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अंचित से दस सवाल : मुझे दिल्ली बिल्कुल पसंद नहीं है

अंचित (जन्म: 1990) नई पीढ़ी के चर्चित कवि, अनुवादक और संपादक हैं। वर्ष 2021 में उन्हें ‘कवि केदारनाथ सिंह कविता सम्मान’ से सम्मानित किया गया। वे इसक-2023 के कवि भी हैं। हाल ही में उनका नया कविता-संग्रह आधी पंक्ति (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2026) प्रकाशित हुआ है। हिंदी साहित्य जगत में इस संग्रह को लेकर लगातार विमर्श हो रहा है। इसी चर्चा को विस्तार देते हुए अंचित से यह संवाद ई-मेल के माध्यम से [जनवरी 2026 के अंतिम दिनों में] संभव हुआ है।

मुझे आपके नए कविता संग्रह आधी पंक्ति (राधाकृष्ण प्रकाशन, 2026) का नामकरण बहुत दिलचस्प लगा। इस नाम तक आप कैसे पहुँचे?

नामों को लेकर मेरे भीतर बहुत सारे संशय रहते हैं। असल में नाम बस एक किसी भाषा में चिह्न मात्र हैं और फिर भी हम अपनी पूरी दुनिया इन्हीं नामों के ज़रिए बनाते हैं। भाषा इस तरह खेल करती है कि नामों के मानी कुछ नहीं होते और फिर भी सबकुछ होते हैं। एक नाम हो सकता है कोई अर्थ न रखे। हो सकता है जिस पीड़ा को आप एक नाम से पुकार रहे हैं, वह असल में कुछ हो ही नहीं। हो सकता है आपकी पीड़ा जिस नाम के ज़रिए निकल रही है, वह नाम आपके लिए कोई ख़ास मायने भी न रखता हो, यह ‘डिस्प्लेस्ड पेन’ हो सकता है, या एक ‘डिस्प्लेस्ड मेटाफ़र’। आदमी दुखों से भागता है और इस भागने में वह भाषा के पास आता है। भाषा की भी सीमाएँ हैं और वह आपको सबकुछ नहीं दे सकती, आपके भीतर जो ख़ालीपन है, उसको नहीं भर सकती। सब आधा रह जाता है, पूरा नहीं होता। न जीवन में, न भाषा में, न कविता में। जो एक पूरी पंक्ति लिख ली जाये तो भीतर जो जलता है वह राख हो जाएगा। मैं किसी को किसी कविता में एक नाम से पुकारता हूँ, ज़रूरी नहीं कि जिस नाम को पुकारा जा रहा है, उसी को पुकारा जा रहा है। जिसको बुलाना है, उसको न बुला सकने की मजबूरी पूरी व्यक्त नहीं होती। जो कहना है, वह पूरा नहीं कहा जा सकता, न समझाया जा सकता है, ऐसे में भाषा ओढ़े कवि एक ठग है, जो ख़ुद की तिजोरी से चोरी कर रहा है। वह भी पूरी नहीं कर सकता। आधी ही। मैं किसी से मुख़ातिब होता हूँ ऐसा लगता है, पर मैं किसी और से मुख़ातिब हूँ, यह होता है। यह फ़र्क़ न मुझे न मेरी कविताओं को पूरा होने देता है। पंक्ति आधी रह जाती है। यह ‘आधी पंक्ति’ यहीं से बनी है और बाद में धर्मेंद्र सुशांत के साथ इस पर बात करते हुए लगा कि यही अधूरापन शायद इन कविताओं को कुछ ठीक ढंग से बता सकता है।

इस संग्रह में मुझे sense of longing का भाव स्पष्ट रूप से दिखा। आपकी दूसरी कविताओं में भी यह स्पष्ट रूप से दिखता है। इस sense of longing को आप कवि के तौर पर कैसे देखते हैं?

