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मेरे एकांत के प्रवेश द्वार

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शाम हम सब ‘मेरे एकांत के प्रवेश द्वार’ के माध्यम से एक ऐसे साझा स्पेस में एकत्र हुए, जहाँ लोग अपने-अपने जीवन की व्यस्तताओं और बहुत कम मिलने वाले अवकाश से थोड़ा समय निकालकर पहुँचे थे। बाहर की दुनिया अपनी गति में चल रही थी, लेकिन इस छोटे-से साहित्यिक दायरे के भीतर ऐसा लग रहा था जैसे लोग किसी ज़रूरी संवाद, किसी ज़रूरी उम्मीद की ओर लौट रहे हों।

कार्यक्रम की शुरुआत ऐश्वर्या द्वारा उपस्थित साथियों और समूह के परिचय से हुई। उन्होंने बताया कि ‘मेरे एकांत का प्रवेश द्वार’ दरअस्ल एक ऐसा वैचारिक और रचनात्मक मंच है, जहाँ व्यक्ति अपने भीतर रहते हुए भी सामूहिकता का अनुभव करता है। यह वह जगह है, जहाँ निर्मला पुतुल से लेकर बेल हुक्स तक की स्त्रीवादी चिंतन परंपरा को पढ़ा और समझा जाता है और उसी से संवाद करते हुए अपनी बात कही जाती है।

इसी क्रम में इस बैठक में समकालीन कवि रूपम मिश्र की कविताओं का पाठ और उस पर बातचीत हुई। रूपम मिश्र ने मध्यमवर्गीय स्त्रियों के जीवन और श्रम के बीच की परतों को खोलते हुए कहा कि महिला दिवस 1908 में मज़दूर महिलाओं के संघर्ष के दिन की तरह शुरू हुआ और आज एक अलग तरह की जंग छिड़ी हुई जो स्त्रियों को पुनः एक ऐसी विवशता की स्थिति में ले जाना चाहती है, जहाँ वे अंततः हारकर स्वीकार कर लेने की स्थिति में आ जाएँ। यह बात उनकी एक कविता-पंक्ति में कुछ यूँ मिलती है—क्या हम सारी लड़ाइयाँ यूँ ही हार जाएँगे?

मैं अपराध और मनुष्य होने का गणित हल कर रही हूँ...

तुम्हारे देह के जूठे होने के भय से काँप उठी थी...

ये पंक्ति स्त्री के उस अनुभव को सामने लाती है, जहाँ उसे अपने अस्तित्व और अपने निर्णयों के लिए लगातार नैतिकता के कठोर पैमानों से गुज़रना पड़ता है। यहाँ ‘गणित’ केवल प्रतीक नहीं है, यह उस जटिल सामाजिक समीकरण का रूपक है—जिसमें स्त्री की इच्छाएँ, उसकी स्वतंत्रता और उसकी मनुष्यता लगातार जाँची-परखी जाती हैं। दूसरी कविता में प्रेम करने के साहस के पीछे छिपे भय, असुरक्षा और सामाजिक दबावों की परतें सामने आती हैं। यह कविता प्रेम को केवल भावनात्मक अनुभव के रूप में नहीं देखती, बल्कि उसे एक सामाजिक और राजनीतिक क्रिया की तरह भी प्रस्तुत करती है।

इसी क्रम में तीसरी कविता की पंक्ति—माँ जैसी औरतों को बताना कि हम उतने ही मनुष्य हैं जितने भैया…

पितृसत्तात्मक पारिवारिक संरचना की गहरी आलोचना करती है। यह पंक्ति उस व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगाती है, जहाँ स्त्री की मनुष्यता तक को अक्सर रिश्तों और भूमिकाओं के आधार पर सीमित कर दिया जाता है।

इसके बाद पढ़ी गई कविताओं में समय की सामाजिक और राजनीतिक बेचैनियाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देती हैं। एक कविता में रात को ‘पहले की तरह काली’ बताया गया है, लेकिन उसी अँधेरे में कवि जुगनू उगाने लगती है। यह बिम्ब केवल आशा का नहीं, बल्कि प्रतिरोध का भी है—अँधेरे को स्वीकार करने के बजाय उसके भीतर रोशनी की संभावना पैदा करने का प्रयास।

कविता ‘सबके जीवन का संझियारे’ की पंक्ति—डरकर पीछे बैठी बुलबुल उड़ जाती है।

स्त्री की उस संभावित उड़ान की ओर संकेत करती है जो लंबे समय तक भय और सामाजिक नियंत्रण के भीतर सीमित रही है। वहीं ‘कुलीनता का भार लिए कितने मनुष्य हो सकेंगे’ जैसी कविता पुरुष के ‘आदमी’ होने के पितृसत्तात्मक पैमानों पर सवाल खड़ा करती है। यह कविता कुलीनता और पुरुषत्व की उस अवधारणा की आलोचना करती है जो मनुष्यता से अधिक सत्ता और नियंत्रण पर आधारित है।

‘भंवरी देवी’ पर लिखी कविता में न्याय की लंबी और कठिन प्रक्रिया की पीड़ा दर्ज है। कविता की पंक्ति—न्याय के लिए तनी हर गर्दन से रस हो गया है

एक ऐसी थकान का चित्र खींचती है, जो न्याय की प्रतीक्षा में बीतते वर्षों से पैदा होती है। यह कविता केवल भंवरी देवी की कहानी नहीं कहती, बल्कि उन तमाम स्त्रियों के संघर्ष की स्मृति को भी सामने लाती है जो न्याय के लिए लगातार लड़ रही हैं।

इसी तरह फूलन देवी पर आधारित कविता ‘वे तुम्हें हेरते हुए आएँगे’ में कवि लिखती हैं—तुम्हें हँसते हुए देखकर लगता है कि मुस्कुराया जा सकता है।

यह पंक्ति स्त्री प्रतिरोध की उस शक्ति को रेखांकित करती है, जो हिंसा और अपमान के बीच भी अपने अस्तित्व और आत्मसम्मान को बचाए रखने की ज़िद रखती है। कविता अंततः यह प्रश्न भी उठाती है—क्या हम सारी लड़ाइयाँ यूँ ही हार जाएँगे?

