अरुण कमल : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’
निशांत
15 फरवरी 2026
एक
मुक्तिबोध मेरे प्रिय कवि हैं। उनकी कविता-पंक्तियाँ मुझे बूस्ट करती हैं, मतलब प्रेरणा प्रदान करती हैं। यहाँ प्रस्तुत आलेख का शीर्षक उनकी एक कविता का शीर्षक है। मुक्तिबोध की ‘अँधेरे में’ शीर्षक से संभव एक कालजयी कविता में एक जगह आता है—‘अरुण कमल एक’। यह कविता ‘कल्पना’ के नवंबर-1964 अंक में प्रकाशित हुई थी। अरुण कमल ने क्या इससे ही प्रभावित होकर अपना नाम अरुण कमल रखा होगा? अब इस अटकलपच्चू का क्या फ़ायदा! पर...
अब अभिव्यक्ति के सारे ख़तरे
उठाने ही होंगे।
तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब।
पहुँचना होगा दुर्गम पहाड़ों के उस पार
तब कहीं देखने मिलेंगी बाँहें
जिसमें कि प्रतिपल काँपता रहता
अरुण कमल एक
अरुण कमल—यह नाम कितना प्यारा है... ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ की याद दिलाता हुआ और ‘कमल’ शब्द और इसका अर्थ भी प्यार खिलाता हुआ।
कनक कामिनी देखि के, तू मत भूल सुरंग।
मिलन बिछुरन दुहेलरा, जस केंचुलि तजत भुवंग॥
मैं बस कनक की जगह कमल रखकर देखता रहता हूँ और कबीर का यह दोहा अक्सर अरुण कमल कहते ही याद आने लगता है। एक प्यारा नाम और प्यार करने को ललचता-ललचाता हुआ सुंदर (सुंदरता की परिभाषा भारत में गोरी चमड़ी है और ‘अरुण कमल’ तो लहलह गोरे हैं।), वृद्ध कवि-लेखक जो अक्सर मुझे यशपाल की कहानी ‘मक्रील’ की याद दिलाता है, जो कहता है—”आता हूँ। आता हूँ। आता हूँ।” अद्भुत ढंग से बहुत कुछ याद आ जाता है—इस शब्द के उच्चारण मात्र से।
शायद अरुण कमल के प्रति मेरे मन में बहुत प्यार है, इसलिए प्यार छलकता हुआ यहाँ भी दिख रहा है। विनोद दास ने भी इसी तरह इस नाम को याद किया है कि—”कुछ नाम होते हैं, जो उनके चेहरे-मोहरे की गवाही देते हैं। अरुण कमल नाम ध्यान आते ही सुंदर खिले हुए कमल की छवि हमारे मस्तिष्क में कौंध जाती है।” (छवि से अलग, पृष्ठ : 145-146)
अरुण कमल की कविता को मैं बहुत प्रेम करता हूँ। मैं उसे इतना प्रेम करता हूँ कि घर लाना चाहता हूँ, लेकिन वह ‘देवदास’ की चंद्रमुखी की तरह है। प्यार तो देती है, पर घर नहीं आती। तर्क देती है कि जिस तरह मैं तुम्हारी हूँ, उसी तरह औरों की भी हूँ। औरों को भी प्रेम पाने का हक़ है। तुम अभी जाओ, तुम्हारा समय समाप्त हुआ... और मैं एक कवि, पाठक, आलोचक मन मारकर अपने कोटर में आ जाता हूँ, यह सोचकर कि कल से नहीं जाऊँगा—चंद्रमुखी के पास, लेकिन फिर दूसरे दिन अपने घोड़े को तैयार कर वहीं पहुचता हूँ—चंद्रमुखी के ठीहे पर। फिर से वही करने अर्थात् वही गीत सुनने। मैं अपने प्यार के हाथों मजबूर हूँ। चंद्रमुखी की भी मजबूरियाँ हैं। यूँ ही कोई...