हम जिस समय में जीते हैं, ‘longing’ के अलावा हमारे पास कुछ नहीं है। जो खो गया है, उसको इसी चाहने में पाया जा सकता है और एक भाषा में बने चिह्न भर। सब टूटता है, टूटता है और टूटता जाता है। मैं कुछ किताबों के उदाहरण दे सकता हूँ, मैं कुछ फ़िल्मों के उदाहरण दे सकता हूँ। ‘मेरा नाम जोकर’—इसका दर्शन मुझे प्रभावित करता है। मुख्य किरदार जितनी बार प्यार करता है, हर बार हार जाता है। पर उसमें दिल बड़ा करने की काबिलियत है, वह उस शाप से ग्रसित नहीं है, जिससे कोई कवि होता है। इसलिए वह रोज़ मंच पर जाता है पर एक कवि की माफ़िक नहीं, एक जोकर की तरह Shakespearean proportions में। फिर भी चाहता तो है और रोता तो है। यह महानता है जो मेरे जैसे आदमी के भीतर नहीं है, मेरा कवि, इस नाते तुच्छ है और रोज़ इस लघुता से लड़ता है। अरुण कमल एक कविता में लौटने का ज़िक्र करते हैं हार के बाद, कहते हैं सुसुम धूप में पुरानी किताबों तक लौटने की बात। यह एक नैसर्गिक चाह है जो हम सब के भीतर भरी है, जो ग्लोरिफ़ाइड लग सकती है। जैसे अन्ना स्वेल की किताब ‘ब्लैक ब्यूटी’ के आख़िरी पन्ने अद्भुत हैं। ‘ब्लैक ब्यूटी’ एक घोड़ा है जिसको अलग-अलग समय पर अलग-अलग मालिक मिले लेकिन उसने अपना आदर्श जीवन जिस वक्फ़े में जिया, उसकी एक चिरंतन याद उसके मन में बनी हुई है और बहुत कष्ट भरे दिनों में वह उन्हीं स्मृतियों की ओर लौटता है। अगर ईसाइयत से उदाहरण उठायें तो वापस ख़ुल्द की चाह कि वहाँ से निकाल दिए जाने के दुख से बड़ा कुछ नहीं। यह एक आदिम प्रवृत्ति है और मूल शब्द है ‘स्मृति’ और वही हर चाहना का बीज है। मेरे लिए भी निजी तौर पर समय का एक टुकड़ा है, जहाँ मेरी समस्त चाहनाओं के बीज हैं, उनको जिस नाम से पुकारूँ। वहाँ कंट्राडिक्शंस हैं लेकिन हार नहीं है। उस सपने में फ़रवरी की एक सुबह मैं घर से निकला हूँ। ठंड है थोड़ी, हल्का कुहरा है। मैं पैदल चलता हुआ गोलघर जाऊँगा जहाँ कोई मेरा इंतज़ार करता है। ऊपर से, हम देर तक गंगा देखेंगे। लौटते हुए हम पटना मेडिकल कॉलेज के कैंपस के भीतर से यूनिवर्सिटी आएँगे। मैंने काली जैकेट पहनी है, उसने जींस का एक लंबा कोट और नीला दुपट्टा ले रखा है। मेडिकल कॉलेज के कैंपस में पोस्टमार्टम वार्ड के ठीक पहले की सड़क पर दोनों और पेड़ों में पीले फूल खिले हैं जिनका नाम मैं नहीं जानता पर यह दृश्य सुंदर है। काली घाट पर एक कॉफ़ी की टपरी से हम कॉफ़ी पियेंगे और फिर साथ चलते हुए अपनी कक्षाओं में चले जाएँगे। यह एक दृश्य जो अब दोबारा घटित नहीं होगा, उसी टीस से कविता पैदा होगी।

जैसे आगा शाहिद अली को उसका कश्मीर सिर्फ़ पोस्टकार्ड में मिल सकता है, जैसे मंदेलस्ताम सिर्फ़ पीटर्सबर्ग जाने की इच्छा पाल सकता है, जैसे फ़ैज़ अपने वतन बदर होने को बार-बार जीते हैं। इक्कीसवीं सदी की हिंदी कविता अपनी अस्मितामुलकता या प्रगतिशीलता में आगे देखती है और युद्ध करती है पर वह भी उस आदर्श की चाहनाओं से ही बनी है। यह सेंस ऑफ़ लोंगिंग ही कविता रचने की ऊर्जा देता है। भारती जी के शब्दों में—“क्योंकि सपना है अभी भी”।

दिसंबर, 2025 में यह किताब पटना पुस्तक मेला में हिंदी पाठकों के सामने आई। क्या किताब आने के बाद पटना के प्रति नज़रिया बदला है या इस शहर को देखने के लिए कुछ नए सूत्र मिले हैं?

