घाम-पानी : नाम्चे बाज़ार का जादुई शनिवार
हरि कार्की
23 सितम्बर 2026
मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्यों हूँ! यह बताने के मायने कुछ नहीं निकलेंगे। बस इतना ही कहना काफ़ी होगा कि मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ... क्योंकि मुझे यहाँ होना होगा। ठीक वैसे ही जैसे ‘Yesterday’ फ़िल्म में जैक मलिक को—उन 12 सेकंड्स के दरमियान—बस से टकराने के लिए वहाँ होना ही होगा।
मैं सगरमाथा बेस कैंप की यात्रा पर हूँ। मैंने यह महसूस किया है कि बिना तैयारी के किया गया काम, तैयारी के साथ किए गए काम से बेहतर होता है। यात्राओं में यह बात और सटीकता से लागू होती है और पहाड़ों में तो हर दस में से नौ बार इस बात की पुष्टि हो जाती है। मैं देर शाम जब नाम्चे पहुँचा तो पाँव की उँगलियों में असहनीय दर्द था। तैयारी में रखी गई पेनकिलर और स्प्रे किसी से काम नहीं चला। वहीं एक शेरपा दाइ [बड़े भाई] ने जब कहा, “नुनपानीले सेकाइ गर्नु खुट्टाको थकान र दुखाइ कम गर्न निकै फाइदा हुन्छ।” माने कि नमक वाले गर्म पानी में पैर डालने से दर्द और थकान कुछ ही देर में ठीक होने की ओर होगा और हुआ भी वैसा ही।
ठंड से बचने के लिए मेरे पास पर्याप्त कपड़े थे। मैं सुबह से दो कप गर्म पानी पी चुका था, पर मुझे ठंड से आराम तब मिला जब नाम्चे में घाम लगा। वैसे पहाड़ों में धूप तीखी होती है और ऐसी यात्राओं में टैनिंग होना भी आम होता है।
मैं अभी अमा डबलाम लॉज [Ama Dablam Lodge] में हूँ। यहाँ मेरी दो दिन और दो रातों की बुकिंग तय है। मैंने कई सालों तक वसंत ऋतु [मार्च से मई] के आस-पास EBC [Everest Base Camp] ट्रैक आने का प्लान बनाया, इटिनेररी बनाकर, जाने की पैकिंग तक की... पर हर बार किसी-न-किसी वजह से पहुँच न सका।
इस बार बिना तैयारी के प्लान बना, मानसून के बाद आसमान साफ़ होने लगेंगे और आख़िरकार मैं इस यात्रा के लिए निकल आया। यहाँ नेपाल में अभी शरद ऋतु का आगमन होने को है; यहाँ बाज़ारों में हलचल है, क्योंकि यह त्योहारों का समय शुरू हो चुका है।
यह मेरी यात्रा का यह आठवाँ दिन है। यह आठ दिन काफ़ी मुश्किल दिन थे। यहाँ पहुँचने से पहले मैंने दिल्ली से काठमांडू की यात्रा बस से की। भारत-नेपाल मैत्री बस सेवा ने मुझे लगभग 28 घंटों के सफ़र के बाद काठमांडू पहुँचाया। आगे की यात्रा भी बस से ही होनी थी, लेकिन यहाँ नेपाल में बस से सफ़र करने पर लेट होने की गुंजाइश क़तई नहीं रहती। मुझे काठमांडू से सुबह साढ़े चार बजे की बस लेकर सल्लेरी के लिए निकलना था। काठमांडू बस स्टॉप से बस निकली और इस बीच कुछ देर के लिए मैं सो गया। लेकिन जैसे ही मैं धुलिखेल के आस-पास जागा, मेरा प्रवेश एक नए संसार में हो चुका था। शहर होने की आधुनिक शर्ते पीछे छूट चुकी थीं। डाँडा [पहाड़ का ऊपरी भाग], गहरी घाटियाँ और दूर तक पसरी पहाड़ों की क़तारें सामने थीं। हिमाल दिखना अभी शुरू नहीं हुए थे। पिच [सड़क] कभी पहाड़ की देह से चिपकी हुई चलती, कभी किसी भञ्ज्याङ [दर्रा] को पार करती हुई दूसरी ढलान पर उतर जाती।
