आचार्य शुक्ल जिसे मर्यादा कहते हैं, वह वास्तव में रूढ़ि है।
जो पानी छानकर पीते हैं, वे आदमी का ख़ून बिना छना पी जाते हैं।
आदमी जब बिगड़ता है तो स्वभाव से ही कुछ ऐसा है कि जब वह एक चीज़ में बिगड़ता है, तो पीछे सब चीज़ों में ही बिगड़ जाता है।
एक फ़ालतू विचार कोई विचार नहीं होता।
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बंबई के सिनेमा वाले संगीत का सलाद तैयार करने में परम निपुण हैं।
बाहर से हमारे मन में सुंदर जिस मार्ग से आता है, असुंदर भी इसी मार्ग से आता रहता है।
कोई इंजीनियर रद्दी माल लगाकर ग़ैर-ज़िम्मेदारी से कच्चे पुल का निर्माण करे; तो वह जिस अपराध का भागी होगा, उसी अपराध का भागी वह कवि भी होगा, जो राष्ट्रीयता की सच्ची भावना की अनुभूति के बिना रस्म-अदाई के लिए ओजहीन राष्ट्रीय-काव्य रचेगा।
बुराइयों को जाने बग़ैर, अच्छाइयों की पहचान और उनका पोषण संभव नहीं। कवि को गर्हित, निकृष्ट, वर्जित और निषिद्ध का भी पीछा करना चाहिए।
यह ‘मिसफिट्स’ का युग है भाई। जिसे जुआड़ख़ाना चलाना चाहिए, वह मंत्री है। जिसे डाकू होना चाहिए, वह पुलिस अफ़सर है। जिसे दलाल होना चाहिए, वह प्रोफ़ेसर है।जिसे जेल में होना चाहिए, वह मज़िस्ट्रेट है। जिसे कथावाचक होना चाहिए, वह उपकुलपति है। जिसे जहाँ नहीं होना चाहिए, वह ठीक वहीं है।
आपदग्रस्ता नारी के सम्मान की रक्षा में मिट जाने वालों की संख्या नगण्य ही है, परंतु अपनी कुचेष्टाओं से उसका अनादर करने वाले पग-पग पर मिलेंगे।
प्रजातंत्र में सबसे बड़ा दोष है; तो यह कि इसमें योग्यता को मान्यता नहीं मिलती—लोकप्रियता को मिलती है। हाथ गिने जाते हैं, सिर नहीं तौले जाते।
महान सभ्यता जब बीच में आकर सड़ती है, तब उसमें अछूत-प्रथा, सती-प्रथा और दहेज-प्रथा की बीमारियाँ पैदा होती हैं।
रूढ़ियाँ केवल शास्त्र की ही नहीं होतीं, लोक की भी होती हैं।
हमें बुरे स्वभाव की व्याख्या हीन भावना की निशानी के रूप में करनी चाहिए।
जब आप ख़ुद के बारे में बुरा महसूस करते हैं, तो आप प्रेम के रास्ते में बाधा खड़ी कर लेते हैं और ऐसी स्थितियों तथा लोगों को आकर्षित करते हैं, जो आपको बुरा महसूस कराएँगे।
नैतिकता की असली कसौटी है, बुराई को निरुत्साहित करने की क्षमता।
यह जगत् सदा ही भले और बुरे का मिश्रण है। जहाँ भलाई देखो, समझ लो कि उसके पीछे बुराई भी छिपी है।
विदेशी लोग हमारे समाज के विषय में; अन्य देशों में भ्रमपूर्ण बातें फैलाकर हमें असभ्य, जंगली बतलाते रहे हैं, और हमारा उनके प्रति रोष भी सर्वथा उचित ही रहा है। पर एक बात में तो हम पूर्व ऐतिहासिक काल के उस जंगली को भी मात करते हैं और आज के अफ़्रीक़ा के वनभाग के हब्शी को भी मात करते हैं—और वह बात यह है कि हममें अभी भी मनुष्य का क्रय-विक्रय होता है और वह कानूनी भी माना जाता है।
जंगली फल आदि के द्वारा जीवन व्यतीत करना सफल है, परंतु खल के साथ निवास अच्छा नहीं।
अर्थ परिमित होता है; किंतु अनर्थ यदि एक बार प्रारंभ हो जाए, तो यह नहीं कहा जा सकता कि उसका अंत कहाँ जाकर होगा।
भारत-भूमि कुछ ऐसी उपजाऊ है कि बाहर से आई हुई चीज़ यहाँ ख़ूब फलती-फूलती है। विदेश से आई हुई प्लेग हमारे गाँव-गाँव में पहुँच गई, और प्लेग की तरह आई अँग्रेज़ जाति भी ख़ूब फली-फूली।
हम अपने हृदय को साफ़ करें, गंदी चीज़ को पसंद न करें। गंदी चीज़ को पढ़ना छोड़ दें। अगर ऐसा करेंगे तो अख़बार अपना सच्चा धर्म पालन करेंगे।
संसार में अधिकांश दुष्कर्म, व्यक्तिगत आसाक्ति के कारण ही किए गए हैं।
हमारी प्राचीन सभ्यता और संस्कृतिवाली जाति भी, पाँच हज़ार सालों से मनुष्य का मांस खा रही है—सिर्फ़ मनु महाराज के नियम देख लीजिए।
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राजन्! दूसरों की निंदा करना या चुग़ली खाना दुष्टों का स्वभाव ही होता है। श्रेष्ठ पुरुष तो सज्जनों के समीप दूसरों के गुणों का ही वर्णन करते हैं।
बाल-विवाह का समर्थन किसी भी शास्त्र में नहीं है।
जिस समाज में इतनी अधिक संख्या में व्यक्ति आत्म-हनन के लिए विवश किए जाते हों, अपने स्वस्थ और सुंदर शरीर को व्याधिग्रस्त कुरूप तथा निर्दोष मन को दूषित बनाने के लिए बाध्य किए जाते हों, उस समाज की स्थिति कभी स्पृहणीय नहीं कही जा सकती।
लोग कहते हैं—दुष्ट के सारे ही काम अपराध होते हैं। दुष्ट कहता है— मैं भला आदमी हो जाता किंतु लोगों के अन्याय ने मुझे दुष्ट बना दिया है।
जो भक्त होना चाहता है; वह दुष्ट प्रकृति के मनुष्यों के साथ भोजन न करे, क्योंकि उनकी दुष्टता का भाव भोजन द्वारा फैलता है।
अप्रिय सत्य का श्रोता और वक्ता दुर्लभ है। नीति-वाणी है, पर अब अप्रिय काव्य के वक्ता बढ़ गए हैं। मैं भाग्य को सराहता हूँ कि जल्दी ही कविता करना बंद कर दिया, वरना इस गिरे ज़माने में श्रोता ढूँढ़ता कहाँ फिरता?
