अतीत पर उद्धरण
अतीत का अभिप्राय है
भूतकाल, व्यतीत, बीत चुका समय, जिसका अस्तित्व या सत्ता समाप्त हो चुकी। प्रस्तुत चयन में अतीत के विभिन्न रंगों, धूप-छाया का प्रसंग लेती कविताओं का संकलन किया गया है।
अतीत के बिना कोई कला नहीं होती है, किंतु वर्तमान के बिना भी कोई कला जीवित नहीं रहती है, यह भी ठीक है।
आप कभी भी अतीत के द्वारा भविष्य की योजना नहीं बना सकते।
जीवन से विरहित होकर भूतकाल की उपासना करना केवल बुद्धि का कुतूहल है।
मुझे अपने अतीत से प्यार है। मुझे अपने वर्तमान से प्यार है। जो मेरे पास था उसमें मुझे शर्म नहीं थी, और मैं इस बात से दुखी नहीं हूँ कि अब वह मेरे पास नहीं है।
जिस प्रकार अतीत नष्ट होता है उसी प्रकार भविष्य निर्मित होता है।
हम प्राचीन देशवासियों के पास अपना अतीत है—हम अतीत के प्रति आसक्त रहते हैं। उन, अमेरिकियों का एक सपना है: वे भविष्य के वादे के बारे में उदासी महसूस करते हैं।
मानव-जीवन का नित्य और प्रकृत स्वरूप देखने के लिए दृष्टि जैसी शुद्ध होनी चाहिए, वैसी अतीत के क्षेत्र के बीच ही वह होती है। वर्तमान में तो हमारे व्यक्तिगत रागद्वेष में, वह ऐसी बँधी रहती है कि हम बहुत-सी बातों को देखकर भी नहीं देखते।
रचनात्मकता का मनोविज्ञान समय के साथ भी एक ख़ास तरह का रिश्ता है—अपने समय के साथ, अपने से पहले समय के साथ और आनेवाले समय के साथ।
राजनीतिक दाँव-पेंच में पड़कर; हमें कम-से-कम इतना तो न भूलना चाहिए कि वर्तमान काल ही सब कुछ नहीं है—भूत और भविष्य काल भी कोई वस्तु है।
अतीत की मुश्किलों, सांस्कृतिक परंपराओं और सामाजिक धारणाओं को छोड़ दें। आप ही इकलौते व्यक्ति हैं; जो उस जीवन का निर्माण कर सकते हैं, जिसके आप हक़दार हैं।
आधुनिकता का एक तात्पर्य जहाँ अपनी जड़ों की छानबीन है (अपनी स्थानीयता, इतिहास, परंपरा आदि में), वहीं उसका दूसरा तात्पर्य कलात्मक अभिव्यक्ति की उन श्रेष्ठतम उपलब्धियों की जानकारी भी है, जिनसे कला का इतिहास बना है।
अतीत, परंपरा, वर्तमान, भविष्य : इनकी लगातार उपस्थिति का बोध, या इनमें से किसी एक की अति-उपस्थिति का बोध निर्धारित करता है कि एक कलाकार अपने समय में मनुष्य की स्थिति और उसकी आधुनिकता को, अपनी रचनाओं में किस तरह ग्रहण और परिभाषित करता है।
हम अबाध रूप से, कालक्रम से नहीं बढ़ते हैं। हम कभी-कभी असमान रूप से एक पहलू में आगे बढ़ते हैं, दूसरे में नहीं। हम थोड़ा-थोड़ा करके बढ़ते हैं। हम तुलनात्मक रूप से आगे बढ़ते हैं। हम एक क्षेत्र में परिपक्व हैं, दूसरे में बचकाने। अतीत, वर्तमान और भविष्य मिलकर हमें पीछे धकेलते हैं, आगे बढ़ाते हैं या हमें वर्तमान में स्थिर कर देते हैं। हम परतों, कोशिकाओं, ज्योति पुंजों से मिलकर बने हैं।
जब हम अतीत के बारे में सोचते हैं, तब हम सुंदर चीज़ों को चुनते हैं। हम विश्वास करना चाहते हैं कि सब कुछ ऐसा ही था।
अतीत आता है—भविष्य, अतीत, भविष्य। यह हमेशा अभी है। यह कभी अभी नहीं है।
आपको भान होगा कि भविष्य के प्रति हमारा भय ही हमारी अतीत से मुक्ति पाने में बाधा है।
सवाल सिर्फ़ अतीत को मिटाने का ही है।
प्रत्येक क्षण के पीछे पूरे अतीत का भार है।
मैंने ख़ुद को एक कालातीत टैक्सी में अनंतकाल से गुज़रते हुए देखा।
मनुष्य उस कोटि की पहुँची हुई सत्ता है, जो उस अल्प क्षण में ही आत्मप्रसार को बद्ध रखकर संतुष्ट नहीं हो सकती—जिसे वर्तमान कहते हैं। वह अतीत के दीर्घ पटल को भेदकर; अपनी अन्वीक्षण बुद्धि को ही नहीं, रागात्मिका वृत्ति को भी ले जाती है।
आगे बढ़ो, किंतु माप कर देखने न जाओ कि कितनी दूर बढ़े हो। ऐसा करने से पुनः पीछे रह जाओगे।
