जैसे तर्क के बेसहारा; अप्रतिष्ठ मार्ग से ब्रह्म को नहीं जाना जा सकता, वैसे ही धर्म को भी नहीं जाना जा सकता।
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निःसंदेह हमें ब्रह्म होना है। हमारा जीवन ही व्यर्थ है यदि हम अपने इस पूर्णता के ध्येय को न पा सकें।
धीरे-धीरे ब्रह्मभाव की अभिव्यक्ति के लिए जिन कार्यों से जीव को सहायता मिलती है, वे ही अच्छे हैं और जिनके द्वारा उसमें बाधा पहुँचती है, वे बुरे हैं।
प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।
हमें विश्वास है कि सभी जीव ब्रह्म हैं। प्रत्येक आत्मा मानो अज्ञान के बादल से ढके हुए सूर्य के समान है, और एक मनुष्य से दूसरे का अंतर केवल यही है कि कहीं सूर्य के ऊपर बादलों का घना आवरण है और कहीं कुछ पतला।
ब्रह्महीन कर्म अंधकार है और कर्महीन ब्रह्म उससे भी बड़ी शून्यता है।
हमारे लिए तो ब्रह्म को सत्य और जगत को मिथ्या कहने की अपेक्षा ब्रह्म को सत्य और जगत को ब्रह्म कहना अधिक उचित और हितकर है।
जिसने पर ब्रह्म का साक्षात्कार कर लिया, उसके लिए सारा जगत नंदनवन है, सब वृक्ष कल्पवृक्ष हैं, सब जल गंगाजल है, उसकी सारी क्रियाएँ पवित्र हैं, उसकी वाणी चाहे प्राकृत हो या संस्कृत-वेद का सार है, उसके लिए सारी पृथ्वी काशी है और उसकी सारी चेष्टाएँ परमात्मामयी है।
ब्रह्म को पाने का अर्थ ब्रह्म से एकत्व पाना ही है।
असीम पूर्णता में दर्जे नहीं होते, हम ब्रह्म में धीरे-धीरे विकास नहीं पा सकते—वह अपने आप में पूर्ण है, उससे कभी अधिकता तो हो ही नहीं सकती।
महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बड़ी-बड़ी तरंगें हैं, फिर छोटी-छोटी तरंगें भी हैं और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सब के पीछे वही अनंत महासमुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनंत समुद्र से युक्त है, फिर दूसरी ओर वह बड़ी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्त है। इसी प्रकार, संसार में कोई महापुरुष हो सकता है, और कोई छोटे बुलबुले जैसा सामान्य व्यक्ति; परंतु सभी उसी अनंत महाशक्ति के समुद्र से युक्त है, जो सभी जीवों का जन्मसिद्ध अधिकार है।
वेदांत ‘ब्रह्म-जिज्ञासा’ है तो काव्य ‘पुरूष-जिज्ञासा।’
अनंत ब्रह्म, अनंत लघु होने पर भी बड़ा है और बड़ा होने पर भी लघु है।
साधना हमें ईश्वर तक पहुँचाती है, तपस्या ब्रह्म तक।
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जो पुरुष निश्चय ही अंतरात्मा में ही सुख वाला है, अंतरात्मा में ही शांति वाला है तथा जो अंतरात्मा ज्ञान वाला है, वह योगी स्वयं ब्रह्मरूप होकर ब्रह्म की शांति प्राप्त करता है।
यज्ञ में अर्पण ब्रह्म है, हवि ब्रह्म है, ब्रह्म रूप अग्नि में ब्रह्म ने हवन किया है, इस प्रकार जिसकी बुद्धि से सभी क्रम ब्रह्म रूप हुए हैं, वह ब्रह्म को ही प्राप्त करता है।
तर्क द्वारा केवल हम उस वस्तु का ज्ञान पा सकते हैं जो हिस्सों में बाँटी जा सके, विश्लिष्ट हो सके। ब्रह्म का विश्लेषण नहीं हो सकता।
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प्रत्येक जीव अव्यक्त ब्रह्म है।
ब्रह्म का ही चिंतन, ब्रह्म का ही कथन, ब्रह्म का ही परस्पर बोधन और ब्रह्म की ही एकमात्र कामना करना इसको विद्वानों के द्वारा 'ब्रह्माभ्यास' कहा जाता है।