1970 से लेकर 2025 आगे और... आगे और भी लिखने की क़ुव्वत रखते हैं इकहत्तर वर्षीय वृद्ध कवि अरुण कमल। अब तक सात कविता-संग्रह (1980 से लेकर 2024 तक), दो आलोचना की पुस्तकें, एक साक्षात्कार की, दो अनुवाद की, बच्चों के लिए दो किताबें, निबंधों की ‘हवामिठाई’ और उपन्यास ‘एक चोर की चौदह रातें’ प्रकाशित और बहुत सारा छिपा ख़ज़ाना और माल आने को तैयार है। अरुण कमल की भावी योजनाओं में—“मैं (अरुण कमल) पिछले दो सौ वर्षों के हिंदी जाति के जीवन के बारे में एक पूरी किताब लिखना चाहता हूँ, साहित्य और कविता के माध्यम से। यानी मैं साहित्य और कविता को आधार बनाकर हिंदी जाति के जीवन की पुनर्रचना करना चाहता हूँ। यह एक मुश्किल काम है, पर अगले वर्षों में मैं उसे पूरा कर लेना चाहता हूँ।” (कथोपकथन, पृष्ठ : 164)। इसमें तीस अंकों तक नामवर सिंह के प्रधान संपादकत्व के नीचे आलोचना के संपादकीय की एक किताब, भाषणों और रज़ा फ़ाउंडेशन में दिए गए वक़्तव्यों की एक या दो आलोचना-पुस्तकें, कोविड-काल में ऑनलाइन भाषणों से पैदा होने वाली दो-तीन और आलोचना-पुस्तकें, साक्षात्कारों की एक और किताब, तद्भव के पाँच अंकों में लिखे गए आत्मकथ्य वाली किताब, वहीं प्रकाशित एक प्रहसन की किताब, लेखों की एक और किताब शीघ्र प्रकाश्य होगी ऐसा अनुमान हम कर सकते हैं। ऐसा नहीं है कि ये सब लिखना बाक़ी है, बल्कि आधा से ज़्यादा छपा हुआ है। देर हो रही होगी तो ज़रूर प्रकाशक की तरफ़ से हो रही होगी या हो सकता है कि अरुण कमल अभी कुछ कविताएँ लिखने में व्यस्त होंगे तो प्रकाशक को उठाकर दे नहीं पाए होंगे। ख़ैर... अस्तु!
अरुण कमल की कुछ कविताओं का मैं फ़ैन हूँ। पहले संग्रह से लेकर ‘रंगसाज़ की रसोई’ तक। काफ़ी पहले ‘पहल’ में ‘पारचून’ शीर्षक के अंतर्गत लिखी गई टिप्पणियों में से एक टिप्पणी याद आ रही है, जिसमें कवि ने लिखा था कि सिर्फ़ एक कविता, कविता-संग्रह में आकर नया मान प्राप्त कर लेती है और कवि को संपूर्णता में देखे जाने की ज़रूरत है—“आवश्यक है कि पूरे संग्रह के ‘मन’ को ढूँढ़ा जाए, उसकी आंतरिक संहति, आंतरिक विवशता और तर्क-पद्धति को ढूँढ़ा जाए। यह तभी संभव है, जब प्रत्येक कविता को दूसरी से जोड़कर धीरज के साथ पढ़ा जाए यानी प्रत्येक शब्द को पढ़ा जाए। फिर इस संग्रह को पिछले संग्रहों से मिलाकर, क्योंकि अंतत: एक वास्तविक कवि अपने पूरे जीवन में एक ख़ाका बनाने की कोशिश करता है। कई बार यह ख़ाका पूरा बनता है, कई बार नहीं। इसलिए सारे संग्रह और सारी कविताएँ एक ही नाभि से निकलती है और मिलकर एक जीवन-दृष्टि का निर्माण करती हैं।” (कविता और समय, पृष्ठ : 212)। मैं अरुण कमल का फ़ैन, अरुण कमल की बातों को आधार बनाकर उनके सातों संग्रहों को उसी क्रम में पढ़ने की धृष्टता कर रहा हूँ। ज़रूरत पड़ने पर उनकी इसी तरह की टिप्पणियों को, कुछ भाषणों को और उनकी आत्मकथा को भी एक ही नाभि से निकला हुआ मानकर और एक ही जीवन-दृष्टि की अभिव्यक्ति समझकर।
दरअस्ल, एक कवि का लिखा हुआ और छपा हुआ कुछ भी यहाँ तक कि अगर वह लिखकर कहे कि वह चोर या ख़ूनी या व्यभिचारी था या अभी भी है तो वह भी उसकी कविता और जीवन-दृष्टि को समझने में एक पाठक और आलोचक की मदद ही करता है।
