अपनी व्यक्तिगत सत्ता की अलग भावना से हटाकर; निज के योगक्षेम के संबंध से मुक्त करके, जगत् के वास्तविक दृश्यों और जीवन की वास्तविक दशाओं में जो हृदय समय-समय पर रमता रहता है, वही सच्चा कविहृदय है।
सिनेमा मेरे लिए कोई 'art form' नहीं है, ये मेरे लोगों की सेवा करने का एक ज़रिया मात्र है। मैं कोई समाजशास्त्री नहीं हूँ और इसलिए ऐसे भ्रम नहीं पालता कि मेरा सिनेमा लोगों को बदल सकता है। कोई एक फ़िल्ममेकर लोगों को नहीं बदल सकता है। लोग बहुत विशाल हैं और वे अपने आप को ख़ुद बदल रहे हैं। में चीज़ें नहीं बदल रहा हूँ, जो भी बड़े बदलाव हो रहे हैं, मैं सिर्फ़ उन्हें दस्तावेज़ कर रहा हूँ।
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हमारी यथार्थ अर्थवत्ता हमारे अपने बीच में नहीं है, वह समस्त जगत के मध्य फैली हुई है।
भागो-भागो यथार्थ तुम्हारा पीछा कर रहा है।
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यथार्थ के प्रति मनुष्य की जानकारी बदलती रहती है या दूसरे शब्दों में वह विकसित होती रहती है। तब उस यथार्थ विशेष का बोध कराने वाले शब्द का अर्थ भी बदलता रहता है।
पुरुष को स्त्री को जानने में कोई दिलचस्पी नहीं थी, इसलिए उसने उसे परम रहस्य कहकर पुरस्कृत किया; लेकिन वास्तव में घमंड के बहाने उसके अधिकार की उपेक्षा की गई।
शांति और मौन का अर्थ है—शोर का अभाव, यानी वास्तव में एक बेचैन करने वाली शांति।
दुनिया में दु:ख तो बहुत हैं, परंतु अगम-अगाध गंभीर दु:ख बहुत ही कम! ठीक वैसे ही जैसे कामबोध की खुजलाहट तो सबके पास है, परंतु निर्मल उदात्त प्रेम की क्षमता बिरले के ही पास होती है।
प्रकृति में प्रत्यक्ष की हम प्रतीति करते हैं, साहित्य और ललिल कला में अप्रत्यक्ष हमारे निकट प्रतीयमान होता है।
वास्तव में संकट इस तथ्य में है कि पुराना निष्प्राण हो रहा है और नया जन्म नहीं ले सकता।
उसने कहा, ‘वास्तविकता इतनी असहनीय हो गई है, इतनी धूमिल कि अब मैं केवल अपने सपनों के रंगों से ही अभिव्यक्त कर सकती हूँ।
प्रत्येक परीकथा वर्तमान सीमाओं को पार करने की क्षमता प्रदान करती है, इसलिए एक अर्थ में परीकथा आपको वह स्वतंत्रता प्रदान करती है, जिसे वास्तविकता अस्वीकार करती है।
'पद्मावत' में प्रेम की प्रधानता निर्विवाद है, परंतु उस प्रेम के स्वरूप के बारे में मतभेद है। विवाद का विषय यह है कि वह प्रेम मूलतः लौकिक है या अलौकिक।
यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दूसरों में रुचि का कारण मनुष्य की स्वयं में रुचि है। यह संसार स्वार्थ से जुड़ा है। यह ठोस वास्तविकता है लेकिन मनुष्य केवल वास्तविकता के सहारे नहीं जी सकता। आकाश के बिना इसका काम नहीं चल सकता। भले ही कोई आकाश को शून्य स्थान कहे…
जो वास्तविक लगता है उसे सत् नहीं माना जा सकता, वास्तविकता और सत् के बीच बहुत अंतर है।
