साहित्य और संस्कृति की घड़ी
एक समय था जब मैं केवल एक फूल था किसी सरोवर का। मैं उस दिन सबसे अधिक प्रसन्न था, जिस दिन मेरा कोई नाम नहीं था। सूरज का प्रकाश मेरे ऊपर उतरता था, जल मुझे अपनी गोद में थामे रहता था और ओस की बूँदें आसमान
जीवन को अपनी इच्छा से जीने का रोमांच कितना सुंदर होता है! जीवन के रोमानी बोध मात्र से हृदय खिल उठता है, आस-पास के वातावरण में स्निग्धता घुल जाती है। अनचाहे दृश्य और अनचाहे शोर भी सुंदर लगने लगते हैं।
14 अक्तूबर 2026
नए साल का पहला महीना जब आधा बीतने को था, मैं गए बरस की यादावरी में रही। तमाम लोग अपनी दीवारों पर बीते बरस के नफ़े-नुक़सान का हिसाब-किताब लगाकर, क्या खोया-क्या पाया लिख चुके थे। साल-ए-नौ की आमद का जश्
थिएटर की बत्ती बुझती है। स्क्रीन पर किसी गंभीर दृश्य की नींव रखी जा रही होती है। नायक का दिल टूटने वाला होता है या सस्पेंस अपनी पराकाष्ठा पर होता है। और ठीक उसी पल आपके दाहिने या बाएँ कान के पास से आ
11 अक्टूबर 2026, रविवार दिल्ली विश्वविद्यालय के साउथ कैंपस की लाइब्रेरी में बैठा हूँ। दिल्ली में आज सीजेपी का तमाम युवा संगठनों के साथ प्रोटेस्ट है। कई साथियों की तरह बनारस से भी एक साथी का फ़ोन
6 अक्टूबर 2026 की शाम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के महिला छात्रावास के आस-पास कुछ अलग हो रहा था। शाम लगभग पाँच बजे छात्रावास के सामने लोग जमा होने लगे। थोड़ी ही देर में इस प्रदर्शन में करीब 300-350 लोग श
गिरि, इस बार मेरी उमा आए तो अब उमा को नहीं भेजूँगी, मुझे कहकर लोग चाहे बुरा कहें, किसी की बात नहीं सुनूँगी। यदि आकर भोला [शिव] उमा को ले जाने की बात कहे, इस बार माँ-बेटी मिलकर करूँगी झगड़ा,
शेरू हमारे परिवार का, मेरे जानने में, पहला और आख़िरी पालतू कुत्ता था। बड़े भाई साहब उस समय 14-15 साल के रहे होंगे, जब वह उसके दूध-से सफ़ेद रंग और नई दुल्हन-सी अधखुली आँखों की मासूमियत पर फ़िदा हो गए।
प्यारेलाल जी पधारे। प्रसन्नता नहीं हुई, कोफ़्त हुई। तंगदिल नहीं हूँ, संगदिल भी नहीं। आगंतुक को समय-कुसमय का ख़याल रखना चाहिए। उनके जैसा कुँवारा तो नहीं हूँ; बाल-बच्चेदार हूँ, नागरिक ज़िम्मेदार हूँ। स
12 अक्तूबर 2026
गदहे को इंसानी समाज ने हमेशा से ही तुच्छ प्राणी समझा है। इसीलिए प्राणी संग्रहालय में गदहे को छोड़कर सब प्राणियों को रखा गया। क्या गदहों को इंसानों की इस हरकत का बुरा नहीं लगता होगा? गदहा हमेशा से