दुनिया का इतिहास इस बात का साक्षी है कि शुभ के समान अशुभ भी क्रमशः बढ़ ही रहा है।
कुसंस्कारों की जड़ें बड़ी गहरी होती हैं।
प्रतिक्रियावादी तत्वों को हमेशा पूँजीपति वर्ग का सहयोग मिलता रहा है। अँग्रेज़काल में ये लोग सरकार के साथ थे और स्वतंत्रता संग्राम के सिपाहियों के विरुद्ध। आज ये प्रतिक्रियावादी सांप्रदायिक तत्त्वों के साथ हैं।
अच्छे स्वर से निरर्थक शब्दों को गाने वाले कवि समाज में जाने जाते हैं, पर अच्छा लिखने वाले, लेकिन मंच पर न कहने वाले श्रेष्ठ कवियों को भी लोग नहीं जानते।
कवि के पास अच्छे लोगों के अलावा, बुरे लोगों के बीच रहने के भी अच्छे-खासे अनुभव होने चाहिए।
सब प्रकार की बुराइयों में से गुज़रते हुए संसार की जो उन्नति हो रही है, वह उसे धीरे-धीरे तथा निश्चित रूप से इन आदर्शों के उपयुक्त बना रही है।
बुराई एक भ्रांति मात्र है।
क्या दुनिया पारस्परिकता पर चलती है? इसका मतलब है कि आप जो अच्छे कर्म करेंगे, वह आपके साथ होगा और जो बुरे कर्म करेंगे—वह भी आपके साथ होगा।
आम कवि-सम्मेलनों में या तो गाना जमता है या गाली, क्योंकि ये दोनों सहज ही समझ में आते हैं। इन दोनों के परे जो कविता नाम की चीज़ है, वह अगर सुनाई जाए तो कवि को 'हूट' कर दिया जाएगा।
यह धारणा कि शुभ और अशुभ ये दोनों पृथक् वस्तुएँ हैं और अनंत काल से चले आ रहे हैं—नितांत असंगत है।
हमारी जाति मुर्दे को अरसे तक चिपकाए रहती है। रूढ़ि को छोड़ने में बहुत समय लेती है और बरबाद होती है।
हे निशाचर! जैसे विषमिश्रित अन्न का परिणाम तुरंत ही भोगना पड़ता है, उसी प्रकार लोक में किए गए पापकर्मों का फल भी शीघ्र ही मिलता है।
जो ज़ालिम है उसको यह हक़ नहीं कि दूसरे ज़ालिम को सज़ा दे।
राम और रावण के बीच की भारी लड़ाई में, राम भलाई की ताक़तों के प्रतीक थे और रावण बुराई की ताक़तों का। राम ने रावण पर विजय पाई, और इस विजय से हिंदुस्तान में रामराज्य क़ायम हुआ।
दूसरों को अपमानित करके लोग अपने को सम्मानित कैसे समझ सकते हैं, इस पहेली को मैं आज तक हल नहीं कर सका हूँ।
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रवि की तरह कवि को भी सब जगह बिना घृणा के जाने, रहने और सहने का तजुर्बा और साहस होना चाहिए। लाचारी और मजूबरीवश ऐसा होना कवि की अयोग्यता है। सोच-समझकर, जान-बूझकर, जिज्ञासु भाव से ऐसा हो, तो वह अपने कवि के निर्माण में बेहतर सहायक हो सकता है।
यह हमारी प्राचीन परंपरा है, वैसे तो हमारी हर बात प्राचीन परंपरा है, कि लोग बाहर जाते हैं और ज़रा-ज़रा सी बात पर शादी कर बैठते हैं।
दुःसमय में जब मनुष्य को आशा और निराशा का कोई किनारा नहीं दिखाई देता तब दुर्बल मन डर के मारे आशा की दिशा को ही ख़ूब कस कर पकड़े रहता है।
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