अनफ़्रेम्ड : 5G की स्पीड में 60 के दशक की ‘तड़प’
दिनेश श्रीनेत
24 सितम्बर 2026
ऐसा मेरे साथ कभी पहले नहीं हुआ था, तो यह बात मेरे मन में बैठ गई। ऑफ़िस से घर लौटते समय स्पॉटिफ़ाई पर अचानक लता मंगेशकर का एक गीत लूप में बज उठा, जिसे पहले कभी नहीं सुना था। गीत था, ‘हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे, खो बैठे...’ जो बहुत से पुराने मधुर गीतों की तरह कानों को सुखद महसूस हुआ। लगा कि इसे याद रखूँ, दोबारा सुनूँगा। मगर प्लेलिस्ट में एक के बाद बजते गीतों के बीच वह कहीं विस्मृत हो गया। कुछ समय बाद जब फिर वही गीत स्पॉटिफ़ाई के सुझावों में आया तो सुनकर सुकून-सा मिला। कुछ दिन और बीते कहीं चलते हुए वही गीत कानों से टकराया। एक दिन मोबाइल स्क्रॉल कर रहा था, एक रील में वही गीत बज उठा। अब वही गीत मुझे अक्सर सुनने को मिल जाता है। यह उसी गीत का जैसे डिजिटल पुनर्जन्म था, इन्हीं दो पंक्तियों को हर कोई अपनी दुनिया में अपने तरीक़े से दुहरा रहा था।
हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे,
तुम कहते हो कि ऐसे प्यार को भूल जाओ...
मुझे याद आया कि एक साल पहले एक और फ़िल्मी गीत इसी तरह से रातों-रात वायरल होने लगा था। यहाँ भी लता मंगेशकर थीं :
तड़पाओगे तड़पा लो
हम तड़प-तड़पकर भी
तुम्हारे गीत गाएँगे...
यह दिलचस्पी का विषय था कि सिनेमा से पॉलिटिक्स और साहित्य से विज्ञापन तक जब हर कहीं फ़ेमिनिज़्म डिस्कोर्स में शामिल हो चुका है; लाखों महिलाएँ, लड़कियाँ, बच्चियाँ ठुकराने पर भी, तड़पने पर भी किसी के लिए गीत क्यों गा रही हैं? इंस्टाग्राम पर ‘तड़पाओगे तड़पा लो...’ के विभिन्न वर्जन (ओरिजिनल, लो-फ़ी, रीमिक्स) को मिलाकर लाखों रील्स बन चुकी हैं। ‘तड़पाओगे तड़पा लो...’ या ‘फिर हम तेरे प्यार में सारा आलम खो बैठे...’ जैसे गीतों का इस दौर की आधुनिक और स्वतंत्र स्त्रियों द्वारा गाया जाने में मुझे एक दिलचस्प समाजशास्त्रीय और मनोवैज्ञानिक विरोधाभास नज़र आया। यह विरोधाभास साहित्य में ‘सुधा’ और ‘चंदर’ की लोकप्रियता में भी देखने को मिलता है।
साठ के दशक का संसार जैसे समर्पण, त्याग और आत्मपीड़ा के महिमामंडन का संसार था। आज की पीढ़ी जो सेल्फ़ के प्रति बहुत ज्यादा अवेयर है और आत्मनिर्भर भी है, उसका इस तरह की भावनाओं के प्रति आकर्षित होने का क्या अर्थ हो सकता है? इसका एक सिरा जल्दी बनने और उतनी जल्दी ख़त्म हो जाने वाले रिश्तों से जाकर जुड़ता है। जहाँ आपसी संबंधों में अस्थायित्व हो, वहाँ आपकी डीप साइकी में एक क़िस्म की असुरक्षा भी जन्म लेती है। वहाँ ऐसे पुराने गीत एक भावनात्मक सुकून देते हैं। इनमें झलकने वाला वह पूर्ण समर्पण आज की जनरेशन के लिए एक फ़ैंटेसी या एस्केप की तरह काम करता है, जो शायद व्यावहारिक जीवन में रिश्तों की अनिश्चितता और ‘कैजुअल डेटिंग’ से कहीं थकान महसूस कर रही है।
