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रागदर्पण : क़िस्सागो अम्मा

एक उबाऊ शाम मोबाइल फ़ोन में उलझे हुए मैंने देखा कि फ़ोन इधर-उधर की तस्वीरों, बधाइयों और अनर्गल संदेशों से अटा पड़ा है। उन्हें डिलीट करते हुए मैंने ख़ुद को एक ज़ब्त न होने वाली झल्लाहट की गिरह में पाया।

सामने पलंग की पुश्त पर सिर टिकाए ख़ुशदिल शख़्स से एक कतिपय खीझ के साथ मैंने कहा—“ये लोग कितनी फ़ुरसत में रहते हैं, इन्हें कोई काम नहीं सूझता?” लैपटॉप की कीज़ में मसरूफ़ ख़ुशदिल शख़्स ने पॉपकॉर्न चबाते हुए मुझे वक्र नज़र से देखा, जैसे कहा हो तुम्हें ही कौन-सा काम है?

माहौल के हिसाब से मुझे इस तंज़ भरी नज़र पर कुछ और कुढ़ जाना चाहिए था, मगर इसकी जगह अपनी  झल्लाहट पर मुझे ग्लानि हुई। बाज़ दफ़ा मैं ख़ुद को वर्षा ऋतु की तरह अनिश्चित देखती हूँ। कभी अतिवृष्टि कभी अनावृष्टि। कभी उदार कभी घोर तंगदिल। मैं ऐसी क्यों हूँ! आख़िर मैं क्यों इतनी नाराज़ हूँ! क्यों कभी बेवजह ही इतनी तन्नाई रहती हूँ! प्रेम से भेजे इन संदेशों को मिटाना क्या कोई ऐसी भारी क़वायद है कि मुझे खीझ से भर जाना चाहिए? मैं कितनी असहिष्णु हूँ। मेरे पास कितनी बेजा शिकायतें हैं। मौसमों से शिक़वे हैं। मूड-मिज़ाज की आजिज़ी है। ऊब का रोना है। प्रेम के गिले हैं। गुनाहों के पछतावे हैं। जब भी मैं अपने को इस क़दर शिकायती होते देखती हूँ, मेरे ख़यालों में मोटे लेंस के पीछे से दो नूरानी आँखें अपलक मुझ पर मुस्कराने लगती हैं। आड़ी-तिरछी लकीरों और नीली खड़ी नसों से भरे हाथ मुझे थपकने लगते हैं। नूरानी आँखों के आस-पास बहुत सारी सलवटें हैं। लकीरों वाली कलाई पर कुछ अक्षर गुदे हैं। ये वो आँखें हैं, जिनमें कभी कोई मलाल न दिखा। ये वो हाथ हैं, जिन्हें कभी कुछ दुश्वार न लगा। वो कौन-सी मिट्टी की देह थी, जिस पर मौसम बेअसर रहे। वो कैसा निस्पृह मन था, जिसे कभी कोई अपेक्षा और क्लेश न हुआ। उस बिजली भरी औरत के बारे में क्या कहूँ कि उसमें कैसी फुर्ती भरी थी। परमात्मा ने उसे कैसी तौफ़ीक़ दी थी। आख़िरी वक़्त से पहले अपनी याद में मैंने उसे कभी बीमार और निढाल न देखा। जबकि अक्सर ही पाँच फ़ुट तीन इंच की अपनी देह को मैं किसी अबूझ थकान से टूटा हुआ पाती हूँ। यह देह सदा मन के क़ब्ज़े में रहती है और मन का कोई ठाँव नहीं। यह न जाने किस जुमूद की गिरफ़्त में है। उस दैवी देह की सबसे बड़ी ख़ूबी थी कि वह मन की ग़ुलाम नहीं थी। मैं उस औरत की क़दमबोसी करना चाहती हूँ, वे क़दम बहिश्त की तरफ़ को एक रास्ता हैं।

दफ़अतन ही दिमाग़ की दीवार पर जैसे स्मृतियों की असंख्य खिड़कियाँ खुल गईं हों, कुछ इस तरह मैं गर्मी का एक उमस भरा दिन याद करती हूँ। जून की दुपहर में तपता हुआ दो कमरों का सरकारी मकान है। बत्ती गुल है। मेरा जिस्म पसीने से चिपचिपा रहा है। मैं महज़ इस लोभ में एक दूसरे चिपचिपे जिस्म से सटकर लेटी हूँ कि उसके हाथ में हरी गोट और नारंगी झालर वाला बीजना मशीनी अंदाज़ में घूम रहा है। मुझे राहत मिल रही है। मैं हैरान हूँ, ऊँघते हुए भी लगातार कैसे कोई पंखा झल सकता है! वह देहगंध आज भी मुझमें रची-बसी है।