क्या जिसे हम क्षितिज कहते हैं, वह वास्तविकता है? या हम ऐसा कह रहे हैं? लेकिन हम अनंत को नहीं देख सकते, इसलिए हम ऐसी काल्पनिक सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं।
मैं कल्पना नहीं कर सकता कि कोई आदमी वास्तव में किसी किताब का आनंद ले और उसे केवल एक बार पढ़े।
वास्तविकता उन संभावनाओं में से एक है, जिसे मैं नज़रअंदाज नहीं कर सकता।
आप अपना जीवन ऐसे जियो जैसे कि यह वास्तविक हो… हज़ारों चुंबनों जितना गहरा।
एक फ़ोटोग्राफ़र का जो कौशल होता है, उसका योग वस्तु के बाह्य रूप के साथ होता है और एक शिल्पी का जो योग होता है, वह उसके भीतर-बाहर के साथ वस्तु के भीतर-बाहर का योग होता है, और उस योग का पंथ होता है कल्पना और यथार्थ घटना—दोनों का समन्वय कराने वाली साधना।
बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।
निराला का निजी संसार उनकी कविता का उतना ही आवश्यक हिस्सा है, जितना वह समाज जिसमें वे जी रहे थे।
आज जो अच्छे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे अच्छे हैं। जो बुरे हैं, उनमें बहुत थोड़े सच्चे बुरे हैं। अच्छे लोग ज़्यादा हैं और बुरे कम हैं। अच्छे में सच्चे कम हैं और बुरे में सच्चे बहुत कम हैं। कुल मिलाकर सच्चे लोग बहुत कम हैं।
जिस प्रकार सिनेमा के चित्र वास्तविक प्रतीत होते हैं; परंतु होते हैं मात्र प्रकाश और छाया के मिले-जुले चित्र, उसी प्रकार सृष्टि की विविधता भी एक भ्रम मात्र है।
सच्चा कवि वही है; जिसे लोकहृदय की पहचान हो, जो अनेक विशेषताओं और विचित्रताओं के बीच से, मनुष्य जाति के सामान्य हृदय को अलग करके देख सके। इसी लोकहृदय में हृदय के लीन होने की दशा का नाम रसदशा है।
सच्चा कवि उसी व्यक्ति या वस्तु का स्वरूप कल्पना में लाएगा, जिसके प्रति उसकी किसी प्रकार की अनुभूति होगी।
वामपंथी से संकीर्णतावादी बना व्यक्ति, द्वंद्वात्मक ढंग से यथार्थ और इतिहास की व्याख्या करने के प्रयास में पूरी तरह भटक जाता है, और पतित होकर सारतः भाग्यवादी दृष्टिकोण अपना लेता है।
माया के परदे को हटाने का ही अर्थ है—सृष्टि के रहस्य को अनावृत्त करना। जो इस प्रकार सृष्टि का अनावरण कर देता है, केवल वही सच्चा अद्वैत्वादी है। अन्य सब केवल मूर्तिपूजक हैं।
स्नेह जहाँ पुरुष-पुरुष का है; वहाँ वह उसी निराकार सीमा में सीमित रह सकता है, लेकिन पुरुष और स्त्री का स्नेह कभी प्लेटोनिक प्रेम तक सीमित नहीं रह सकता।
साहित्यशक्ति, शब्द-शक्ति मनुष्य तभी प्रकट कर सकता है, जब वह सामान्य मन से ऊपर उठकर जनता के मानस की तरफ़ देखे।
रचनात्मक दृष्टि से डाक्युमेंटरी एक प्रवृत्ति का नाम है। सत्य यथार्थ में निहित होता है, और कैमरा भौतिक यथार्थ के सभी पक्षों को पकड़ने में विशेष सक्षम होता है। यह कलाकार का कर्तव्य है कि वह यथार्थ को अंकित कर, कलात्मक ढंग से प्रस्तुत करे।
विलगाव की स्थिति में, आधुनिक जीवन की अधिकाधिक यांत्रिक और जनसंकुल परिस्थितियों में, मानव समुदायों के आस्तित्विक और सांस्कृक्तिक लयभंग के मानसोपचार की ज़रूरत के तकाज़े से ही; प्रकृति के साथ मानवीय चेतना के संबंधों की खोज, जीवन की औपन्यासिक पुनर्रचना में और भी गहरे और भी सूक्ष्मतम घरातलों पर अनिवार्य उठती है।
