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‘बाघ का भाग्यफल और अन्य कहानियाँ’ : धर्म-सत्ता-प्रेम का त्रिकोण

लिखने की मोहलत के लिए मृत्यु को ही अपनी किताब सादर समर्पित करता लेखक मृत्यु से तो भिड़ ही रहा है, साथ ही उसकी वैचारिक मुठभेड़ अपने समय के अजीब, अप्रिय, भ्रामक, भ्रष्ट, कुव्यवस्था के सामाजिक, राजनीतिक, पारिवारिक ढाँचे के साथ भी चल रही है। छद्म राष्ट्रवाद, सनातन धर्म, दर्शन का मुखौटा ओढ़े भारतीय ज्ञान परंपरा का शोर, हायर एजुकेशन के सेमिनार और बड़बोले नेता की प्रचार रैली सब घुल-मिल गई है। ख़ैर, सनातन शब्द इन दिनों मुझे अनिल यादव के इसी वर्ष प्रकाशित हुए कहानी संग्रह ‘बाघ का भाग्यफल और अन्य कहानियाँ’ में एक किरदार के रूप में मिला। 

सनातन कुमार पांडेय ‘बाइक और पर्स’ कहानी का केंद्रीय पात्र है, जो एक यूनिवर्सिटी में रिसर्च स्कॉलर है। कहानी कहती है कि यह देश की सबसे आधुनिक यूनिवर्सिटी है। जहाँ सनातन, संस्कृत विभाग में वात्स्यायन के ‘कामसूत्र’ पर पीएचडी कर रहा है। वार्डन का नोटिस, हीटर पर छापेमार दस्ते का क़ब्ज़ा और जुर्माना—यह सब छात्रों पर नियंत्रण की आधुनिक प्रचलित प्रथा है। सनातन सोचता है कि छात्रों पर नियंत्रण तो गुरुकुल के समय भी था।

“वात्स्यायन ने गुरुकुलों में छात्रों को सोने के लिए दी जाने वाली विशेष वनस्पति के रेशों से बनी चटाइयों का वर्णन किया है, जिन पर वीर्य के दाग़ जितने धोए जाएँ उभरते जाते थे। यह छात्रों के यौन जीवन अथवा ब्रह्मचर्य पर नज़र रखते हुए अनुशासन बनाए रखने की एक प्रविधि थी।” (‘बाघ का भाग्यफल’, पृष्ठ : 69)

सनातन जुर्माना भरने के बाद भगवा पहनने लगा। वह भगवे रंग के यंत्र की ख़ूबी से परिचित हो चुका है।

“उसने प्रयोग करके जान लिया कि उसके नाम, जाति और व्यक्तित्व के पीछे युगों लंबी और योजनों गहरी एक रहस्यमय खाई है, जो बाध्यकारी ढंग से पवित्र और श्रेष्ठ है। उस खाई से निकलने वाली धर्म, परंपरा, नैतिकता की तरंगें भगवा कपड़ों पर ही पड़कर दिखाई देती हैं, वरना अदृश्य होकर गुज़र जाती हैं। हज़ारों सालों में इस रंग का कपड़ा एक यंत्र में बदल चुका है, जिसका इस्तेमाल करके संस्कृत का अध्यापक आसानी से हुआ जा सकता है। उसने अध्यापकों पर प्रभाव से समझ लिया कि जितनी पात्रता कोई अध्ययन, जुगाड़ और इंटरव्यू के तैयारी से हासिल करेगा, उससे कई गुना अधिक सिर्फ़ इसको पहनकर खड़े रहने से आ जाती है।” (‘बाघ का भाग्यफल’, पृष्ठ : 71)

सुगंधा और सनातन पहले दोस्त हैं, फिर प्रेमी। सुगंधा सुब्रह्मण्यम वुमन स्टडीज फ़र्स्ट ईयर में है। वह तर्कशील, आज़ाद ख़यालों वाली आधुनिक लड़की है। अभिनव, सनातन का छोटा भाई है, जो इस कहानी में भगवा रंग से इस्तेमाल से राजनीति के शिखर तक पहुँचना चाहता है। वह सुगंधा और सनातन को साथ नहीं देखना चाहता। यहाँ धर्म और रंग का कोई नया प्रयोग नहीं है। धर्म और राजनीति में दबदबा बनाने की पहली शर्त ही जैसे यह विशेष रंग मान लिया गया है।

कहानी पढ़ते हुए कई बार लगा जैसे यह तो हमारे समय की कई यूनिवर्सिटीज़ में घटित घटनाओं पर आधारित है। अनिल यादव, आज के समय की विसंगति को कथा रूप देने में माहिर हैं। मीडिया किस तरह मंत्रियों के बयान से किसी विश्वविद्यालय का चरित्र तय करती है, यह इस कहानी में उजागर किया गया है।