पर्वतीय इलाक़ों में सुबह-सुबह का समय हो तो रास्ते में सबसे पहले बतास [सुगंधित हवा] महसूस होता है। ऐसी बतास का अनुभव हर रोज़ नहीं होता। मैंने बस की खिड़की का शीशा खोल दिया था। बस जैसे-जैसे ऊपर बढ़ी हमें पहाड़ों की ढलानों के बीच हुस्सु [कोहरा/धुंध] मिलने लगा। बाहर देखने पर लगता जैसे हम पिच पर नहीं, आसमान पर चल रहे हैं। बस उसके भीतर से गुज़रती है तो कुछ देर के लिए सामने की दुनिया धुँधली हो जाती। बीच-बीच में अचानक घाम की धार उतरती और वही पहाड़ जो कुछ क्षण पहले ग़ायब था, फिर सामने खड़ा मिल जाता है।
धुलिखेल से खुर्कोट तक रास्ता सुनकोशी नदी की ओर उतरता है। एक तरफ़ भीर [पहाड़ की खड़ी दीवार] और दूसरी तरफ़ नीचे बहता सुनकोशी नदी का विस्तार। बीच-बीच में छोटे-छोटे गाँव गुज़रते, यहाँ ज़्यादातर घर आज भी काँठ और मिट्टी से बनाए गए हैं। बीच में सीढ़ीनुमा खेत में काम करते लोग भी दिखते। पहाड़ की ढलान पर खेतों और घरों को देख भू-स्खलन का सवाल बार-बार मेरे मन में आ रहा था, लेकिन दुनिया के ऐसे क्षेत्र में लोगों के पास और विकल्प होते भी क्या हैं! गाँव से निकल जब दुबारा जंगल की ओर बस जाती तो बीच में कहीं किसी खोला [किसी क्षेत्र से गुज़रती एक नदी] की आवाज़ सड़क तक आती, कहीं जंगल के भीतर से पक्षियों की पुकार।
खुर्कोट के बाद यात्रा का मिज़ाज बदलने लगा। घुर्मी के लिए बस नीचे उतरने लगी। घुर्मी पुल के आस-पास रास्ता भू-स्खलन के चलते ख़राब था। रास्ते में छोटे बाज़ार, छोटे पसल [दुकानें] और गाँव आते रहे। किसी चौतारी [विश्राम का स्थान] के पास बैठे लोग, रास्ते से गुज़रते खच्चर और घरों के बाहर सूखते कपड़े... ये सब मिलकर बताते रहे कि यह पिच केवल यात्रियों की नहीं, पहाड़ में रहने वाले लोगों की भी रोज़मर्रा की राह है। यह कभी पगडंडी हुआ करती होगी, जिसे अब एक बड़ी पिच में बदल दिया गया है।
जैसे-जैसे ऊँचाई बढ़ी प्रकृति का रूप बदलने लगा। अब हवा में ज़्यादा ठंडक थी। रास्ते वैसे ही चल रहे थे—कभी घना जंगल आता है, कभी खुला लेक [ऊँचा पहाड़ी क्षेत्र]। देउराली [पहाड़ी दर्रा/ऊँचा पड़ाव] जैसे ऊँचे पड़ावों पर पहुँचकर रास्ता कुछ देर के लिए साँस लेता हुआ-सा लगता। यहाँ ठंड तो काफ़ी थी, लेकिन बतास की ऐसी सुगंध मैंने पहले कभी महसूस नहीं की थी। पीछे देखने पर नीचे छूट चुकी घाटी दिखाई दे रही थी, जो ऊपर जाते हुए और छोटी होती जाती। सामने से गाड़ी के नाम पर पाँच-सात मिनट में कोई बाइक या 4x4 गुज़र जाती। यहाँ बस से आने-जाने का समय नियत था तो बस ज़्यादातर लंबे अंतराल के बाद की अगल-बग़ल से गुज़रती।
