दृष्टि का निर्माण : लोक से हाइपर-रियलिटी तक
पलाश किशन
17 दिसम्बर 2025
“हर शाम हम सूर्य को धीरे-धीरे क्षितिज के पीछे डूबते हुए देखते हैं। हम जानते हैं कि हमारी पृथ्वी सूर्य से दूर जा रही है। फिर भी हमारा यह ज्ञान और यह वैज्ञानिक व्याख्या, डूबते हुए सूरज को देखने के हमारे नज़रिए को बदल नहीं पाती।”
यह क्या है? यह लोक की व्याख्या है, जिसे हम जिस तरह से करते हैं वही सच हो जाता है, उसी से हम बन जाते हैं। परंपराओं, रीतियों, आख्यानों के निर्माण में वैज्ञानिकता का अभाव भले हो, हम उन्हीं से निर्मित हुए हैं। हम लोक की जिस दुनिया के आस-पास पले बढ़े हैं, वह कहानियों से बना है। डर, साहस, शक्ति, उत्साह, प्रेम, लगाव की कहानियाँ हमें ज़िंदा रखती हैं। वैज्ञानिक सहीपन के वर्चस्व के बाद लौटकर पुनः आख्यानों का समय आया है। जहाँ कैसी भी व्याख्या ग़लत नहीं है और तमाम मानकीकृत स्थापनाओं पर सवालिया निशान है। कहने का अर्थ लोक-परंपरा से आईं कहानियों का दौर लौट आया है, भले ही अब इसका इस्तेमाल पूँजी केंद्रित बाज़ार अपने उत्पादों के संकेत रचने के लिए ही कर रहा हो।
आशीष मिश्र द्वारा अनूदित ‘देखने के तरीक़े’ किताब जॉन बर्जर की ‘Ways of Seeing’ का हिंदी रूपांतरण है। यह पुस्तक कलाकृतियों [पेंटिंग], विज्ञापनों और जेंडर बनावट में पूँजीप्रधानों की वर्चस्वशाली, वस्तु-केंद्रित, महीन युक्तियों को हमारे सामने उधेड़ देती है।
देखना शब्दों से भले ही पहले आता हो पर आप वही देख पाते हैं, जिसे कहानियों आख्यानों के सहारे गढ़ा गया होता है—ऐसा भाषा विज्ञानी कहते आए हैं। पर किसी भी तरह के संकेत, देखने-छूने-सुनने के बाद ही बनते हैं। हम देखें, सुनें, छुए बिना न तो कुछ महसूस कर सकते हैं और न ही कुछ संप्रेषित कर सकते हैं। कुछ भी देखते हैं तो हमारे मन में यह हमेशा रहता है कि हमें भी चीज़ें देख सकती हैं। दुनिया में देखने और देखने की विषयवस्तुओं में सतत परिवर्तन होता रहा है। चूँकि इसी से शृंगार, इसी से भय, इसी से शक्ति, इसी से देखने के वस्तुकरण का निर्माण होता है। इसलिए दुनिया के शासकों, पूँजी प्रधानों ने हमारे आपके देखने को हमेशा से विनियमित किया है। हम जो कुछ देखते हैं, पसंद करते हैं और बनना चाहते हैं, इसका संसार धीरे-धीरे सत्ता द्वारा रचा जाता है।
इस दुनिया की ज़्यादातर वस्तुएँ शासकों के मार्फ़त गढ़ी गईं। मसलन यूँ कहें कि पुरुषों के मार्फ़त गढ़ी गईं। वस्तुएँ कैसी दिखेंगी, कैसे रचेंगी, रंग-रूप, ढाँचा या फिर पूरा सौंदर्य, उनका प्रयोग कौन करेगा, इससे तय होता आया है। इसी तरह स्त्री मन और संज्ञान किस तरह पुरुषों द्वारा प्रबंधित होता है? या हर स्त्री के भीतर पुरुष दृष्टि कैसे पैठी रहती है? इस किताब में यह सब बख़ूबी आता है।
पहली बार चित्र क्यों बनाए गए होंगे? ज़ाहिर है आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान, रहन-सहन, सौंदर्यबोध और अपनी पहचान की दुंदुभी रचने के लिए बनाया गया होगा। देखने की दुतरफ़ा प्रक्रिया के चलते यह भी कि उस समय उस ज्ञान, सौंदर्य, पहचान को बाक़ियों ने कैसे देखा, यह चित्रकार अपनी प्रतिभा से रचता रहा। चित्र देखने की परंपरागत दृष्टि, उसकी व्याख्या उपस्थित भौतिकी, भंगिमा एवं अभावों की मदद से होती थी। बाज़ार और पूँजी के वर्चस्व ने धीरे-धीरे इसमें रहस्य पैदा किया। बाज़ार चित्रकला के आस-पास चकाचौंध कर देने जैसे आख्यान रचने लगे। मसलन यह सबसे पहले कितने में बिकी, किसने ख़रीदा, किसके महल में, किसके ड्राइंग रूम की यह अब तक शोभा बढ़ा रही थी और इसलिए ही यह अब कितनी बेशकीमती है।