जैसा आपको पिछले उत्तर से समझ में आ ही गया होगा, पटना मेरे लिए बहुत ज़रूरी जगह है। शहरों पर जितना लिखा मैंने पढ़ा है, मुझे कवाफ़ी की एक कविता और कैल्विनो की किताब ‘इनविजिबल सिटीज़’ ने बहुत प्रभावित किया है, लेकिन ज़ाहिरन इनसे टकराना बाद में हुआ। जब मैंने नई-नई साइकिल चलानी सीखी और काफ़ी देर से—दसवीं में आने के बाद—तो, मैं घूमने निकल जाता था। उसके पहले पिताजी के साथ बचपन में घूमते हुए, हम दोनों जने पैदल चला करते थे। उन्होंने मुझे गलियाँ देखनी सिखाईं। पटना की मुख्य सड़क, ठीक है, अशोक राजपथ है जिसके अपने पेंचो-ख़म हैं लेकिन असल पटना, उसकी पुरानी गलियों, उनके नामों और उनमें रहने वाले लोगों से बना है। बाद में अरुण कमल के साथ बीए के दिनों में यूनिवर्सिटी के आस-पास पैदल ही ख़ूब घूमा। लोगों के बारे में बतियाते हुए, किताबों के बारे में बतियाते हुए, कविताओं के बारे में भी। पामुक के लिए इंस्ताबुल है, अली के लिए कश्मीर, शमशेर के लिए इलाहाबाद और ऐसे ही अनगिन उदाहरण है। फिर भी मैं अपने कहे का पूरा खंडन कर देता हूँ। शहर आपको समझ में आता है और जगह देता है, जब आप किसी के साथ होते हैं, सोते-जागते, बात करते, साथ न चलते हुए भी एक-दूसरे के साथ होने को अपने भीतर भरे तो शहर का स्पेस आप reproduce करते हैं, वह एक पेड़ की तरह आपके भीतर उगता है।

फिर पटना की एक तहज़ीब है जो मुझे हिंदी पट्टी के अन्य शहरों में लेखकों के बीच अपने सीमित अनुभव में नहीं मिली। अंतरंगता। तमाम मतभेदों के बाद भी जिस गर्मजोशी से पटना वाले एक-दूसरे से साहित्यिक कार्यक्रमों में मिलते हैं, मैंने और कहीं नहीं देखा। यहाँ लोग मज़े में असहमतियाँ जता देते हैं और फिर साथ चाय पीते हैं। जब अन्य कई जगहें अंदर से बाहर तक बेवजह आक्रामकता से भरी हैं, पटना की अपनी रौ है। जिससे भी जितना राब्ता रहा हो, पिछले पंद्रह वर्षों में मैंने महसूस किया है कि मैं इनका हूँ और ये मेरे लोग हैं। यह नागरिकता की मूल शर्त भी है। ऐसे में किताब यहाँ से आए, यह मन तो था और शायद राजकमल प्रकाशन समूह और संपादकों को भी ऐसा लगा जो मेरे लिए बड़ी बात है।

नयापन तो हर क्षण क्रिएट होता है। हम लगातार ख़ुद को, एक-दूसरे को, मौजूद जगहों को rewrite करते रहते हैं। मैं भाग कर कहीं जाता हूँ तो अपने शहर पहुँचता हूँ और मैं उल्लसित कहीं अपने होने का अनुभव करता हूँ तो शहर को ही साथ पाता हूँ।  इस रोज़ बदलते constant से शायद यह एक डायलेक्टिकल नाता है और मुझे इसमें और गहरे उतरना है, उतरते जाना है।

आधी पंक्ति में एक कविता है ‘कवि के साथ सोने का सुख’। यह कविता आपने अँग्रेज़ी के मेटाफिज़िकल कवियों को समर्पित की है। यह कविता मुझे कवियों की संगत का उत्सव लगी। इस कविता के बनने की प्रक्रिया के बारे में बताएँ।

