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रागदर्पण : उस जादुई शाम के नाम

अपने हालिया सफ़र के बाद, मैं पूरे यक़ीन के साथ कह सकती हूँ कि मैंने अपने अब तक के जीवन की सबसे करामाती शाम को देखा है। बुलंद बर्फ़-पोश पहाड़ियों के पीछे पश्चिम में दहककर बुझता हुआ लाल अलाव। वह दृश्य मेरे मन मानस पर हमेशा को नक़्श हो गया, जब डूबती साँझ की झाईं में पेड़ों, पत्तों, पर्वतों, चट्टानों और मेरी आँखों की हद में आने वाली हर शै का रंग-रूप बिल्कुल बदल गया था। क्षण-क्षण रूप बदलती हुई, अनगिन-अजाने रंगों से भरी हुई, वह धजीली मायाविनी शाम। उन रंगों के नाम भी तो मुझे ठीक-ठीक मालूम नहीं। यूँ भी जब तक मुझे नाम सूझता, तब तक रंग बदल जाता। कितने और कौन-कौन से रंग तो थे! शायद कबूदी या बैंजनी! न चंपई... पूरी तरह चंपई भी नहीं। शायद गेंदई! ओह! हाँ गेरुई या... या फिर किरमिजी। मगर ज़रा ही देर बाद फ़ाख्तई या शायद धूसर... नहीं उस आख़िरी रंग को तो सुरमई कहना ही ज़्यादा ठीक था। उफ़्फ़! आपस में गड्ड-मड्ड हुए उन रंगों के नाम कोई भी कैसे जान सकता है!

रंगों को पहचानने के इस खेल में मेरे चौतरफ़ स्याही उतर आई। देखते-देखते सूरज किसी छलावे की तरह अदृश्य हो गया। मुझे मलाल हुआ कि ‘शाम बहुत छोटी होती है’, बस आधे घंटे की। उस जादू भरी शाम को तनदिही से ताकते हुए ख़याल आया कि सौंदर्य और सुख की उम्र कम ही होती है। मैं उन तमाम चीज़ों के दर-बाब सोचने लगी जो मुझे पसंद हैं। फूलों की गमक, सतरंगी धनक, काँच के कासे में भरा ख़ुमार और... और प्यार। सब कुछ अल्पकालिक!

जादुई साँझ ढल गई थी। पगडंडियों पर भेड़-बकरियों को हाँकते बाज़गश्त चरवाहों के पहाड़ी बोलों की मिठास माहौल में गूँज रही थी। परिंदे-चरिंदे अपने घरों को लौट चले थे। पंछियों की कूजन गुंग होने लगी थी। उस घड़ी मैं सोच रही थी कि कभी सारे खटराग भूलकर ख़ानाबदोश क़लंदरों की तरह भटकते फिरना भी ख़ासा मज़ेदार होता होगा! आनन-फ़ानन तय हुआ कि रात यहीं खुले आसमान के तले गुज़ारी जाए। इस तरह हम काहिलों को डूबते सूरज के बाद उगते सूरज का दीदार भी हासिल होगा। सवेरे की नींद के पक्के प्रेमियों को गुनगुने सूरज को देखे महीनों बीत जाते हैं और वैसे भी पहाड़ फ़ुर्सत तलब करते हैं। उन्हें जीने के लिए, उनकी तहें खोलने के लिए रातों की हज़ार बैठकी भी नाकाफ़ी है। होटल के गरम और गदबदे बिस्तरों के ऐश-ओ-निशात को धकियाकर हम निघरघट एक ठूँठ के क़रीब बैठ गए। उस नंगे दरख़्त पर चंद सूखी पत्तियाँ थीं। उसने पतझड़ का भारी दुःख उठाया होगा। उसके पीछे सुख से इतराते चीड़ और दियारों का पूरा कुनबा था। हम तंग और घुमावदार सड़कों से गुज़रकर उस चटयल मैदान पर पहुँचे थे। पहाड़ की ऊँचाइयों पर अच्छी-बड़ी समतल जगह का होना भी एक अजूबा है। यह मैदान बारिशों के दिनों में हरियल घास से ढँका रहता है, मगर शुष्क जाड़े ने हरी घास को सूखा और भुरभुरा कर दिया था।

हमारे पास ख़ुद को गर्म रखने के लिए अलाव जलाने का बंदोबस्त था। पुरानी बढ़िया शराब और मदहोशकुन संगीत सुनने का सामान था। एक भले कवि की कविताओं की किताब थी। आग में भूनने को शकरकंद और चबाने को करारी मूँगफलियाँ थीं।

तारों भरे खुले आसमान के नीचे पत्थरों के एक गोलबंद में अलाव जलाया गया। थोड़ी देर में ही धुँधुआती लकड़ियाँ दहर-दहर जलने लगीं। आँच खाकर चेहरे तचने लगे। काग़ज़ के कासों में जाम ढाले गए। धुआँनोशों ने अपनी सिगरेट सुलगा लीं।

फ़रीदा ख़ानम ने आलाप लिया।

“चंद घड़ियाँ यही हैं जो आज़ाद हैं
इनको खोकर कहीं, जान-ए-जाँ ऽऽऽ
उम्र भर न तरसते रहो”

जान पड़ा माघ महीने की पहाड़ी रात शराबघर से ज़्यादा नशीली होती है।

ऊपर ठीक सामने खर्वट में घरों की बत्तियाँ जुगनुओं की तरह टिमटिमा रही थीं। कुल जमा दसेक घर होंगे। पहाड़ों के गाँवों में अक़्सर इतने ही घर होते हैं। छह-आठ सौ क़दम की दूरी पर कुछ तंबुओं में झुमाऊ पंजाबी गीत बज रहे थे। उन पटवासों में नौजवान सैलानियों का डेरा होगा। जैसे-जैसे रात सरक रही थी, हवाएँ तेज़-ओ-तुंद हो रही थीं। पारा दो डिग्री गिर गया था। यानी शून्य से तीन डिग्री नीचे। ठंड हमारी दबीज़ जैकेटों को पारकर, धारदार तीर की तरह हाड़ों को बींधने लगी थी। दस्तानों के भीतर उंगलियाँ अकड़ने लगी थीं। अधरात चीड़ों और देवदारों की नुकीली पत्तियों के कोरों से ओस चूने लगी। अलाव ठंडा पड़ रहा था। शराब उतरने लगी थी। ठंड से ज़्यादा सन्नाटा गड़ रहा था। लगातार गिरता पारा चेता रहा था कि जाओ जाकर अपने गर्म और नरम बिस्तरों में दुबक जाओ। अलाव झंवने के बाद आख़िर हौंसला टूट गया। हम अपने ठिकाने की ओर चल पड़े।

और इस तरह उगते सूरज को देखना एक बार फिर टल गया।

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