अरुण कमल के यहाँ कविताएँ तो हैं, पर युवा-प्रेम-अनुभूति की कविताएँ नहीं हैं, न विद्रोह की, न नक्सलवाद की, न पटना के जेपी और जनांदोलन से संबंधित। अरुण कमल ने दो अनुभवों को साझा किया है कि क्यों नहीं वह उस तरह की कविताएँ लिख पाए। देखें—“हमारे झुंड में लड़कियाँ नहीं थीं। यह केवल लड़कों की दोस्ती थी, बी.ए. कर रहे लड़कों की। हममें कभी भी कोई यौन-प्रसंग नहीं घटा, न वैसी कोई रुचि ही थी। जहाँ तक मेरा सवाल है, बचपन में मेरे कुछ संबंध ऐसे रहे। किशोरावस्था तक। आपस में हमउम्र दोस्तों के साथ। एक कारण तो शायद यह होता हो ऐसे संबंधों का कि अपनी ही जैसी देह के रहस्य का आकर्षण, देह को अकस्मात् मिलने वाला विचित्र सुख, एक ऐसी ऐंठ देह की रस्सी की और एक जैसे अंगों से रहस्यमय रिसाव। एक ख़ाली घर में हमने गर्मी की अनेक लू-अंधड़ भरी दुपहरें एक-दूसरे को इसी तरह खोलते, एक-दूसरे से इसी तरह प्रभावित होते बिताईं। इसके बाद भी यदि ऐसे संबंध चलते रहते हैं तो कारण कुछ और होंगे। मार्क्स ने कहा है कि सामंती, पुरुष-वर्चस्व वाले समाजों-समूहों में जहाँ स्त्रियाँ पर्दे में या सार्वजनिक जीवन से बाहर घरों में महदूद रखी जाती हैं, वहाँ पुरुषों के बीच समलैंगिकता सबसे ज़्यादा और सबसे वीभत्स रूप में होती है। जहाँ सामंत या दूसरे लोग भी लौंडे रखते हैं और इसमें अपनी शान समझते हैं और इस तरह स्त्रियाँ अपनी पराधीनता का बदला लेती हैं। मैं जल्दी ही इससे उकता चुका था। इसका कारण एक वीभत्स घटना भी रही होगी। हम शाम को छोटी लाइन की पटरियों पर जामुन के पेड़ों के नीचे बैठे चुन-चुनकर जामुन खा रहे थे कि मेरा दोस्त द्वारिका हँसते हुए आया और बोला कि आज अरहर के खेत में फ़लाँ लड़का अपने से छोटे फ़लाँ लड़के के साथ ऐसा कर ही रहा था कि उस लड़के ने हग दिया और द्वारिका ख़ूब ज़ोर से हँसा। वहीं मेरा एक यौन-जीवन समाप्त हो गया।” (तद्भव-27,पृष्ठ : 147-48)।
क्या यह एक छोटा-सा जीवन या यौन-प्रसंग इतना छोटा है, जिसकी पहली पंक्ति है कि ‘हमारे झुंड में लड़कियाँ नहीं थीं।’ हमारे झुंड और लड़कियाँ शब्द को ध्यान से सुने जाने की ज़रूरत है और पैंसठ साल की उम्र में साक्षात्कार में यह कहे हुए को भी कि मरने का जब ख़याल आया तो “पहला ख़याल ये आया कि दराज़ से कंडोम हटा लेना चाहिए था।” (पूर्वग्रह 171-72, जनवरी-मार्च, 2021, पृष्ठ : 27)
ये बयान यह बतलाते हैं कि अरुण कमल के जीवन में कभी भी स्वस्थ प्रेम-संबंध नहीं बन पाए। शायद इसलिए प्रेम-कविताओं में जिस उदात्तता और कल्पना की वकालत की जाती है, वह अरुण कमल के यहाँ नहीं है और न ही निजी प्रेमपरक कविताएँ। जो हैं भी वे सिर्फ़ देखे हुए या किसी घटना को कविता में तब्दील करती हुई कविता है, जैसे—‘डेली पैसेंजर’... जिसमें एक लोकल ट्रेन में एक युवती कवि के बग़ल में आकर बैठती है और थोड़ी देर बाद कवि के कंधे पर सो जाती है।
अरुण कमल ने बिताए हुए जीवनकाल ख़ासकर स्मृतियों के सहारे कुछ शानदार कविताएँ रची हैं। यौन-प्रसंग भी स्मृतियाँ हैं, लेकिन अरुण कमल ख़ुद इन्हें वितृष्णा की तरह याद करते हैं; जबकि यौन-प्रसंगों पर कितनी शानदार कविताएँ रीतिकाल, भक्तिकाल और विश्व-साहित्य में लिखी गई हैं। ऊपर के गद्य के टुकड़ों को कविता की तरह अरुण कमल लिखते जैसा कि ‘रंगसाज़ की रसोई’ में लिखा है तो हिंदी कविता की बनक कुछ और होती—“प्रभो एक बात मानोगे? आज संध्या-आरती के बाद तुरंत बंद मत कर लेना कपाट। रखना खुला बाहर पूरा अँधेरा होने तक। वह आएगी, हाँ-हाँ वही कन्या दाड़िम फूल-सी, पोखर वाले घर से। अकेले। आलता रचाए। मेखला से तन कसे। दीप-स्तंभ के स्थिर प्रकाश में चौवों पर खिंचती देह, तनती ग्रीवा, अधर स्फुट, पलकें उन्नत, स्तन अंकुरित, दाहिनी बाँह से लोलक पकड़ती। एक हिलकोर और हवा कौंधती। आज उसे मुहूर्त को निमिष भर देख लूँ! मान जा प्रभो मैं प्रतिदिन बुहार दूँगा प्रांगण। वह भी तो तेरी दासी होगी दयामय, फूल लोढ़ती ओससिक्त।” (रंगसाज़ की रसोई, पृष्ठ : 99)
