पार्टनर तुम्हारा ज़ोन ऑफ़ इंटेरेस्ट क्या है?
उज्ज्वल शुक्ल
20 जनवरी 2026
अरे भाई, मुझे नहीं चाहिए शिखरों की यात्रा
मुझे डर लगता है ऊँचाइयों से
बजने दो साँकल
उठने दो अँधेरे में ध्वनियों के बुलबुले,
वह जन—वैसे ही
आप चला जाएगा आया था जैसा।
—मुक्तिबोध (अँधेरे में)
होलोकॉस्ट और हिटलर की क्रूरता पर अनेक फ़िल्में समय-समय पर बनती रही हैं। इस लिस्ट में ‘शिंड्लर्स लिस्ट’ (Schindler's List), ‘लाइफ़ इज ब्यूटीफ़ुल (Life is Beautiful)’, ‘द ब्वाय इन द स्ट्रिप्ड पैजामाज़’ (The Boy in the Striped Pajamas) जैसी फ़िल्में प्रमुख हैं, जो सीधे नाज़ी कैंप की भयावहता से भरी हुई हैं। इन फ़िल्मों के दृश्य एक बार देखने पर जीवन भर के लिए स्मृतियों में दर्ज हो जाते हैं। 2023 में आई फ़िल्म ‘द ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट’ (The Zone of Interest) इसी लिस्ट में शामिल होती है, लेकिन यह इन सभी से बहुत भिन्न है। भिन्न इन संदर्भों में कि इस फ़िल्म के दृश्य में कहीं ख़ून की एक बूँद भी नहीं दिखाई देती है, कहीं सामने हत्या होती नहीं दिखती है, दृश्य में क्रूरता का शायद ही कोई क्षण मौजूद हो। फ़िल्म का लगभग हर दृश्य स्टिल कैमरा शॉट है। हर दृश्य में सफ़ाई का कंपल्सिवनेस इतना हावी है कि यह विकार उत्पन्न करने लगता है। दृश्यों की एकरसता में रह-रहकर दूर से आती गोलियों, ट्रेन की आवाज़ और चीखें हैं।
फ़िल्म एक जर्मन कमांडेंट रूडोल्फ़ हेस और उसके परिवार को दिखाती है। उसके परिवार ने आउत्शवित्श में घर बना लिया है, जहाँ साफ़-सफाई के लिए नौकर (यहूदी) रखे गए हैं। वे परिवार के दैनिक क्रियाकलापों और मौज के बीच बैकग्राउंड के रूप में दिखते हैं। रह-रहकर दूर से आती चीख़ें और गोलियों की आवाज़ किसी को प्रभावित नहीं करतीं। जहाँ एक ओर नौकर हर चीज़ को साफ़ करते रहते हैं, वहीं कमांडेंट की पत्नी मृत यहूदियों के सामान में से क़ीमती चीज़ें खोजती हैं और अपनी सहेलियों को दिखाती हैं; बच्चे कभी-कभी सैनिक खिलौनों और कभी मृतकों के सोने के दाँतों से खेलते हैं।
पूरी फ़िल्म में एकरसता का जो दृश्य है, वह कहीं भंग नहीं होता है। यह एकरसता वर्तमान परिस्थिति को दर्शाता प्रतीत होता है। हाना आरेंट द्वारा दिए गए टर्म ‘the banality of evil’ इस फ़िल्म का केंद्र है। वह कहती हैं—“तानाशाही सरकार का सार और शायद हर नौकरशाही का स्वभाव, मनुष्यों को प्रशासनिक तंत्र में मात्र पदाधिकारी और पुर्ज़े बनाकर उन्हें अमानवीय बना देना है।” यहाँ कोई विलेन नहीं है, कोई सेवियर नहीं है। बल्कि एक सामान्य नौकरशाह है, जो अपना काम कर रहा है। कमांडेंट रूडोल्फ़ आदेशों का पालन कर रहा है और होलोकास्ट की तैयारी में लगा रहता है। वहीं उसका परिवार इन सभी परिस्थितियों में मौज करता है। बड़ी दीवार के उस पार से ट्रेन धुआँ उड़ाते हुए गुज़र जाती है। चीख़ें और गोलियाँ बस कुछ दिन के लिए आई कमांडेंट की सास को रात में डराती हैं, जो अगली सुबह किसी को बिना बताए वहाँ से चली जाती है। लेकिन कोई डर, उत्साह अथवा अपराधबोध का भाव लाउड नहीं होता। फ़िल्म का निर्देशन बिल्कुल दृष्टा भाव से किया गया लगता है—कहीं भी कोई भी बात ऐसी नहीं दिखती जो करुणादि भावों से प्रेरित हो और न ही कहीं यहूदियों के प्रति नफ़रत का एक शब्द। एक स्थान पर कमांडेंट की पत्नी अपनी नौकरानी से बातचीत के लहजे में कहती है, “मैं तुम्हारी राख अपने पति से बेबीच के खेतों में बिखेरवा सकती हूँ”। लेकिन यहाँ भी कोई तीव्र अनुभाव नहीं दिखते मानो यह सामान्य-सी रोज़मर्रा की बात हो। समस्त निर्णय दर्शकों पर छोड़ दिए जाते हैं। इस सामान्यता में घटित हो रहा नरसंहार समकालीन प्रश्नों से जुड़ता है। सामान्यता में जीवन यापन कर रहे लोग कहाँ और किस अमानवीयता को अंजाम दे रहे हैं, क्या उन्हें यह पता है? लोग कमांडेंट की तरह अपने परिवार के साथ घूमने-फिरने और काग़ज़ पर हस्ताक्षर करने वाले भी हो सकते हैं। फ़िल्म में कैमरों की स्थिरता भी सामान्य जीवन की एकरसता की ओर इंगित करती है।
