साहित्य और संस्कृति की घड़ी
11 सितम्बर 2026
आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश्
कुछ शहर देखे नहीं जाते, जिए जाते हैं। कुछ शहर ऐसे होते हैं जिन्हें देखने के बाद भी आप उन्हें पूरी तरह देख नहीं पाते, क्योंकि वे अपने दृश्य से कहीं अधिक अपने स्वभाव में बसे होते हैं। न्यूयॉर्क मेरे लि
चइत की एक शाम अस्सी घाट पर चइत [चैत] चल रहा है। गुलमोहर में लाल-लाल फूल आ गए हैं। महुए रस से भर गए हैं। दिन-रात टप-टप-टप चू रहे हैं। आम के मंज़र अब टिकोरे में बदल गए हैं। गेहूँ की बालियाँ पक गई है
घर से निकलकर अगर पेड़-पौधों पर नज़र दौड़ाई जाए तो क्या इनके इतिहास का पता लगाया जा सकता है? ये अचानक यहाँ आकर तो खड़े नहीं हुए। इनके जन्म, वृद्धि और विकास की भी अपनी कहानी है, जिसे स्पष्टतः कोई नहीं
कुछ दिनों पहले मलिका अमर शेख की आत्मकथा ‘मैं बर्बाद होना चाहती हूँ’ पढ़ी थी। उसमें मलिका ने अपने विवाहित जीवन की पीड़ा को बिना किसी लाग-लपेट के उघाड़कर रख दिया था। हाल ही में ‘रेत की मछली’ उपन्यास पढ
यह पत्र विजयदान देथा का चंद्रप्रकाश देवल (सी.पी. देवल) को लिखे एक सीख-रूपी पत्र का अनुवाद है। संयोग से सी.पी. देवल विजयदान देथा के जँवाई हैं। सो, इस पत्र में उनका ‘ससुर’ रूप भी सीख के बहाने बीच-बीच म
08 सितम्बर 2026
गताध्याय से आगे... ग्यारह “सोने का मुकुट नहीं चाहिए था, चाँदी का चँवर भी नहीं चाहिए था। साहित्य का सिंहासन लेकर क्या करता, मेरा चूतड़ उस पर बैठने से इंकार कर देता। राजाओं के दरबार में जगह-वजह च
वर्ष 1993 में कानपुर से शुरू हुए रचनात्मक व बौद्धिक हस्तक्षेप के सहकारी उपक्रम ‘संगमन’ का 26वाँ आयोजन देश के विभिन्न राज्यों से गुज़रता हुआ इस बार भोपाल (मध्य प्रदेश) में हो रहा है। तारीख़ें हैं—2-3-4
ध्यातव्य है कि यह वर्ष कुँवर नारायण की जन्मशताब्दी का वर्ष है। इसी उपलक्ष्य में ‘अर्थात्’ की सातवीं गोष्ठी आयोजित की गई, जिसके तहत कविता के बहाने मनुष्य को समझने का प्रयास शामिल था। इस कड़ी में कुँ
• भादों-विहार भादों दूभर महीना माना गया है। सावन की झँकोर जवानी उसमें नहीं होती। भादों की बरखा से धरती के कोश भर जाते हैं। सावन में धरती गल जाती है; ताल भरने लगते हैं, धान जड़ पकड़ लेते हैं, उन