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पवित्रता पर उद्धरण

जीवन के पवित्र रूप में विश्वास करो।

जैक केरुआक

जहाँ कहीं महानता, हृदय की विशालता, मन की पवित्रता एवं शांति पाता हूँ, वहाँ मेरा मस्तक श्रद्धा से नत हो जाता है।

स्वामी विवेकानन्द

संख्या-शक्ति, धन, पांडित्य, वाक्चातुर्य—कुछ भी नहीं, बल्कि पवित्रता, शुद्ध जीवन, एक शब्द में अनुभूति, आत्म-साक्षात्कार को विजय मिलेगी।

स्वामी विवेकानन्द

पवित्रता ही आध्यात्मिक सत्य है। “पवित्र हृदयवाले धन्य हैं, क्योंकि वे ईश्वर का दर्शन करेंगे।” इस एक वाक्य में सब धर्मों का निचोड़ है। यदि तुम इतना ही सीख लो, तो भूतकाल में जो कुछ इस विषय में कहा गया है और भविष्यकाल में जो कुछ कहा जा सकता है, उस सबका ज्ञान तुम प्राप्त कर लोगे। तुम्हें और किसी ओर दृष्टिपात करने की ज़रूरत नहीं, क्योंकि तुम्हें उस एक वाक्य से ही सभी आवश्यक वस्तुओं की प्राप्ति हो चुकी। यदि संसार के सभी धर्म-शास्त्र नष्ट हो जाएँ, तो अकेले इस वाक्य से ही संसार का उद्धार हो सकता है।

स्वामी विवेकानन्द

मैं स्वर्ग के पार उड़ गया और भगवान को काम करते हुए देखा। मैंने पवित्र कष्ट सही।

हरमन हेस

स्वर्ग तथा मर्त्य लोक में सर्वत्र, केवल पवित्रता ही सर्वश्रेष्ठ तथा दिव्यतम शक्ति है।

स्वामी विवेकानन्द

अनंत धैर्य, अनंत पवित्रता तथा अनंत अध्यवसाय—सत्कार्य में सफलता के रहस्य हैं।

स्वामी विवेकानन्द

सभी धर्म मेरे लिए पवित्र हैं।

स्वामी विवेकानन्द

तुममें भारती अतीत का नारी-रत्न खोज रही है, जिसमें सत्य की पवित्र, ज्योति, चरित्र की महान महिमा प्रकाशित है |

नलिनीबाला देवी

अगर हम अपनी वर्तमान स्थिति में सफल नहीं हो सकते तो किसी अन्य स्थिति में भी नहीं हो सकेंगे। अगर हम कमल की तरह कीचड़ में भी पवित्र और दृढ़ नहीं रह सकते तो हम कहीं भी रहें, नैतिक दृष्टि से कमज़ोर ही साबित होंगे।

हेलेन केलर

चरित्र की मूल जड़ों से जब हम प्रतिदिन पवित्रता प्राप्त करें, तभी भावुकता हमारी सहायता कर सकती है।

रवींद्रनाथ टैगोर

अपवित्र आत्मा कभी धार्मिक नहीं हो सकती।

स्वामी विवेकानन्द

आगे बढ़ो और याद रखो—धीरज, साहस, पवित्रता और अनवरत कर्म।

स्वामी विवेकानन्द

जिनका मन डूब गया है; उनमें विशुद्ध स्वाभाविकता की शक्ति नहीं रह जाती, वह मन अपवित्र-अस्वस्थ हो उठता है।

रवींद्रनाथ टैगोर

नवयुग की ज्योति को जो एक बार देख लेता है, उसी को वह पवित्र बनाती हुई जलाने लगती हैं।

मैक्सिम गोर्की

पवित्रता की माप है मलिनता, सुख का आलोचक है दुःख, पुण्य की कसौटी है पाप।

जयशंकर प्रसाद

मेघ वर्षा करते समय यह नहीं देखता कि वह भूमि उपजाऊ है या ऊसर। वह दोनों को समान रूप से सींचता है। गंगा का पवित्र जल उत्तम और अधम का विचार किए बिना सबकी प्यास बुझाता है।

संत तुकाराम

लड़ते हुए मर जाना जीत है, धर्म है। लड़ने से भागना पराधीनता है, दीनता है। शुद्ध क्षत्रियत्व के बिना शुद्ध स्वाधीनता असंभव है।