आधुनिकता शब्द का रचनात्मक आशय; वर्तमान को केंद्र में रखते हुए अतीत और भविष्य के प्रति भी संचेत रहता है, इसलिए 'समकालीन' प्रत्यक्ष या 'तत्कालीन' जैसे शब्दों के साथ भी इसके गहरे और सतही दोनों संबंध हैं।
अतीत कभी मरता नहीं है। वह बीतता भी नहीं है।
वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है; अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है।
अतीत के प्रति पारंपरिक भारतीय दृष्टिकोण—जैसे कि इस सदृश दूसरे समाजों में भी है—इस मान्यता का एक नकार है। यह नकार उस सिद्धांत के जड़ में प्रहार करता है, जिस पर आधुनिक संगठित हिंसा अधिकाधिक आश्रित है।
अतीत की अपूर्ण विषयवस्तु को अपनी प्रतिभा से पूर्णरूप प्रदान करने में कवि की मौलिकता प्रकट होती है।
हर युग के भूत से वर्तमान की कुश्ती हुई है। कालिदास की अवहेलना जब केवल उनकी नवीनता के कारण होने लगी, तो उन्हें ललकारना पड़ा कि जो पुराना है, वही श्रेष्ठ नहीं है।
जब अतीत मर जाता है तो शोक होता है, लेकिन जब भविष्य मर जाता है तो हमारी कल्पनाएँ उसे आगे बढ़ाने के लिए मजबूर हो जाती हैं।
पूर्ववर्ती को अधिकार करके ही परवर्ती का आविर्भाव होता है।
भूतकाल में जो ज्ञानी हुए, वर्तमान जो ज्ञानी है एवं भविष्य में जो ज्ञानी होंगे—उनके ज्ञानी होने में कोई मार्गभेद नहीं है।
अतीत का अर्थ उतना ही नहीं, जितना वह एक परंपरा में बरकरार रहता है। बहुत कुछ ऐसा होता है, जो एक परंपरा के बाहर अतीत में छूट जाता है।
हृदय के लिए अतीत एक मुक्ति-लोक है जहाँ वह अनेक प्रकार के बंधनों से छूटा रहता है और अपने शुद्ध रूप में विचरता है।
जो रात बीत गई है, वह फिर नहीं लौटती, जैसे जल से भरे हुए समुद्र की ओर यमुना जाती ही है, उधर से लौटती नहीं।
भूतकाल हमारा है, हम भूतकाल के नहीं हैं। हम वर्तमान के हैं और भविष्य को बनाने वाले हैं, भविष्य के नहीं।
अतीत सुखों के लिए सोच क्यों, अनागत भविष्य के लिए भय क्यों, और वर्तमान को मैं अपने अनुकूल बना ही लूँगा, फिर चिंता किस बात की?
वर्तमान हमें अंधा बनाए रहता है, अतीत बीच-बीच में हमारी आँखें खोलता रहता है।
अतीत में जो कुछ भी सुंदर रहा है, उसे जीवित रखना होगा। साथ ही वर्तमान के भंडार को और भी समृद्ध बनाने के लिए, भविष्य का विकासद्वार भी खुला रखना होगा।
परंपराएँ अतीत को वर्तमान और वर्तमान को भविष्य से जोड़ती हैं। उनके माध्यम से सामाजिक जीवन को निरंतरता मिलती है, और उसका स्वरूप निर्धारित होता है।
कुलीनता पूर्वजन्म के कर्मों का फल है, चारित्र्य इस जन्म के कर्मों का प्रकाशक है।
वर्तमान हमारे अतीत के कर्मों से निर्धारित होता है और भविष्य वर्तमान से।
हमारा भविष्य जैसे कल्पना के परे दूर तक फैला हुआ है, हमारा अतीत भी उसी प्रकार स्मृति के पार तक विस्तृत है।
स्मृति अतीत-विषयक होती है। मति भविष्य-विषयक होती है। बुद्धि वर्तमान विषयक होती है। प्रज्ञा त्रिकाल-विषयक होती है। नवनवोन्मेषशालिनी प्रज्ञा को प्रतिभा कहते हैं।
आदमी को पूरी निर्ममता से अपने अतीत में किए कार्यों की चीर-फाड़ करनी चाहिए, ताकि वह इतना साहस जुटा सके कि हर दिन थोड़ा-सा जी सके।
भूतकाल के साँचों को तोड़ डालो परंतु उनकी स्वाभाविक शक्ति और मूल भावना को सुरक्षित रखो, अन्यथा तुम्हारा कोई भविष्य ही नहीं रह जाएगा।
इतिहास हमेशा वर्तमान और उसके अतीत के बीच संबंध का निर्माण करता है।
दुनिया समय में आगे नहीं बढ़ती, बल्कि ऐसा लगता है जैसे यह हमारे अतीत से भविष्य की ओर एक सीधी रेखा में जा रही है।
हमारा अतीत एक व्याख्या है, और हमारा भविष्य एक भ्रम है।