ओखलढुंगा बाज़ार से ऊपर की तरफ़ जाते हुए, हिमाल आने का इंतिज़ार शुरू हो चुका था। सोलोखुम्बु ज़िले में प्रवेश के बाद पत्ताले के आस-पास से हिमाल शृंखलाएँ दिखनी शुरू हो गई थीं। इतनी दूर से उन्हें हम जैसे सामान्य लोग पहचान तो नहीं सकते थे, पर जानकार लोग बता देते कि कौन-सी हिमाल-शृंखला दिख रही है। अब सल्लेरी की ओर बढ़ते हुए सड़क पर सन्नाटा और गहरा होता जा रहा है। शाम हो रही थी, गाड़ियाँ बहुत कम हो गई थी, गाँवों के बीच की दूरी भी बढ़ रही थी। बीच-बीच में रास्ता ख़राब था और तिंग्ला और आस-पास के हाइड्रो-प्रोजेक्ट देखते हुए हम सल्लेरी बाज़ार पहुँचने वाले थे। सल्लेरी से आगे का रास्ता उन पहाड़ों की ओर जाता था; जहाँ से हिमालय अब सिर्फ़ दूर दिखाई देने वाला दृश्य मात्र नहीं रह जाता, बल्कि यात्रा का हिस्सा बन जाता।
सल्लेरी बाज़ार पहुँचकर मैं वहाँ एक दिन रुका और फिर जीप से होते हुए फाप्लू एयरपोर्ट के आस-पास से गुज़रकर थम डांडा तक की यात्रा की। आगे की यात्रा पैदल की जानी थी। एक दिन बाद पाइया से चलकर ख़ूबसूरत पाइन के जंगलों और रास्तों को पार करते हुए, मैं लगभग सात घंटे की पैदल यात्रा करके फाकडिंग [2,610 मीटर] पहुँचा। अगला पड़ाव नाम्चे तक पहुँचने का था। फाकडिंग से मोनजो होते हुए मैंने सगरमाथा नेशनल पार्क में प्रवेश किया और वही सात घंटे की यात्रा के बाद नाम्चे बाज़ार में अपने लॉज पहुँचा। अगले दो दिन मुझे यही अमा डबलाम लॉज में आराम करना है। उसके बाद में आगे की यात्रा करूँगा।
अपनी यात्रा के ज़रूरी ब्योरे नोट करके मैं लॉज के डायनिंग एरिया से बाहर की ओर निकल गया। अमा डबलाम लॉज के बाहर एक खुली जगह थी। जहाँ से चारों तरफ़ देखा जा सकता था। सामने हिमाल की काली, खुरदरी चट्टानें धूप में चमक रही थी और आसमान में घाम-बादल बारी-बारी से आ-जा रहे थे। हुस्सु साफ़ हो चुकी थी। आगे नीचे पत्थरों से बना एक छोटा-सा चौक था, जिसके किनारे कुर्सियों पर बैठकर लोग चाय पी रहे थे। मैंने भी एक बड़ा कप चाय लिया और कुछ देर उसी जगह पर खड़ा रहा। मेरे आस-पास प्रकृति का ऐसा मौलिक रूप मैंने आज से पहले नहीं देखा था। मैं इस जादू का हिस्सा हो जाना चाहता था। मैं इस क्षण में ही रह जाना चाहता था।
इधर बड़े-बड़े शहरों में रहते हुए, याद नहीं आता कि कब मैं आख़िरी बार इस तरह अवाक् रहा था। जहाँ हर दिन अगले दिन की तैयारी में बीतता है। थोड़ा और पैसा, थोड़ा और नाम, दूसरे से थोड़ा और बेहतर, थोड़ा और ऊँचा पद—हम जीवन को जीने से ज़्यादा उसे बेहतर बनाने में लगे रहते हैं। शायद इसी वजह से हमारी सबसे बड़ी थकान काम की नहीं; उस लगातार चलते रहने की है, जिसमें रुकना हमें अपराध जैसा लगने लगता है।
मैं जैसे ही प्रकृति जादू से मुक्त हुआ, मैंने पाया कि मैं आसुँओं से भीग चुका हूँ। मैं ख़ुश था। नाम्चे बाज़ार ने मुझे कहा—Welcome to Namche!