वैसे तो अपनी कविताओं पर बात करने में मुझे हिचक होती है। उनको जिस तरह पढ़ लिया जाता है, जिस स्तर पर भी, मैं कोशिश करता हूँ कि मैं इससे प्रभावित न हूँ। पर ईमानदारी यह मानने में है कि कुछ असर तो होता ही है। अँग्रेज़ी के मेटाफिज़िकल कवियों की दो कविताएँ, विशेषकर जॉन डन की ‘सन राइजिंग’ और एंड्रयू मार्वल की ‘टू हिज कॉय मिस्ट्रेस’ मुझे बहुत पसंद हैं। हाँ यह सच है कि इस कविता में रैम्बो की भी एक छाया है और कुछ ध्वनियाँ बीसवीं सदी के दूसरे हिस्से के अमरीकी कवियों की भी। प्रेम की आतुरता तो ऊपर से दिखाई देती ही है लेकिन ‘काल तुझसे होड़ मेरी’ की तर्ज पर समय के घटने, असंभावनाओं से घिरे होने इत्यादि का एक बोझ जो इस समय में हमारे ऊपर रहता है, वह इस कविता को ड्राइव करता है। इस विस्मृत समय में कल की कोई कल्पना आदमी नहीं कर पाता, आज भी जी ले, यह नेमत होती है। स्मृतिहीनता झेलते हम पहली पीढ़ी के लोग हैं और हम नहीं जानते कि इससे कैसे जूझना है। और जो आज की भी कल्पना है, उसका आधार कुछ नहीं है।  यह भी है कि संभोग की मैकेनिकल पुनरुत्पत्ति को यह कविता बहुत ही संशय से देखती है और ठौर की माँग करती है। मेरी एक दोस्त ने सबसे पहले मुझे मेटाफिज़िकल पोएट्स के बारे में बताया था, कॉलेज के पहले साल में, तब से मैं ऐसी एक कविता लिखना चाहता था और समर्पित करना उन सभी कवियों को जो मेरे भीतर का मांस खाते गिद्ध से मुझे लड़ने की हिम्मत देते हैं।

इस कविता संग्रह में आपने तमाम दोस्तों को याद किया है। “आभार” के रूप में इनके नाम पढ़ते हुए मुझे अरुंधती रॉय का चर्चित उपन्यास The God of Small Things (1997) का acknowledgement ख़ूब याद आया। इस किताब के बनने की प्रक्रिया में दोस्तों की भूमिका के संदर्भ में थोड़ा विस्तार से कुछ कहें।

कहने में बात बहुत फ़िल्मी लगती है लेकिन अगर ये लोग न होते तो मेरा जीना और कठिन होता। बार-बार ये मुझे ज़िंदगी की तरफ़ वापस लौटा लाए। उन सभी कठिनाईयों की खिल्ली उड़ाई जो अपने भार से मुझे दबाती रहीं और आधी-आधी रात को भी मेरे लिए खड़े रहे। यह मैं पूरी गंभीरता से कह रहा हूँ। माँ-पिता जितने भी दोस्त हो सकें, उनकी अपनी भूमिका होती है। यह मैं पहली बार बता रहा हूँ और सार्वजनिक मंच से यह कहते हुए हिचक भी है। एक बड़े संयुक्त परिवार में बड़े होते हुए मेरे भीतर हमेशा सेल्फ़-बिलीफ़ की कमी रही और आत्मविश्वास की भी। हमेशा मैं कुर्सियों के बड़े झुंड में एक टूटी टाँग वाली कुर्सी की तरह रहा, जहाँ मैं लगातार एक मिनिमम तवज्जो खोजता रहा और मुझे नहीं मिली। आज भी एक बहुत लोगों वाले परिवार में मेरा एक भी मित्र नहीं है जिससे मैं खुल कर अपने दिल की बात कर सकता हूँ। शायद इसी ख़ालीपन के चलते मैंने लिखना शुरू किया और कविता ने मुझे ये नेमत दी कि मेरे जैसे ख़ुदगर्ज़ आदमी को ऐसे दोस्त दिए जिन्होंने अपने को जताया नहीं और मेरे होने को सेलिब्रेट किया। मैं जो कुछ लिख सका और अगर आगे कुछ लिखूँगा तो सिर्फ़ इनकी वजह से। इनमें से एक भी टुकड़ा टूटता है तो मेरा होना कम हो जाता है। मैं जितना भी मनुष्य हूँ, इनकी वजह से ही हूँ।

