पत्र : कल्पना शास्त्री के लिए : मुझसे नहीं होगा समीक्षा का काम
स्वस्ति श्री सर्वोपमायोग्य कल्पना शास्त्री जी, यहाँ से मनीष का राम-राम। चकित होऊ नका; मैं भी जानता हूँ कि चिट्ठी-पत्री की परंपरा तो अब बहुत पुरानी हो चुकी है। सो भी, मैं आपको चिट्ठी लिखने बैठ गया।
विश्व पुस्तक मेला आज से...
विश्व का सबसे बड़ा पुस्तक आयोजन—नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेला (NDWBF)—अपने 53वें संस्करण के साथ आज से शुरू हो रहा है। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एनबीटी), भारत, शिक्षा मंत्रालय के तत्वावधान में आयोजित नई द
विकुशु के नाम एक पत्र
प्रिय विनोद कुमार शुक्ल जी, आपको मेरा सादर प्रणाम! मैंने जब ‘हिंद युग्म’ महोत्सव (रायपुर) में आपको पहली बार देखा और आपसे मिली तो मेरे मन में पहले जो भी भ्रांतियों के बादल घिरे थे, सब छँट गए। सो
विनोद कुमार शुक्ल से दूसरी बार मिलना
दादा (विनोद कुमार शुक्ल) से दुबारा मिलना ऐसा है, जैसे किसी राह भूले पंछी का उस विशाल बरगद के पेड़ पर वापस लौट आना—जिसकी डालियों पर फुदक-फुदक कर उसने उड़ना सीखा था। विकुशु को अपने सामने देखना जादू है।
लिखने का सही समय
लिखने का सही समय क्या होता है? शायद वही समय—जब भीतर कुछ बेचैन करता है, चुपचाप करवटें बदलता है और शब्द बनकर बाहर आना चाहता है। बचपन में जब पहली बार पेंसिल उठाई थी तो यह नहीं पता था कि उससे करना क्य