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अनुवाद का द्वंद्व : भक्ति-काव्य की सार्वभौमिक अनुगूँजें

दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे (1938–2009) आधुनिक मराठी साहित्य के प्रमुख कवि, आलोचक, अनुवादक, चित्रकार और फ़िल्मकार थे; जिन्होंने मराठी और अँग्रेज़ी—दोनों भाषाओं में अपनी रचनात्मकता का विस्तार किया। बड़ौदा (गुजरात) में जन्मे दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे पर उनके पिता पुरुषोत्तम चित्रे के साहित्यिक संस्कारों का गहरा प्रभाव पड़ा। शिक्षा के बाद उन्होंने इथियोपिया, मुंबई और अन्य स्थानों पर रहते हुए विज्ञापन, पत्रकारिता और सृजनात्मक लेखन के क्षेत्रों में सक्रिय भूमिका निभाई। उनकी कृतियाँ—‘An Anthology of Marathi Poetry’ (1967), ‘Orpheus’ (1968), ‘शेबा राणीच्या शोधात’ (शेबा रानी की खोज में), ‘छाव्या’, ‘तिरकस आणि चौकस’, ‘शतकाचा संधिकाल’—उनकी अंतरराष्ट्रीय दृष्टि और सामाजिक चेतना को दर्शाती हैं। उन्होंने ‘मिट्ठू मिट्ठू पोपट’ (1989) और ‘सुतक’ (1989) जैसे नाटक लिखे और ‘गोदाम’ (1983) फ़िल्म का लेखन और निर्देशन कर अपनी बहुआयामी प्रतिभा का परिचय दिया। चित्रे की रचनाशीलता का मुख्य केंद्र भक्ति परंपरा से उनका वैचारिक और काव्यात्मक जुड़ाव था। उन्होंने संत तुकाराम और संत ज्ञानेश्वर के दर्शन को आधुनिक संदर्भों में नए रूप में परिभाषित किया और उनके ग्रंथों का अँग्रेज़ी अनुवाद कर भारतीय अध्यात्म और बौद्धिक परंपरा को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाई। ‘पुन्हा तुकाराम’ (1990) और ‘अमृतानुभव’ (1996) के उनके अनुवादों ने मराठी साहित्य में भक्ति-विमर्श को नया आयाम दिया। दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे ने लघुपत्रिका आंदोलन से जुड़कर मराठी समाज में आधुनिकता और प्रयोगशीलता की चेतना को भी सक्रिय रूप से प्रोत्साहित किया। उनके कविता-संग्रह ‘कविता’, ‘कवितेच्या आंतरकविता’, Traveling in a Cage (1980) और ‘दहा बाय दहा’ (1983) आधुनिक मनुष्य की जटिल संवेदनाओं, आत्म-संघर्ष और आध्यात्मिक खोज को प्रभावपूर्ण ढंग से व्यक्त करते हैं। हिंदी जगत प्रायः दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे के कवि-स्वर से परिचित है, किंतु अनुवादक और चिंतक के रूप में उनके बौद्धिक योगदान पर अपेक्षाकृत कम चर्चा हुई है। यह अनुवाद उसी दिशा में एक छोटा-सा प्रयास है। यह निबंध Paperwall Publishing द्वारा 2024 में प्रकाशित पुस्तक ‘Life on a Bridge: Essays by Dilip Chitre on Bhakti, Self and Translation’ से लिया गया है। मूल अँग्रेज़ी में इस निबंध का शीर्षक है : ‘To Translate or Not to Translate : The Universal Resonances of Bhakti Poetry.’ Paperwall Publishing के संस्थापक और मराठी के महत्त्वपूर्ण कवि हेमंत दिवटे का हार्दिक आभार, जिन्होंने इस निबंध के हिंदी अनुवाद की अनुमति दी। साथ ही, मराठी और अँग्रेज़ी के प्रतिष्ठित कवि और अनुवादक प्रो. सचिन केतकर का भी धन्यवाद, जिन्होंने दिलीप चित्रे के निबंधों से परिचय कराने और अनुवाद के लिए प्रेरित किया। आशा है कि यह अनुवाद हिंदी पाठकों को दिलीप पुरुषोत्तम चित्रे के विस्तृत बौद्धिक संसार से जोड़ने में सहायक होगा।

