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जगह-जगह 2.0 : न मैं हिंदी शहर नगौरी

भाषा-विज्ञान में व्युत्पत्ति-भ्रांति का अर्थ है कि किसी शब्द के प्राचीनतम अर्थ को ही उसका ‘सही’ अर्थ मानने पर ज़ोर दिया जाए और उसके वर्तमान इस्तेमाल को रद्द करके उसे उसके मूल प्रयोग, प्राचीन अर्थ और संदर्भ में ही अंगीकार किया जाए।

कविता और साहित्य में जगहें जिस तरह बची हुई हैं, उनका वास्तविक रूप में बचा होना अब मुश्किल है। वे नष्ट हो चुकी हैं, जन-स्मृतियों में हैं और स्मृतियों में ही उनका पावित्र्य है। ज़रदुश्ती आग कितनी पुरानी है, ‘आग’ शब्द कितना पुराना है? बेथलेहम के पत्थर कितने पुराने हैं? समरकंद, ताशकंद और जबलपुर, इन तीनों नामों का एक ही अर्थ है—‘पत्थरों का शहर’। तीनों जगहों में अब पत्थर कम हैं, जबलपुर में तो मिट्टी भी बहुत कम है।

मैं सोचता हूँ कि बुल्ले शाह की इस काफ़ी में ‘नगौरी’ का क्या मतलब होगा। क्या यह देवनागरी का ‘नगर’ है, या ‘नागौर’ है, या बुल्ले शाह ‘हिंदियों के नगर’ में रहने को तज रहे हैं। इसमें अरबी, लाहौरी, पिशौरी (पेशावरी) और अब हिमाचल प्रदेश में स्थित ‘नदौन’ जैसे नाम भी जगहों के रूप में आए हैं।

जगहों के हवाले से पहचान बनाना और उन्हें तजना बहुत दिलचस्प खेल है। ऐसी बहुतेरी कविताएँ हैं, जिनमें पहचान और स्थानीयता का त्याग है। यह त्याग कोरा नहीं है; इसमें चुनाव भी है। बुल्ले शाह ‘नदौन’ को मासूमियत का शहर कहते हैं, अपनी जन्मस्थली कसूर का नाम लेते हुए ‘असाँ कसूरी, असाँ दी ज़ात कसूरी’ कहते हैं। वह कहते हैं कि जो उन्हें सैयद कहे, वो दोज़ख़ में जले और जो अराईं या अपने गुरु की पहचान से पुकारे, उसे ‘भिश्ती पींघाँ’ मिलें।

पंजाबी में यह नया नहीं है, संभवतः यह सूफ़ी कविता का कोई टेम्पलेट हो इसीलिए सिंधी और कश्मीरी परंपराओं में भी इसके स्वर मिलते हैं। रूमी के यहाँ भी तजने की ऐसी कुछ कविताएँ हैं, हालाँकि उसका सत्यापन अब संदिग्धता की ज़द में है। पहचान में निवेश अब सर्वत्र अधिक है। महान् यायावर हर फ़र्लांग पहचान की जिल्दें उतारते रहे; अब पहचान की पर्चियाँ हैं, पहचान के झंडे हैं। हम जहाँ से चले थे, वहाँ से अब तक बहुत कुछ का त्याग किया जा सकता था। यह तजना सभ्यता पर क़र्ज़-सा है, सभ्यता के दहाने से लौटने की पुकार आती है। ऐसी आवाज़ें बहुत-सी हैं। उन्हें सुनने में आदर्शवाद की ऊब है, यूटोपिया की हरी घास है। फिर भी उनमें कई संदर्भ हैं जो साहित्यिक परिप्रेक्ष्य से बहुत दिलचस्प हैं।

पंजाबी के ही हवाले से 17वीं सदी के पंजाबी-हिंदू संत छज्जू भगत की बैठक, जो अब लाहौर में है, के नाम पर कहावत है—‘जो सुख छज्जू दे चौबारे, वो बल्ख़ न बुख़ारे।’ ‘बुख़ारा’ वही जगह है जिसे शायर हाफ़िज़ एक ‘तुर्क शीराज़ी’ के गालों के तिल पर न्यौछावर कर रहे हैं, “ब:-ख़ाल-ए हिन्दूयश बख़्शम समरक़ंद ओ बुख़ारा रा।”

बुल्ले शाह का ‘हिंदियों का नगर’ यहाँ ‘हिंदुओं का नगर’ नहीं है। उसी तरह हाफ़िज़ के मिस्रे में ‘हिन्दू’ से आशय काले तिल से है।

यूसुफ़ और कनआन

“Yusuf'u kaybettim Kenan ilinde
Yusuf bulunur, Kenan bulunmaz”

— यूनुस एमरे, 1238-1320

अर्थात् :

“मैंने कनआन में यूसुफ़ को खो दिया;
यूसुफ़ मिल सकता है, कनआन नहीं मिलता।”