इस क्रम में समूह के कुछ साथियों ने भी अपनी कविताएँ प्रस्तुत कीं। ऐश्वर्या की कविता ‘आज़ाद बेटियाँ’ बसंत के आने की प्रतीक्षा करती है। लेकिन यह बसंत केवल मौसम का नहीं है; यह सामाजिक और लोकतांत्रिक परिवर्तन की आकांक्षा का प्रतीक बनकर सामने आता है।

ऋचा की कविता ‘मेरी निर्माता : एक अधूरी वंशावली’ यह प्रश्न उठाती है कि जब तक माँओं को अवकाश नहीं मिलेगा, तब तक वे पितृसत्तात्मक आस्थाओं और परंपराओं पर सवाल कैसे खड़े कर पाएँगी। यहाँ ‘अवकाश’ केवल समय नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता का भी प्रतीक है।

दुर्गेश्वरी की कविता ‘बोलती हुई औरतें’ स्त्री होने के पितृसत्तात्मक खाँचों को तोड़ती हुई, स्त्री अस्तित्व की एक मुखर अभिव्यक्ति है। यह कविता चुप्पी के विरुद्ध आवाज़ की स्थापना करती है और यह दिखाती है कि बोलना ही अपने आप में एक राजनीतिक क्रिया हो सकता है।

मांडवी की कविता में जब मांडवी अपनी रचनाओं के भीतर यात्रा करती है, तो वह रसोई से गुज़रते हुए ‘चौका’ कविता पर ठहरती है। यह कविता बताती है कि चौका केवल घरेलू श्रम का प्रतीक नहीं है; वह एक ऐसी जगह भी हो सकता है—जहाँ एक नई स्त्री की चेतना आकार लेती है, मानो वह एक सामाजिक और वैचारिक प्रयोगशाला हो।

‘प्रेम पत्र’ कविता में प्रेमिकाएँ गुप्त लिपि में प्रेम पत्र लिखती हैं—तुम पढ़ लो, मैं काम कर लूँगी।

यह पंक्ति स्त्री-प्रेम के उस रूप को सामने लाती है, जो घरेलू श्रम, भावनात्मक श्रम और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच आकार लेता है। साथ ही यह प्रेम की पारंपरिक बाइनरी को भी चुनौती देती है।

ऐश्वर्या विजय राज की कविता ‘बकरियों की माँ’ इच्छाओं, शरीर और लैंगिकता के प्रश्नों को एक नए ढंग से सामने लाती है। कविता में इच्छाएँ पानी में बदल जाती हैं जो मछलियों को जीवन देती हैं। यह बिम्ब शरीर, इच्छा और जेंडर के स्थापित खाँचों को तोड़ने की कोशिश करता है।

शिवानी की कविता ‘फ़ेमिनिस्ट औरतें और दंभ’ समकालीन सामाजिक-राजनीतिक प्रश्नों—विशेषतः जाति और आरक्षण—की ओर जाती है। यह कविता यह भी रेखांकित करती है कि स्त्रीवादी विमर्श केवल लैंगिक असमानता का प्रश्न नहीं है; वह जाति, वर्ग और सत्ता संरचनाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।

मौलश्री की कविता ‘उदास लड़कियों के गीत’ उदासी को स्त्री-जीवन का स्थायी भाव तो मानती है, लेकिन उसी के भीतर प्रतिरोध और उम्मीद की संभावना भी तलाशती है। यहाँ उदासी निष्क्रियता नहीं, बल्कि संवेदना और संघर्ष की ज़मीन बन जाती है।

इस तरह अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की यह शाम केवल कविता पाठ का अवसर नहीं रही। यह एक ऐसा साझा क्षण था, जहाँ जेंडर, प्रेम, श्रम, न्याय, इच्छा और प्रतिरोध के अनेक आयाम एक साथ खुलते गए। हर कविता किसी सूची की तरह अलग-अलग नहीं लगी; बल्कि ऐसा महसूस हुआ जैसे हर कविता दूसरी कविता की किसी अनकही पंक्ति को पूरा कर रही हो—कहीं सहमति में, कहीं असहमति में, और कहीं एक नए प्रश्न की तरह।

अंततः यह एहसास फिर से सामने आया कि कविता केवल संवेदना की अभिव्यक्ति नहीं है। वह समय के दबावों के बीच मनुष्य को उसके भीतर के साहस से मिलाती है। वह उन सवालों को जीवित रखती है, जिन्हें समाज अक्सर चुप्पी में दबा देना चाहता है। और शायद इसी वजह से ऐसे छोटे-छोटे साहित्यिक स्पेस—जहाँ लोग अपने एकांत से निकलकर सामूहिकता में शामिल होते हैं—आज के समय में और भी ज़रूरी हो जाते हैं। क्योंकि जब तक समाज में अन्याय के ख़िलाफ़ बोलने की इच्छा और उम्मीद की हल्की-सी लौ बची है, तब तक कविता भी रहेगी—और उसे सुनने, समझने और आगे बढ़ाने वाले संवेदनशील लोग भी।

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