लेकिन इस लोकप्रियता को इतनी-सी बात से जोड़कर देखना एक सरलीकरण भी हो सकता है। साठ के दशक के सिनेमा में नायिका की पीड़ा को पितृसत्तात्मक नज़रिये से एक आदर्श के रूप में महिमामंडित किया जाता था। लेकिन आज एक लड़की अपने स्मार्टफ़ोन पर कैमरे के सामने अपनी मर्ज़ी से इसे गाती है, तो इसका संदर्भ बदल जाता है। यह उसी गीत को री-क्लेम करना है; जहाँ इसे गाना लाचारी नहीं, बल्कि अपनी मर्ज़ी से चुनी गई एक कलात्मक अभिव्यक्ति है। लेकिन सवाल फिर वही है कि कोई मज़बूत स्त्री ऐसे शब्दों को क्यों ही चुनेगी भला? इसके पीछे ख़ुद की निष्कवचता या ‘वल्नरेबिलिटी’ के लिए एक सुरक्षित स्पेस तलाशना भी है। उत्तर उदारीकरण के बाद एक तेज़, प्रतिस्पर्धा और नितांत व्यावहारिकता से भरे हमारे इस समय में आधुनिक महिलाओं को सबसे ज्यादा मनोवैज्ञानिक दबाव का सामना करना पड़ता है। सबसे बड़ा दबाव उन पर मज़बूत और अडिग दिखने का है। पुराने दौर का यह संगीत और उसके बोल उनको एक ऐसा सुरक्षित स्पेस देते हैं, जहाँ वे भावनात्मक रूप से स्पष्ट होने की स्थिति को कम से कम महसूस कर सकती हैं। उसी पुराने दौर के गीत आज के समय में उनके लिए कैथार्सिस रच सकते हैं। इन पंक्तियों को गाना उनके लिए वास्तविक जीवन के किसी टॉक्सिक रिश्ते का समर्थन नहीं है, बल्कि सिर्फ़ भावों को व्यक्त करना है।
जैसा कि देरिदा कहते हैं कि अर्थ हमेशा बदलता रहता है और कभी स्थिर नहीं होता। 1963 में ‘दिल एक मंदिर’ फ़िल्म में यह गीत भले भारतीय स्त्री के समर्पण और उसकी सामाजिक विवशता का प्रतीक रहा हो, जब उसे 2026 में इंस्टाग्राम रील पर गाया जाता है तो न सिर्फ़ उसका पुराना पितृसत्तात्मक अर्थ ‘स्थगित’ हो जाता है, बल्कि पॉप-कल्चर उसमें तोड़-फोड़ भी करता है। यह मज़बूत बनाम कमज़ोर, स्वतंत्र बनाम आश्रित और आधुनिक बनाम पारंपरिक की ‘बाइनरी’ को ध्वस्त करता है; ताकि हम अपनी आधुनिकता को साथ लिए हुए ख़ुद को हाशिए पर खड़ा न पाएँ और परंपरा के भीतर यात्रा करते हुए आधुनिक भी बने रहें। इस तरह जब एक आधुनिक, आर्थिक और वैचारिक रूप से स्वतंत्र महिला एक ‘कमज़ोर और आश्रित’ नायिका के गीत को गाती है, तो वह इस द्वैत को ध्वस्त कर रही होती है।
देरिदा मानते थे कि संदर्भ बदलने से पाठ बदल जाता है। इसका एक और विश्लेषण इस रूप में भी किया जा सकता है के कैसे एक ‘पाठ’ अपने ही अर्थ का खंडन करने लगता है। कोई लड़की जिसका अपने करियर और जीवन पर पूरी तरह से नियंत्रण है; एक ऐसे गीत पर लिप-सिंक या परफ़ॉर्म कर रही है जो पूरी तरह से ‘सारा आलम खो बैठे’ या ‘तड़प’ पर है, यानी यह शक्तिहीनता का एक बेहद सशक्त प्रदर्शन है। वह ख़ुद अपना कैमरा सेट करती है, अपनी लाइटिंग चुनती है और ख़ुद तय करती है कि उसे दुनिया के सामने कैसे दिखना है। इस प्रक्रिया में वह विक्टिम के एक्ट को एक सचेत परफ़ॉर्मेंस में बदल देती है। अब यहाँ पर किसी के प्यार में सारा आलम खो बैठता या तड़प कर किसी के गीत गाना भी वह अर्थ खो देता है, जिसे ध्यान में रखकर उसके गीतकार ने कभी लिखा होगा।
