आत्म-साक्षात्कार बहुत आसान है, स्वयं का चरित्र-साक्षात्कार अत्यंत कठिन है।
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अनावृत होना यानी स्वयं का होना है, जबकि नग्नता दूसरों के द्वारा नग्न देखा जाना है—जिसकी तस्दीक़ स्वयं के लिए नहीं होती।
सच बात तो यह है कि आत्मपरक रूप से विश्वपरक, जगतपरक होने की लंबी प्रक्रिया की अभिव्यक्ति ही कला है—अभिव्यक्ति-कौशल के क्षेत्र में और अनुभूति अर्थात् अनुभूत वस्तु-तत्व के क्षेत्र में।
विचार ही हमारी कार्य-प्रवृत्ति का नियामक है। मन को सर्वोच्च विचारों से भर लो; दिन पर दिन यही सब भाव सुनते रहो, मास पर मास इसी का चिंतन करो।
संसार-बंधन के दुःखों की रचना को विध्वंस करने हेतु; प्रलयाग्नि के सदृश ब्रह्मानंद पद में प्रवेश के उद्योग के बिना ,और बाक़ी सब वणिग्व्यापार है। प्रयोजनवाली बात केवल ब्रह्म का चिंतन है।
यदि तुम मनुष्यों से प्रेम करते हो और वे मैत्री का व्यवहार नहीं करते, तो अपने प्रेम की समीक्षा करो। यदि तमु शाशन करते हो और लोग नियंत्रित नहीं होते, तो अपनी बुद्धि की जाँच करो। यदि तुम दूसरों के प्रति शिष्टता का व्यवहार करते हो और वे तुम्हारे प्रति नहीं करते तो, अपने आत्म-सम्मान की समीक्षा करो। यदि तुम्हारे कार्य निरर्थक होते हैं, तो उसके कारण को अपने अंदर ढूँढ़ो।
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मनुष्य को अंधे के समान जीवन-यापन नहीं करना चाहिए, जीवन के तत्वों की मीमासा करनी चाहिए। अपरीक्षित जीवन जीने योग्य नहीं।
धर्म को जानने का अर्थ है, विषय के मूल कारण को जानना और वही जानना ज्ञान है। उस मूल के प्रति अनुरक्ति ही है भक्ति, और भक्ति के तारतम्यानुसार ही ज्ञान का भी तारतम्य होता है। जितनी अनुरक्ति से जितना जाना जाता है, भक्ति और ज्ञान भी उतना ही होता है।
अंतर में जो ऐक्य है, जो योग है, उसमें ही परमानंद है। इसको प्राप्त करना ही यथार्थ ज्ञान है।
संकीर्णतावाद मिथक गढ़ता है और उससे अलगाव पैदा करता है। आमूल-परिवर्तनवाद आलोचनात्मक होता है, इसलिए मुक्त बनाता है।
विज्ञान-शक्ति, आत्मज्ञान-शक्ति, साहित्य-शक्ति—समाज को मोड़ देने में इन्हीं तीन शक्तियों से विशेष मदद मिलती है। इन्हीं की छाप समाज और व्यक्ति के हृदय पर पड़ती है।
तुम विषय में जितना आसक्त होते हो, विषय-संबंध में तुम्हारा ज्ञान भी उतना ही होता है। जीवन का उद्देश्य है, अभाव को एकदम भगा देना और यह केवल कारण को जानने से ही हो सकता है।
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मनुष्य का दोष यह है कि वह दूसरों का शिक्षक होना चाहता है। छोटा मनुष्य अपने दोषों को कभी नहीं देखता।
जब तक बुद्धि आत्मनिष्ठ नहीं होती, तब तक स्वराज्य नहीं। अंदर से प्रकाश मिलेगा, तो स्वराज्य प्रकट होगा।
मन, ज्ञान, आदि के रूप में उपासना अपनी अंतःसत्ता के भीतर देखने का विधान है।