‘तद्भव-27’ और ‘रंगसाज़ की रसोई’ के गद्य में मुझे वह साम्यता दिखती; अगर वह उदात्तता होती तो, पर वह नहीं है। एक कवि ‘रंगसाज़ की रसोई’ की तरह के सरल गद्य में यौन-प्रसंग को लिख सकता था, पर नहीं लिख पाया। फ़ेल हो गया। अरुण कमल वैसे भी गद्य में जब कविता लिखते हैं तो कविता उनसे आगे-आगे भागती हुई प्रतीत होती हैं। वैसे तो उनकी ही क्यों, आज की सारी कविताएँ गद्य कविता ही हैं। फिर भी ‘मुक्त छंद’ तो ‘मुक्त छंद’ है; इसमें भावों की सांद्रता, संवेदनाओं की गहराई ‘बिटवीन द लाइंस’ में जो होती है, या अरुण कमल की ही कविताओं में जो है : वह उन्हीं की इन गद्य कविताओं में नहीं है। इसलिए ये ‘गद्य कविता’ कम ही जँचती हैं। अरुण कमल का हाथ गद्य कविता में तंग है। यह बात नंदकिशोर नवल ने भी गंभीरता से लिखी है। यह भी बतलाया है कि—“यह क्षमता समकालीन कवि की बुनियादी क्षमताओं में से एक है, जो विष्णु खरे में सबसे ज़्यादा और अरुण कमल में सबसे कम है।” (कसौटी-17, अप्रैल-जून 1999, पृष्ठ : 127)
अब दूसरा प्रसंग भी देखें जिसकी वजह से सोशलिस्टों से, राजनीति से और उनकी विचारधारा से वह विरक्त हो गए और आज तक हैं—“तब मैं दसवीं कक्षा में पढ़ता था, बाबू जी के साथ पहली बार पटना आया और जितना घूम सकता था घूमा। इतना बड़ा शहर मैंने पहली बार देखा था। मेरी बहुत इच्छा थी विधानसभा देखने की, भीतर जाकर, क्योंकि संविद सरकार यानी संयुक्त विधायक दल की सरकार बनी थी जिसमें बिहार के सोशलिस्ट बहुत थे। हमें भीतर जाने की अनुमति मिल गई थी और मैं विधानसभा की दर्शक-दीर्घा से भाग्यविधाता लोगों को देख रहा था। ऐसी चमक-दमक, इतने मुलायम गद्दे, ग़लीचे, शान-शौकत—मैं हतप्रभ था। फिर कभी कहीं भी विधानसभा या संसद को भीतर से देखने का मौक़ा नहीं मिला। रुचि भी नहीं रही। बाबू जी मुझे बिठाकर किसी से मिलने चले गए और मैं एक कोने में जहाँ ख़ाली-ख़ाली था, जाकर बैठ गया और नीचे देखने लगा। तभी एक अधेड़ आदमी आया, खादी का सफ़ेद कुर्ता-पायजामा पहने और मेरे बग़ल में आकर बैठ गया। वह भी नीचे ताकता रहा। फिर अचानक उसने अपना दाहिना हाथ बिना मेरी ओर देखे, बिना बोले, मेरे अंग पर रख दिया और सहलाने लगा। मैं चुपचाप बैठ रहा। वह सामने ताकता रहा और सहलाता रहा। मेरा सफ़ेद पायजामा भीग गया। वह उठा। चला गया। मैं अवाक् बैठा रहा। तबसे मुझे राजनीति से, संसदीय राजनीति से और सोशलिस्टों से नफ़रत हो गई। वह संसदीय राजनीति के भ्रष्टाचार के रूपक की तरह आज भी मुझे याद आता है।” (तद्भव, पृष्ठ : 148)। एक अनुभव पूरे सोशलिस्टों से उन्हें दूर ले गया। वह मुहावरा याद आता है—एक मरी हुई मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है।