यह आख्यान क्या हैं? फ़्रांसीसी समाजशास्त्री ज्याँ बोर्डीलार्ड, प्रतिरूप [Simulation] की थ्योरी में बताते हैं कि अब मूल यथार्थ नहीं बचा है, यथार्थ की जगह अब संकेतों और प्रतीकों ने ले लिए हैं। अब बाज़ार में आख्यान रूपी संकेत बिकते हैं, जिन्हें पूँजी अपने हित में इस्तेमाल करती है। मूल यथार्थ नहीं बचा है, मतलब अब यथार्थ वह है जो यथार्थ की जगह व्याख्यायित किया जा रहा है—एक हाइपर यथार्थ। जिसे संकेतों, प्रतिकृतियों के सहारे गढ़ा जाता है, आपका या मूल वस्तु का प्रतिरूप जिसे कृत्रिम रूप से साइबर स्पेस या विज्ञापनों की दुनिया में गढ़ा जाय।
इसी तरह कैमरे के आने से चित्रों की वास्तविकता में बदलाव आया। अब यह सबके घरों में, सबकी कहानियों में आ सकती थी। यह चल कर कहीं भी जा सकती थी। इसने चित्रकला के एकाधिकार को तो तोड़ा परंतु इससे भी चित्रकला के मायने बदले। अब चित्र लोगों के जीवन में उनकी कहानियों के अनुरूप ढलने लगे। इन सब बदलावों को किताब में सिलेसिलेवार व्याख्यायित किया गया है। कैमरे ने वास्तविकता के साथ जो किया उसे इस किताब से पढ़ते हुए प्लेटो की बात याद आई। वह एक ऐसी वास्तविकता की बात करते हैं जो इस भौतिक संसार के बाहर कहीं विद्यमान है। यह वास्तविकता हमारे चारों ओर दिखने वाली वस्तुओं में केवल प्रतिबिंबित होती है। जो हम देखते हैं, वे वास्तविकता से दो क़दम दूर हैं, अर्थात् वे उस सच्ची वास्तविकता की केवल छाया या प्रतिकृति मात्र हैं। कैमरे के आने से ही यह बात और मजबूत हुई है। कैमरे ने देखने की दुनिया को खोला और देखने के गढ़ों और मठों को तोड़ा। इस प्रक्रिया में उसने चित्रों को महलों, संग्रहालयों, कुलीनों से आज़ाद कर चलायमान किया।
किताब का तीसरा अध्याय लैंगिक दृष्टि से स्त्री-पुरुष को देखने और उनकी प्रस्तुतीकरण के विभिन्न तरीक़ों को व्याख्यायित करता है। पुरुष जो कुछ करता है, वही उसकी पहचान मानी जाती है, उसे शक्ति का प्रतीक माना जाता है; जबकि स्त्री देखने की विषयवस्तु है। बचपन से उसे ऐसे गढ़ा जाता है कि वह देखी जाए। उसका अस्तित्व दूसरों के देखने पर आश्रित माना जाता है। इसीलिए स्त्री ख़ुद को निरंतर दूसरी नज़र से भी देखती रहती है। मानो अपने ऊपर वह ख़ुद किसी पुरुष की नज़र बनाए हुए हो। यह अंश पढ़िए—
“ ‘सर्वेक्षित और सर्वेक्षक’—अपने इन दोनों हिस्सों को वह स्त्री के रूप में अपनी पहचान के दो घटकों की तरह देखने लगती है जो घटक फिर भी दो विरोधी तत्त्व बने रहते हैं। वह जो भी है, उसे लगातार उसका निरीक्षण करना होता है और जो वह करती है उसका भी। वह ऐसा यह जानने के लिए करती है कि दूसरों को और अंततः पुरुषों को वह कैसी लगती है। जीवन में जिस चीज़ को आमतौर पर उसकी सफलता समझा जाता है, उसमें भी इसकी बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। अपने आप में होने के उसके बोध के स्थान पर यह बोध आ जाता है कि दूसरे उसकी प्रशंसा किस रूप में करते हैं”
यहाँ लेखक स्त्री के वस्तुकरण की प्रक्रिया को उधेड़ता है। उसका मानना है कि इस तरह ही स्त्री धीरे-धीरे वस्तु में तब्दील होकर ‘देखे जाने योग्य वस्तु’ बन जाती है। इस दृष्टि-संकल्पना में स्त्री का आत्म, उसका स्वायत्त अस्तित्व दो हिस्सों में विभाजित हो जाता है, एक जो वह जीती है और दूसरा जो वह स्वयं को देखती है। जबकि पुरुष हमेशा से दिग्दर्शक प्राणी माना जाता है। पितृसत्तात्मक समाज स्त्री को इसी तरह ‘दृश्य वस्तु’ मानता है और पुरुष को ‘द्रष्टा’।
किताब का आख़िरी अध्याय विज्ञापनों की राजनीति को हमारे सामने रखता है।
