Font by Mehr Nastaliq Web

जनता पर उद्धरण

जनता की, जनता के द्वारा, जनता के लिए सरकार कैसे अपने ही लिए हो जाती है—यह अब्राहम लिंकन को नहीं मालूम था, हमें मालूम है।

हरिशंकर परसाई

महाकवि विद्यापति मध्यकाल के पहले ऐसे कवि हैं, जिनकी पदावली में जन-भाषा में जनसंस्कृति की अभिव्यक्ति हुई है।

मैनेजर पांडेय

जो लोग 'जनता का साहित्य' से यह मतलब लेते हैं कि वह साहित्य जनता के तुरंत समझ में आए, जनता उसका मर्म पा सके, यही उसकी पहली कसौटी है—वे लोग यह भूल जाते हैं कि जनता को पहले सुशिक्षित और सुसंस्कृत करना है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

आज की दुनिया में जिस हद तक शोषण बढ़ा हुआ है; जिस हद तक भूख और प्यास बढ़ी हुई है, उसी हद तक मुक्ति-संघर्ष भी बढ़ा हुआ है और उसी हद तक बुद्धि तथा हृदय की भूख-प्यास भी बढ़ी हुई है। आज के युग में साहित्य का यह कार्य है कि वह जनता के बुद्धि तथा हृदय की इस भूख-प्यास का चित्रण करे और उसे मुक्तिपथ पर अग्रसर करने के लिए ऐसी कला का विकास करे, जिससे जनता प्रेरणा प्राप्त कर सके और जो स्वयं जनता से प्रेरणा ले सके।

गजानन माधव मुक्तिबोध

‘जनता का साहित्य’ का अर्थ, जनता को तुरंत ही समझ में आनेवाले साहित्य से हरगिज़ नहीं है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रारंभिक श्रेणी के लिए उपयुक्त साहित्य तो साहित्य है और सर्वोच्च श्रेणी के लिए उपयुक्त साहित्य, जनता का साहित्य नहीं है—यह कहना जनता से गद्दारी करना है।

गजानन माधव मुक्तिबोध

शोषकों के वर्ग-स्वार्थों को जब कोई चुनौती देता है; तो उस वर्ग के प्रवक्त्ता कहते हैं, यह आदमी ख़ुदा से लड़ रहा है। ख़ुदा को प्राइवेट संपत्ति का रक्षक और शोषण का एजेंट तभी से बना लिया गया था—जब मनुष्य ने उसके होने की कल्पना की थी।

हरिशंकर परसाई

जो काव्य सर्वसाधारण की समझ के बाहर होता है, वह बहुत कम लोकमान्य होता है।

महावीर प्रसाद द्विवेदी

मीडिया का आधुनिक उन्माद नीरसता पर भीषण हमला है, क्योंकि हमें ईमानदारी के साथ स्वीकार करना चाहिए कि ज़यादातार लोगों के जीवन ऐसे हैं, जिनका आसानी से अनुमान लगाया जा सकता है।

रुत्ख़ेर ब्रेख़्मान

धार्मिकता कोई भारत की बपौती नहीं। यह इस देश में इतनी ज़्यादा इसलिए पाई जाती है, क्योंकि भारत के अलावा किसी अन्य देश में इतनी अज्ञानता नहीं पाई जाती है।

एम. एन. राय

शक्ति का प्रयोग अत्यंत आवश्यक होने पर ही उचित है, और आम जनता के तमाम आंदोलनों के लिए अहिंसा की नीति अपरिहार्य है।

भगत सिंह

लोकतांत्रिक चुनावों का सारा मक़सद; बड़ी-बड़ी समस्याओं पर मतदाताओं के विचार को समझना, और मतदाताओं को उनके प्रतिनिधियों को चुनने की ताक़त प्रदान करना है।

जवाहरलाल नेहरू

अब कोई आदमी सुरक्षित नहीं है। एक दिन ऐसा आएग, जब इस देश के आधे आदमियों की जाँच हो रही होगी और बाक़ी आधे जाँच कमीशनों में होंगे।

हरिशंकर परसाई

भ्रष्टाचार अगर अपने हाथ से हो, तो वह प्रजा के लिए हितकारी है। दूसरे के हाथ से भ्रष्टाचार हो, तो वह प्रजा के लिए दु:खदाई है। इसीलिए रैलियाँ निकालनेवाले, प्रदर्शन करने वाले ये दल चाहते हैं कि शासकीय भ्रष्टा-चार करने का अधिकार इन्हें मिल जाए। इनका भ्रष्टाचार इतना पवित्र होगा कि जनता अपने आप सुखी हो जाएगी।