उस समय जब अरुण कमल किशोर थे और जवान होने की प्रक्रिया में थे तो इन अनुभवों से गुज़र रहे थे। फ़्रायड ने कहीं लिखा है कि बुढ़ापे की असली चाबी बचपन-किशोर उम्र के दिनों के पास होती है। अरुण कमल अभी भी उन अनुभवों से उबर नहीं पाए हैं। वैसे लेखन एक बहुत अच्छी दवा होती है, अपने अनुभवों को लिखकर उनसे उबरने की। अब शायद अरुण कमल कुछ और बेहतर प्रेम और यौन-जीवन पर अच्छी कविताएँ लिख पाएँ। विश्व-कविता में तो बुढ़ापे में अपने कर्मो की स्वीकृति पर शानदार कविताएँ लिखी गई हैं—स्मृतियों पर आधारित। जो छूट गई होंगी तो वह अब लिख डालेंगे, जैसे जवानी के दिनों की तेजोमय स्मृतियाँ।
अरुण कमल जब जवान हो रहे थे तो नक्सलवाद, धूमिल, कुमार विकल, अज्ञेय का जलवा, नागार्जुन-त्रिलोचन-शमशेर और केदारनाथ अग्रवाल का रमरमा रहा होगा। नागार्जुन पर कविता और गद्य में लंबा लिखा भी है अरुण कमल ने और उनसे युवा कवियों को सीखने की नसीहत भी दी है, पर इन सभी से क्या सीखा अरुण कमल ने? उनकी कविताओं में कवियों का ज़िक्र तो बहुत है, फ़िक्र थोड़ी कम। वैसे भी अरुण कमल अपनी कविताओं में अपने नाम का कुछ इस तरह इस्तेमाल करते हैं मानो इसी तरह कविता में आकर यह नाम लोगों की ज़बान पर शायद चढ़ा रहे—“लेकिन अरुण मैं आसाम नहीं जाऊँगा”, ‘स्वगत’ कविता जो ‘सबूत’ संग्रह में है कि उसकी यह पंक्ति है—जहाँ अरुण चार बार आता है। ‘मैं वो शंख महाशंख’ में संगृहीत एक कविता ‘निजी एलबम’ जो कि स्मृतियों पर आधारित है कि अंतिम कविता ‘समूह-चित्र’ को देखे—“कुर्सी पर बैठे हुए (बाएँ से) / शमशेर, त्रिलोचन, भीष्म साहनी, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल / खड़े (बाएँ से, पीछे)... / बैठे (पैरों के पास)... और अरुण कमल।” (मैं वो शंख महाशंख, पृष्ठ : 100) ये जबलपुर में प्रगतिशील लेखक संघ के 1980 के सम्मेलन में खिंचाए हुए फ़ोटो को देखकर लिखी गई कविता है। यहाँ बहुत सारे जीवित स्टार कवियों के नामों को याद किया गया है। इसी कविता-सीरीज़ में और दो जगह—‘अरे अरुण क्या नाम है इसका?’ कवि विजेंद्र पूछते हैं तो सुदीप बनर्जी कहते हैं—‘कैसे हो अरुण कुछ दुबले लग रहे हो’। इसी तरह ‘रंगसाज़ की रसोई’ में एक लंबी कविता में अपने को अरुण कमल यों परोसते हैं—“कि मुरमुरे के ठोंगे पर मिली अरुण कमल की कविता”, लेकिन कवि को याद रखना चाहिए कि ‘नेम ड्रापिंग’ से कोई कविता महान् नहीं बनती। वह महान् बनती है अपनी विषय-वस्तु से, कवि के अनुभव के मांस-मज्जा से निकलकर। सिर्फ़ कला से प्रहसन हो सकता है, जीवन नहीं। अरुण कमल ने एक प्रहसन भी लिखा है और उसकी भूमिका में एकदम सही लिखा है—“यह एक प्रहसन है। यहाँ सब झूठ है। केवल मज़ा मिले, ऐसा उद्देश्य है। इस प्रहसन के लेखक स्वनामधन्य श्री अरुण कमल जू हैं जो पटने के वासी हैं। कविता के अभ्यासी हैं। परंतु कविता के खेल में फ़ाउल खेलने के कारण निष्कासन उपरांत इधर प्रहसन में हाथ आजमाने और हो सका तो हाथ साफ करने का विचार किया है।” और यह छोटी-सी भूमिका अपने नामोल्लेख के साथ बंद होती है—“श्री अरुण कमल जू, भारतेंदु, ब्रेख़्त, भिखारी ठाकुर और शेक्सपियर के भक्त हैं। विश्व भर के कवियों की जै!” हो सकता है कि यह प्रहसन की भूमिका हो जो इसी शिल्प में लिखी जा रही हो। लेकिन अपने नाम से एक कवि को इतना मोह। ओफ़्फ़, ओह!