“उन्हीं दिनों एक मंत्री ने बयान दिया कि ‘इस यूनिवर्सिटी के छात्रावासों के डस्टबिनों से शराब की बोतलें और इस्तेमाल किए गए कंडोम बरामद होते हैं, देश के लिए दिन-रात मेहनत करने वाले टेक्सपेयर के पैसों से यहाँ व्यभिचार और देशद्रोह का अड्डा चलाया जा रहा है, ऐसी यूनिवर्सिटी को फ़ौरन बंद कर देना चाहिए।’ मंत्री को हर चीज़ से घृणा थी। वह संपत्ति, शराब, अच्छा खाना, सेक्स, और सम्मान सिर्फ़ अपने लिए चाहता था, बाक़ी लोगों को आज्ञाकारी विनम्र दास के रूप में देखना चाहता था।” (‘बाघ का भाग्यफल’, पृष्ठ : 73, 74)

मीडिया इसी बयान के आधार पर यह कह देना चाह रही है कि बिना सेक्स और शराब के पीएचडी ही नहीं पूरी हो सकती। सनातन को मीडिया ने पहले ही उसके कपड़े के रंग के कारण हिंदू संत और सनातन का आधिकारिक प्रवक्ता मान लिया, सोशल मीडिया पर उसके बारे में अनेक कहानियाँ चल निकली। अंधी आस्था और तंज़ के कोटेशन सोशल मीडिया पर तैरने लगे—अनपढ़ बाबाओं के मेले में चलो एक पीएचडी बाबा तो मिला, वह अनपढ़ों से अच्छा होगा... हर संत का एक अतीत होता है और पापी का भविष्य।

सुगंधा के तर्क से सनातन सहमत होता है। लेकिन अभिनव, सुगंधा को सेकुलर बताकर उससे दूर रहने को कहता है। पॉलिटिक्स का खेल भी यही है, भेड़ बनिए। वह सनातन से ‘सनातन स्वामी जी’ बना दिए गए। भारत माता का मंदिर भी कैंटीन में बन जाता है और चढ़ावा चढ़ने लगता है।

मंत्री के बयान को सनातन मंत्री की दिमाग़ी उपज बताता है। काम, संभोग और सेक्स के अंतर को बताते हुए वह कहता है कि भारतीय ग्रंथ परंपरा के अनुसार संवैधानिक पद पर बैठे किसी व्यक्ति को जो सुख मिलता है वह भी ‘काम’ है।

मंत्री और सरकार को युवाओं की इतनी ही चिंता है तो यूनिवर्सिटी में पहले उन्हें बधिया करना चाहिए, फिर एडमिशन देना चाहिए।

सुगंधा को बाइक पर बैठने से हँसी आती थी, सनातन के लिए यह रहस्य ही रहता है।

कहानी में क्रिकेट का रोमांच भी है। भारत-पाकिस्तान का मैच है, उसमें भी राजनीति है। राजनीति के दख़ल ने खेल को मनुष्य की तरह देखना भी असंभव बना दिया है। अब या तो खेल देखने वाला खेल में डूबकर देश से दूर हो जाए या चिल्लाकर देश के क़रीब रहे। भारत और पाकिस्तान के मैच में पाकिस्तान मुर्दाबाद बोलने वाला देश और खेल की क़रीबी एक साथ साध लेता है। यूनियन चुनाव में धर्म और नफ़रत का मुद्दा अभिनव की पार्टी ने सनातन के नाम से परोस दिया। सुगंधा ने उसके पूरे खेल को चुनाव के दिन ही सनातन की इमेज स्वामी के खाँचे से बाहर निकालकर जींस, खुली बटन वाले शर्ट, गॉगल, बाइक, पोलिंग बूथ और सेल्फ़ी खच्चाक... से बदल दिया। पोस्ट, शेयर, टैग... सोशल मीडिया । हर हाथ में सूचनाएँ उगलता एक फ़ोन, एक इमेज ओपिनियन, समीकरण, नतीजा सबकुछ बदल सकता है।

अभिनव और उसके साथी सुगंधा, सनातन और ग़नीमत को बाइक से खींचकर हेलमेट से ख़ूब मारने लगते हैं। तीनों के सिर से रिसता ख़ून, उनके चेहरों पर बह रहा था। वे चिल्लाते हुए बेहोश हो गए। कुछ देर बाद एम्बुलेंस आई, उन्हें लेकर अस्पताल चली गई। अब मुद्दा बदल गया था। सनातन-सुगंधा के प्रेम और ग़नीमत की दोस्ती पर क्रुद्ध वोट पड़ने लगे। दोपहर तक की वोटिंग के बाद छात्र-संघ चुनाव के इतिहास में सबसे ज़्यादा इसी बार रिकार्ड वोटिंग हुई। अस्पताल में घायलों के घावों की ड्रेसिंग, टूटी हड्डियों पर प्लास्टर की इमेज से लग रहा है जैसे संस्था की ही ड्रेसिंग हुई, घाव भरे... बेहोशी है फिर भी...