हरिशंकर परसाई

वास्तव किसी क्रांति से सामान्य आदमी को आज़ादी नहीं मिलती, वह हमेशा ग़ुलाम रहता है। आज़ादी हमेशा शासक और शोषक वर्ग को मिलती है।

हरिशंकर परसाई

अगर कोई मुझसे पूछे किभारतीयों के चरित्र की सबसे बड़ी विशेषता क्या है, तो मैं कहूँगा—मौक़े-बमौक़े अनायास परिचय बढ़ाना, आत्मीयता पैदा करना। आदमी को अपनी आत्मा में समेट लेने के लिए भारतीय कितना आतुर रहता है।

हरिशंकर परसाई

किसी किसी तरह की तपस्या का ख़याल; हिंदुस्तानी विचारधारा का एक अंग है और ऐसा ख़याल सिर्फ़ चोटी के विचारकों के यहाँ है, बल्कि साधारण अनपढ़ जनता में फैला हुआ है।

जवाहरलाल नेहरू

जनता की प्रवृत्तियों का औसत निकालने पर धर्म का जो मान निर्धारित होता है, वही लोकधर्म होता है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

हमारे देश के लोगों में विचार है, गुणग्राहकता। इसके विपरीत एक सहस्त्र वर्ष के दासत्व के स्वाभाविक परिणामस्वरूप; उनमें भीषण ईर्ष्या है और उनकी प्रकृति संदेहशील है, जिसके कारण वे प्रत्येक नए विचार का विरोध करते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

जो शासक जितना अधिक भ्रष्टाचारी हो, उसे प्रजा को सदाचारी बनाने का उसी अनुपात में प्रयत्न करना चाहिए।

हरिशंकर परसाई

जनता अच्छी तरह जानती है कि नेता भावनाओं के व्यापारी होते हैं, फिर भी उनकी बातों में जाती है।

कृष्ण कुमार

हर राष्ट्र के लिए और हर व्यक्ति के लिए जिसको बढ़ना है, काम-काज और सोच-विचार के उन सँकरे घेरों को—जिनमें ज़्यादातर लोग बहुत अरसे से रहते आए हैं—छोड़ना होगा और समन्वय पर ख़ास ध्यान देना होगा।

जवाहरलाल नेहरू

सभ्य समाज की जो भाषा हो, उसी भाषा में गद्य-पद्यात्मक साहित्य होना चाहिए।

महावीर प्रसाद द्विवेदी

कुसंस्कारों, कुप्रथाओं और मिथ्या विश्वासों में आपादमस्तक ढँके हुए; विशाल जनसमूह का उपयोग बिल्कुल उस तरह किया जा रहा है, जिस तरह कारख़ानेवाला ‘कच्चे माल’ का उपयोग करता है।

हरिशंकर परसाई

भक्ति आंदोलन, जनसंस्कृति के अपूर्व उत्कर्ष का अखिल भारतीय आंदोलन है। ऐसे आंदोलन में अनेक स्वरों का समावेश कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

मैनेजर पांडेय

जो सर्वजनों के लिए लभ्य होगी; सर्वजनों को स्पर्श कर सकेगी, वही श्रेष्ठ कला है।

विनोबा भावे

आम तौर पर बांग्लादेश के लोग अत्यंत भावुक हैं और एक बार किसी को अपनाना शुरू कर दें, तो कुछ भी कर डालते हैं। और अगर वे आपको नापसंद करें, तो पूरी तरह ठुकरा देंगे।

ऋत्विक घटक

सच्चा मानववादी कौन है, इसकी पहचान जनता पर भरोसा रखे बिना उसके पक्ष में किए गए हज़ारों कार्यों से उतनी नहीं होती; जितनी जनता पर किए गए भरोसे से होती है, क्योंकि यह भरोसा ही उसे जनता के संघर्ष में शामिल करता है।

पॉलो फ़्रेरा

जनता को अगर नेताओं, विचारकों, संस्कृतिकर्मियों द्वारा मुग़ालते में डालना एक सचाई है, तो यह भी एक काफ़ी बड़ी सचाई है कि जनता उनको इससे ज़्यादा मुग़ालते में डालने की ताक़त रखती है।

ललित कार्तिकेय

यदि सरकार सहिष्णु होती है, तो जनता बुरे मार्गों से दूर रहती है। यदि सरकार की तरफ़ से अनावश्यक हस्तक्षेप होता है, तो लोग शासन को नियमों का उलंघन करने लगते हैं।

लाओत्से

संसद को संविधान का दुश्मन मानकर आप संविधान की रक्षा कैसे कर सकते हैं? जनता को जनतंत्र का दुश्मन मान लिया जाए, तो फिर जनतंत्र की रक्षा कैसे होगी?