एक कवि या कविता पर लिखते हुए क्या उस समय को हम देखने की कोशिश नहीं करते? कभी नामवर सिंह ने कहा था—कविता सामाजिक सत्य खोज निकालने की चीज़ है। मगर याद रखना चाहिए कि सामाजिक सत्य आता व्यक्ति के मार्फ़त से ही। व्यक्ति अपने समय को अभिव्यक्त करता है, माध्यम चाहे कविता हो या गद्य। इसलिए एक समय में रचनारत रचनाकारों को एक साथ पत्रिकाओं में पढ़ते हुए या किताबों को गहते हुए न चाहते हुए भी हम तुलना कर बैठते हैं। इसलिए अरुण कमल पर विचार करते हुए उनके कई समकालीन कवि जो इतिहास की छलनी से छनकर सामने खड़े हैं, उनकी भी रचनाएँ याद आने लगती हैं। यह स्वाभाविक है। उनके ही शहर के आलोकधन्वा याद आते हैं। एक अच्छी कविता पढ़ते हुए दूसरी अच्छी कविता की याद जैसे स्वाभाविक है, उसी तरह उस कविता पर कुछ लिखते हुए अन्य कविताओं पर भी लोग (आलोचक) अनायास लिख डालते हैं। यह उसका अभीष्ट नहीं होता, यह हो जाता है। इसी बहाने कविताओं के संसार की विविधता और विपुलता का रहस्योद्घाटन भी होता रहता है।
इस रहस्योद्घाटन में उनके ही शहर पटना के जिस कवि का ध्यान सबसे पहले दिमाग़ में आता है, वह अरुण कमल नहीं, आलोकधन्वा हैं। निःसंदेह इसके लिए उत्तरदायी उनकी कविताएँ हैं। ‘भागी हुई लड़कियाँ’, ‘जनता का आदमी’, ‘गोली दाग़ो पोस्टर’, ‘कपड़े के जूते’, ‘ब्रूनो की बेटियाँ’, ‘आम का पेड़’, ‘रेलगाड़ी’ फ़िलहाल तो ये सात कविताओं के नाम तुरंत याद आ जा रहे हैं; जबकि उनके संग्रह को पढ़े हुए काफ़ी दिन हो गए। लेकिन पटना के ही कवि अरुण कमल की सिर्फ़ एक कविता याद आ रही है—‘अपनी केवल धार’... जबकि अरुण कमल के साथ कई बार एक ही मंच से हम लोगों ने एक साथ कविताएँ पढ़ी हैं। क्या अरुण कमल का स्थायी पता ‘अपनी केवल धार’ बनकर रह जाएगा, जबकि वह कविता कुछ कविता-प्रेमियों को सामंती मूल्यों की वकालत करती हुई प्रतीत होती है। हाँ, अभी एक कविता और याद आ रही है—‘संबंध’।
एक कवि, लेखक, संपादक का स्थायी पता उसके घर का पता नहीं होता। हाँ; शहर या गाँव के बहाने हम उसे याद करते हैं, जैसे लमही कहते प्रेमचंद याद आते हैं। भोपाल कहते राजेश जोशी और जबलपुर कहते ज्ञानरंजन। पर ये शहर भी स्थायी पता नहीं होते। कवि, लेखक का स्थायी पता उसके द्वारा लिखी गई रचनाएँ होती हैं। इस मामले में ‘पहल’ पत्रिका और उसके संपादक ज्ञानरंजन ही सौभाग्यशाली है कि ‘पहल’ और ज्ञानरंजन का स्थायी पता 101, रामनगर, आधारताल, जबलपुर ही साहित्य की दुनिया में अमर रह जाएगा। दरअस्ल, स्थायी पता चापलूसी करने, हर-एक के मुँह पर मीठा बोलने, जातिवाद करने, घर जाने पर मिठाई खिलाने और पुस्तकें उपहार में देने, कभी-कभी पैसा भी और सभी का ब्लर्ब लिखकर उसे महान् बताने से नहीं हासिल होता। उसके लिए बड़े दिल से बड़ी रचनाएँ होनी चाहिए। जब लेखक का नाम लें तो उसका मुखड़ा नहीं, उसकी रचनाएँ सामने आकर खड़ी हो जानी चाहिए। उन रचनाओं के पीछे ही लेखक का स्थायी पता छपा होता है, उसके मुखड़े के पीछे नहीं। वैसे भी साहित्य की दुनिया में फ़ोटो नहीं, रचनाएँ ही स्थान ज़्यादा घेरती है। फ़ोटो तो किताब पर पीछे छपने के लिए होता है, वह भी थोड़ी-सी जगह में।
तो पटना के अरुण कमल की जिस कविता ने सबसे पहले ध्यान खींचा। वह थी—‘अपनी केवल धार’। लेकिन उससे पहले चेतन कश्यप की यह कविता ‘दूसरा पक्ष’ ज़रूर पढें। मैंने भी काफ़ी देर से पढ़ी। ख़ैर, आइए पहले यह छोटी-सी कविता पढ़ें :
क्या करूँगा भला
लेकर इतनी धार?
सान पर चढ़ा
फ़लक चमका
किसका गला रेतूँगा
काटूँगा किसकी बात?
चाहता हूँ लोहा
रहे बना लहू में
लेने को लोहा, क़दम-क़दम पर
जीवन आसान नहीं है
क्या करूँगा आख़िर
लेकर ऐसी धार?
संग जिसके लगा उधार!
कौन सुने ताने-तग़ादे, मुझसे तो
सही नहीं जाती हैं बातें भी
तीखी तेज़-तर्रार!
सुनिए,
धार से लोहा नहीं बनता
लोहे में दे सकते धार!!
