साहित्योत्सव : साहित्य कम, टाइमपास ज़्यादा
मयंक जैन परिच्छा
23 फरवरी 2026
आजकल साहित्य-उत्सवों, सम्मेलनों और पुस्तक मेलों की धूम है। वैसे उत्सव और सम्मेलन हमेशा से समाज के बहुमूल्य अंग रहे हैं। हर जाति, धर्म और समुदाय अपने-अपने स्तर पर युवक-युवती परिचय सम्मेलन करवाते हैं, जहाँ युवक-युवतियों से ज़्यादा उनके परिवार वाले आते हैं और विवाह तय करके लौट जाते हैं। युवक-युवतियों को आपस में मिलाने की चिंता किसी को नहीं होती; परिवार का मिलना ज़्यादा ज़रूरी है।
वैसे भी चिंता किस बात की? सम्मेलनों का असली उद्देश्य कभी संवाद नहीं रहा, उद्देश्य हमेशा से टाइमपास ही रहा है, चाहे वह पर्यावरण की COP हो, या किसी क़िस्म की शांति वार्ता। वहाँ बस अच्छा खाना, बढ़िया चाय हो—फिर क्या कहने। मज़े ही मज़े!
तो साहित्योत्सव किस घमंड में हैं? उनका मुख्य उद्देश्य टाइमपास ही है। बाक़ी थोड़ा साहित्य और लोक, जहाँ की बातें हो जाएँ वो बस कॉम्प्लिमेंटरी।
बाज़ार में साहित्योत्सवों पर कई क़िस्म के विचार प्रचलित हैं।
पहला, कुछ को लगता है कि साहित्य उत्सवों में महज़ दिखावा होता है; वहाँ ज़्यादातर ऐसे लोग बुलाए जाते हैं जिनका साहित्य और समाज से एक तरह का बाज़ारी रिश्ता है। जैसे लोकप्रिय गायक, फ़िल्म अभिनेता, कॉमेडियन इत्यादि और साहित्य की बातें कम होती हैं, लोक-संदर्भ की सुरक्षित और हल्की बातें ज़्यादा।
दूसरा यह कि साहित्योत्सव दिखावटी पाठकों का जमावड़ा है, जहाँ सभी लेखक किताबें बेच सकते हैं। यहाँ दबे-कुचले और वंचित लेखकों के पास भी एक मौक़ा होता है। प्रकाशक भी इसी लोभ में किताबों का प्रचार करते हैं कि साहित्य का आरक्षण लिए आए लेखकों को कोई ख़रीद ही ले। जो लोग सालों से प्रकाशकों की सकारात्मक कार्रवाई (अफ़रमेटिव एक्शन) के कारण एक बोझ तले झेले जा रहे हैं, उन्हें कोई फ़ेमस ‘मानव’ छू ले और वे ‘विनोद’ हो जाएँ।
प्रकाशक करें भी तो करें क्या?
जो लेखक अच्छा लिखते हैं—वे किताब की मार्केटिंग नहीं करते, जो मार्केटिंग कर लेते हैं—वे अच्छा नहीं लिखते। जिसमें दोनों का मिश्रण हो ऐसे लेखक कम हैं। इसलिए प्रकाशक किताबों को बेचने के लिए लोक-प्रलोभन वाली हर कोशिश करते हैं—जो ज़रूरी भी है—लोकप्रिय साहित्यकारों और लोगों से किताबें बिकवाते हैं, साहित्योत्सव करवाते रहते हैं, क्योंकि किताब ख़रीदने वालों में सबसे बड़ा वर्ग वह है जिसे किताब पढ़ना नहीं होता, उसको यह दिखाना होता है कि वह पढ़ता है। ऐसे वर्ग को किताबें बेचने के लिए अगर प्रकाशक को आर्केस्ट्रा बुलाकर गाना भी गाना पड़े तो उसे गाना पड़ेगा। इससे बचने के लिए वे लोकप्रिय लोगों को बुला लेते हैं।
कोई और विकल्प नहीं है। क्योंकि बाज़ार प्रकाशक के लिए कई अच्छे लेखकों को बोझ बना देता है, उनको वह केवल इसीलिए प्रकाशित करते हैं कि कल को कोई अवार्ड मिल गया और पता चला फ़लाने प्रकाशक ने नहीं छापा था, तो बिना बात थू-थू हो जाएगी।
तीसरा विचार यह है कि ये मेला है, जो समाज में मज़े के लिए होते रहते हैं। तो लोग आएँगे, फ़ोटो खिंचवाएँगे, प्रकाशक-आयोजक पैसे कमाएँगे और निकल जाएँगे। इन उत्सवों में मस्त बिरयानी, छोले-भटूरे आदि मिलते हैं और सुंदर लड़के-लड़कियाँ आते हैं तो युवा लोग थोड़ा नैन-मटक्का कर लेते हैं। बुड्ढे भी कर लेते हैं। ये विचार मानता है किताबें जाएँ भाड़ में, बिरयानी जाए पेट में।
चौथा विचार स्वघोषित गंभीर लेखकों, और साहित्यजीवियों का है। जिनको जिस भी साहित्योत्सव में बुला लिया जाता है, वह अच्छा होता है, जिनमें नहीं बुलाया जाता—वह तुच्छ, बेतुका, ग़ैर ज़रूरी, और साहित्य नाशक।
पाँचवाँ विचार है कि साहित्य और समाज की गंभीर बातें करने के लिए एक लोकप्रिय एंट्री प्वाइंट चाहिए होता है, जो साहित्योत्सव उपलब्ध कराते हैं। अगर साहित्योत्सव नहीं होंगे तो नए पाठक कैसे जुड़ेंगे?