सहसा मेरी आँखों में दृश्य बदल गया है। जून की तपती दुपहरी के बर-अक़्स यह सर्द मौसम की कोई रात है। मैं गाँव के घर में हूँ। सघन टाट से बापर्दा लंबे बरामदे में कतार में चारपाई बिछीं हैं। हम सब गाढ़े के ग़िलाफ़ चढ़ी रज़ाइयों में दुबके हैं। अकेली एक देह रज़ाई से बाहर अपना आख़िरी काम निबटा रही है। लालटेन की रौशनी में हमारी परछाइयाँ हमारे आकार की चौगुनी हो गई हैं। बाबा अपने को आधा रज़ाई के भीतर घुसाकर चिलम गुड़गुड़ाते हुए सी-सी कर रहे हैं—“जन रामजी के क्या जी में है अबकी त सुरु माघ में ई ख़ूब जाड़ा पड़ रा है।” अपने कनटोप को उन्होंने गरदन तक खींच रखा है। छह सेर रुई की रज़ाई में भी उन्हें जाड़े से शिक़ायत है। अधबुझी अंगीठी उनके पैताने रखकर हम सबको गर्म दूध के कटोरे और गुड़ की डली थमा दी गई है। लालटेन की बत्ती नीची कर दी गई है। लरजती हुई रौशनी में अपनी ज़रूरतों से गूँगी देह लिहाफ़ में मेरे नज़दीक अपनी ठंड से सूजी उंगलियों की खाज पर बेशिक़ायत नीम गरम कड़ुआ तेल लगा रही है। अभी एक ज़रूरी काम और बाक़ी है। क़िस्सागोई का काम। जिसमें उसे ख़ूब रस आता है। इससे ज़्यादा लज़्ज़तदार उसके लिए कोई दूसरा काम नहीं है। इन्हीं क़िस्सों से मैंने कई गूढ़ बातें जानी थीं, जैसे यह कि मेरी अंधी परदादी की आँखें कोई परेत चाट गया था। लाचार परदादी दिन-दिन भर भौंडी गालियाँ देती हुई हवा में उस पर अपनी लठिया फटकती थी, और यह भी कि घर के पीछे खड़े कैथ के पेड़ पर सावन के पूरे महीने किसी कंजरी की आत्मा रहती थी। जो बस हरी चूड़ी वाली औरतों को लपेटे में लेती थी। मुझे इन कल्प कथाओं पर कोई ख़ास अक़ीदा न था, मगर इन्हें सुनने का उछाह गाँव आने की सबसे बड़ी वजह होता।

आख़िर कौन थी वह क़िस्सागो! मैं उसे अम्मा बुलाती थी। वह मेरी माँ न थी। वह मेरे पिता की भी माँ न थी। किंतु हम दोनों को उससे एक-सा मातृत्व मिला। माँ जैसा नहीं माँ का ही लाड़। असल में वह पिता की ताई थी। तीन साल की उम्र में पिता की माँ न रही और तेरह की उम्र में मेरी। इस तरह अम्मा हम दोनों की माई हो गई। यादों की गीली चादर फटको तो नन्हीं बूँदों-सा कितना कुछ झड़ने लगता है। मेरे छुटपन में कार्तिक नहान के समय अगर मेरी वह मैया न होती तो मैं गंगा मैया के उदर में होती। मुझे डूबते देख अम्मा झट नदी में कूद पड़ी थी। उसने अपने छुटपन में पीठ पर ख़ाली कनस्तर बाँध कर तैरना जो सीखा था। ख़ैर मैं बच गई ।अम्मा ने कहा, “सब गंगा मैया की किरपा है।”

सफ़ेद किनारदार कलफ़ लगी धोती में अम्मा ख़ूब जँचती थी। साधारण-सी अंगलेट थी। कोई ऐसी शक़्लोसूरत न थी कि आँख न हटे। मगर यह कोई झूठ बात नहीं कि मुझे वह कोई ऋतंभरा लगती थी। किसी की भी निंदा और मज़म्मत से दूर। जिसने अपने मन पर ऐसा क़ाबू कर लिया उसे और क्या कह सकते हैं। क़िस्सागोई के इतर और कितनी ही बातें हैं कि अम्मा मुझमें कहीं रहती है। उसने मुझे ‘अतिथि देवो भव’ का पाठ पढ़ाया। अम्मा अन्नपूर्णा थी। उसके हाथ में कुछ ऐसी बरक़त थी कि मेरे होश में कभी उसका बनाया भोजन कम न पड़ा। कोई मंगता उसके द्वार से ख़ाली न गया। मुश्किल वक़्त में भी कटोरा भर आटा अम्मा ने ज़रूर दिया। कनागतों में तो आदमजात के अलावा कालू कुत्ता, बागेसरी गैया और कैथ के कउए भी ख़ूब जीमते थे। अम्मा मोहल्ले भर के बच्चों की जसोदा मैया थी। सब मिलकर दिन भर ऊधम मचाते मगर उसने फूल की छड़ी से भी किसी को न मारा। पेड़-पौधों के प्रति मेरा मोह अम्मा के तुलसी प्रेम से ही जागा। सांझ पड़े पौधों को न छूना यह सबक़ किताब से पहले अम्मा ने पढ़ाया।