(स्रोत : तरावट)
चेतन कश्यप भी पटना के ही कवि हैं (व्यक्तिगत कारणों से आजकल राँची में निवास) और जब उनकी ऊपर उद्धृत कविता पढ़ी तब लगा कि अरे! यह है सही कविता। अभी तक मैं ग़लत कविता के प्रेम में पगलाया हुआ था। दरअस्ल, जवानी के प्रेम में प्रमाद कुछ ज़्यादा ही होता है। उम्र होने पर समझदारी आती है। इस कविता ने मुझे अरुण कमल की कविताओं को अब पुन:-पुन: पढ़ने को बाध्य किया। कविता की ताक़त का एहसास फिर से हुआ। इस कविता के अंत में चेतन कश्यप ने लिखा है कि “सही, ग़लत या अच्छा, बुरा ठहराने को नहीं, सिर्फ़ एक दूसरा पक्ष”। यह पक्ष मुझे तो सही लगता है, अब बाक़ी पाठक इसे और अरुण कमल की इस कविता को एक साथ पढ़ें तो उन्हें भी कुछ समझ में आए :
कौन बचा है जिसके आगे
इन हाथों को नहीं पसारा
यह अनाज जो बदल रक्त में
टहल रहा है तन के कोने-कोने
यह क़मीज़ जो ढाल बनी है
बारिश सर्दी लू में
सब उधार का, माँगा-चाहा
नमक-तेल, हींग-हल्दी तक
सब क़र्ज़े का
यह शरीर भी उनका बंधक
अपना क्या है इस जीवन में
सब तो लिया उधार
सारा लोहा उन लोगों का
अपनी केवल धार।
(अपनी केवल धार, पृष्ठ : 88)
देखिए, कितने मज़े की बात है कि जब यह कविता याद आई तो इसका शीर्षक ही ग़लत लिख दिया। ‘अपनी केवल धार’ कविता की अंतिम पंक्ति है, कविता का शीर्षक है—‘धार’। कहने का मतलब यह है कि कविता ज़रूर अंतिम पंक्ति में ही रही होगी, जिसे मेरे दिमाग़ ने कैच कर लिया होगा और आज तक वही पंक्ति शीर्षक के रूप में मेमोरी में बनी हुई थी। शायद आगे भी रहे क्योंकि वही चीज़ें हमें याद रहती है जो दिमाग़ को स्ट्राइक करती है। शायद ‘धार’ कविता में ‘अपनी केवल धार’ ही मेरे दिमाग़ को स्ट्राइक करती हो।
यह अरुण कमल की ‘सिग्नेचर कविता’ है। इस कविता की लोकप्रियता अरुण कमल की लोकप्रियता है। हमारी जवानी के दिनों में यह कविता हमारे लिए लाइट हाउस का काम करती रहती थी। तब मैं कितने साल का रहा होऊँगा—अठारह या बीस-इक्कीस साल का, कविता का ककहरा सीखता हुआ। दरअस्ल, इस कविता को जब एक युवा पढ़ रहा होगा जिसकी उम्र पर समाज, समय और जीवन का दबाव होगा कि उसे ‘कुछ’ करना है, ‘कुछ’ बनना है तो उसे यह कविता नि:संदेह अच्छी लगेगी। पहली पंक्ति से ही यह कविता उसे अपनी लगने लगेगी। “कौन बचा है जिसके आगे / इन हाथों को नहीं पसारा” यह पंक्ति तो उसे ऐसे अपने ऊपर फ़िट बैठेगी कि वह इसके जादू की गिरफ़्त में न चाहते हुए भी सम्मोहित होकर उसके पीछे-पीछे चलने लगेगा। जवानी के दिनों में और बुढ़ापे के दिनों में भी यह दो पंक्ति उसे अपने निजी जीवन के खोखलेपन को, उसके निस्सारता को, यथार्थता और चुभने वाली सच्चाई को पकड़ लेती है। फिर ‘यह अनाज’ से लेकर ‘यह शरीर भी उनका बंधक’ हर पाठक को अपने शरीर से जोड़ देती है। जवानी में सब इसी तरह सोचते हैं। वे भूल जाते हैं कि यह कविता है और सिर्फ़ अनुभव ही नहीं इसमें कविता लिखने की कला भी समाहित है। और अंतिम चार पंक्ति तो इतनी लयात्मकता के साथ है कि पाठकों को याद हो जाती थीं। अरुण कमल इसे पढ़ते भी उसी सम्मोहित करने वाली कला के साथ हैं, ताकि यह कविता लोगों को अच्छी लगे। अंतिम चार पंक्ति में ‘उधार’ और ‘धार’ के साथ इन दोनों शब्दों के अर्थ पर जाएँ तो समझ में आता है, उधार का—जीवन में क्या महत्त्व है और धार कहकर कवि सभी पाठकों को काव्य-न्याय (पोएटिक जस्टिस) की तरफ़ रोमांटिक तरीक़े से ले आता है। दरअस्ल, धार अपने अंदर की ऊर्जा की तरफ़ इशारा करता है। बतलाता है कि तुम्हारे पास ‘धार’ है। ‘कुछ’ है। इस कुछ से बहुत कुछ किया जा सकता है। इस कुछ को हाथ में लो और ‘पिजाओ’। तेज़ करो, यह तेज़ी ही तुम्हारी अपनी है। और तेज़ करो, इसी से सबकुछ पा सकते हो। तुम यही कर सकते हो। पाठक ख़ुश हो जाता है, कविता हिट और कवि बमबम। अभी भी युवा लोगों को यह कविता आकर्षित करती होगी।