साहित्य को सबकी ज़रूरत होती है—लोकप्रिय लेखकों की, अच्छा लिखने वालों की, गंदा लिखने वालों की। साहित्य विविधता से चलता है, और बाज़ारवाद के युग में अगर साहित्य को फलना-फूलना है तो ऐसे आयोजनों और लोकप्रियता की ज़रूरत है। यही पाठक वर्ग को बढ़ाएँगे। यह विचार समझदारी के सबसे क़रीब लगता है।
एक और विचार यह भी है कि सम्मेलन और साहित्योत्सवों से अच्छा टाइमपास होता है। यह सबसे कम चर्चित, लेकिन सबसे ज़्यादा व्यवहारिक विचार है। क्योंकि ‘टाइमपास’ हिंदी-भाषी क्षेत्र में एक बेहद ज़रूरी शब्द और क्रिया है। हम सबको टाइमपास करना पसंद है।
इसी शब्द के सहारे ऑस्ट्रेलिया के भूगोलवेत्ता और मानवविज्ञानी क्रेग जेफ़्री ने भारत के युवाओं को लेकर एक अहम बात कही। मेरठ और आस-पास के कॉलेजों में डेढ़ दशक पुराने शोध में उन्होंने पाया कि युवाओं के लिए बेरोज़गारी कोई आपात समस्या नहीं है। उसे टाला जा सकता है, झेला जा सकता है, और सबसे ज़रूरी टाइमपास करके निकाला जा सकता है। इसे वे ‘इंतज़ार की राजनीति’ कहते हैं।
जैसा कि कई अँग्रेज़ी अकादमिकों के साथ समस्या रही है, वे उपनिवेशवाद से गुज़रे समाजों को लेकर अक्सर अति-सरलीकृत और सामान्यीकृत तर्क प्रस्तुत करते हैं। यह दृष्टिकोण उपनिवेश से गुज़रे समाजों को निष्क्रिय और अकर्मण्य साबित करने की कोशिश भी करता है, और यहीं यह बाज़ार का प्रिय तर्क बन जाता है। (बाज़ार कितना बेदर्द है न ज्ञान चतुर्वेदी जी।)
कई शोधकर्ता यह दलील भी देते रहे हैं कि भारत के लोग पैसिव हैं, इसलिए उनमें क्रांति की रुचि नहीं हो सकती। इसमें भी वैसे उपनिवेशवादी सोच की गंध आती है।
वैसे बात कुछ भी हो। आदमी निष्क्रिय हो या उत्पादक। बाज़ार चालू खोपड़ी है, अगर आदमी निष्क्रिय भी है तो जो आदमी नीम के नीचे बैठा ताश खेलता था, या हुक्का पीता था, या सिर्फ़ सोता था। तो वह आज वही सब रील देखते हुए करता है।
मज़े की बात तो यह है बाज़ार को ‘टाइमपास’ पसंद नहीं है। लेकिन बाज़ार असहाय नहीं है। जिनकी ज़मीन हाईवे में चली गई हो और करोड़ों मिल गए हों, उनके मामले में बाज़ार क्या कर सकता है? क्या वह ऐसे युवा को थार ख़रीदने से रोकेगा? नहीं बाज़ार तो चाहेगा वे—थार क्या, जैगुआर ख़रीदे, रील भी देखे, कई तरीक़े के सबक्रिप्शन ले, नशे करे, बाल झड़े तो उपाय करे, ब्रांडेड कपड़े पहने। बाज़ार हर जगह अपना काम निकाल लेता है।
कई युवा मजबूरी में टाइमपास कर रहे होते हैं, जैसे परिवार की हालत, सरकारी नौकरी की सुरक्षा, लेकिन धीरे-धीरे उन्हें उसी चक्र में फँसे रहने में मज़ा आने लगता है। वह स्वपीडादाई सुख बन जाता है।
हाल ही में एक मित्र, जो एक कंपनी में वरिष्ट प्रबंधक है और लाखों कमाता है—UPSC की परीक्षा में बैठा। इसके लिए वह दो महीने दिल्ली के मुनिरका में रहने चला गया। उसे इस परीक्षा में न पास होने की ख़ुशी हुई; पास हो जाता तो दुख होता। उसे ख़ुशी थी कि एक साल और तैयारी करने को मिल गया।
भारत में किसी प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी का सुख सबसे कम चर्चित और वर्णित है। इसपर शोध हो गया तो कई विदेशी कल्ट बनाकर SSC और UPSC जैसी परीक्षा की तैयारी में लग जाएँगे। सरकारें भी यह बात जानती हैं। वे जानती हैं कि सबको टाइमपास पसंद है क्योंकि वह ख़ुद भी टाइमपास कर रही है। इसीलिए बेरोज़गारी उनके लिए भी कोई बड़ी समस्या नहीं है। उन्हें पता है कि युवाओं को उत्पादक बनने के लिए प्रोत्साहित करने का कोई फ़ायदा नहीं, क्योंकि अगर युवाओं को टाइमपास में मज़ा नहीं आएगा, तो दिक़्क़त होगी। युवा निष्क्रिय है उनके लिए वही अच्छा है।
तो, सौ बात की एक बात—‘टाइमपास’ करो, ख़ुश रहो। साहित्योत्सव हो रहे हैं, जाओ मस्त खाना खाओ, फ़ोटो खींचो। रील चलाओ। साहित्योत्सवों में नहीं जाना तो मत जाओ। बस टाइमपास करते रहो।
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