महात्मा गांधी

सभी शास्त्रों का विरोध करने वाली प्रतिज्ञा सर्वागमविरोधिनी प्रतिज्ञा कहलाती है। यथा, शरीर पवित्र है, प्रमाण तीन हैं अथवा प्रमाण हैं ही नहीं।

भामह

हम ध्यान द्वारा शुद्ध और सूक्ष्म हुए मन से परमात्मा के स्वरूप का अनुभव तो कर सकते हैं, किंतु वाणी द्वारा उसका वर्णन नहीं कर सकते, क्योंकि मन के द्वारा ही मानसिक विषय का ग्रहण हो सकता है और ज्ञान के द्वारा ही ज्ञेय को जाना जा सकता है।

वेदव्यास

सौंदर्य, आचरण की पवित्रता, मर्दानगी का ज़ौहर, यही वह गुण हैं जिन पर मुहब्बत निछावर होती है।

प्रेमचंद

गोस्वामी जी की राम-भक्ति वह दिव्य वृत्ति है जिससे जीवन में शक्ति, सरसता, प्रफुल्लता, पवित्रता, सब कुछ प्राप्त हो सकती है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

कोई भी कर्म जब इस भावना से किया जाता है कि वह परमेश्वर का है तो मामूली होने पर भी पवित्र बन जाता है।

विनोबा भावे

जो योग का आचरण करता है, जिसका हृदय शुद्ध है, जिसने स्वयं को जीत लिया है, जो जितेंद्रिय है और जिसकी आत्मा सब प्राणियों की आत्मा बनी है, वह कर्म करता हुआ भी अलिप्त रहता है।

वेदव्यास

जो बात शुद्ध अर्थशास्त्र के विरुद्ध हो, वह अहिंसा नहीं हो सकती। जिसमें परमार्थ है वही अर्थशास्त्र शुद्ध है। अहिंसा का व्यापार घाटे का व्यापार नहीं होता।

महात्मा गांधी

तुम अपनी पत्नी की आबरू की रक्षा करना, और उसके मालिक मत बन बैठना, उसके सच्चे मित्र बनना। तुम उसका शरीर और आत्मा वैसे ही पवित्र मानना, जैसे कि वह तुम्हारा मानेगी।

महात्मा गांधी

पवित्र नदियाँ, बिना स्नान किए, अपने दर्शनमात्र से ही दर्शक का मन पवित्र कर देती हैं।

कवि कर्णपूर
  • संबंधित विषय : नदी

सच्चा उपवास एक मूक और अदृश्य आदमी शक्ति पैदा करता है, जो यदि उसमें आवश्यक बल और पवित्रता हो, तो सारी मानव जाति में व्याप्त हो सकती है।

महात्मा गांधी

योगी होते हुए भी सच्चा कलाकार वितर्क का अतिक्रमण करके विचार और आनंद की भूमिकाओं के बीच पेंगें मारता रहता है। साधना के अभाव के कारण वह किसी एक जगह टिक नहीं सकता, परंतु थोड़ी देर के लिए उसको सत्य की जो आभा देख पड़ती है, जड़ चेतन के आवरण के पीछे अर्द्ध-नारीश्वर की जो झलक मिलती है, वह उसको इस जगत के ऊपर उठा देती है, उसके जीवन को पवित्र और प्रकाशमय बना देती है।

सम्पूर्णानंद

जीवन-शुद्धि और जीवन-समृद्धि यही हमारा आदर्श हो।

काका कालेलकर

जिसने पर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया, उसके लिए सारा जगत नंदनवन है, सब वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, सब जल गंगाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी चाहे प्राकृत हो या संस्कृत-वेद का सार है, उसके लिए सारी पृथ्वी काशी है और उसकी सारी चेष्टाएँ परमात्मामयी है।

आदि शंकराचार्य

निष्काम कर्मयोगी तभी सिद्ध होता है जब हमारे बाह्य कर्म के साथ अंदर से चित्तशुद्धि रूपी कर्म का भी संयोग होता है।

विनोबा भावे

पवित्रता संप्रदायगत नहीं होती। ठीक कर्मों वाले मनुष्य का धर्म-ग्रंथ ग़लत नहीं हो सकता।