अम्मा को सोचने बैठूँ तो ढेरों यादें मेरी पसंदीदा धुनों की तरह मेरे भीतर बजने लगती हैं। हैरानी का एक अछोर विस्तार मुझमें दूर तक फैलता जाता है। अम्मा ऐसी हक़ीम थी कि कभी कोई नुस्ख़ा उलटा न पड़ा। हिसाब की ऐसी पक्की जैसे कैलकुलेटर। सारे जोड़-घटाव उँगलियों पर ही कर लेती। पुरवा-पछुआ हवाओं से ही मौसम का मिज़ाज बता देती। वक़्त का ऐसा सटीक अंदाज़ कि घंटे तो दूर मिनट भी इधर-उधर न हो। पंचांग और कालदर्श का भी उसे पूरा ज्ञान था। एक और बड़ी ख़ूबी थी अम्मा की गायकी। भजन-आरती से लेकर सतिए-झांझी तक, चक्की-चरखे से गोधन-होली तक, जच्चा-बन्ने से टीका-जनेऊ तक के गीत अम्मा मगन होकर गाती थी। लेकिन मैं जिस गुण से सबसे ज़्यादा प्रभावित थी, वह अम्मा का कथक्कड़पना ही था।

मेरे लिए यह भी एक पहेली है कि अम्मा किस घड़ी में अपने मन में क़िस्सों के मसौदे तैयार करती थी।

क़िस्से सुनाने का कोई ख़ास वक़्त नहीं था न ही किसी बैठकी का इंतज़ार होता था। ये दैनिक कामों के साथ चक्की, चरख़े, ओखली और उबारे से उलझे हुए या झाड़ू बुहारी के दौरान भी सुनाए जा सकते थे। ठीक इसी तरह क़िस्से सुनने की भी कोई ख़ास शर्त या अदब नहीं था। बस क़िस्साख़्वानी के दौरान हर दो मिनट पर एक हुंकार भरनी होती थी। हूं... हाँ... अरे... ओफ़... च् च् च जैसी अभिव्यक्तियाँ क़िस्सागो की हौंसला अफ़ज़ाई का ढंग था। मेरे लिए यह भी एक पहेली है कि अम्मा किस घड़ी में अपने मन में क़िस्सों के मसौदे तैयार करती थी। एक शाम आँगन बुहारते वक़्त का एक क़िस्सा मुझे ख़ूब रोचक लगा था। यह उन दिनों की बात थी, जब बालों को चुटिल्ले में गूँथने का चलन था। मैं कोई सात-आठ साल की थी। यह कहानी कुछ यूँ सुनाई गई थी कि मैं चुटिल्ले वाली औरतों को देखकर डरने लगी थी। कहानी में एक फेरी वाला गाँव की बीसेक औरतों को चुटिल्ले बेच गया। सुनहरे फुंदने वाले रेशमी चुटिल्ले। साँझ को पति के लौटने के समय औरतें चुटिया बिंदी किया करती थीं। जाने क्या हुआ था कि रेशमी चुटिल्ले लगाने वाली सारी औरतों ने संदूकचियों से अपने ज़ेवरात निकालकर सिंगार किया और आधी रात होश खोई-सी जंगलात में निकल पड़ीं। सवेरे जब आँख खुली तो नंगी-बूँची। सारे ज़ेवर नदारद।

उस ज़ेहन में ऐसी कितनी ही तो अनुश्रुतियाँ थीं कितने ही क़िस्से। जिनका कहन निराला था। जिन्न-जिन्नात और भूत-परेतों के क़िस्से, मेरे परदादा और परदादी के क़िस्से, उल्टे पैरों वाली कानी चुड़ैल के क़िस्से। और क़िस्सागोई ऐसी कि भूत, परेत और चुड़ैलें आँखों के आगे रक़्स करने लगें। “चौमासे के दिन... अबेर हो रई तेरे भगवत ताऊ साइकिल पे इकले गुलावठी से लौट रए। जल्दी में भूड़ का रस्ता पकड़ लिया तो पीछे ऊँचे ठाड़े निमाड़ी बैलन की जोड़ी अर हाँकने वाला कोई ना। फेर के जो पिछवाड़ी देखा तो बैलन की जगह दो गज लंबे स्यांप...”