अनिल यादव इस कहानी के माध्यम से आज के ढोंग, अंधविश्वास, नफ़रत, और राजनीतिक, एकेडमिक सफलता के शॉर्टकट फ़ार्मुलों की धज्जियाँ कुशलतापूर्वक उड़ाने में सफल हुए हैं। सनातन और सुगंधा के प्रेम से परिवर्तन और संघर्ष का जीत जाना, कुंद माहौल में भी उनके सकारात्मक दृष्टिकोण का परिचायक है। कहानी पढ़ते हुए उनकी कुछ सूक्तियाँ दिमाग़ में छप जाती हैं :

‘समय प्रेम के अधीन है मेरे नहीं, उसकी व्यवस्था की प्रेरणा खोजिए।’

‘एक बाबा और तमाम प्रकार के ईश्वरों के बीच इस संसार में जो कुछ अस्तित्वमान है, वह सब का सब कहानियों से बना हुआ है।’

‘अगर आज़ादी सिर्फ़ शब्दजाल नहीं है, उस परमेश्वर के समक्ष सभी समान हैं, अगर उनमें वही टिमटिमा रहा है तो एक नीलगाय, एक लोमड़ी और एक युवा की आज़ादी में कोई अंतर नहीं है।’

हमारे आस-पास कितनी समस्याएँ हैं, जिन पर हम पोस्टरों और प्रचारों के शोर में बात नहीं करना चाहते। अनिल यादव इस कहानी में उन समस्याओं का ज़िक्र बख़ूबी करते हैं :

तुम्हारा देश काल्पनिक है जो कल ‘सोने की चिड़िया’ था, कल ‘विश्वगुरु’ और परसों ‘सुपर पावर’ होने वाला है। ऐसा ‘सुजलाम सुफलाम शस्य श्यामलाम’ कि रत्ती भर कोई खोट हो ही नहीं सकता, लेकिन मेरे देश के ज़्यादातर जंगल कट चुके, ग्लेशियर नंगे हो गए, ज़मीनें हाथी के दाँत जैसे देशभक्तों के पास जा चुकीं, जलवायु बदल गई, मैले आँचल वाली भारत माता की शक्ल भूखे, अनपढ़, अधनंगे धर्मांध लोगों जैसी है—जिसका मंदिर बनाना वैसा ही छल है जैसा नवरात्र में लड़कियों को थोड़ी देर के लिए देवी कहकर सम्मानित किया जाता है।

इस कहानी में एक ओर हायर एजूकेशन में धार्मिक उन्माद की बढ़ती प्रवृत्ति, उस पर रोटी सेंकते मंत्री, दूसरी ओर पितृसत्ता का वह चेहरा जो सनातन और उसके पिता के संवाद से सामने आता है, बेटों पर अपनी उम्मीदों के बोझ लादने की चालाकी, इन सबमें पिसता युवा सनातन अंत में सुगंधा के प्रेम को स्वीकार कर नफ़रत को ठेंगा दिखा देता है। लेखक जिस परिवर्तन की उम्मीद इस कहानी में कर रहे हैं, वह आज के दौर में मुश्किल तो हो सकता है, नामुमकिन नहीं।

अगर आप किसी विशेष धर्म दर्शक चश्में से कहानी देखेंगे तो आपको निराश होना पड़ेगा। सेक्स, कंडोम, शराब, सिगरेट सब आपके मानकों के ख़िलाफ़ मिलेगा। बाक़ी कहानी के पाठक के तौर पर आप इसे नकार नहीं सकते हैं, असहमत हो सकते हैं। लेखक की लंबी उम्र की दुआ के साथ बशीर बद्र का यह शे’र :

दुआ करो कि ये पौदा सदा हरा ही लगे
उदासियों में भी चेहरा खिला खिला ही लगे

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~ अनिल यादव की एक कहानी यहाँ पढ़िए : नगरवधुएँ अख़बार नहीं पढ़तीं
~ अनिल यादव का इंटरव्यू यहाँ सुनिए : संगत

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