लिए दवा है। मैं तो जीवन भर सिर्फ़ प्यार ही करना चाहती थी। पर नहीं कर सकी; क्योंकि मेरे रक्त में, माथे के अंदर, मन के भीतर घुस गया है—हिंसा का ज़हर, अधिकारबोध का वायरस! मैं सदा से सब प्रकार के साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ रही हूँ, लेकिन न जाने क्यों ख़ुद के अंदर छिपे इस विषाक्त साम्राज्यवाद से बच नहीं पा रही!
मैं पहले तुम्हें कार्ड दिया करती थी, अब व्हाट्सएप-संदेश भेजकर हैप्पी वैलेंटाइंस डे कह देती हूँ। पहले प्रेम किसी वस्तु या आयोजन का मोहताज नहीं था; अब प्रेम-दिवस पर घूमने, बाहर जाने या पार्टी करने का प्रस्ताव भी औपचारिकता का हिस्सा बन गया है। हमारे संबंध में औपचारिकता की मात्रा लगातार बढ़ती जा रही है।
इसके साथ ही हमारी नदियाँ सूखती जा रही हैं, हमारे जंगल समाप्त होते जा रहे हैं। चारों ओर फैली कृत्रिम रोशनी इतनी तीव्र हो गई है कि चाँदनी रात का स्वाभाविक सौंदर्य खो गया है। ऐसे समय में यह प्रश्न और भी तीखा हो उठता है कि मनुष्य आख़िर जाए तो जाए कहाँ?
लेकिन विश्वास करो, मैं तुम्हें अब प्यार नहीं कर पाती हूँ। मैं बीमार हूँ। तुम बीमार हो। हम बीमार हैं। हम गाने लिख रहे हैं, कविताएँ लिख रहे हैं, हम देशप्रेम में आग की तरह जलकर शत्रु-शिविर को राख करना चाहते हैं, हम धर्म के लिए विधर्मियों का गला काटना चाहते हैं...
इसके बावजूद मैं फिर तुम्हारी आँखों में देखकर कहती हूँ—मैं प्यार करती हूँ तुमसे... जिस तरह एक पक्षी दूसरे पक्षी से प्यार करता है, जिस तरह एक बाघ एक बाघिन से प्यार करता है, वैसा नहीं। एक आदिम पुरुष जिस तरह एक आदिम स्त्री से प्यार करता था, वैसा भी नहीं।
हम एक-दूसरे से प्यार करते हैं—अब लेन-देन के माध्यम से। हम स्वस्थ नहीं हैं। हमारा पूरा रक्त इस तरह विषाक्त हो रहा है कि आने वाले किसी समय में हम शायद इंसान नहीं रहेंगे। हम शायद एक-दूसरे पर प्यार के नाम पर उन्मत्त हिंसा में झपट पड़ेंगे।
प्रेम ही चाहिए हमें। बहुत सारे विषाक्त वायरस के ख़िलाफ़ अमोघ वैक्सीन की तरह, विनाशकारी बैक्टीरिया के ख़िलाफ़ निश्चित एंटीबायोटिक की तरह—प्रेम ही चाहिए हमें। हमें प्यार सीखना होगा। हमें प्यार करना सीखना होगा। हमें अपने रक्त को फिर शुद्ध करना होगा। विरोध की रीढ़ को फिर मज़बूत करने के लिए ख़ुद को फिर से पकड़ना होगा। तुम्हें मैं ऐसे प्यार करना चाहती हूँ कि तुम्हारे-मेरे बीच किसी साम्राज्यवादी या फ़ाशीवादी शासक का क्रोध प्रवेश न कर सके, कि तुम्हारे-मेरे बीच किसी तानाशाह का वॉचटावर न घुस सके, कि तुम्हारे-मेरे बीच किसी पूँजीपति का सीसीटीवी अपनी नाक न घुसा सके।
पेड़ पर जिस तरह फूल खिलते हैं, जिस तरह कहीं अभी भी ऋतु-परिवर्तन होता है—उस तरह हम एक-दूसरे से प्यार कर सकें।
वैलेंटाइंस डे होने से पहले जिस तरह आदिम पुरुष और आदिम स्त्री एक-दूसरे से प्यार करते थे, जिस तरह एक पक्षी और दूसरे पक्षी के चुंबनरत दृश्य को देखकर किसी हेमंती ने किसी कालिदास से कहा था—इस सृष्टि का सबसे सुंदर दृश्य—मैं इस तरह तुम्हें प्यार करना चाहती हूँ।
इंसान को बचाने के लिए आज प्यार की ही ज़रूरत है। अगर प्रेम प्राण में न होता, तब वह कैसे सत्ता के आँखें तरेरने को अस्वीकार करना जानता, कैसे नग्न शासक के शासन के ख़िलाफ़ अकेले विरोध की मशाल बनता, कैसे जुलूस में जाते-जाते एक पल के लिए भी उसके मन में यह नहीं आता कि इस चलने में भी किसी शासन-यंत्र का रिमोट-कंट्रोल छिपा है।
प्यार के लिए जिस तरह कोई एक दिन बनाकर पूँजीवाद व्यापार करना चाहता है, उस तरह नहीं; बल्कि प्रेम की ज़रूरत है, प्यार-संबंधित सभी लोगों को अस्वीकार करने के लिए। सभी औपचारिकताओं को दूर हटाकर हम ऐसे प्यार करना चाहते हैं कि कोई ऑनर-किलिंग न हो। देखो तुम—‘ऑनर किलिंग’ यह नाम भी कितने निर्लज्ज तरीक़े से बनाया गया है!
मैं ऐसे प्यार करना चाहती हूँ कि अगर तुम मुझे प्यार न करना चाहो, तो तुम्हारे मुँह पर एसिड न फेंकूँ। मैं ऐसे प्यार करना चाहती हूँ कि अगर तुम किसी और से प्यार करो, तो भी तुम्हें त्याग सकूँ। मैं तुम्हारे चले जाने को प्यार के साथ ही स्वीकार कर सकूँ। क्या हम फिर प्यार कर सकेंगे? क्या हम अपने प्रेम से इस विषाक्त दुनिया को फिर स्वस्थ कर सकेंगे? क्या हम दुनिया को प्रेमियों-प्रेमिकाओं के रहने लायक़ बना सकेंगे? क्या हम ऐसी दुनिया बना सकेंगे जहाँ कोई धर्म नहीं, कँटीले तार नहीं, विद्वेष नहीं, अधिकारबोध नहीं, सत्ता की भौंहें नहीं, नष्ट करने वाली प्रतियोगिता नहीं, संदेह नहीं, अविश्वास नहीं, दमन नहीं? क्या हम इस जीवन में फिर स्वस्थ हो सकेंगे? क्या हम फिर विरोध कर सकेंगे? क्या एक-दूसरे का हाथ हम फिर थाम सकेंगे?
मैं नहीं जानती। मैं सिर्फ़ इतना जानती हूँ कि तुम्हें गुलाब देकर, चॉकलेट देकर, आलिंगन करके, चूमकर भी मैं तुम्हारी हत्या कर सकती हूँ। तुम भी मुझे मार सकते हो, क्योंकि हम एक भयानक हिंसा वाली महामारी से ग्रस्त हैं। हमें एक-दूसरे से प्यार की बात कहने के लिए औपचारिकता की ज़रूरत है—क्योंकि वह भी उद्देश्यपूर्ण है। हमें प्रेम चाहिए। हमें स्वास्थ्य चाहिए। हमें जीवन चाहिए।
इस संसार में क्या यह संभव है?
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