ओपेनहाइमर से ओडिसियस तक : साम्राज्यवादी महानायकों का खोखलापन
अभिषेक कुमार सिंह
30 जुलाई 2026
क्रिस्टोफ़र नोलन की ‘द ओडिसी’ की सनसनीख़ेज़ समीक्षाओं की होड़ में कश्मकश करने से पहले सबसे ज़रूरी है कि इस होड़ के पीछे की सोच की समीक्षा करना। आख़िर क्यों और कैसे लोक-कथाओं और पुराणों की समृद्ध संस्कृति वाले इस देश में एक ख़ालिस पाश्चात्य महाकाव्य का सिनेमाई रूपांतरण इस मानसून में हमारी चेतना के खेतों में इतनी जिज्ञासा की रोपाई कर दे रहा है कि उसकी फ़सल काटने में सेमिनार हॉलों से लेकर अँग्रेज़ी और हिंदी दोनों के मीडिया हाउस तक दम भर वर्जिश करते दिखाई दे रहे हैं?
ओडिसी के दर्शन और नोलन साहब के क्राफ़्ट पर कुछ भी कहने से पहले मुझे आज फिर उनकी ही एक दूसरी फ़िल्म याद आती है—‘ओपेनहाइमर’। शायद यही महीना और यही मौसम था, बस बात लगभग तीन साल पहले की है। ‘ओपेनहाइमर’ और ‘बार्बी’ एक साथ भारतीय बाज़ार में आई थीं, लेकिन एक नितांत वैज्ञानिक द्वंद्व पर आधारित ‘ओपेनहाइमर’ अभूतपूर्व ढंग से बाज़ार और विमर्श—दोनों पर छा गई।
वह देश जहाँ आम बोलचाल, आम जीवन के लक्ष्य और वैज्ञानिक समझ—तीनों के बीच गहरी दूरी मौजूद है, वहाँ न्यूक्लियर फ़िज़िक्स पर बनी एक फ़िल्म का इतनी बड़ी व्यावसायिक और बौद्धिक सफलता हासिल करना अपने आपमें एक दिलचस्प घटना थी। इस दौरान भारतीय मीडिया और सोशल मीडिया के एक बड़े हिस्से में इस बात को विशेष रूप से उभारा गया कि दुनिया को परमाणु बम देने वाला वैज्ञानिक भगवद्गीता के दर्शन से गहरे प्रभावित था। “अब मैं काल हूँ…” वाले उद्धरण को बार-बार दोहराया गया और एक व्यापक जिज्ञासा पैदा हुई कि शायद पश्चिम का आधुनिक विज्ञान किसी गहरे भारतीय दार्शनिक स्रोत से जुड़ता है। देखते-देखते ‘ओपेनहाइमर’ की जीवनी भी बेस्टसेलर सूची में पहुँच गई।
अब लौटते हैं नोलन और ओडिसी पर : इस बार भी भारतीय प्रचार और सोशल मीडिया में तेज़ी से यह तुलना स्थापित होने लगी कि ‘ओडिसी’ पश्चिम की ‘महाभारत’ है। भारत की अपनी महाकाव्य परंपरा के प्रामाणिक संस्करणों से अक्सर अपरिचित समाज के लिए यह तुलना अपने आपमें पर्याप्त आकर्षण बन गई। ऊपर से यह भी प्रचारित हुआ कि फ़िल्म अत्याधुनिक आईमैक्स कैमरों पर फ़िल्माई गई है और उसकी तकनीकी भव्यता को भारत के अधिकांश सिनेमाघर पूरी तरह प्रदर्शित ही नहीं कर सकते। फिर क्या था—क्या आम, क्या ख़ास—हर कोई उस अनुभव का हिस्सा बनने को बेचैन दिखाई देने लगा। वही पुराना फ़ोमो फिर अपना काम कर गया।
ख़ैर, साहित्य की आलोचनात्मक व्याख्या करना बहुत तार्किक अभ्यास नहीं माना जाता, फिर भी ‘ओडिसी’ मेरे लिए साम्राज्यवाद की एक लंबी और वीभत्स यात्रा की खिड़की भी है और उसका आईना भी। कहानी कई क़बीलाई राज्यों की है; ज़मीन और वर्चस्व की लड़ाई है; राजा की संप्रभुता स्थिर नहीं है, उसे बार-बार अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है; रानी की निजता और सत्ता राजा की उपस्थिति पर निर्भर है; षड्यंत्र हैं; देवताओं से दबा और दानवों को दबाता मनुष्य है; और अंततः आख़िरी विजय के बाद एक ऐसी अनंत पराजय है जो भीतर खिलती रहती है।