आत्मचिंतन या ‘एकांतवास’ प्राणशक्ति से बँधे मन और इंद्रियों को विलग करने का अवैज्ञानिक प्रयास है।
वाणी विज्ञान से भी आगे जाकर सीधी हृदय पर असर करती है और हृदय तक पहुँच जाती है। आत्मज्ञान अंदर प्रकाश डालता है। विज्ञान बाहर रहता है, आत्मज्ञान अंदर रहता है, और इन दोनों के बीच में रहकर वाणी पुल बनती है।
तुम्हारी भाषा यदि कुत्सा-कलंक जड़ित ही हो; दूसरे की सुख्याति नहीं कर सके, तो किसी के प्रति कोई भी अभिमत प्रकाश न करो। मन ही मन तुम अपने स्वभाव से घृणा करने की चेष्टा करो, एवं भविष्य में कुत्सा-नरक त्यागने के लिए दृढ़ प्रतिज्ञ बनो।
मुझे संसार के प्रति मधुर बनने का समय नहीं है, और मधुर बनने का प्रत्येक यत्न मुझे कपटी बनाता है।
जैसे बाह्य प्रकाश के बिना; बाह्य पदार्थ का नेत्र से भान (ज्ञान) कहीं नहीं होता है, इसी प्रकार से विचार के बिना अन्य साधनों से आत्मज्ञान नहीं उत्पन्न होता है।
अज्ञानता मनुष्य को उद्विग्न करती है, ज्ञान मनुष्य को शांत करता है। अज्ञानता ही दुःख का कारण है और ज्ञान ही आनंद है।
अंतर्ज्ञान आत्मा का मार्गदर्शन है, जो मनुष्य के मन में तब स्वाभाविक रूप से प्रकट होता है—जब वह शांत होता है।
धर्म का द्वार स्वातंत्र्य का द्वार है। हमारा स्वभाव-धर्म हमें स्वतंत्र करता है और हम स्वतंत्र होकर उस धर्म की साधना करते हैं, जो कर्म का औचित्य है।
लोग दूसरे की दुर्गति समझ सकते हैं, किंतु अपनी नहीं समझ पाते।
अपने अज्ञान को जानना सर्वोतम है। अज्ञानी होते हुए अपने को बुद्धिमान समझना बहुत बड़ी बीमारी है। जो इस बीमारी को बीमारी के रूप में जानता है, वही इससे मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
‘आत्मवान्’ होने का अर्थ स्पष्ट ही इच्छा-तंत्र से मुक्ति है।
जहाँ-जहाँ आत्मज्ञान पैदा हुआ, वहाँ पूरा-का-पूरा जीवन बदल गया।
जो दूसरे मनुष्यों को जानता है, वह विवेकी है। जो अपने को जानता है, वह ज्ञानी है। जो दूसरों को वशीभूत करता है, वह बलवान है। जो अपने को वशीभूत करता है, वह अत्यंत शक्ति-संपन्न है। जो अपनी परिस्थिति से संतुष्ट है, वही घनी है।
जब तक बाह्य तथा आंतरिक विकास सापेक्ष नहीं बनते, हम जीना नहीं जान सकते।
दुनिया को बनानेवाली दूसरी ताक़त, जो जीवन को आकार देती है—आत्मज्ञान है।
जो दुर्बल है, वह कभी मुक्ति नहीं पा सकता। समस्त दुर्बलताओं का त्याग करो। देह से कहो, 'तुम ख़ूब बलिष्ठ हो।' मन से कहो, 'तुम अनंत शक्तिधर हो', और स्वयं पर प्रबल विश्वास और भरोसा रखो।
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व्यक्ति अपनी ही खोज में समाज को ढूँढ़ता है, समाज के विकास की परीक्षा करता है, और इस प्रकार उसकी परीक्षा करते हुए अपनी परीक्षा करता है।
तुम भक्तिरूपी तेल में ज्ञानरूपी बत्ती भींगोकर सत्यरूपी चिराग जलाओ, देखोगे कितने फतिगें, कितने कीड़े, कितने जानवर, कितने मनुष्यों ने तुम्हें किस प्रकार घेर लिया है।
