साहित्य और संस्कृति की घड़ी
मेरे देश का नाम है—घरघराहट! मेरा प्यारू देश है दुनिया का सबसे न्यारू देश और मेरे देश से बाहर जो भी हैं वे सब साले हैं झरझरालू देश। मेरा अपना पर्सनल नाम सुकुमार समस्या कुमार है। मेरे पैदा होने के बा
चाईं उर्फ निशू भाई के पास कमाल का गुण था—वह सड़क पर चलती, खड़ी, इठलाती, इतराती, मुस्काती लड़की को देखकर बता देता था, ‘यह गश्ती है, चल भाई लपक लिया जाए...’ अपने जादुई अनुमान पर वह कभी फ़ेल नहीं हुआ
सर पानी में डूबता है, गोली सिर के पीछे से माथे को चीरती हुई निकलती है, पूरा का पूरा पानी सुर्ख़ लाल हो जाता है और इसी कलात्मकता के साथ फ़िल्म सबसे पहले अपने नाम से आपको रूबरू करवाती है। एक पारंपरिक भ
इतनी रात को क्या कर रहे हो? इंतिज़ार... दोस्त का... दोस्त? हाँ, दोस्त ही तो... ट्रेन का इंतिज़ार करते, लास्ट मिनिट ब्लिंकइट ऑर्डर का इंतिज़ार करते, सेलरी का इंतिज़ार करते, किसी विशेष मैसे
“मेरी विद्या-बुद्धि कुछ भी नहीं थी। बहुत दरिद्रता में दिन कटे हैं। बीस रुपये के अभाव में मैं परीक्षा में बैठने तक से वंचित रह गया था। ऐसे दिन भी आए, जब भगवान् से प्रार्थना करता था—‘हे भगवान्, कुछ दिन
यह दिसंबर की साँझ थी। पावर प्लांट की एक परिचित, ठंडी और गहराती साँझ। प्रशासनिक भवन के भीतर अभी भी रोशनी थी... हल्की, दूधिया, स्थिर, अलसाई हुई-सी जैसे ऑफ़िस की ट्यूबलाइटें भी पूरे दिन की गहमा-गहमी
‘हिन्दवी’ के वार्षिक आयोजन ‘हिन्दवी उत्सव’ [23 अगस्त 2026] के लिए ज्ञानेंद्रपति जी को बनारस से लेकर मेरा इलाहाबाद जाना तय हुआ था। मेरी एक कविता पर हिंदी समय-समाज आंदोलित था और मैं भीतर से बेतरह भरा ह
12 सितम्बर 2026
प्रस्थान कुछ बादल अधिक, कुछ धूल कम। सितंबर। कोई गली ठीक उसी छत पर नहीं रुकती। अकेली नमी कोई त्योहार नहीं है। घाणी है सुनहरी। बचने का संकेत कभी बताया नहीं जाता। सितंबर कोई ठहराव नहीं है। कीचड़ से
यह बात मान लेनी चाहिए कि हम अपने अतीत से कितना स्नेह रखते हैं। हम वहाँ सुखद अनुभूति करते हैं, सुरक्षित महसूस करते हैं। अतीत हमारे वर्तमान की ख़ाली जगहों को भरता है। वह बार-बार याद आता है, बावजूद इसके
11 सितम्बर 2026
आदरणीय ममता कालिया जी, नमस्कार! “रात-रात नींद नहीं आती। दिन ऐसे बीतते हैं, जैसे भूतों के सपनों की एक रील पर दूसरी रील चढ़ा दी गई हो और भूतों की आकृतियाँ और डरावनी हो गई हों।” विद्यानिवास मिश