साहित्य और संस्कृति की घड़ी
दिन के सवा ग्यारह बज रहे हैं और कमरे में गहरा अँधेरा छाया हुआ है। पर्दे गिराए हुए, दो-दो खिड़कियाँ लेकिन दोनों बंद। फ़र्श एकदम चिकट, कमरे के बाहर एक सड़े हुए कपड़े को डोरमैट के रूप में बिछाया हुआ है। अलम
स्मृतियाँ सचमुच कभी नहीं मरतीं। वे हमारे भीतर किसी गहरे, अदृश्य तह में चुपचाप बैठी रहती हैं—कभी धुँध की तरह, कभी उजाले की तरह और कभी किसी ऐसे सपने की तरह जो जागने के बाद भी पूरी तरह टूटता नहीं। कु
मेरे पास एक ही धन है—निकम्मापन। मैं बाय चॉइस निकम्मा नहीं हूँ। यह आलस्य और काहिली के संयुक्त उद्यम से उपजा है। ऐसा नहीं है कि मैं डेड वुड हूँ जो किसी काम के लिए प्रेरित नहीं होता; प्रेरित होता हूँ—जब
30 जून 2026
आज आषाढ़ का पहला दिन है। इस अवसर पर हम ‘हिन्दवी बेला’ पर वह कर रहे हैं, जो इससे पूर्व हमने कभी नहीं किया—एक उपन्यास का धारावाहिक प्रकाशन। यह हमारे लिए बहुत हर्ष और उल्लास का प्रसंग है कि इस काम की शु
विवाह के इन दस वर्षों के दरमियान घर के ख़र्चों के साथ अब शब्दों में भी कटौती होने लगी है। राहुल के आने की आहट होती है, पत्नी रसोई से केवल पलकें उठाती है और फिर तुरत ही अपने काम में व्यस्त हो जाती है।
इंट्री मुझे किसी ने कहा था कि शाम पाँच बजे के बाद पुलिस अंदर नहीं जाने देगी। मैं हड़बड़ाया हुआ जब जंतर-मंतर पहुँचा तो पाँच बजने में कुछ मिनट बचे थे। एक गेट एक बैरिकेडिंग, एक मेटल डिटेक्टर, तीन तर
कलाएँ मानवीय अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम होती हैं। प्राचीन काल से ही मनुष्य अपनी अभिव्यक्ति कलाओं के विविध रूपों में करता आया है। उसकी कल्पनाओं के आदिम अवशेष आज भी लोक कलाओं में चिह्नित किए जा सकते है
आज से क़रीब दस महीने पहले मैं दूसरी बार दिल्ली की ओर आया। दिल्ली के किनारे, नोएडा को ठिकाना बनाया। जब मैं आया तब मेरे पास शब्दों का एक बड़ा-सा गोदाम था। इस गोदाम से मैं शब्द निकालता, उसे वाक्य बनाता
पूर्वग्रह मुहल्ले में ‘मौग’ होना उपहास की बात थी। बसों-ट्रामों में हाथ बजाकर अपनी पहचान जताना किसी हीनता की निशानी। और मैदान के अँधेरे कोनों में खींच लिया जाता अथवा स्वेच्छा से ‘व्यभिचार’ में
When did the future switch from being a promise to being a threat? — Chuck Palahniuk इतिहास की पूँछ और भविष्य गुरंदी बाज़ार की एक दुकान में मुझे एल्विन टॉफ़्लर की ‘फ़्यूचर शॉक’ की एक प्रति म