नाम्चे बाज़ार लगभग 3,500 मीटर की ऊँचाई पर बसा हिमालयन क़स्बा है। सगरमाथा और आस-पास के अन्य [अमा डबलाम, ल्होत्से, नुप्त्से] हिमाल-शृंखलाओं को समिट करने वालों और EBC और अन्य बेस कैम्पों तक ट्रैक करने वालों का यह प्रारंभिक पड़ाव है। अपर हिमालय का रास्ता इसी क़स्बे से खुलता है। मुझे भी यहाँ बाक़ी ट्रेकर्स की तरह altitude acclimatization के लिए रुकना था।
यक़ीन मानिए सुबह के आठ बजे यहाँ के बाज़ार में किसी शहरी बाज़ार के पीक ऑवर जैसा शोर था। मैंने बातों-बातों में सुना कि आज शनिवार बाज़ार का दिन है। वैसे नेपाल में शनिवार को हाट-बाज़ार लगना आम है, क्योंकि यहाँ दफ़्तरों-स्कूलों में इसी दिन विदा [छुट्टी] दी जाती है।
मैंने यहाँ के बारे में यह पढ़ा था कि नाम्चे बाज़ार कोंगडे री, थमसेरकु, कुसुम खंगारू और कई अन्य हिमाल-शृंखलाओं से घिरा हुआ है। इस क़स्बे की नींव सोलहवीं सदी में एक गाँव के रूप में पड़ी थी। हिमाल को जानने-पहचानने-प्रेम करने वाले और कठिन रास्तों पर चलने वाले शेरपाओं की कुशलता और हिमालय के साथ उनके गहरे आध्यात्मिक रिश्ते ने धीरे-धीरे इस जगह को एक अलग पहचान दी। उन्नीसवीं सदी आते-आते यह स्थान तिब्बत और नेपाल के बीच एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ। एक लंबे अंतराल तक नेपाल ने विदेशियों को विभिन्न हिमाल-शृंखलाओं से दूर रखा, उन्हें किसी भी तरह से यहाँ तक आने-जाने नहीं दिया। बीसवीं सदी में यह सिलसिला बंद हुआ और 29 मई 1953 के बाद इस हिमालय क्षेत्र का महत्त्व-उपयोगिता-रूप हमेशा के लिए बदल गया।
मैंने तय किया कि कुछ देर और आराम करता हूँ। फिर शनिवार हाट देखूँगा, लोकल लोगों से बातें करूँगा, Sherpa Cultural Museum जाऊँगा और लौटते हुए The Irish Pub में बैठकर एक-दो बीयर पीते हुए घर पर और दोस्तों से बात करूँगा।
कुछ देर बाद में आगे के कार्यक्रम के लिए बाहर आया। नाम्चे के केंद्र से क़रीब बीस-तीस मिनट की पैदल दूरी पर पहाड़ों में ऊँचे-नीचे रास्तों पर किलोमीटर गिनना बिल्कुल आसान नहीं होता... सगरमाथा बेस कैंप [EBC] जाने वाले रास्ते में यह संग्रहालय है।
रास्ते भर चीज़ों से गुज़रते हुए, मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि नाम्चे बाज़ार में क्या नहीं है! यह एक फ़ैंसी मार्केटप्लेस है। यहाँ ब्रांडेड सामानों की कई दुकानें हैं। पब, बार, बरिस्ता, कैफ़े, बेकरी, रेस्तराँ, होटल, इनडोर स्पोर्ट्स, म्यूज़ियम, बैंक, स्कूल, स्तूप और मठ सब तो है। ऊपर से शनिवार बाज़ार में आस-पास के गाँवों में बने साबुन, मक्खन, लोकल सब्ज़ियाँ, याक-लोकल पशु के दूध से बने उत्पाद सब कुछ तो है यहाँ। मैंने सोचा कि छोटा-मोटा कोई व्यापार चल जाए तो कोई यहाँ से क्यों जाना चाहेगा!
मैं म्यूज़ियम पहुँच चुका था। Sherpa Cultural Museum पहुँचकर मैंने देखा संग्रहालय में शेरपा संस्कृति की कई महत्त्वपूर्ण वस्तुएँ सुरक्षित हैं। इसके एक हिस्से में सगरमाथा के पर्वतारोहण इतिहास को तस्वीरों और पुराने अख़बारों की कटिंग्स के ज़रिये सहेजा गया है। इनमें 1953 के एवरेस्ट अभियान और तेनज़िंग नोर्गे की ऐतिहासिक तस्वीरें भी शामिल हैं। इन तस्वीरों को देखते हुए लगता है कि जैसे सगरमाथा तक पहुँचने का इतिहास किसी किताब से ज़्यादा, यहाँ की दीवारों में देखा और महसूस किया जा सकता है। संग्रहालय में एक पुस्तकालय भी था, जहाँ जाने का मौक़ा मिल नहीं पाया।
इस डेढ़ घंटे के अंतराल में मुझे पूरे दिन की थकान महसूस हो गई। मैंने तय किया कि altitude acclimatization के लिए कल जो ज़रूरी ट्रैक करना है, उसके लिए आराम ही एकमात्र विकल्प है—इसलिए दुपहर ही बीयर वाला काम निपटाकर मैं पूरा दिन आराम करूँगा। मैं आज के अपने अंतिम डेस्टिनेशन The Irish Pub की ओर चलने लगा। पब के लिए जाते हुए, मैंने कम-से-कम पाँच लोगों से सुना कि पता नहीं क्यों आज पब बंद किया गया है!