भाषा स्थान है। जबकि संस्कृति स्थान और समय दोनों है। पैंतालीस वर्षों तक विभिन्न भाषाओं और उनके अनोखे साहित्यिक भूगोल में भटकने के बाद, एक कवि और कविता के अनुवादक के रूप में मैंने यह सत्य अचानक ही अनुभव किया। परंतु यदि प्रत्येक भाषा और उसका साहित्य अपनी विशिष्ट भूमि और संदर्भ में जड़ें जमाए हुए हैं, तो फिर सहज ही सवाल पैदा होता है कि अनुवाद वास्तव में क्या है? शायद वह किसी पथिक की डायरी है —या फिर यात्रियों के मन से निकली हुई कोई कथा। यदि इस रूपक को समकालीन बौद्धिक भाषा में अभिव्यक्त किया जाए, तो कहा जा सकता है कि अनुवाद एक ऐसा कार्य है, जिसे अंतर-सांस्कृतिक संप्रेषक संपन्न करते हैं —वे व्यक्ति जो प्रारंभ में संस्कृति-पार यात्री या नोमैडिक अन्वेषक के रूप में विभिन्न भौगोलिक और सांस्कृतिक प्रदेशों की ओर प्रस्थान करते हैं। ये प्रदेश वे स्थान हैं, जहाँ अन्य समाज और समुदाय अपनी अस्तित्वगत स्थिति तथा स्थानिक अर्थों को निरंतर पुनः परिभाषित कर रहे होते हैं। अनुवादक ऐसे सांस्कृतिक परिदृश्यों में प्रवेश करता है, जहाँ भाषाएँ, प्रतीक और अर्थ-व्यवस्थाएँ परस्पर संवादरत होती हैं। वह इस अंतःसंवाद से उत्पन्न अर्थों को ग्रहण कर, विभिन्न सांस्कृतिक संदर्भों के मध्य अर्थ-संवहन का सेतु निर्मित करता है। इस प्रकार, अनुवाद केवल भाषिक रूपांतरण नहीं, बल्कि सांस्कृतिक अनुभवों का पुनर्निर्माण भी है। यह, इस प्रकार, उस अतिसंवेदनशील मानव-प्रजाति के इतिहास का एक अंश है, जो सम्पूर्ण पृथ्वी पर विस्तृत है, और जिसने लगभग पचास हज़ार वर्षों से आवास की खोज तथा निवास-निर्माण की सतत प्रक्रिया में स्वयं को निरंतर संलग्न रखा है। मानवीय समानविचारिता (like-mindedness) अनुवाद की मूल संरचना का आधारभूत तत्व है, और वही उसके समस्त अर्थ-आविष्कारों की प्रेरक शक्ति के रूप में कार्य करती है। तथापि, मनुष्य की सीमाएँ ही अनुवाद को परिभाषित करती हैं—जैसा कि वे प्रत्येक संवाद-प्रयास को उसके बौद्धिक तथा अभिव्यक्तिगत परिधियों में सीमित करती हैं। किसी चीज़ को प्रस्तुत करना असल में एक सृजनात्मक क्रिया है। इसी कारण अनुवाद को एक विरोधाभासपूर्ण बौद्धिक उपक्रम माना जा सकता है—क्योंकि यह उस पाठ का पुनर्निर्माण करने का प्रयास करता है जो किसी ‘अन्य’ भाषा-संरचना और साहित्यिक परंपरा में निहित होता है, परंतु उसे व्यक्त करने के लिए अनुवादक को ‘लक्ष्य-भाषा’ तथा उसकी सांस्कृतिक-साहित्यिक परंपरा के उपकरणों और अभिव्यक्तिगत माध्यमों का प्रयोग करना पड़ता है। परंतु यह उतना भी अवैध या अनुचित नहीं