रील्स के दौर में पुराने गीतों को हासिल इस लोकप्रियता में लिरिक्स के अलावा भी बहुत कुछ छिपा है। पिछले कुछ सालों में कुछ ख़ास तरह के गीत रातों-रात लोकप्रिय होते देखे गए। लता मंगेशकर का ही ‘मेरा दिल ये पुकारे आजा...’ वर्ष 2022 में उछला था। एक शादी के दौरान किए गए डांस वीडियो ने वर्षों पुराने इस गीत को ट्रेंड बना दिया था। इंस्टाग्राम पर इसी गीत पर लाखों रील्स बनीं और स्पॉटिफ़ाई पर इसके स्ट्रीम्स में लगभग 700% का उछाल दर्ज किया गया। ‘आपकी नज़रों ने समझा प्यार के क़ाबिल...’ इस गीत के लो-फ़ी वर्जन ने वीडियो और रील्स में जबरदस्त प्रसिद्धि हासिल की। बारिश के मौसम और यात्राओं पर बनी रील्स में 70 के दशक में हेमलता के गाए एक गाने ‘अँखियों के झरोखों से...’ को भी ख़ूब पॉपुलर बना दिया, यानी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म सिर्फ़ नया कंटेंट ही नहीं बना रहे हैं; बल्कि वे एक आर्काइव की तरह काम कर रहे हैं जो भारतीय सिनेमा की संगीत विरासत को नई पीढ़ी के सामने उनकी अपनी शैली, अपने फ़ॉर्मेट में पेश कर रहे हैं।
जहाँ एक पीढ़ी ने बहुत से पुराने गानों को ‘प्योर रोमांस’ और ख़ुद को खोए हुए संसार की अभिव्यक्ति के रूप में खोजा है, वहीं जेन-ज़ी के बीच इनका असर कुछ अलग है। उनके बीच पुराने गीतों के अचानक लोकप्रिय होने के मुख्य कारण इसका आसानी से लो-फ़ी में कन्वर्ट हो जाना है। डिजिटल क्रिएटर्स इन पुराने गीतों की गति को धीमा करके और उनमें गूँज डालकर एक ‘मेलन्कोलिक’ या स्वप्निल प्रभाव पैदा करते हैं, जो जेन-ज़ी के बीच बहुत पॉपुलर है। आम तौर पर 60 और 70 के दशक की रिकॉर्डिंग शैली और वाद्ययंत्रों की ध्वनि को आधुनिक ऑडियो इंजीनियरिंग के साथ मिलाकर लो-फ़ी का एस्थेटिक तैयार होता है। पुराने गीतों का लो-फ़ी वर्जन तैयार करना आसान है।
अब शॉर्ट-फ़ॉर्म वीडियो में जब 15 से 30 सेकंड के भीतर गहरी या भावप्रवण बात कहनी होती है; तो पुराने दौर के गीतों में वह भाव पकड़ना बहुत आसान होता है, जहाँ बस एक पंक्ति इतनी गहरी या दिल को छू लेने वाली हो कि वह अपने-आपमें ही पूरी बात कह जाए। यही कविता और शाइरी के साथ भी होता है। आज के दौर के इन्फ़्लूएंसर और कंटेंट क्रिएटर जानते हैं कि सोशल मीडिया का अल्गोरिदम तीन सेकेंड के ‘हुक’, ‘वॉच टाइम’ और ‘इंगेजमेंट’ पर काम करता है। पुराने गीत दर्शकों में नॉस्टेल्जिया को ट्रिगर करते हैं। जानी-पहचानी धुनें सुनकर लोग वीडियो को पूरा देखते हैं या लूप में देखने लगते हैं। इससे अल्गोरिदम उस ऑडियो को और अधिक पुश करता है, जिससे वह रातों-रात एक ‘वायरल ट्रेंड’ बन जाता है।
अगली बार आप जब आप मोबाइल स्क्रॉल करते हुए कोई पुरानी धुन सुनें और बार-बार सुनें तो एक बार ठहरकर जरूर सोचें कि आज की दुनिया में आपके मन के किस कोने को यह स्पर्श कर रहा है।
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