इस किताब के बनने में भी उनके असंख्य सुझाव, उनसे असंख्य तक़रीरें शामिल हैं। इन कविताओं को उन्होंने मेरे साथ जिया है और ये समझते रहे हैं कि मैं जो भाषा में छिपा रहा हूँ, उसके परे क्या है और कौन है, कोई भी नाम उगता हो, कोई भी प्रसंग आता हो, मैं ख़ुद अपनी ग़फ़लत में जीता रहा या ग़लतियों में। किताब के आभार में उनका नाम लिख देना भर काफ़ी नहीं है। आप जिसके सामने रो सकते हों, ऐसे लोग बहुत ख़ुशक़िस्मती से मिलते हैं। बाक़ी फिर न कविताएँ महत्त्वपूर्ण हैं, न जीवन का क्या बना वह, न एक किताब, न कोई अन्य स्थिति। अगर कोई मुझसे कहे कि तुम कविताओं और दोस्तों में से किसको चुनोगे तो मैं बेहिचक ये दोस्तियाँ अपने लिए रखूँगा कि मेरे लिए इनसे महत्त्वपूर्ण कुछ नहीं है। मेरा होना ही इनके होने से बना है।

आप अनुवादक के तौर पर भी लंबे समय से सक्रिय हैं। आपने 2023 में सदानीरा के 28वाँ अंक का संपादन किया जो टी.एस. एलियट की प्रदीर्घ और प्रसिद्ध कविता वेस्टलैंड (1922) पर एकाग्र था। इसके अलावा आपने विश्व साहित्य से अनेक कवियों की कविताओं का अनुवाद किया है। अनुवादक के तौर पर भविष्य में आपकी कौन-सी योजनाएँ हैं।

अनुवाद करना मेरे लिए साँस भरने की तरह है। जो ऑक्सीजन मुझे मेरी कविताओं के लिए चाहिए कि उनके बाहर आने में मेरी अस्थि-मज्जा के टुकड़े चले जाते हैं, मेरे शरीर का मांस कम हो जाता है, मेरा वज़न घट जाता है, इसी प्रक्रिया से मिलता है। अनुवाद मुझे फिर से खड़ा करते हैं। यह काम, अगर ऑडेन की प्रसिद्ध किताब के सहारे कहा जाए, तो कवि के ज़रूरी कामों में से है। अनुवाद, एक नए बनते हुए कवि के लिए, मास्टरक्लास भी है जब आप एक घनी अंतरंगता में उस कवि के साथ रहते हैं जिनका आप अनुवाद कर रहे हैं। सबसे पहले मैंने मुक्तिबोध की कविता ‘शून्य’ का अनुवाद किया था। अनुवाद सिखाने वालों में दो नाम महत्त्वपूर्ण हैं। रामकृष्ण पांडेय ने मुझे अनुवाद का ककहरा सिखाया और पंक्ति दर पंक्ति कविता को खोलना। अरुण कमल तो मेरे शिक्षक रहे लेकिन क्लास में शायद ही कभी अनुवादों पर बात हुई हो। लेकिन अनगिनत बैठकों में हमने एक साथ कई कई कवियों को परत-दर-परत खोल कर देखा और कई बार जो अर्थ सिमट जाते थे, जैसा अँग्रेज़ी मॉडरनिज़्म की कविताओं में अक्सर होता है, हम देर-देर तक एक-एक इमेज पर बात करते रहे। कविताओं का अनुवाद करते हुए आपके सामने एक पूरी परंपरा की महानता खड़ी होती है। एक पूरा युग होता है जिससे आपको बात करनी है, थोड़ा तो आप उस परंपरा से जुड़ते हैं अनुवाद करते हुए। फिर अपनी भाषा में एक पूरी अलहदा संस्कृति को जीने का सुख भी बड़ा सुख है।