डोरिस लेसिंग

योगी (कर्मयोगी) आसक्ति को त्याग कर अंतःकरण की शुद्धि के लिए कर्म करते हैं।

वेदव्यास

कृतज्ञ नेत्र! सुंदर, मनोहर और हृदयहारी! किसने बनाए? क्यों बनाए? आत्मा के गवाक्ष। पवित्रता के आकाश | प्रकाश के पुंज।

वृंदावनलाल वर्मा

गंगा गोमुख से निकलती है और इसका स्वभाव एवं चरित्र भी पयस्वला धेनु की तरह है जो अपने बछड़े के लिए रँभाती-दौड़ती घर को लौट रही हो

कुबेरनाथ राय

और वह नदी! वह लहराता हुआ नीला मैदान! वह प्यासों की प्यास बुझाने वाली! वह निराशों की आशा! वह वरदानों की देवी! वह पवित्रता का स्रोत! वह मुट्ठीभर ख़ाक को आश्रय देने वाली गंगा हँसती-मुस्कराती थी और उछलती थी।

प्रेमचंद

एक ऐसी दुनिया में; जो अक्सर हमें विभाजित करने की कोशिश करती है—साहित्य उन खोई हुई पवित्र जगहों में से एक है जहाँ हम एक-दूसरे के दिमाग़ में रह सकते हैं—भले ही कुछ पन्नों तक ही क्यों हो।

बानू मुश्ताक़

संवेदनशील बनो परंतु निर्मल भी। प्रेमी बनो परंतु पवित्र भी।

लॉर्ड बायरन

पवित्रता ही साधना की सामग्री है।

रवींद्रनाथ टैगोर

पार्वती और गंगा हमारे अस्तित्व का ही मेरुदंड है। हमारे भीतर और बाहर जो कुछ उत्तम है, जो कुछ सुंदर है, जो कुछ पवित्र है, उसको प्रतीक रूप में पार्वती और गंगा व्यक्त करती हैं।

हजारीप्रसाद द्विवेदी

गंगा की पवित्रता में कोई विश्वास नहीं करने जाता। गंगा के निकट पहुँच जाने पर अनायास, वह विश्वास पता नहीं कहाँ से जाता है।

लक्ष्मीनारायण मिश्र

दर्शन से, स्पर्श से, जलपान करने तथा नाम कीर्तन से सैकड़ों तथा हज़ारों पापियों को गंगा पवित्र कर देती है।

वेदव्यास

आत्मा की अपनी शुद्धता मोक्ष है। जिससे वह शुद्धता प्रकट होती है, वह मोक्षमार्ग है।

श्रीमद् राजचंद्र

आदिम निषाद की दृष्टि में नदी एक अप्सरा थी, उज्जवल दूधवर्णी परिधान धारण किए, आपादमस्तक शुक्लाभिसारिका रूप।

कुबेरनाथ राय
  • संबंधित विषय : नदी

मैं इस जगत् का माता, पिता, धारणकर्ता, पितामह, ज्ञेय, पवित्र वस्तु, ओंकार, ऋग्वेद, सामवेद और यजुर्वेद हूँ। मैं अंतिम गति, पोषणकर्ता, स्वामी, साक्षी, निवासस्थान, शरण जाने योग्य, मित्र, उत्पत्तिकर्ता, लयकर्ता, मध्य की अवस्थिति, भंडार और अविनाशी बीज हूँ।

वेदव्यास

भारतीय साहित्य में यमुना की जो छवि बनती है; वह है एक चंचल किशोरी की। सिर पर गागर लिए हुए, बड़ी कला-छला वाली, नील परिधान में सजी, दूध-वर्ण गोरी-गोरी छोरी—एक गिलास ताज़े गर्म दूध जैसी छोकरी!

कुबेरनाथ राय

नींद सबसे पवित्र दैवीय वस्तु होती है जो केवल पवित्र लोगों की पलकों पर उतरती है।

पीएत्रो चिताती

मैं जानता हूँ कि इस दुनिया में अब भी कुछ पवित्र और पाक लोग हैं। इन लोगों में मेरा विश्वास भी है, लेकिन इन लोगों के विश्वास में मेरा विश्वास नहीं है। मैं सिर्फ लोगों में विश्वास कर सकता हूँ—ये मेरी स्थिति है।

लास्ज़लो क्रास्ज़्नाहोरकाई

कोई हमारे पंख खोल देता है। कोई ऊब और दर्द को ग़ायब कर देता है। कोई हमारे सामने प्याला भरता है—हम केवल पवित्रता का स्वाद चखते हैं।

रूमी