अपने नाम के मूल्य मुताबिक़, हर आर्ट को इंसान की बेहतरी के लिए काम करना ही चाहिए। मैं किसी कठोर थ्योरी में यक़ीन नहीं करता हूँ, लेकिन ठीक उसी समय मैं इन तथाकथित 'महान' फ़िल्ममेकर्स को लेकर हैरान हूँ, जो मूल रूप से कुछ नहीं बस नौसिखिए हैं और मानवीय रिश्तों के आर्ट का शोर मचाते रहते हैं। अपनी सामाजिक ज़िम्मेदारी से बचने का ये बहुत चतुर तरीक़ा है। असल में जो भी काम ये करते हैं, वो सिर्फ़ उनकी अपनी सत्ता को फ़ायदा पहुँचाने के लिए होता है। ये लोग इतने पक्षपाती हैं, जितना कि कोई हो सकता है, लेकिन अपक्षपाती होने का मास्क पहनते हैं। मैं ऐसे आदर्शों से घृणा करता हूँ।
जैसे समुद्र और आकाश के बीच, यात्री और समुद्र के बीच का अंतर बताना मुश्किल है; वैसे ही हक़ीक़त और दिल की भावनाओं के बीच अंतर करना कठिन है।
सिर्फ़ उन चीज़ों के बारे में लिखिए जिनमें वास्तव में आपकी रुचि है; वे चाहे वास्तविक हों या काल्पनिक, और किसी चीज़ के बारे में नहीं।
वास्तविकता को प्रचुर कल्पना से हराया जा सकता है।
मैं अब नहीं मानती कि हम चुप रह सकते हैं। हम वास्तव में ऐसा कभी नहीं करते, ध्यान रहे।
शांति और मौन का अर्थ है—शोर का अभाव, यानी वास्तव में एक बेचैन करने वाली शांति।
संपूर्ण वास्तविकता शब्दों की दुनिया की नक़ल करने का एक व्यर्थ प्रयास था।
उस दूसरी दुनिया का समय अब पिछले हफ़्ते से ज़्यादा वास्तविक नहीं लगता।
प्रत्येक भाषा आपको वास्तविकता के अपने हिस्से तक पहुँच प्रदान करती है।
मृत्यु वास्तव में मानवता के लिए एक महान वरदान है, इसके बिना कोई वास्तविक प्रगति नहीं हो सकती।
जो दिखाई दे वह यथार्थ हो यह ज़रूरी नहीं।
सौंदर्यानुभूति वास्तविक जीवन की मनुष्यता है।
विकट यथार्थ की स्थिति में, चेतना कल्पना की जगह ले लेती है।
वास्तविकता घिसी-पिटी होती है, जिससे हम रूपक का इस्तेमाल करके बच जाते हैं।
जो योगी अखंड ध्यान द्वारा अपनी चेतना को परम चैतन्य में विलीन कर देता है, वह प्रकाश (प्राणशक्ति स्पंदन) को सृष्टि के आधार तत्त्व के रूप में देखता है। उसके लिए फिर पानी बन कर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में, और ज़मीन बनकर सामने आने वाली प्रकाश किरणों में कोई अंतर नहीं होता।
साहित्य जहाँ जीवन की मात्र व्यावसायिक चेष्टा न होकर; सर्वप्रथम उसके कला-पक्ष की अभिव्यक्ति है, वहाँ साहित्य और जीवन का संबंध दूसरा होगा। रचा जाने के बाद साहित्य भी उसी जीवन का यथार्थ एवं घनिष्ठ अंग बन जाता है, जिससे वह उत्पन्न होता है।
जो कुछ आपने नहीं दिया है, वह वास्तव में कभी भी आपका नहीं होगा।
व्यंग्य जीवन से साक्षात्कार करता है, जीवन की आलोचना करता है—विसंगतियों, मिथ्याचारों और पाखँड़ों का परदाफ़ाश करता है।
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