है, जितना कि मेरे जैसा गुजरात में जन्मा एक मराठी मातृभाषी व्यक्ति द्वारा फ़्रांसीसी पनीरों और जर्मन रोटियों के स्वाद का अनुभव कर उनकी रसात्मकता, सुगंध तथा स्पर्शात्मक अनुभूति को मराठी भाषा में अभिव्यक्त करने का प्रयत्न करना। कभी न कभी, मेरे बताए हुए अनुभव की सच्चाई मेरे श्रोता और पाठक ख़ुद अपने अनुभव से परखेंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, उन्हें तो अपने भीतर की संवेदना और कल्पना पर भरोसा करना होगा—उसी के सहारे वे मेरे शब्दों में उस स्वाद, उस गंध और उस अहसास की दुनिया महसूस कर पाएँगे। मैं हमेशा से दो भाषाओं में लिखता आया हूँ—अपनी मातृभाषा मराठी में, और उस अँग्रेज़ी में, जो बचपन से ही सीखी थी। मुझे लगता है, मैंने अनुवाद करना भी बिल्कुल स्वाभाविक रूप से शुरू किया, क्योंकि मैं ख़ुद दो भाषाओं के बीच जीता हूँ—यानी, मैं मूलतः द्विभाषी लेखक हूँ। परंतु जो अँग्रेज़ी मैंने जीवन्त संवादों और पठन-पाठन से सीखी थी, वह मेरे साधारण दैनंदिन परिवेश का हिस्सा नहीं बनी—तब तक नहीं, जब तक कि वयस्क होने पर मैंने अँग्रेज़ी-भाषी देशों की यात्राएँ नहीं कीं, वहाँ निवास नहीं किया, मित्र नहीं बनाए, और जब तक जीवन का अनुभव उस भाषा में नहीं किया। मेरे व्यक्तित्व की बनावट में एक प्रकार का ‘मातृभाषा–परभाषा संकट’ निहित था। कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें मैं केवल मराठी में ही कह सकता था—अपने आप से और दूसरों से भी; और कुछ बातें ऐसी थीं जिन्हें मैं केवल अँग्रेज़ी में ही व्यक्त कर सकता था। दोनों भाषाओं के अपने-अपने स्पष्ट और स्वाभाविक स्थल थे। प्रत्येक भाषा का अपना विशिष्ट परिदृश्य, आत्मस्वरूप और सांस्कृतिक संदर्भ था। एक अनुवादक के रूप में, मेरा संघर्ष किसी तस्कर के समान था—जो सीमा की दीवारों से बच निकलने और पासपोर्ट नियंत्रण को चकमा देने की कोशिश करता है। जिन सीमाओं को मैंने पार किया, वे सशक्त और स्वायत्त सांस्कृतिक प्रदेशों द्वारा संरक्षित थीं। जिन निषिद्ध वस्तुओं को मैं सांस्कृतिक परंपराओं की सीमाओं के पार ले जाता था, उनका मूल्य अनिर्धारित और अस्पष्ट था। मेरे साहित्यिक जीवन का बड़ा हिस्सा मराठी ‘भक्ति’ कविताओं को अँग्रेज़ी में अनुवाद करने में बीता है। और यह एक ऐसा श्रम रहा है, जिसे मैंने कई बार अपनी मौलिक रचनाओं के लेखन से भी अधिक प्रेम किया है। इस दौरान मुझे बहुत सी अहम बातें सीखने को मिलीं। मराठी के महान् कवि ज्ञानदेव और तुकाराम के मेरे अनुवादों को अँग्रेज़ी पढ़ने वाले पाठकों—ख़ासकर अमेरिका और इंग्लैंड जैसे देशों में, जहाँ साहित्य की अपनी समृद्ध परंपराएँ हैं—धीरे-धीरे अच्छी सराहना मिली है। तुकाराम के मेरे अनुवादों को, जिन्हें भारतीय साहित्य और संस्कृति के प्रसिद्ध जर्मन विद्वान लोठार लुत्से (Lothar Lutze) (1927-2015) ने अँग्रेज़ी से जर्मन में रूपांतरित किया, और जिन्हें पश्चिम में आश्चर्यजनक