सारे विज्ञापन हमारे देखने के लिए बनते हैं। विज्ञापन हमारे भीतर धीरे-धीरे उन छवियों के प्रति लालच भरते हैं। जो ग्लैमर की सैद्धांतिक परिपाटी न भी जानते होंगे वह भी उन कपड़ों, चश्मों, हेयर स्टाइल को पाना चाहते हैं जिससे वह भी उसी तरह दिखे—जैसे उस छवि में मॉडल दिख रहे हैं। फिर वह भी उसी तरह ईर्ष्या का पात्र बनना चाहते हैं, सबको दिखाना चाहते हैं। विज्ञापन हमारे दिमाग़ पर अपना ग्लैमर रचते हैं। ग्लैमर से उत्पादन का व्यापार जुड़ा है इसकी मदद से बाज़ार माँग पैदा करता है। यह अंश देखिए :
“विज्ञापन आनंद की प्राकृतिक भूख जगाने से अपना काम शुरू करता है, लेकिन यह वास्तविक चीज़ें देता नहीं है बल्कि अपने प्रोडक्ट के ज़रिए ख़ुद को ग्लैमरस बनाने का एक सपना, एक छवि देता है। यह ग्लैमरस छवि उन्हें दूसरे में ईर्ष्या पैदा करने का अवसर देती है, जो कि वह ख़ुद दूसरों से करता रहा है।”
विज्ञापन आनंद न देकर ख़ुशी देने की बात करते हैं क्योंकि ख़ुशी दूसरे लोगों के मार्फ़त तय की जाती है। आगे ईर्ष्या के गोरखधंधे को बहुत आसानी से समझाया गया है, पूँजी का व्यापार ईर्ष्या से चलता है। हर कोई वह बनना चाहता है जिससे सब जलें, ललचाई नज़रों से देखे जाएँ क्योंकि ऐसी नज़रों से देखा जाना एक तरह का सुख है। विज्ञापन सबको ईर्ष्या का पात्र बनने का सुख देना चाहता है। पैसा फेंकिए और ललचाई भरी नज़रों से देखे जाने का सुख लीजिए। यही तमन्ना लिए सब नौकरियों, ऊँचे पदों पर जाने हेतु प्रयासरत रहते हैं। भ्रष्टाचार करते हैं। यह अंश देखिए :
“तुम्हें रुचि से देखा जाता है लेकिन तुम उन्हें रुचि से नहीं देखते—अगर तुम ऐसा करते हो तो ईर्ष्या पैदा करने की तुम्हारी पात्रता कम हो जाएगी।” यह क्यों होता होगा? क्योंकि ग्लैमर रियल नहीं होता बल्कि हायपर रूप में गढ़ा गया झूठा यथार्थ होता है। आप जो हैं उससे कोई आपमें रुचि नहीं ले रहा बल्कि आपके आस-पास जो ग्लैमर रचा गया है, उससे रुचि बन रही है अतः अगर कोई आपमें रुचि ले रहा, ललचाई नज़रों से देख रहा तो यह तब तक बना रहेगा जबतक आप जो रियल में हैं वह उस तक पहुँच नहीं जाता। जैसे ही पहुँचेगा वह आपके प्रति वह हो जाएगा जो आपके पड़ोसी, सहपाठी, या कलीग होते हैं। इसलिए ग्लैमर वह है जो बोर्डीलार्ड हाइपर रियलिटी में बताते हैं। जिसे बाज़ार अपने वस्तुओं को बेचने के लिए बेचता है। विज्ञापन से प्रबंधित बाज़ार में यह एक तरीक़े की तरह अपनाया जाता है। विज्ञापन की इसी जादूगरी के सहारे पूँजी, वर्ग [क्लास] गढ़ता है। आज आप क्या ख़रीद सकते हैं, क्या पहन सकते हैं, कौन-सी गाड़ी में चलते हैं, इससे तय होता है कि आप किस वर्ग के माने जाएँगे और बाज़ार को आपके जीवन के यथार्थ से बस इतने भर का संबंध होता है। आपके जीवन मूल्य क्या हैं, आपके जीवन में रिश्तों, प्रेम, भावनाओं के क्या मायने हैं बाज़ार को इससे कुछ फ़र्क़ नहीं पड़ता।
अंत में, किताब अपने कहन में सरल, पठनीय और धारा प्रवाह है। अँग्रेज़ी से अनूदित यह किताब हिंदी भाषी पाठकों के समक्ष चित्रकला की बदलती दुनिया, विज्ञापन की बैकस्टेज रणनीति और देखने के अनदेखे आयामों को अत्यंत सरलतम रूप में प्रस्तुत करती है। किताब के आवरण पर शुरुआती कुछ वाक्य रखने से भीतर क्या है, पाठक की उसमें अनायास ही रुचि बनती है। चित्रकलाओं, मूर्तिकलाओं के भारतीय प्रतीकों के इस्तेमाल से आवरण हिंदी भाषियों के लिए अधिक सहज व रिलेटेबल हो गया है। चीज़ों के होने और दिखने, देखने, समझने की नई दृष्टि और पुराने नज़रिए पर सवाल करने के लिए यह किताब हम पढ़ सकते हैं।
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