मैंने यक़ीन नहीं किया और आगे चलता रहा। मैं The Irish Pub के बाहर खड़ा था। बाहर से देखकर लगा तो नहीं कि पब बंद है। Open वाली स्लेट मेरी दिशा में ही थी। मैंने दरवाज़ा खोला और अंदर घुस गया। मुझे लगा कि मैं किसी दूसरे समय अंतराल में आ गया हूँ। ग़नीमत थी कि आज इस समय वहाँ भीड़ नहीं थी। भीड़ छोड़िए वहाँ मेरे अलावा कोई भी नहीं था। मैं ख़ुश हुआ कि अगले एक घंटे में यहाँ से खा-पीकर वापस लॉज लौट जाऊँगा। मैंने एक बीयर और एक प्लेट गर्म-गर्म झोल म: म: [मोमो] और ऑर्डर किया। ऑर्डर करते ही पब में हलचल बढ़ी और The Beatles का एक गीत बजने लगा :
Yesterday
All my troubles seemed so far away
Now it looks as though they're here to stay
Oh, I believe in yesterday
Suddenly
I'm not half the man I used to be
There's a shadow hangin' over me
Oh, yesterday came suddenly
ऑर्डर का इंतिज़ार करते हुए, मैंने लिखने के लिए अपनी नोटबुक और पेन हाथ में ले लिए। यह यात्रा अब तक सफ़र के हिसाब से तो बढ़िया थी, लेकिन लिखने के हिसाब से मैं बीते आठ दिनों से निराश था। इस यात्रा में कुछ तो था जो मैं मिस कर रहा था।
ख़ैर, न लिख पाने का ख़याल ऑर्डर आता देख ग़ायब हो गया। यह सच एक सपने जैसा था कि मैं नाम्चे बाज़ार में हूँ और मेरी टेबल पर हिमालयन देश में बनी बीयर के साथ लोकल फ़्लेवर म: म: हैं। ऐसे अनुभव जीवन में बार-बार नहीं मिलते। मैं खाना शुरू किया। पब के बाहर हलचल बढ़ रही थी, लेकिन अब भी वहाँ कोई नहीं आया था। मैं अकेला वहाँ अपना वन्स इन अ लाइफ़टाइम मोमेंट एन्जॉय कर रहा था।
कुछ देर बाद बाहर हलचल और ज़्यादा बढ़ गई। मुझे लगा लोगों को पता चल गया है कि पब ओपन हो गया है। मैंने सोचा अब भीड़ बढ़ जाएगी। मुझे आस-पास कुछ अलग महसूस होने लगा... जैसे कुछ होने वाला है। मैं जो महसूस कर रहा था, ऐसे इमोशन में मैं कभी नहीं रहा था।
मैं लगभग आधी बीयर पी चुका था और मैंने एक प्लेट म: म: दुबारा मँगवाए थे। अचानक पब का गेट ओपन करके कोई अंदर आया। मैंने ऊपर देखा। मुझे लगा कि यहाँ बीयर ज़्यादा स्ट्रॉन्ग है। मैंने प्लेट से एक म: म: खाया और फिर से ग़ौर करके देखने की कोशिश की।
मैं उसे जानता था। व्यक्तिगत रूप में नहीं। लेकिन उसके बारे में पढ़-देख चुका था कि उसके चेहरे को पहचान सकूँ। मुझे यक़ीन नहीं हुआ कि यह इस तरह होगा। माउंटेन स्पोर्ट्स और एल्पाइन स्पोर्ट्स का GOAT [Greatest of All Time], जिसने इसके इतिहास को दुबारा लिखे जाने के लिए मज़बूर किया—वह निम्सदाइ मेरे सामने थे।
निर्मल पुरजा बिल्कुल मेरे सामने थे। मैं निम्सदाइ को देखकर मुस्कुराया। एक पल के लिए मेरे शब्द मेरे भीतर ही उलझकर रह गए। मैं न हिंदी में कुछ बोला पाया, न इंग्लिश में और नेपाली बोल पाना इस क्षण में शायद असंभव होता। मैं निम्स को मुस्कुराकर देखते हुए सोच रहा था कि कोई कैसे दो सौ सालों के आधुनिक पर्वतारोहण इतिहास को सिर्फ़ एक दशक में ही जी सकता है।
मैं सोच ही रहा था कि निर्मल पुरजा ने मेरी प्लेट की तरफ़ देखा और मुझसे पूछा : “Are those good?”