और हृदय को संतोष देने वाली आलोचनात्मक स्वीकृति प्राप्त हुई है। इस अनुभव ने मेरी इस आस्था को और सुदृढ़ किया है कि साहित्यिक सृजन अपने स्वभाव में स्वायत्त और उदार होता है—वह लिंग और जाति, स्थान और काल, प्रवृत्ति और परिवेश—इन सब सीमाओं को लांघते हुए विजयी होता है। ‘भक्ति’ उस भावना का नाम है जिसमें मनुष्य अपने से भिन्न किसी ‘अन्य’ के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाता है। यह धर्म और अध्यात्म के बीच के फ़र्क़ को समझने से जुड़ी है। ‘भक्त’ किसी ‘देवता’ का उपासक होता है। लेकिन ‘देवता’ हमेशा एक धार्मिक संदर्भ में होता है—उसका अपना एक नाम होता है, अपनी भाषा में पहचाना जाने वाला रूप होता है। उसका एक आकार या मूर्त रूप भी होता है। देवता, आख़िरकार, एक ‘व्यक्ति’ के रूप में देखा जाता है। सभी आस्तिक धर्मों में ‘ईश्वर’ को एक ‘व्यक्ति’ के रूप में देखा जाता है। कई एकेश्वरवादी धर्मों में ‘वह’ (वह — स्त्री या पुरुष, दोनों रूपों में) पूरे ब्रह्मांड का ‘एकमात्र व्यक्ति’ या ‘सामूहिक चेतना’ माना जाता है। लोकधर्मों में अक्सर देवताओं के पूरे-के-पूरे परिवार होते हैं, जिनके आपसी संबंध उतने ही जटिल और गहरे होते हैं, जितने किसी समाज या समुदाय में मनुष्यों के संबंध होते हैं। ‘भक्ति’ वह दार्शनिक अवधारणा और व्यक्तिनिष्ठ अनुभव है, जो ‘दैवी सत्ता के साथ ‘तादात्म्य’ या ‘आध्यात्मिक संयोग’ की अनुभूति कराता है—उस सत्ता के साथ जो सामान्यतः अलभ्य और अमूर्त है। यद्यपि विश्व में विविध धर्म परंपराएँ विद्यमान हैं, तथापि अपने-अपने देवता—चाहे वह सार्वभौमिक आत्मा हो अथवा कोई स्थानीय दैवी सत्ता—के साथ आध्यात्मिक संयोग का अनुभव सभी में एक समान रूप से पाया जाता है। जैसे सौंदर्य का अनुभव सबके लिए खुला है, वैसे ही आध्यात्मिक अनुभव भी सभी को सुलभ है। हज़ारों सालों से लोग अलग-अलग भाषाओं—चाहे वे अब जीवित हों या लुप्त—में इस अनुभव को एक-दूसरे से बाँटते आए हैं। जब लोग अपने आध्यात्मिक अनुभव को शब्दों में व्यक्त करते हैं, तो उसमें एक समान भावना और गूँज सुनाई देती है, जो पूरी मानवता को एक सूत्र में बाँधती है। शायद इसका कोई न्यूरोलॉजिकल (मस्तिष्क से जुड़ा) आधार हो, जिसके बारे में हम अभी बहुत कम जानते हैं। यह कुछ वैसा ही हो सकता है जैसा कला के सार्वभौमिक अनुभव में होता है — जो मन में गहरी और तीव्र अवस्थाएँ पैदा करता है, या जैसा ज्ञानदेव के शब्दों में कहा जाए तो ‘स्व में आनंद’ की अनुभूति कराता है। भक्ति की तरह ही, अनुवाद भी एक पारलौकिक अनुभव है—यह एक क्रिया भी है और आत्मचिंतन का माध्यम भी। और मुझे लगता है, हममें से बहुत कम लोग इस बात से असहमत होंगे कि कविता भाषा में आत्मचिंतन का एक सुंदर अवसर होती है।

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अनुवाद और प्रस्तुति : राकेश कुमार मिश्र

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