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डर पर गीत

डर या भय आदिम मानवीय

मनोवृत्ति है जो आशंका या अनिष्ट की संभावना से उत्पन्न होने वाला भाव है। सत्ता के लिए डर एक कारोबार है, तो आम अस्तित्व के लिए यह उत्तरजीविता के लिए एक प्रतिक्रिया भी हो सकती है। प्रस्तुत चयन में डर के विभिन्न भावों और प्रसंगों को प्रकट करती कविताओं का संकलन किया गया है।

ओ गुटबाज

मनोज जैन

धुँधलका

देवेंद्र कुमार बंगाली

अपने ही इर्द-गिर्द

देवेंद्र कुमार बंगाली

फिर जला लोहबान

देवेंद्र कुमार बंगाली

इजोतक खातिर

दीपिका चन्द्रा

सभ्यता को आँकना

प्रदीप बहराइची

ओ गुटबाज

मनोज जैन

पहाड़ हमर बाटपर

मार्कण्डेय प्रवासी

सोच रहा हूँ

देवेंद्र कुमार बंगाली

बारूद पर गाँव

ब्रजभूषण मिश्र

तितलियो! इस बार जाना

ज्ञान प्रकाश आकुल

हिन्दवी उत्सव 2026

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