राजेंद्र माथुर

हमारी महान् जाति दो स्थितियों में जी रही है—एक तो इसका स्नायु-तंत्र ढीला हो गया है, सो इसे दस्यु सुंदरी-कथाओं जैसा उत्तेजक रस चाहिए। या इसे कोई चिंता अपनी, और अपने देश की नहीं है—घी से तर माल खाकर यह जाति लेटी है, पेट पर हाथ फेरती है।

हरिशंकर परसाई

जनता अपने भाग्य की आप मालिक है। वह अपने कामों को आप करेगी, व्यक्ति या समूह उस पर आज्ञा नहीं चला सकेंगे। उसकी आज्ञा के सामने सम्राट और भिखारी दोनों बराबर होंगे।

गणेश शंकर विद्यार्थी

चतुर सरकार मुँह पर कपड़ा डालकर, लचकती-फचकती फ़ूर्ती से कमीशन की गली से निकल जाती है, और उधर समस्याएँ हुड़दंग करती रहती हैं।

हरिशंकर परसाई

जो पंच कहता है वह परमेश्वर की आवाज़ होती है, ऐसा कहते हैं। जो जगत है वह पंच के समान है। इसलिए जो जगत कहता है, वही सही तरीक़े से ईश्वर का न्याय है।

महात्मा गांधी

जनता शिक्षित हो या अशिक्षित—स्मृति सबकी बराबर होती है।

कृष्ण कुमार

जनता के किसी भाग की दुर्वृत्तियों के सहारे जो व्यवस्था स्थापित होगी, उसमें गुण, शील, कलाकौशल, बल, बुद्धि के असामान्य उत्कर्ष की संभावना कभी नहीं रहेगी—प्रतिभा का विकास कभी नहीं रहेगा।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

बहुसंख्यक जनता स्वाभाविक तौर पर यही मानती है कि म्यूज़ियम बाक़ी जगहों से अलग कुछ पवित्र चीज़ों से भरा है।

जॉन बर्जर

साधारण जनता के लिए शासक-वर्ग की राजनीति की लीला, हमेशा अबूझ पहेली होती है।

मैनेजर पांडेय

उत्पीड़ितों के व्यवहार और प्रतिक्रियाओं से उत्पीड़क; सांस्कृतिक आक्रमण के लिए प्रेरित होता है, लेकिन क्रांतिकारी को इन चीज़ों से कर्म के एक भिन्न सिद्धांत के लिए प्रेरित होना चाहिए।

पॉलो फ़्रेरा

गांधी ने भारत की प्रेतभाषा को पढ़ा और प्रेतों से वार्तालाप करके उन्हें मनुष्य जैसा बर्ताव करना सिखाया। लेकिन प्रेतों को याद ही नहीं कि गांधी उनसे मिला था। वे मंत्र के इशारे पर नाचते हैं, लेकिन उच्चार बंद होते ही उन्हें याद नहीं रहता कि मंत्र था।

राजेंद्र माथुर

भारत के भाग्य का निपटारा उसी दिन हो चुका, जब उसने इस (म्लेच्छ) शब्द का आविष्कार किया और दूसरों से अपना नाता तोड़ दिया।

स्वामी विवेकानन्द

चाहिए यह कि लीडर तो जनता की नस-नस की बात जानता हो, पर लीडर के बारे में कुछ भी जानता हो।

श्रीलाल शुक्ल

उत्पीड़कों के लिए यह आवश्यक है कि वे जनता को गुलाम बना कर निष्क्रिय बनाए रखने के लिए जनता के निकट पहुँचें।

पॉलो फ़्रेरा

क्रांति तो नेताओं द्वारा जनता के लिए होती है, जनता द्वारा नेताओं के लिए—वह तो दोनों की अटल एकजुटता में होती है

पॉलो फ़्रेरा

क्रांति आम जनता और व्यक्ति से शक्ति के संचय तथा संधान की माँग करती है।

व्लादिमीर लेनिन

इतिहास के पाठ को ठीक से जाँचकर समझना कठिन होता है। सभी देशों के इतिहास में देखा जाता है कि जब कोई बड़ी घटना सामने आती है; तो उसके पहले लोगों पर किसी प्रबल आघात का प्रभाव पड़ चुका होता है, और लोगों के मन आंदोलित हो चुके होते हैं।

रवींद्रनाथ टैगोर

जनपक्षीय होने वालों को अस्तित्व का एक नया रूप ग्रहण करना चाहिए क्योंकि अब वे वही नहीं रह सकते, जो पहले थे।

पॉलो फ़्रेरा

राजा प्रजा का सबसे आला दर्जे का सेवक होता है।

महात्मा गांधी

आज़ाद हिंदुस्तान में सारे देश पर जनता का अधिकार है।

महात्मा गांधी