यह तुर्की शे’र यूसुफ़ और उनके पिता याक़ूब की कथा की ओर इशारा करता है। कनआन वह भूमि थी, जहाँ याक़ूब अपने परिवार के साथ रहते थे। यूसुफ़ उनके सबसे प्रिय पुत्र थे। भाइयों ने उनकी दिव्यता की भविष्यवाणी और उत्तराधिकार की ईर्ष्या में उन्हें कुएँ में डाल दिया और याक़ूब के सामने ऐसा प्रस्तुत किया मानो यूसुफ़ की मृत्यु हो चुकी हो। बाद में यूसुफ़ मिस्र पहुँचा दिए गए। इधर याक़ूब कनआन में बेटे के वियोग में रोते रहे। कहा जाता है कि लगातार रोते-रोते उनकी आँखों की रोशनी भी चली गई। कथा आगे और भी है और उसका अंत पुनर्मिलन में होता है।

इस शे’र की कई व्याख्याएँ की गई हैं। शे’र में कहीं भी ‘मैं’ ज़ाहिर नहीं है; यह अंदाज़न याक़ूब की आवाज़ है, जिन्हें साज़िशन तैयार किया गया ख़ून से लिथड़ा कपड़ा मिलता है और वह यूसुफ़ की मृत्यु से आहत यहाँ-वहाँ भटकते रहते हैं और रोते-रोते अंधे हो जाते हैं।

कनआन, आदर्श और मासूमियत के ह्रास का भी प्रतीक है और समय का भी।

पारंपरिक व्याख्या में एक विरोधाभास की ओर संकेत है, कि दुनिया (कनआन) चाही हुई जगह हो सकती है, लेकिन उसके भीतर का तत्त्व (यूसुफ़) खो जाए तो वह अर्थहीन हो जाती है।

यह कथा कुछ परिवर्तनों के साथ सभी इब्राहिमी पंथों में मिलती है। यहाँ ‘कनआन’ उस भूभाग की ओर संकेत है जो आज के इज़राइल, जॉर्डन और मिस्र के बीच की भूमि मानी जाती है, जहाँ समय बुरी तरह विकृत हो चुका है और वहाँ सारे दावे केवल मिथकीय हो सकते हैं।

मर्ग-ए-मजनूँ पे अक़्ल गुम है, ‘मीर’

लैला-मजनूँ की कथा ने रेगिस्तान को एक अमिट रूपक में बदल दिया। मजनूँ को शायद लैला से भी ज़्यादा सहरा की दरकार है। सहरा का रिक्त विस्तार मजनूँ का आत्म है।

रेगिस्तान पृथ्वी का मौन है। यहाँ दूरियाँ अपना अनुपात खो देती हैं। नक़्शे अविश्वसनीय हो जाते हैं, इसका क्षितिज दोपहर में पिघल जाता है, दिशाओं का लोप हो जाता है। रात को ब्रह्मांड नज़दीक आ जाता है, आकाश अखंड सत्ता की तरह सिर पर टिका रहता है। यहाँ स्मृतियाँ पदचिह्नों की तरह क्षणिक हैं। सारी दिव्य पैग़ंबरी फुसफुसाहटें रेगिस्तान में सुनी जा सकती हैं। सारे पैग़ंबर, घुमक्कड़, तपस्वी और दीवाने किसी आत्मबोध या आत्मविनाश तक पहुँचने से पहले रेगिस्तान से गुज़रते हैं। रेगिस्तान मजनूँ के पागलपन को आकार देता है। सभ्यता से दूर यहाँ मुँह से निकली हर बात प्रार्थना में बदल जाती है।

यहाँ अदूनिस की कविताओं का नायक अपने शब्दों और वाक्य-विन्यासों को रेत पर पटकता है।

सहरा, बियाबान, उजाड़, दश्त और रेग का स्थायी नायक मजनूँ है। यह अफ़्रीकी सहारा से थार और गोबी तक फैले वीरान में मौजूद है। यह कथाओं और कविताओं के लोक की सबसे अधिक फैली हुई स्थानीयता है। उसमें दिशाएँ धुँधली हो जाती हैं, रास्ते मिट जाते हैं। रेगिस्तान के कोने नहीं होते। कवि कह गया है, “दीवाने में रेगिस्तान ढूँढ़ो।”

हमारे कवियों को अपनी किताबों को समर्पित करते हुए ख़ुद को मजनूँ का जूनून कहने, अँधेरे की क़ंदील होने और क़ंदील का परवाना कहने से पहले थोड़ा हिचकना चाहिए।

रूमी बेहतर लिखते हैं

गुफ़्त लैला रा ख़लीफ़ा, कान तुई?
कज़ तु मजनूँ शुद परीशाँ ओ ग़वी?
अज़ दिगर ख़ूबाँ तु अफ़ज़ून नीस्ती!
गुफ़्त: ख़ामोश, चूँ तु मजनूँ नीस्ती।

अर्थात् : 

ख़लीफ़ा ने लैला से पूछा, क्या तू वही है
जिस पर मजनूँ यूँ परीशाँ और बावला हुआ?
तू तो दूसरी ख़ूबसूरत औरतों से बढ़कर भी नहीं है।
लैला ने कहा, ख़ामोश! तू मजनूँ नहीं है।

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