उदाहरण के तौर पर, नेरूदा के अनुवाद न मुझे सुरेश सलिल के पसंद आते हैं न चंद्रबली सिंह के, न रामकृष्ण पांडेय के। अरुण कमल के किए अनुवाद मुझे ख़ासे पसंद हैं जिन्हें मैं बार-बार पढ़ता हूँ। फिर भी कई बार यह होता है कि किसी कविता का अनुवाद मुझे ख़ुद करने की इच्छा होती है ताकि उस कवि के जिए को थोड़ा बहुत मैं भी जी सकूँ। नेरूदा की कविताओं का संगीत अँग्रेज़ी में मुझ तक पहुँचता ही नहीं। उनको पढ़ते हुए मैं हिंदी में उन पंक्तियों को सोचता हूँ।

आगे मैं बंगाली कवियों को बांग्ला में पढ़कर, उनका अनुवाद करना चाहता हूँ। कुछ अँग्रेज़ी कवियों के अनुवाद करने की भी योजना है। बाक़ी मैं एक कवि पर और काम कर रहा हूँ और उनकी लगभग बीस कविताओं का अनुवाद कर चुका हूँ। पुस्तक के रूप में अभी उनकी कविताओं के अनुवाद हिंदी में नहीं आए। वह काम करने की भी कोशिश करनी है।

अँग्रेज़ी और भारतीय भाषाओं में लिखे जा रहे गद्य पर आपकी लगातार नज़र रहती है। यहाँ मेरा सवाल यह है कि गद्य ने कवि होने में या कविता को साधने में किस हद तक मदद की?

अगर मैं बहुत ईमानदारी से कहूँ और शायद यह बात सबको पचे भी नहीं, मेरे लिए गद्य और पद्य का भेद बहुत मायने नहीं रखता। अंत में सब भाषा है और कवि को ताउम्र भाषा का रियाज़ करना है। सबसे रोचक यह है कि इसमें उम्र कोई मायने नहीं रखती। कवि को अंत में भाषा में उतरना है और उसकी स्मृति से काम करना है। कीट्स एक जगह कहते हैं कि ‘टच हैज मेमोरी’। भाषा कहीं भी हो, किसी भी विधा, किसी भी शैली, किसी भी आकार में, कवि को उसके पास जाना है और उसको छू कर देखना है। कि आपने अमूर्त चिह्नों को उठाया, उन्हें छूकर देखा और फिर उन्हें क़रीने से सजाया। यह हमारी मनुष्यता, हमारी सभ्यता का मूल है। जो लेखक मुझे ख़ासे पसंद हैं, उन समकालीन लेखकों में जूलियन बार्न्स, कोएट्ज़ी, कैल्विनो, आंद्रे एसिमन आदि की तरफ़ मैं लौटता रहता हूँ। फिर मार्केज़ तो हैं ही। साथ-साथ कुछ क्लासिकल अँग्रेज़ी लेखक जैसे लॉरेंस, हार्डी, हेमिंग्वे भी हैं जिनकी कुछ किताबें, मैं कोशिश करता हूँ, हर साल पढ़ूँ। ये लेखक मेरे दिमाग़ को स्ट्रक्चर करते हैं। ऐसे ही टैगोर के उपन्यास, बौडेलेयर का गद्य, कामू का गद्य या किर्केगार्ड और नीत्शे का लिखा इतना महीन है कि उनसे ख़ूब सीखा जा सकता है। आख़िरकार सब भाषा है। कई बार लिखना, इस पढ़ने के बाई-प्रोडक्ट जितना ही होता है।

आधी पंक्ति को भविष्य में कुछ प्रभावशाली गद्य कविताओं के लिए भी याद किया जाएगा। इस संग्रह की आख़िरी कविता ‘फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया’ को पढ़ते हुए सहज ही ख़याल आया कि क्या मिर्ज़ा पाब्लो (अंचित का एक उपनाम) को दिल्ली छोड़ने का अफ़सोस है?