मुझे ऐसे क़िस्से ख़ूब रिझाते जिनकी तासीर आँखों देखे हाल की तरह होती। जिज्ञासा मेरा रोम-रोम बींध देती।

“अच्छा फिर क्या हुआ। भगवत ताऊ को साँप ने डस लिया?”

“काए को। तेरा ताऊ झट समझ गया के परेत रूप भर रा है। हलुमान चालीसा बाँचता घर को आ लिया तेरा ताऊ। बूढ़े बाबा कू चांदी के कटोरे में दूध चढ़ाने की बोल ली।”

“बूढ़े बाबा कौन?” मारे कौतूहल के मेरा सब्र टूट रहा था। मैं दम साधे सुन रही थी।

“अरी हमारे नाग बाबा। सगली अला-बला से रच्छा करैं। भुस के कोठरे में रहवैं।”

भुस का कच्चा अंधियारा कोठरा एक तरह का ईंधन भंडारघर था। उसमें जलावन के लिए अरहर के सूखे झम्बे, मकई की गिल्लियाँ और उपले भरे थे। एक ओर सरकंडे की बाड़ लगाकर गैया के लिए भूसा सहेजा गया था।

बाद उस रात के भुस का कोठरा मेरे लिए दहशत का सामान हो गया। बहुत समझाने पर भी मैं मानने को तैयार न थी कि कोई नाग या साँप हमारे लिए निरापद भी हो सकता है। तमाम रात मेरी कल्पना में धवल दाढ़ी वाला एक अज़दहा फन फैलाए फुंफकारता रहा। कई दिन मेरी आँखें सर्पदंश के डर से उनींदी रहीं। मैंने आँगन के आगे उस कोठरे से सटे बरामदे तक में पाँव धरने बंद कर दिए। फिर जब-जब गाँव गई मैं हर वक़्त बूढ़े बाबा की ख़याली आमद से चौकन्नी रही।

बूढ़े बाबा की तस्दीक़ के लिए मैंने ख़ूब मशक्क़त की। उस रात के दो रोज़ बाद की सुबह चूल्हा लीपती तिलस्मी  क़िस्सागो को मैंने कहा, “कल चक्की के पीछे मैंने इत्ता बड़ा चितकबरा साँप देखा।” नाग बाबा के वजूद की पुष्टि  के लिए उस चेहरे की भंगिमा को भाँपना ही मेरे पास इकलौती चाल थी। किंतु वहाँ किसी बनावट या प्रपंच का लेश भी न था, जिसे पकड़कर मैं सच को जान लेती।

“लाली ऐसे ना कैऐं करें। बूढ़े बाबा होंगे। दूध का कटोरा धर के हाथ जोड़ देती।”

सरल, सौम्य, नितांत निर्विकार चेहरा।

देह अवसान के समय भी वह चेहरा इतना ही सौम्य था। जब आँखें मूँदे अम्मा ने कहा था, “छोटी जी घबरा रा है। आँखों में तारे से दीख रए।” मुझे लगा था आसमान आज नीचे आ गिरेगा।

आज यह सब दोहराते हुए मैं मुस्करा रही हूँ कि कैसे उस दिन बात ही बात में पूरे कुनबे तक बात फैल गई थी, “हमारी छोटी ने बूढ़े बाबा देखे।” इससे पहले बूढ़े बाबा का अस्तित्व किसी एक के क़िस्सों का मोहताज था। अब दो लोग एक ही अफ़साना कह रहे थे। मुझ पर सवालों की झड़ी लगी थी, “कैसे दीखे हैं बूढ़े बाबा?” मैंने अपनी बाहों को जितना फैला सकती थी, उतनी दूर तक फैलाकर कहा था—“इत्तेsss  बड़े... चितकबरे।”

इस वक़्त इस क़िस्से को लिखते हुए मुझे उन हाथों और उन आँखों की अदम्य हूक उठी है। जी चाह रहा है मैं उन हाथों को थाम लूँ और उन आँखों में झाँककर कानाबाती करूँ कि अम्मा मैंने झूठ कहा था जो उस रोज़ कहा था। अब तुम भी कह दो ना कि कोई बूढ़े बाबा न थे। क़िस्सों की जिस ज़मीन की तुम बागबां हो मैं बस उसकी घसियारिन हूँ। मान गई तुम्हें तुम कमाल की अदाकारा हो। और सुनो... मैं तुम जैसी क़िस्सागो होना चाहती हूँ।

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