मन के तत्त्व, मूलतः, बाह्य जीवन-जगत् के दिए हुए तत्त्व हैं।
जो तुलना अंतर्निहित कारण को प्रस्फ़ुटित कर देती है—वही है प्रकृत विचार।
यदि कवि का ज्ञान-पक्ष दुर्बल है, यदि उसका ज्ञान; आत्म-पक्ष, बाह्य-पक्ष और तनाव के संबंध में अधूरा अथवा धुँधला है, अथवा यदि वह तरह-तरह के कुसंस्कारों और पूर्वग्रहों तथा व्यक्तिबद्ध अनुरोधों से दूषित है, तो ऐसे ज्ञान की मूलभूत पीठिका पर विचरण करनेवाली भावना या संवेदना निस्संदेह विकारग्रस्त होगी।
यदि ज्ञानी; मन और इंद्रियों से छुटकारा पा जाए, तो उसे किसी से कुछ पूछने की आवश्यकता नहीं। यदि राग का प्रवाह रुक जाए, तो आत्म-दर्शन सहज ही हो जाता है।
जो कुछ भी आप देखते या महसूस करते हैं; जैसे कोई किताब, उसे उठाएँ। पहले उस पर मन को एकाग्र करें, फिर उस ज्ञान पर जो किताब के रूप में मौजूद है, फिर उस अहंकार पर जो किताब को देख रहा है और इसी तरह आगे बढ़ते रहें। इस अभ्यास से सभी इंद्रियों पर विजय प्राप्त हो जाएगी।
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तुम गुरु या सत् में चित्त संलग्न करके आत्मोन्नयन में यत्नवान रहो, दूसरे तुम्हारे विषय में क्या बोलते हैं, देखने जाकर आकृष्ट न हो पड़ो। ऐसा करने से आसक्त हो पड़ोगे, आत्मोन्नयन नहीं होगा।
अंतर्तत्त्व-व्यवस्था बाह्य जीवन-जगत का, अपनी वृत्तियों के अनुसार आत्मसात्कृत रूप है। किंतु यह आत्मसात्कृत जीवन-जगत—बाह्म जीवन-जगत् की प्रतिकृति नहीं है।
किसी भी अध्ययन-अनुशीलन के लिए प्रारंभिक तथ्य अपनी समग्रता, अपनी संपूर्णता में अपने मन के सामने उपस्थित करना आवश्यक है—फिर वह विज्ञान कोई भी हो, शास्त्र कोई भी हो। इसमें संपूर्ण आत्म-निरपेक्षता, सतर्कता, और जाग्रत दृष्टि आवश्यक है।
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जिस कवि में आत्म-निरीक्षण तीव्र होगा, वह कंडीशड साहित्यिक रिफ्लेक्सेज से उतना ही जूझ सकेगा।
निर्मल ब्रह्म के चिंतन से ही परमानंद की प्राप्ति हो सकती है।
हमारे स्वतंत्र होने का अर्थ ही है, साध्य का अनेकांत होना। नहीं तो स्वातंत्र्य कैसा? साध्य के अनेकांत में ही जिज्ञासा कचोटती है—धर्म क्या है?
जिस तरह मन विषयों में रमता है, उसी तरह यदि आत्म-साक्षात्कार करने में रमे तो, हे योगीजन! जीव शीघ्र ही निर्वाण पा जाए।
भगवान को जानने का अर्थ ही है, समस्त को समझना या जानना।
आत्मज्ञान, वीतरागता, पूर्व कर्म के उदय अनुसार विचरण, अपूर्ववाणी और परम श्रुतज्ञान—ये आत्मानुभवी सद्गुरु के लक्षण हैं।
आत्मनिरपेक्षता सहज तथ्य-वस्तु नहीं है।
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बाह्य का आभ्यंतिकरण एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है।
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