मुझे दिल्ली बिल्कुल पसंद नहीं है। मैं अपनी छोटी ज़िंदगी में जितनी बार दिल्ली गया हूँ, दूसरे किसी शहर नहीं गया और मैंने कई बार कोशिश की है कि मैं दिल्ली से बेइंतहा मोहब्बत करूँ क्योंकि दिल्ली ग़ालिब और मीर की दिल्ली थी। मैं हर बार यह भूल गया कि दिल्ली कवियों का नहीं बादशाहों का शहर है, जहाँ एक शायर की बिसात एक सड़क पर लगे पत्थर से ज़्यादा नहीं है। दिल्ली ने मुझे बार-बार बुलाया और हर बार पहले से और टूटा हुआ और पहले से और अकेला छोड़ दिया। उसने मुझे ऐसे घाव दिए हैं जो अब इस ज़िंदगी में नहीं भरेंगे। दिल्ली छोड़ने से ज़्यादा मुझे दिल्ली जाने का अफ़सोस है कि मैं अब अगर उधर लौटा तो और अकेला, और निरीह, और टूटा हुआ वापस आऊँगा। मेरे कुछ प्रिय कवियों ने दिल्ली से मोहब्बत की है पर दिल्ली पलट कर मोहब्बत नहीं करती, उसका दिखावा करती है या आपको ऐसा बना देती है कि कुछ पूरा नहीं पड़ता। निहत्थे, पैदल दिल्ली जाने की कल्पना मैंने कई बार कविताओं में की है लेकिन अब मेरे भीतर दिल्ली जाने की हिम्मत नहीं बची। अगर मेरा बस चला तो मैं अब कभी दिल्ली नहीं जाऊँगा।

आप उम्र को किस तरह देखते हैं? क्या पिछले कुछ सालों में उम्र बढ़ने का एहसास बढ़ा है?

आदमी का शरीर बूढ़ा होता है लेकिन उसके पहले उसकी आत्मा बूढ़ी हो जाती है। यह एहसास कब होता है, मैं नहीं जानता लेकिन एक सुबह आप उठते हैं और आप पाते हैं कि आपकी आत्मा पर झुर्रियाँ पड़ गई है, हर क़दम चलते हुए वह दुखती है और उसका वज़न बहुत बढ़ जाता है। देह का क्या होता है, इसके बहुत मायने नहीं हैं क्योंकि जो जैविक है उसकी प्रवृति पकड़ी जा सकती है, उसका अनुमान किया जा सकता है और एक हद तक कोर्स करेक्शन भी। मुझे ऐसा लगता है कि मैं बूढ़ा हो गया हूँ क्योंकि मैं प्रथम-अनुभवों से छूट गया हूँ। दोहरावों में मेरी कोई रुचि नहीं है, न दिनचर्या में। मुझे ‘वंडर’ की चाहत है जो बहुत कम, बहुत थोड़ी मात्रा में इधर-उधर लिखने के दौरान मिल जाती है—एक बहुत छोटा परसेंटेज। हम जिस समय में रहते हैं, उसकी दिनचर्या बहुत औसत, बहुत फ़ार्सिकल है और इतने सारे पैटर्न्स से बनी है कि अब यात्रा पर निकलना भी क्लिशे है, प्रेम करना भी। ऐसे में भीतर ‘नया’ क्या है, यह मैं नहीं जानता। इसका कोई उत्तर मेरे पास नहीं है। कीट्स, शेली, राजकमल चौधरी जैसे कवि युवा रह गए। मैं अब फिर कब से युवा होऊँगा, मैं नहीं जानता। शायद यह सीसीफियन रियलाइज़ेशन ही मुझे बूढ़ा कर रहा है। लेकिन, एक लेकिन हमेशा बना रहेगा।

आप लंबे समय से पटना पर केंद्रित एक उपन्यास लिख रहे हैं। वह उपन्यास हमें कब तक पढ़ने को मिलेगा?

उपन्यास मेरा ट्रेड नहीं है। न इसको लिखने की कोई योजना थी। मैं मूलत: कवि हूँ/होना चाहता हूँ। इसलिए मुझसे यह विधा साधी नहीं जा रही। मैं उसपर बार-बार काम कर रहा हूँ और बार-बार असंतोष से भर जा रहा हूँ। फिर भी हो सकता है, इस साल वह उपन्यास आ जाये।

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