सफ़ाई के प्रति एक जुनून, कमांडेंट और फ़िल्म के टोन में एक मनोवैज्ञानिक पक्ष भी जोड़ता है। कमांडेंट तो इस क़दर सफ़ाई के प्रति पागल रहता है कि एक दृश्य में वह किसी यहूदी महिला से सेक्स करने के बाद घर के नीचे टनल से दूर जाकर एक अंडरग्राउंड कमरे में अपने निजी अंगों को साफ़ करता है। वहीं दूसरी ओर उनके घर के पास की नदी में मृतकों की राख भी बहती है। एक दृश्य में तो कमांडेंट अपने घर की फ़सलों में राख छिड़क रहा होता है। इसी राख से उपजे फल और सब्ज़ियाँ पूरा परिवार खाता भी होगा। अंत में कमांडेंट की बिगड़ती तबीयत शायद यहीं से प्रेरित है। राख और धुआँ दोनों में प्रतीकात्मकता है। कमांडेंट अपने बच्चों पर और ख़ुद पर उस राख का एक अंश भी नहीं चाहता है।
फ़िल्म क्रूरता को कई स्तरों पर जाकर एक्सप्लोर करती है। पिता अपनी बेटी को रात में क़िस्से पढ़कर सुना रहा है, पत्नी बाग़वानी कर रही है, बच्चे मासूमियत से खेल रहे हैं और उस खेल में बड़ा लड़का छोटे को एक ग्रीन हाउस में बंद कर गैस चेंबर की भाँति ‘हिस्स्स्’ की आवाज़ निकाल रहा होता है। इसलिए क्या विश्वास किया जा सकता है कि इतना मासूम पिता हज़ारों लोगों को एक साथ जला देने वाली मीटिंग से भी भाग लेता है? ये जो मन की परतें हैं, जहाँ एक ही व्यक्ति अपने जीवन के अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग आचरण करता है—मनुष्य की प्रकृति और मनोविज्ञान को टटोलती है। हम किसी व्यक्ति को एक स्थान पर अत्यंत सौम्य मान सकते हैं, वहीं दूसरे स्थान पर वह क्रूरता के उच्चतम शिखर पर भी हो सकता है। ऐसे में मनुष्य के विवेक और चेतना से जुड़े प्रश्न भी उभरकर सामने आते हैं। वहीं बच्चे का गैस चेंबर का खेल खेलना भी भयानक लगता है। जहाँ एक ओर फ़्रंट लाइन पर लोगों को मारने और जलाने वाले लोग हैं, वहीं दीवार के इस पार ऐसे लोग जो इसकी योजना बनाते हैं, पत्नी, जिसे अपने लिए मिलती कीमती चीज़ें एवं घर—सपने का सच होना लग रहा है और बच्चे, जिन्हें ये खेल लगता है।
फ़िल्म में एक और महत्त्वपूर्ण दृश्य निगेटिव कलर शेड में आता है। जब रात में एक बच्ची मज़दूरों के लिए नहरों, खेतों, उनके ढेलों में फल छुपा रही है। दो बार आया यह दृश्य इस फ़िल्म में संभवतः दर्शक को अपना ज़ोन तलाशने को कहती है।
भयावह लेकिन धीमी आवाज़ें, सुंदर और सफ़ाई से भरे दृश्य और निगेटिव शेड के कुछ दृश्य ही ‘ज़ोन ऑफ इंटरेस्ट’ के मूल में है कि कहाँ किसका ज़ोन है। फ़िल्म का आख़िरी दृश्य वर्तमान आउत्शवित्श में होती साफ़-सफ़ाई और सलीक़े से रखे गए हर सामान को दिखाकर क्या कमांडेंट की मानसिकता को ही नहीं सामने रखती है? जहाँ क्रूरताओं के अवशेष भी ढंग से रखे जा रहे हैं और चारों ओर उसी बारीक़ी से सफ़ाई की जा रही है, यहाँ तक कि गैस चेंबर भी। यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन यह फ़िल्म इसी एस्थेटिक के विरुद्ध अपना स्टैंड लेती है। यह स्वच्छता से भरपूर साफ़ एस्थेटिक की सुविधा किसे है? क्या उन्हें जिनके पास संसाधन होने चाहिए या जो सामान्य जीवन जीने के नाम पर किसी-न-किसी प्रकार से संसाधन छीन लेते हैं? लेकिन क्या वह दोनों के पास हैं और प्रदर्शन के माध्यम छीन लिए गए हैं?
निःसंदेह आज हम होलोकास्ट जैसी स्थिति में नहीं हैं। फिर भी आर्थिक असमानता का एक रूप है, जिसमें हर व्यक्ति के सामाजिक सरोकार अपने आप और अपने काम तक सीमित हैं। शायद हमें ज्ञात भी न हो कि हम किन अमानवीय परिस्थितियों का निर्माण कर रहे हैं। जैसे कमांडेंट का अपनी पत्नी से अंत में यह पूछना कि क्या वह इतने बड़े कमरें में गैस भर पाएगा जिसकी दीवारें बहुत ऊँची हैं। यहाँ उसकी चिंता यहूदियों के पक्ष में नहीं बल्कि अपने काम को पूरा करने की योग्यता पर है। यह फ़िल्म उन पर कमेंट्री है और प्रश्न रखती है कि ‘आपका ज़ोन ऑफ़ इंटरेस्ट क्या है?’, ‘क्या आपको आवाज़ें सुनाई देती हैं?’
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