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व्यंग्य पर गीत

व्यंग्य अभिव्यक्ति की

एक प्रमुख शैली है, जो अपने महीन आघात के साथ विषय के व्यापक विस्तार की क्षमता रखती है। काव्य ने भी इस शैली का बेहद सफल इस्तेमाल करते हुए समकालीन संवादों में महत्त्वपूर्ण योगदान किया है। इस चयन में व्यंग्य में व्यक्त कविताओं को शामिल किया गया है।

मदवा पीले पागल जोबन बीत्यो जात

भारतेंदु हरिश्चंद्र

स्वागत गान

कालीकान्त झा ‘बूच’

अबकी जिताइ के देखा हो पंचो

रामजियावान दास ‘बावला’

आइल फिर 26 जनउरी

रामजियावान दास ‘बावला’

नमन बाटै

रामजियावान दास ‘बावला’

आजादी पउलस के?

रामजियावान दास ‘बावला’

भदैया होली

कालीकान्त झा ‘बूच’

देखहक हौ गान्धी बाबा!

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

अइसन अनेत हो गइल

विजेन्द्र अनिल

चूरन अमल बेद का भारी

भारतेंदु हरिश्चंद्र

वाह रे हिन्दुस्तान!

रामजियावान दास ‘बावला’

कइसे कहीं की भारत हौ

रामजियावान दास ‘बावला’

अगर महराज न बदलवा

रामजियावान दास ‘बावला’

बाजल डंका

मार्कण्डेय प्रवासी

माला

कालीकान्त झा ‘बूच’

बतावा कहाँ रचइबा रास

रामजियावान दास ‘बावला’

शुभे हो शुभे!

मार्कण्डेय प्रवासी

शिव ई बाना

चन्द्रनाथ मिश्र ‘अमर’

नोतक प्रेमी

कालीकान्त झा ‘बूच’

चने जोर गरम

भारतेंदु हरिश्चंद्र

हमर गाम

कालीकान्त झा ‘बूच’

युग परिवर्तन

कालीकान्त झा ‘बूच’

मुन्ना कक्का सासुर चलला

कालीकान्त झा ‘बूच’

सुनू आब मन जेहन लगैए

कालीकान्त झा ‘बूच’

काटरक परिणाम

कालीकान्त झा ‘बूच’

हील हाइ-हाइ

कालीकान्त झा ‘बूच’

हिन्दवी उत्सव 2026

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