मेरी जड़ता पर जैसे किसी ने ठंडा पानी खींचकर मारा। मैंने अपनी म:म: प्लेट की ओर देखा और जवाब दिया : “मीठो छ...”
अब निम्सदाइ मुस्कुराने लगे : “त्यसो भए ट्राय गर्नुपर्छ।”
इस तरह मैं निर्मल निम्सदाइ पुरजा से मिला—न किसी समिट पर, न किसी ट्रैक पर और न ही किसी इंटरव्यू सेट पर तैयारी के साथ; बल्कि बिना तैयारी के एक ऐसे क्षण में, जब मैं केवल ख़ुद के साथ था—इस म:म: प्लेट को मैं कभी भूल नहीं पाऊँगा, यह मुलाक़ात मैं कभी नहीं भूल पाऊँगा।
निम्सदाइ ऑर्डर करने के लिए स्टॉफ़ ढूँढ़ने लगे और बैठ गए। मैं भी उनको जवाब देकर सामान्य हुआ।
मैंने हिम्मत करके कहा—“माफ़ी चाहता हूँ…मैं आपको?”
वह रुके और मेरी तरफ़ देखा।
“Yeah?”
मैंने कुछ असहज होकर उनसे पूछा, “माफ़ करिएगा। मुझे लगा... मेरे ख़याल से मैं आपको जानता हूँ।”
वह फिर हँसने लगे और बोले, “हाँ, आमतौर पर लोग मुझे पहचान ही लेते हैं।”
उनका जवाब सुन मैं भी हँस पड़ा।
मैं इस मौक़े को हाथ जाने नहीं देना चाहता था, निम्सदाइ के साथ बिताया एक-एक मिनट मेरे जीवन में किसी उत्सव के कम नहीं था। मैंने उनसे पूछा, “क्या मैं आपके लिए एक बीयर ले सकता हूँ।”
उन्होंने मेरी मेज़ पर रखी बीयर देखी और मज़ाक़ के लहज़े में कहा, “आपके टेबल पर तो पहले से ही एक रखी है।”
“अच्छा तो मैं एक और ले लेता हूँ।”
उन्होंने बैठने के लिए कुर्सी खींच ली। इस दौरान ऑर्डर सर्व करने वाला शख़्स जिसे निम्सदाइ बहुत देर से खोज रहे थे, आ गया।
जीवन में कुछ पल ऐसे होते हैं जिसकी तैयारी कभी नहीं की जा सकती। ऐसे मौलिक पलों की तैयारी उन्हें निर्जीव बना देती है। तैयारी करके आप उस समय अभिनय में चले जाते हैं और फिर जो आप करते हैं; वह केवल और केवल एक मुलाक़ात का अभिनय होता है, जिसे आप अनुभव नहीं करते बल्कि सिर्फ़ पूरा करते हैं।
निम्सदाइ ने मुझसे मेरे बारे में पूछा। मुझे संकोच महसूस हुआ; क्योंकि मैं जो कर रहा था, वह करने अनगिनत लोग यहाँ आते हैं। इसमें कुछ नया नहीं था। मैंने कुछ सोचते हुए जवाब में कहा, “मैं EBC के अनुभव लिख रहा हूँ। मैं घूमना चाहता हूँ और लिखना चाहता हूँ।”
निम्सदाइ को शायद मेरा संकोच समझ आ गया। उन्होंने अपनी बीयर को उठाकर एक घूँट लिया और बोले, “अपने सफ़र को औरों के सफ़र से कंपेयर मत करो। दो यात्राएँ एक नहीं होतीं।”
मैंने उनकी बात को महसूस किया। इस ऊँचाई पर मेरी तरह के न जाने कितने लोग होंगे जो यहाँ EBC के लिए मौजूद हैं, लेकिन इस पल यहाँ इस धन्वाकार में बसे पहाड़ी क़स्बे में निम्सदाइ के साथ बातचीत सिर्फ़ मैं कर पा रहा हूँ।
मैंने उनसे पूछा कि पहाड़ों को लेकर लोगों की सबसे बड़ी ग़लतफ़हमी क्या होती है?