जवानी के दिनों में सिर्फ़ इस एक कविता के लिए मैं लोगों को कह सकता था कि अरुण कमल को पढ़ें, लेकिन अब मैं जान रहा हूँ कि यह कविता उस पूरे परिवेश को, समय को सेफ़्टी वॉल्व की तरह बैलेंस करने में लगी थी। पाश, आलोकधन्वा, वेणु गोपाल, धूमिल, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, राजकमल चौधरी, कुमार विकल की तरह यह कविता कुछ करने की अपील नहीं करती, न लाउड है। यह केदारनाथ सिंह की तरह बिंबों में बात करती है और केदारनाथ सिंह की परंपरा का विस्तार करती है। दरअस्ल, उस पूरे परिवेश में सत्ता को जो चाहिए, यह कविता उसे उस समय वह आसानी से उपलब्ध करवाती है। ग़ुस्सा है तो उसे अपने पास रखो, कुछ करो मत। उधार की कविता लिखो, तोड़-फोड़ या सत्ता से कुछ मत माँगो। यह सत्ता की तरफ़ झुकी हुई आज नज़र आती है मुझे, इसलिए आज इस कविता को पाठक पढ़ें तो यह ज़रूर ध्यान में रखें कि उस समय के कवि जब सत्ता के ख़िलाफ़ रच रहे थे अपना गान, अपनी कविताएँ तब एक कवि सत्ता को बतला रहा था कि मैं इतना निरीह और भोला हूँ कि मेरे पास सिर्फ़ ‘धार’ है। लोहा जो हर व्यक्ति के ख़ून में टहल रहा होता है वह सत्ता (आप) के पास है। हर सत्ता को ऐसे कवियों की ज़रूरत होती है, ताकि ‘सेफ़्टी वॉल्व’ की तरह वह इनका इस्तेमाल करें और फिर सत्ता इन कवियों को पुरस्कृत करती है। करती आ रही है। आगे भी करेगी।
अस्सी के आस-पास जब बिहार-बंगाल में नक्सलवादी आंदोलन और मार्क्सवादी विचारधारा का ज़ोर था, तब भी ख़ून खौलाने वाली कविता भले न हो अरुण कमल के पास, पर उग्रता या लाउडनेस भी अरुण कमल के पास नहीं है। उनकी कविता के पास तो नागार्जुन जैसा व्यंग्य भी नहीं है। नखदंतविषविहीन और तो और जेलवाली जो कुछ कविताएँ लिखी गईं, उसमें भी वह आवेग नहीं दिखता। चिपचिपे व्यक्तित्व से चिपचिपी कविताएँ ही आएँगी जिसमें हॉस्पिटल से ‘ऑपरेशन के बाद’ वापस आने पर नायक फुसफुसा कर कहता है—‘जानते हो जिस डॉक्टर ने / मेरा ऑपरेशन किया वह एक नर्स से फँसा था।’ इसे पढ़ने के बाद एक अजीब तरह की दया आती है कविता के नायक पर और उसकी कामग्रंथि पर कि तुम अभी भी ‘फँसे’ को फुसफुसाते हो। तुम धन्य हो, तुम्हें... जबकि उस समय बहुत से डॉक्टरों ने अपनी पढ़ाई छोड़ दी थी। देश-दुनिया को बदलने के स्वप्न देखते हुए और तो और पटना से ‘संपूर्ण क्रांति’ का नारा उठा और अरुण कमल उससे प्रभावित नहीं हुए ये जानते हुए कि perversion बूढों में ज़्यादा होता है। विचारधारा कोई हो, कामवृत्ति तो मनुष्य की जैविक ज़रूरत है। आख़िर इस उम्र में भी ‘कंडोम दराज़ में’ लोग छिपाकर रखते ही हैं। नागार्जुन लिखकर गए हैं—‘नहीं चाहिए किसको काम’ और अरुण कमल ने इससे विमुख होने के पीछे टीन-एज की एक घटना का ज़िक्र किया है, जिसका ऊपर ज़िक्र हो चुका है। अरुण कमल जवान होने, अँग्रेज़ी पढ़ने-पढ़ाने, विश्वविद्यालय में रहने, राजधानी में और प्रगतिशील लेखक संगठन में होने के बावजूद आग वाली कविताएँ नहीं लिख पाए तो यही थोड़ा उनकी कविताओं का मुँह दुब्बर हो गया है, प्रकारांतर से स्वयं कवि का भी। आज तक ऐसी मुँह दुब्बर कविताएँ लिखते और सारे मंचों पर बुलाए जाते रहने वाले कवि हैं अरुण कमल। सरकारों को ऐसे कवियों से भला दुश्मनी की क्या ज़रूरत। प्रगतिशील लेखक संगठन में रहते हुए भी सरकार और सरकार जैसे बंदों से बंदगी और न हींग लगे न फिटकरी, रंग चोखा हो जाए... इसी को कहते हैं। ऐसी चोखी कविताओं ने भी हिंदी के युवा कवियों को पुरस्कार और मुँह दुब्बर कविताएँ लिखने के लिए रास्ता बनाया। रास्ता दिखाया और सुंदर कवि व्यक्तित्व ने भी कवियों को ख़ूब आकर्षित किया और पटने के ही नहीं, आस-पास के कवियों ने भी अरुण कमल में अपना हीरो पाया। वे ‘अ से अरुण, क से कमल’ लिखना सीख पाए। (देखें : राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित ‘प्रतिनिधि कविताएँ : अरुण कमल’ में प्रेमरंजन अनिमेष की विस्तृत सहलाऊँ भूमिका।)
आगे पढ़िए : ‘चुप रहो मुझे सब कहने दो’-2
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