अब तो बच्चे और शायद उनके भी बच्चे जान चुके हैं कि ‘ओडिसी’ में लोग अपनी सुविधा के अनुसार ‘महाभारत’ भी खोज लेते हैं और ‘रामायण’ भी। इथाका के राजा ओडिसियस की विजय के बाद की अंतहीन निराशा, भटकाव और विघटन की तुलना पांडवों के उत्तरजीवन से की जाती है। ट्रॉय विजय में ट्रोजन हॉर्स की युक्ति को कहीं अश्वत्थामा और भीष्म के प्रसंगों के साथ रख दिया जाता है। समुद्र के देवता पोसाइडन का क्रोध, अजनबी द्वीप, शापित जादूगरनी, एक आँख वाला दैत्य, महाकाय शक्तियों से मुठभेड़ और अंत में धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर असंभव प्रतीत होने वाली परीक्षा—इन सबकी तुलना समय-समय पर भारतीय महाकाव्यों की विभिन्न घटनाओं से की जाती रही है। ये समानताएँ निश्चय ही तुलनात्मक अध्ययन का विषय हो सकती हैं, लेकिन इन्हें प्रत्यक्ष ऐतिहासिक प्रभाव मान लेना जल्दबाज़ी होगी।
यक़ीनन कोई न कोई देवदत्त पटनायक या अमीश त्रिपाठी जैसी लोकप्रिय व्याख्याओं की परंपरा से जुड़ा विमर्श फिर आर्यों के उद्भव और भारतीय तथा यूरोपीय मिथकों की समानताओं पर नई बहस खड़ी करेगा। लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में हम फिर एक बार साम्राज्यवादी महानायक को रोमानी आभा से ढक देने वाले सांस्कृतिक बाज़ार में ख़रीदार बनकर प्रवेश कर जाते हैं।
कभी सिकंदर की खाली हाथ लौटने वाली कथा, कभी ओपेनहाइमर का आत्मसंघर्ष, कभी ओडिसियस की त्रासदी—हर बार एक नया चेहरा होता है, लेकिन महानायक का मिथक लगभग वही रहता है।
दिलचस्प प्रश्न यह है कि आख़िर क्यों साम्राज्यवादी विजय का यह महानायक अंतिम जीत के बाद स्वयं से ही हार जाता है? यदि पश्चिमी साहित्य सदियों पहले से विजय की इस त्रासदी और उसके नैतिक शून्य को पहचानता रहा है, तो फिर वही सभ्यता बाद में उपनिवेशवाद की सबसे निर्मम परियोजनाओं तक कैसे पहुँची? स्पेन, पुर्तगाल, फ़्रांस और ब्रिटेन जब दुनिया के बड़े हिस्से को निचोड़ रहे थे, तब क्या यह आत्मालोचन केवल साहित्य तक सीमित रह गया था?
बात शायद इतनी-सी है कि पश्चिम का साहित्य अपनी अंतर्विरोधी कमियों को भी अद्भुत कलात्मकता के साथ प्रस्तुत करना जानता है। वहाँ आत्मालोचना भी अंततः सांस्कृतिक पूँजी बन जाती है। श्रेष्ठता का मिथक भी बना रहता है और बाज़ार भी फैलता जाता है। नव-उपनिवेशवाद कई बार बंदूक़ की नली से नहीं; बल्कि कथा, मिथक, सिनेमा और सांस्कृतिक आकर्षण के रास्ते लौटता है और हम जाने-अनजाने उसकी महफ़िल में शामिल हो जाते हैं।
वह महानायक कभी सिकंदर में लौटता है, कभी नेपोलियन में, कभी ओपेनहाइमर में, कभी ओडिसियस में। कभी-कभी वह किसी समकालीन राजनीतिक व्यक्तित्व में भी अपने नए रूप गढ़ लेता है। चेहरे बदलते रहते हैं, पर विजय के मिथक की संरचना बहुत कम बदलती है।
नोलन की ओडिसी की शुरुआत में पर्दे पर सबसे पहले लिखा आता है—“एक ऐसा दौर… जब सब कुछ जादुई था।”
बस यही एक पंक्ति या तो सब कुछ बता देती है या फिर सब कुछ छिपा लेती है... और शायद नोलन अनजाने ही यह भी स्वीकार कर लेते हैं कि सर्वश्रेष्ठ की खोज अक्सर मनुष्य को उसकी सबसे गहरी शिकस्त तक ले जाती है।
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