“लोग सोचते हैं कि असली चुनौती तो पहाड़ है, लेकिन परिस्थितियाँ—ऊँचाई, मौसम या रास्ते—असल मुश्किल नहीं है... बल्कि डर, थकान, संघर्ष करने की इच्छा को जगाए रखना असली चुनौती है। पहाड़ों में आप ख़ुद अपनी चुनौती होते हैं।”
मैं अभी तक यक़ीन नहीं हो रहा था कि पब के गेट इधर-उधर दो अलग-अलग दुनिया चल रही है। भीतर मैं और निम्सदाइ बातें कर रहे हैं और बाहर बाक़ी संसार चल रहा है... पोर्टर अपने वज़न से कई गुना ज़्यादा भार उठाकर नाम्चे से ऊपर की ओर जा रहे थे। महँगी-ब्रॉडेड जैकेट पहने EBC से लौटे रहे ट्रैकर अपने-अपने लॉज की ओर बढ़ रहे थे। कोई मोलभाव कर रहा था। कहीं दूर घंटी बज रही थी। खच्चरों का झुंड खाने-पीने की चीज़ें ऊपर लेकर जा रहा था। शाम हो रही थी, हिमाल और सुंदर दिख रहे थे।
इन कुछ मिनटों के लिए EBC को पूरा करने की बात में पूरी तरह भूल चुका था। लक्ष्य नहीं था। निम्सदाइ से बात करते हुए मैं महसूस कर पा रहा था कि कोई भी हिमाल फ़तेह करने; जीतने या रिकॉर्ड बनाने की चीज़ नहीं, बल्कि यह सिर्फ़ और सिर्फ़ वहाँ होने की चीज़ है।
मैंने पूछा, “क्या आठ हज़ारी और उससे ऊँचे हिमाल पर पहुँचने के बाद ‘ऊँचाई’ के क्या मायने रह जाते हैं?”
“ऊँचाई सिर्फ़ एक पैमाना है।”
“आपको यहाँ सबसे ज़्यादा डर किस चीज़ से लगता है?”
“जरूरत से ज़्यादा आत्मविश्वास! यह आपको मौत दे सकता है...”
उनके जवाब को लेकर मैं कुछ और सोच रहा था। मैंने फिर पूछा, “लेकिन डर?”
“डर त काम लाग्ने चीज़ हो नि, कांछा...”
वह आगे बोले, “डर आपको सावधान रहना सिखाता है, पर अति-आत्मविश्वासी होने पर आप यक़ीन कर लेते हो कि हाँ अभी चार घंटे में नीचे उतर आऊँगा।”
मैंने पहली बार महसूस किया कि जिस निम्सदाइ को दुनिया उसकी असाधारण उपलब्धियों के कारण जानती है, वह शायद अपनी उपलब्धियों को उतना बड़ा नहीं मानता जितना हम मानते हैं।
मैंने पूछा, “किसी समिट पर पहुँचने के बाद आपको पहला ख़याल क्या आता है?”
वह मुस्कुराए, “Down!”
मैं हँस पड़ा।
“सच में?”
“और नहीं तो क्या! समिट तक पहुँचना तो आधा रास्ता तय होना है। कहानी नीचे उतरकर ही पूरी होती है। वापस लौटना ज़्यादा ज़रूरी है। समिट नहीं हुआ चलेगा, लौटना नहीं हुआ... फिर!”
मैंने उनसे उनके रिकार्ड को लेकर बात की और पूछा कि क्या उन्हें कभी लगता है कि लोग पर्वतारोहियों को सिर्फ़ नंबर्स में देखने लगते हैं? 8,000 Metres. 14 Peaks. Seven Months. Records. Speed. With Oxygen/Without Oxygen... इन की-वर्ड्स पर इतना ज़ोर क्यों है?
निम्सदाइ बोले, “अच्छा लगा सुनकर कि तुम्हें फ़र्क़ पड़ता है इस Mountain Sports के इस हसल कल्चर से।”
“नंबर आसान होते हैं। लोगों को संघर्ष नहीं जानना!”
उन्होंने अपनी बीयर ख़त्म की और फिर बोले, “लेकिन पहाड़ आँकड़े नहीं हैं।”
मैंने पूछा, “फिर क्या हैं?”
निम्सदाइ उठे और खिड़की के बाहर देखने लगे।
“लोग”
मैंने बाहर देखा।
नाम्चे बाज़ार की ढलान पर स्थानीय लोग सामान ख़रीद रहे थे।
“पहाड़ों को अर्थ इंसान देते हैं।”
...
“शेरपा। पोर्टर। पर्वतारोही। खाना बनाने वाले। सामान ढोने वाले। इंतिज़ार करने वाले... और वे सब लोग और उनके परिवार जो कभी तस्वीरों में नहीं आते।”
मैं कुछ देर तक कुछ बोल नहीं पाया। मुझे यात्रा में मिले लोग याद आने लगे। वह आदमी जिसने बस के हुड तक मेरा सामान चढ़ा दिया था। वह स्त्री जिसने बिना कहे ही खाना थप दिया था। वह बुज़ुर्ग जिसने मुस्कुराकर रास्ता बताया था। मैंने महसूस किया कि मैंने पूरे रास्ते पहाड़ों को देखा था। लेकिन असली पहाड़ मुझे लोगों के ज़रिये ही मिला।
मैंने उनसे पूछा, “क्या आपको लगता है कि आप पहाड़ों के बिना रह सकते हैं?”
निम्सदाइ ने शून्य भाव से कहा, “मैं कहीं भी रह सकता हूँ... लेकिन पहाड़ हमेशा मेरे लिए घर जैसे रहेंगे।”
मैंने पूछा, “क्यों?”
“क्योंकि पहाड़ों को इससे कोई मतलब नहीं कि आप कौन हैं!”
निम्सदाइ ठीक कह रहे थे। पहाड़ आपको सबको एक नज़र से देखता है। एक महान् पर्वतारोही हो या पहली बार ट्रैक करने वाले व्यक्ति—पहाड़ के लिए दोनों समान हैं। वह न आपकी प्रसिद्धि से प्रभावित होता है, न आपकी असफलता से। वह आपको केवल आपकी साँस से पहचानता है। आप थकते हैं तो वह आपको बैठने देता है। आप ग़लती करते हैं तो वह उसकी क़ीमत माँगता है। वह बस मौजूद रहता है। वह उस घर की तरह होता है, जहाँ आपको अपनी पहचान साबित नहीं करनी पड़ती। आप वहाँ अपने पद, अहंकार और उपलब्धियों से मुक्त होकर सिर्फ़ एक इंसान की तरह ही जा सकते हैं।
हम दोनों की बीयर ख़त्म हो चुकी थी। बातचीत भी धीरे-धीरे समाप्त हो रही थी।
मैंने उनसे आख़िरी सवाल पूछा, “पहली बार EBC जा रहे एक व्यक्ति को अगर एक बात कहनी हो तो आप क्या कहेंगे?”
उन्होंने मेरी तरफ़ देखा और बोले, “वहाँ सिर्फ़ यह कहने के लिए मत जाना कि तुम वहाँ जा चुके हो।”
मैं चुप रहा।
“वहाँ जाओ, ताकि ख़ुद से मिल सको।”
विदा-बेला आ चुकी थी। बाहर हल्का-हल्का पानी गिरने लगा था। हमने हाथ मिलाए।
निम्सदाइ ने कहा, “ख़याल रखना”
मैंने कहा, “आप भी...”
न कोई भावुक विदाई, न फिर मिलने का कोई वादा। वह बाहर चले गए और नाम्चे की शाम में चुपचाप कहीं घुल-मिल गए। मैं वहीं बैठा रहा। अचानक पब में शोरगुल बढ़ गया। लोग आने लगे। मैं उठा और बाहर निकल गया। दूर हिमाल-शृंखलाएँ अँधेरे में ग़ायब हो रही थीं। मुझे लगा : मैं एक सपने से लौटा हूँ। यात्रा के इस एक घंटे ने मेरी पूरी यात्रा का अर्थ बदल दिया है।
संबंधित विषय
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट