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मेरे अब्बा

उर्दू के मशहूर कहानीकार राजेंद्र सिंह बेदी ने अपनी एक कहानी ‘सिर्फ़ एक सिगरेट’ में लिखा है कि दुनिया के हर बेटे के दिल में कहीं न कहीं यह ख़्वाहिश छुपी होती है कि उसका बाप मर जाए। बेदी ने जिस बाप का ज़िक्र किया है, वह हमारे यहाँ दरअस्ल ज़ुल्म की वह सिम्बॉलिक नज़र है, जो इंसान को अपने तौर पर कुछ करने, सुनने और समझने से रोकती है, उसको अपने ज़ेहन में मौजूद नई-नई चीज़ों को दौड़ लगाकर हासिल करने के अंजाम से डराती भी है, धमकाती भी है। लेकिन यह लाइनें मैं अपने अब्बा के बारे में लिख रहा हूँ तो सबसे पहले बेदी की इस बात को पूरी तरह मानते हुए इतना भी कहना चाहता हूँ कि मैंने ख़ुद अपनी आँखों के सामने अपने बाप को, जिन्हें हम उर्दू में बेहद इज़्ज़त से वालिद के नाम से पुकारते हैं, तिल-तिल कर मरते देखा है।

मेरा अपने वालिद के साथ जो तअल्लुक़ है, वह उस दुनिया पर बहुत हद तक साफ़ है, जो मुझे और उन्हें एक साथ जानती है, हम तक़रीबन एक-दूसरे की ज़िद हैं। चेहरे, रंग, क़द और नैन-नक़्श के लिहाज़ से मुझमें वालिद की कुछ चीज़ें ज़रूर उतर आई हैं, लेकिन ज़िंदगी में जिस्मानी मेल-जोल की इतनी अहमियत कहाँ होती है, जितनी ज़ेहनी तालमेल की। हालाँकि मेरे वालिद ने ख़ुद को देखने के लिए आठ आँखें और पैदा की हैं, यानी मेरे वह बाक़ी चार भाई-बहन जो उन्हें अलग-अलग नज़रों से देखते हैं, लेकिन मैं जिस जगह पर खड़ा हूँ, वहाँ से मेरे वालिद की शक्ल कुछ धुँधली-सी, साफ़ न दिखने वाली, बेबस और साथ ही बेहद ताक़तवर और कभी-कभी बेरहम शख़्स की भी होती जाती है, एक ही चेहरे से निकलने वाली इतनी किरणों को एक लिखावट में कैसे समेटा जाए।

रिवायत तो कहती थी कि या तो मैं ख़ुद इतना बड़ा इंसान हो जाऊँ कि लोग मुझमें और मेरे आस-पास मौजूद लोगों में दिलचस्पी लेना शुरू कर दें, या फिर मैं अपने वालिद की मौत पर आँसू बहाते हुए एक दुख भरी कविता लिखने पर तैयार रहूँ, रोऊँ-धोऊँ और क़िस्सा ख़त्म करूँ, लेकिन न तो मैं इतना बड़ा शख़्स हूँ और न ही मेरे वालिद की मौत हुई है। यह लिखावट बस अचानक फूट पड़ी है, जैसे बहुत कुछ अभी ही याद आ रहा है, अभी न लिखा तो शायद फिर कभी न लिख पाऊँ, वह सब, बहुत-सा कुछ जो उनसे मैंने कभी ग़ुस्से में कहा, कभी उनके गले लगकर, कभी उनकी बग़ल में बैठकर या कभी उनके पीठ पीछे। आज सब कुछ उन्हें सुनाऊँ और उन लोगों को भी, जो इस तहरीर को पढ़ सकते हैं या पढ़ रहे हैं।

हमारे समाज में आमतौर पर बाप कैसे होते हैं या एक इंसान बाप बनने के बाद कैसा हो जाता है। इसके लिए बहुत दूर जाने की ज़रूरत नहीं, यह हादसा आमतौर पर उन लोगों के साथ पेश आता है, जिन पर दुनिया हमदर्दी के फाहे नहीं रखती, उन्हें बेबसी और दया भरी नज़रों से नहीं देखती यानी आम भाषा में जो लोग यतीम नहीं हुआ करते। मैंने भी जब होश सँभाला तो एक ख़ूबसूरत शख़्स को अपनी नज़रों के सामने, बड़े रोबदार अंदाज़ में लोगों पर रोब जमाते देखा, बड़ी-सी दो बिल्डिंगों के बीच सिमटे हुए एक छोटे से दफ़्तर में वह सफ़ेद कुर्ता और हरी धारीदार लुंगी पहनकर बैठा करते थे, आस-पास लोगों की भीड़ होती, जवान लड़के, बूढ़े, बिल्डिंग के सेक्रेटरी साहब, ख़ज़ांची सब लोग उन्हें भाई जान कहकर पुकारा करते थे, क्योंकि वह ख़ानदान में इसी नाम से मशहूर थे।

मुझे मालूम हुआ कि भाई जान का तअल्लुक़ दरअस्ल उत्तर प्रदेश के एक ज़िले शाहजहाँपुर से है, जो दो नदियों खन्नौत और गर्रा समेत अब भी उनकी रगों में बह रहा है। शायरी फ़सीह अकमल के नाम से करते हैं, वैसे असली नाम सैयद ज़ीशान अनवार है। कुछ तहरीरों, ग़ज़लों या नज़्मों पर उनका नाम हमने फ़ाइलों में फ़सीह अकमल क़ादरी भी लिखा देखा। वजह यह थी कि उन्हें अब्दुल क़ादिर जीलानी जो कि ग़ौस-ए-आज़म के नाम से मशहूर वली (सूफ़ी संत) हैं और जिनका मज़ार बग़दाद, इराक़ में है, उनसे एक ख़ास लगाव और इश्क़ है।

साल 1944 की उनकी पैदाइश है। साल 1960 के क़रीब शायरी शुरू की थी, बंबई भी शायरी पढ़ने जा चुके थे और एक अच्छा-ख़ासा वक़्त उन्होंने दिल्ली शहर में भी गुज़ारा था, जहाँ ख़्वाजा बाक़ी बिल्लाह के मुजाविरों में शामिल किसी ख़ानदान के एक हज़रत बक़ाई साहब से उनका तअल्लुक़ क़ायम हुआ और बक़ाई साहब की बेटी यासमीन से मोहब्बत हो गई। मैंने अपने वालिद और यासमीन साहिबा दोनों की जवानी की तस्वीरें देखी हैं, वह जवानी में यक़ीनन ख़ूबसूरत थीं, गोरा रंग, बड़ी आँखें, ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर भी उनके हुस्न की रंगीनी को फीका नहीं कर सकी थी।

वालिद की क़द-काठी पतली और लंबी थी, बेल-बॉटम वाली पैंट और लंबे शर्ट जो कि उस ज़माने में काफ़ी चलन में थे, पहनकर, लंबे बालों और 555 (सिगरेट) की डिबिया समेत वह पुराने और क्लासिकल सिनेमा के एक हीरो दिखाई पड़ते थे। उनके माथे की चौड़ाई, चेहरे का सांवला रंग, आँखों से झाँकती हुई समझदारी और होठों पर एक हल्की-सी मुस्कराहट ने मेरी आँखों में एक ख़ुशहाल मर्द के तसव्वुर को जन्म दिया, बल्कि एक ख़ुशहाल नौजवान।

लेकिन हमारी ज़िंदगी में, ख़ास तौर पर बचपन में वह इस तरह के इंसान बिल्कुल नहीं थे, जैसा कि एल्बम में रखी हुई वह तस्वीर थी। वह उससे बहुत अलग थे, जब वह घर पर होते तो हमें अपने फ़्लैट से बाहर पैर रखने की इजाज़त न होती, छत पर भी जाना मुमकिन न था, बस दो बड़े-बड़े कमरे थे, उस वक़्त हम चार भाई-बहन थे, ताज़ीम (सबसे छोटा भाई) अभी पैदा नहीं हुआ था, हम उस बड़े से फ़्लैट में भूतों की तरह भटकते थे। हमने घरेलू खेल ख़ुद ही बना लिए, हमारे खेलों में रस्सी कूदने, लिगोरचा खेलने और घर के ड्रॉइंग रूम में ही क्रिकेट का नाटक रचने पर हमें मजबूर होना पड़ता था, इसके अलावा हम ‘थप्पड़-थप्पड़’ नाम का एक खेल खेला करते, जिसमें तीन भाई-बहन, बारी-बारी किसी एक को पकड़कर बिस्तर पर लिटाते, वह हाथ-पैर चलाता, अपना बचाव करता, मगर उसे उठाकर ज़बरदस्ती लिटाया जाता और एक-एक करके उसके गालों पर पाँच थप्पड़ बरसाए जाते। इस ज़ालिम खेल में सबसे ज़्यादा नुक़सान हमारी बहन का होता था, वह अक्सर रहम खाकर अपने तमाचे माफ़ कर दिया करती थी, लेकिन हम तीनों भाई कभी उस पर रहम न करते। हमारी अम्मी नमाज़, रोज़े, तस्बीह और अलग-अलग तरह के वज़ीफ़ों, दुआओं में उलझी रहती थीं।

हम बहुत खुश होते थे, जब मालूम होता कि अब्बा बंबई जा रहे हैं। दरअस्ल हम चूँकि महाराष्ट्र के बाहरी इलाक़े वसई में रहते थे, इसलिए इसे बंबई में गिना नहीं जाता है, बल्कि बंबई की तेज़ रफ़्तार ज़िंदगी के बिल्कुल उलट यहाँ इंसानी ज़िंदगी बिल्कुल धीमे अंदाज़ में नाचती रहती थी, सूरज जल्दी डूबता था, सुबह आराम से दर्शन दिया करती थी, कोई घाई (जल्दी) नहीं थी। वालिद के बंबई जाने से हम इसलिए ख़ुश होते थे क्योंकि अपने घर की ग्रिल से कई बार भूखों की तरह हम बिल्डिंग के ग्राउंड में दूसरे बच्चों को शोर मचाता देखते, उनको मिट्टी में सने हुए, भागते-दौड़ते, गिरते-पड़ते देखकर हमें बड़ी ख़ुशी होती। अम्मी से नीचे खेलने की इजाज़त लेना बहुत मुश्किल काम नहीं था, वह तस्बीह पढ़ते-पढ़ते ही हाँ में सिर हिलातीं और हूँ-हूँ कहकर हमें नीचे जाने की इजाज़त दे देतीं। फिर नीचे खेलते वक़्त भी हर वक़्त जान अटकी रहती, कहीं ऐसा तो नहीं कि अब्बा जल्दी लौट आएँ, अगर उन्होंने नीचे खेलते हुए हमें देख लिया तो? अगर किसी और इंसान ने उनसे शिकायत कर दी तो? फिर कई बार ऐसा होता भी था। हम अपने चचेरे भाइयों, अपार्टमेंट के ही लड़कों के साथ खेलते हुए हिचकिचाते थे, खेल में इसी भरोसे की कमी ने हमें कमज़ोर बना दिया था। हम पर बाक़ी लड़के हुक्म चलाया करते, ज़्यादातर लोग हमें टीम में न लेते और लेते तो सबसे आख़िर में, अगर मजबूरी हुई तो। इत्तेफ़ाक़ से जिस दिन हम कोई कैच पकड़ लेते, अच्छी बल्लेबाज़ी का नज़ारा दिखा देते या बेहतर बॉलिंग कर पाते तो हमारे चेहरे देखने लायक़ होते थे। फिर ऐसा भी हुआ कि उन्हें पता चल गया।

हमारे घर में हर जुमा ख़ास तौर पर माँ-बाप की बड़ी सख़्त लड़ाइयाँ हुआ करती थीं, जब पूरा ख़ानदान एक साथ रहा करता था, यानी दोनों बुआ, चाचा और हमारी फ़ैमिली, तो एक बहुत छोटे से कमरे में हमें कुत्ते-बिल्लियों की तरह बंद रखा जाता था, हम चॉल में शरारत करने के लिए बाहर निकलने की ताक में रहते, चार फ़ीट ऊँची दीवार के उस पार की दुनिया कैसी है, देखना चाहते थे, मगर कई बार इस कमरे की खिड़की तक भी हाथ नहीं जाता था। लड़ाइयाँ तब भी बहुत होती थीं, भाई-बहन मानो एक साथ नहीं रहते थे, बल्कि एक-दूसरे से नफ़रत करते थे। उस ज़माने में हमारे वालिद का काम अच्छा नहीं चलता था, चाचा ताने भी देते थे और ख़र्च भी। अम्मी ने जब हमारे अब्बा से कहा कि आपको एक अलग घर ले लेना चाहिए, रूखी-सूखी ही सही, हम लोग उसमें गुज़ारा तो कर ही सकते हैं, तो वालिद ने यह भांडा अपनी चहेती फ़ैमिली के सामने चौराहे पर फोड़ दिया। बच्चे बहुत छोटे थे, इस बेइज़्ज़ती को मेरी माँ ने कैसे सहा होगा, आज भी इस बात का अहसास मुझे अंदर तक परेशान कर देता है।

अब वह कहते हैं कि उस वक़्त हालात कुछ ऐसे ही थे कि वह भाइयों के ताने सुन सकते थे, बहनों से लड़ सकते थे, मगर जब तक उनकी अम्मी (दादी) की इजाज़त न होती, ख़ुद के लिए कोई दूसरा ठिकाना करना उन्हें मंज़ूर न था, आख़िर उन्हीं के कहने पर तो अपना ख़ुद का मकान बेचकर, जो कि उनके वालिद और हमारे दादा ने बड़ी मेहनत और मोहब्बत के साथ शाहजहाँपुर में बनवाया था, वह अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारते हुए, शाहजहाँपुर की यादें और बचपन और इज़्ज़तदार जवानी के दिन झोले में डाले वहाँ से निकल आए थे। ख़ुद बताते हैं कि दादा ने इस मकान को बेचने पर उन्हें सख़्त बद्दुआएँ भी दी थीं, बात भी सही थी कि जिस मकान को उन्होंने अपनी औलाद के लिए इतनी मेहनत से बनवाया हो, उसे एक ग़ैर-ज़रूरी और नुक़सानदेह ज़िद की वजह से बिकता हुआ देखना कितना दर्दनाक नज़ारा रहा होगा।

लेकिन हमारे वालिद ने अपनी अम्मी के कहने पर वह मकान बेचा और महाराष्ट्र में दो-तीनों मकानों को बदलने के बाद वसई की ‘सलमा मंज़िल’ नाम की चॉल में वह फ़्लैट ख़रीद लिया, जिसमें एक ही वक़्त में तीन अलग-अलग परिवार रहा करते थे। छोटे-छोटे बच्चों का शोर-शराबा, बड़ों की बैठकें, अपनी तारीफ़ें, दूसरों की बुराइयाँ, ज़िम्मेदारियों और गैर-ज़िम्मेदारियों पर भाषण के लंबे सिलसिले, शराबी फूफाओं की मौजूदगी, एक ही किचन का झगड़ा, इस सबने मिलकर ज़िंदगी को एक ऐसी खिचड़ी का रूप दे दिया था, जिसमें नमक ज़रूरत से बहुत ज़्यादा हो गया था। लड़ाइयाँ होती थीं, मगर हमारे वालिद टस से मस न होते।

बहरहाल वक़्त ने न जाने कैसी करवट ली कि एक बिल्डर के साथ किए गए काम की वजह से उन्हें घर लेने का ऑफ़र मिला, घर भी इतना बड़ा कि हम लोग जब वहाँ शिफ़्ट हुए तो लगता था झोपड़ी से किसी राजमहल में आ गए हैं। बड़े-बड़े ख़ाली कमरे, बड़े बेडरूम, लॉबी, किचन, दो-दो बाथरूम। कुल मिलाकर वालिद की ज़िंदगी में भी अचानक बहुत से बदलाव आ गए। वह मसरूफ़ रहने लगे, उन्हें प्रॉपर्टी का काम रास आ रहा था, वह अलग-अलग पार्टियों के साथ कभी कहीं जाते, कभी कहीं, ज़मीनें दिखाने, अलग-अलग तरह की, उनमें कुछ विवादित प्रॉपर्टीज़ भी थीं, ऐसी बिल्डिंगें भी, जिनके सौदे तय होते-होते रह जाते। सारी बातें तय हो जातीं, दो पार्टियों के बीच सौदा तय कराया जाता, टोकन साइन हो जाता, इधर-उधर के ढेरों काग़ज़ात जमा कर लिए जाते, नक्शों पर घंटों सिर खपाया जाता और पता चलता कि ‘पावर ऑफ़ अटॉर्नी’ नहीं मिल पाई, या फलाँ पार्टी मिल नहीं रही, या कोई और मसअला। हमने अपनी छोटी-सी उम्र में स्क्वायर फ़ीट, अलग-अलग तरह के काग़ज़ात और पावर ऑफ़ अटॉर्नी की अहमियत को समझ लिया था।

फिर वालिद साहब दिल्ली जाने लगे, किसी काम के सिलसिले में, सुना था वहाँ कहीं उन्हें कोई ज़मीन मिली है, जो बहुत क़ीमती है, उसी के सौदे का मामला था, इससे पहले उनके किसी काम में उन्हें बड़ा फ़ायदा हुआ था। हमारे घर में नोटों की बौछार होने लगी, मैं ख़ुद देखता था कि बड़ी-बड़ी थैलियों में हमारे चाचा, रुपये भर कर लाया करते थे, गड्डियाँ निकाली जातीं, गिनी जाती थीं।

इतने हज़ार, इतने लाख, लेकिन हम तो खेल में मगन रहते, हमें ख़ुशी थी कि हम उस छोटे से पिंजरे से निकलकर इस मैदान जैसे घर में आ गए थे। पहले ही वालिद के बंबई जाने की ख़ुशी क्या कम होती थी, जो अब वह दिल्ली भी जाने लगे। दिल बल्लियों उछला करता, अब तो सारा इलाक़ा अपना था, शोर मचाते थे, छतों पर पतंगें उड़ाते, क्रिकेट खेलते, इधर से उधर घूमा-फिरा करते, लट्टू घुमाते, खो-खो खेला करते, भाइयों के यहाँ शतरंज, कैरम और लूडो के दौर चलते। शाम को घर पहुँचकर थक कर सो जाते। अब उन झगड़ों की भी गुंजाइश कम रह गई थी, जिनकी वजह से हम सहम जाया करते थे, कई बार वालिद ने पीटा भी था। वह मारते कम और डराते ज़्यादा थे।

लेकिन एक दफ़ा किसी बात पर छोटे भाई तालीफ़ को ऐसा करारा हाथ मारा कि उसके सर पर दरवाज़े का कुंडा लग गया, ख़ून बहने लगा। इतनी-सी उम्र में इतना ख़ून देखना अच्छा नहीं होता, मगर हमने देखा था, अपने भाई का ख़ून भी और अपनी अम्मी का भी, फिर धीरे-धीरे वह ख़ून जमने लगा। वालिद दिल्ली में ही रहने लगे, आते भी थे तो इतने कम वक़्त के लिए कि रात को हमारे सोने के बाद आते और सुबह आँख खुलने से पहले कोई फ़्लाइट पकड़कर दिल्ली रवाना हो जाते। मुझे तो ज़ाती तौर पर इस बात से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। मेरे लिए वालिद का घर पर न होना एक वरदान की तरह था। मैं ख़ुशी महसूस करता था, आज़ादी महसूस करता था। क़िले में जाया करता, दोस्तों के साथ समुद्र किनारे, कभी सुबह-सुबह, कभी शाम को।

रुपये-पैसे की रेल-पेल लग गई थी, हमने इस बड़े और ख़ाली फ़्लैट को, इस मैदान जैसे घर को, इसकी गुलाबी दीवारों को अपना मान लिया था, बहुत अपना। एक ऐसा दोस्त, एक ऐसा यार, जिससे बेवफ़ाई का ध्यान भी मुमकिन न था, जिससे बिछड़ने की कल्पना भी मुश्किल थी। लेकिन एक रोज़ वालिद साहब ऐसे आए कि उनके हाथ में सिर्फ़ एक छोटा-सा हैंडबैग था, चमड़े का। उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था, शक्ल से ही मालूम होता था कि वह कोई बड़ी भारी क़ीमत चुकाकर आ रहे हैं, उन तमाम दिनों की, जब उनके बच्चों ने आराम के दिन काटे हैं, उनका सामान भी दिल्ली में हमारे एक रिश्तेदार के यहाँ रखा हुआ था। वह बंबई आए और बीमार हो गए। वजह यह थी कि उन्हें एक काम में लाखों का नुक़सान हुआ था, किसी ने उन्हें एक ऐसी ज़मीन बेच दी थी, जिसका सौदा होना क़रीब-क़रीब नामुमकिन था। लालच कहिए या बेहतर भविष्य की एक अंधी उम्मीद, जिसकी बुनियाद पर उन्होंने ज़मीन तो ख़रीद ली थी, मगर इस दफ़ा यह ज़मीन पैरों के नीचे ठहरने वाली नहीं थी, बल्कि पैरों तले से निकलने वाली थी। और साथ में ले जाने वाली थी सर पर से वह आसमान, जिसे हमने अब अपनी ऊँचाइयों की आख़िरी हद मान लिया था।

वालिद साहब की बीमारी के एक लंबे सिलसिले के बाद पता चला कि ख़्वाबों ने जो लंबी छलांगें भरी थीं, वह दरअस्ल एक छलावा थीं। अब घर का सामान बिकने लगा, कर्ज़ बढ़ने लगा और नौबत यहाँ तक आई कि वह फ़्लैट जिसमें हम रहते थे, उसे अलविदा कहना पड़ा। वालिद साहब के उस बिल्डर से भी रिश्ते ख़राब हो गए थे, उसका लाखों रुपया ज़मीन के चक्करों में ख़ुद भी डूब चुका था। यहीं से मेरी ज़िंदगी ने अपने वालिद के बारे में गहरी दिलचस्पी के मेरे सिलसिले को जन्म दिया।

हमारा ख़ानदान मौलवियों का ख़ानदान था, वालिद को भी दादा मौलवी ही बनाना चाहते थे, मगर उन्होंने ढाई पारे से ज़्यादा क़ुरआन को हिफ़्ज़ (याद) न किया, छोटी उम्र में घर छोड़ा और बहुत जल्द अपने लिए दिल्ली में एक अलग और सुकून भरी ज़िंदगी बनाई। वह ज़िंदगी और उस दौर की ख़ूबसूरती, मानो उन पर लिखे हुए तक़दीर के रचनाकार का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा थी। शाहजहाँपुर में ग़ुंडों से लेकर पुलिसवाले तक उन्हें सैयद साहब के नाम से जानते थे, ख़ानदानी इज़्ज़त उन्हें विरासत की थाली में सजी हुई मिली थी, मगर दिल्ली में उन्होंने नाम, इज़्ज़त और रुपया अपने दम पर कमाया था। अपने क़लम के ज़ोर पर। उन्होंने रेडियो में फ़ीचर लिखे, आज़ाद तौर पर इब्ने सफ़ी के उपन्यासों की नक़ली कॉपियाँ भी तैयार कीं, जेम्स हेडले चेज़ और अगाथा क्रिस्टी के चटपटे और जासूसी उपन्यासों को दूसरों के नाम से उर्दू के रूप में ढाला। अख़बारों में लेख लिखे। राजनेताओं से रिश्ते बनाए, शायरी में नाम पैदा किया। उस वक़्त उनके दोस्तों के दायरे में मनचंदा बानी, अमीक़ हनफ़ी, महमूद हाशमी जैसे लोग शामिल थे। कॉफ़ी शॉप पर जाना, शाम तक अदबी और सियासी बातें करना, ठाठ से रहना, इश्क़ लड़ाना और दूसरों के काम आना।

अब वह कई बार कहते हैं कि उस ज़माने में ओखला में ही, जहाँ अब हम किराये के मकानों को बदलते फिरते हैं, उन्हें बड़े सस्ते दामों पर प्लॉट मिल रहे थे, मगर उन्होंने सोचा कि यहाँ तो मच्छर भिनभिनाते हैं, टख़नों तक पानी रहता है, ऐसी जगह पर ज़मीन ले भी ली तो किस फ़ायदे की। क़दमों को देखती हुई आँखों ने, तेज़ी से आगे बढ़ते हुए भविष्य को नहीं देखा। मगर वह एक शायर की दुनिया थी, एक लापरवाह, सिगरेट पीने वाले शायर की दिल्ली, जिसने उन्हें फ़सीह अकमल बनाया था। उन्होंने जवानी की दहलीज़ पर ठीक से क़दम रखने से पहले ही अपने दो दोस्तों, मंसूर और नवाब को खोया था। एक का परिवार पाकिस्तान चला गया था, दूसरे को बाप ने चापलूसी और पैसे के दम पर सरकारी नौकरी दिलवा दी थी। नौकरी भी ऐसी, जिसमें रिश्वत का सुख, पीछे देखने की फ़ुर्सत ही नहीं देता था। इसलिए उन्होंने भी दिल्ली में एक अलग-थलग दुनिया बनाई।

बक़ाई साहब के यहाँ रहे, उनकी बेटी से इश्क़ किया और इश्क़ को निभाने का इरादा भी किया और कोशिश भी। लेकिन बात बनी नहीं। पढ़ाई तो तब ही छूट गई थी, जब अलीगढ़ में वालिद ने पैसे भेजने बंद कर दिए थे और हाई स्कूल भी पास न हो पाया था। दिल्ली में उनकी ज़िंदगी जम जाती, अगर शाहजहाँपुर से एक दिन उनके एक दोस्त शमीम का तार न आया होता। उस तार में लिखा था कि तुम्हारी बहन किसी के साथ रुख़सत हो गई है, माँ-बाप परेशान हैं, जल्दी आओ। सब छोड़-छाड़कर वह शाहजहाँपुर वापस गए। उनसे छोटे भाई सलमान तो पहले ही बंबई जा चुके थे। घर से भागने या दूर होने वाली सिर्फ़ उनकी बहन ही नहीं थीं, दरअस्ल उनके घर का माहौल ही ऐसा था।

हमारे दादा आमतौर पर तक़रीरों के सिलसिले में हिंदुस्तान के दौरे पर रहा करते थे, उन्हें ‘मुफ़क्किर-ए-मिल्त’ (कौम का विचारक) कहा जाता था, इसलिए वह परिवार के विचारक न बन सके और घर धीरे-धीरे बिखरने लगा। मुसलमानों की पिछड़ी राजनीतिक सोच का असर था, जिसकी वजह से हमारे दादा ने दोनों बुआ को स्कूल में दाख़िल ही न कराया। नतीजा बेहद ख़राब हुआ। पढ़ाई-लिखाई से दूर, बिना किसी काम की और झुर्रियों से झाँकती हुई ज़िंदगियाँ, अटकी हुई साँसों की तरह अचानक ही बाँध तोड़कर बाहर की तरफ़ लपकती हैं। पहले वालिद ने घर छोड़ा था, उसके बाद छोटे भाइयों ने, और अब बहनें भी जा चुकी थीं। दादी बहनों के पास जाना चाहती थीं, जो कि हमारे चाचा सलमान रिज़वी के पास बंबई पहुँच गई थीं, वहाँ से उनके लौटने की कोई उम्मीद न थी, इसलिए यही तय हुआ कि घर बेचकर बंबई में ही नया आशियाना बनाया जाए।

यह दोतरफ़ा हिजरत (पलायन) थी, हमारे वालिद को अगर एक तरफ़ इस चक्कर में अपनी जड़ों को जलाना पड़ा तो वहीं दूसरी तरफ़ दिल्ली में एक रोशन भविष्य की उम्मीद को भी अलविदा कहना पड़ा। वह बंबई गए और वहाँ ‘ब्लिट्ज़’ अख़बार में नौकरी कर ली। मगर कुछ वक़्त बाद अख़बार बंद हो गया।

वालिद साहब की जब शादी हुई तो उनकी उम्र अड़तीस (38) साल थी। लेकिन जिस लड़की से शादी हुई थी, उसकी उम्र बीस (20) साल थी और उसने तलाक़ के एक बड़े भारी और ज़ख़्मी कर देने वाले अतीत को उतारकर दोबारा अपने बाप की इज़्ज़त और नाम को बनाए रखने के लिए शादी का जोड़ा पहन लिया था। हमारे माता-पिता की आपस में बहुत वक़्त तक बनी नहीं। वालिद की ब्लिट्ज़ की नौकरी छूटी तो उन्होंने फिर कोई नौकरी ही नहीं की। बच्चे पैदा हुए तो लगातार होते गए, चार बच्चे। मुझे याद नहीं कि मेरे वालिद कभी स्कूल-वस्कुल की वजह से बहुत परेशान हुए हों, हमारी अम्मी की कोशिशों से पहले एक अँग्रेज़ी मीडियम में और उसके बाद उर्दू स्कूल में हमें दाख़ला मिल गया। हमने वहाँ पढ़ा, कई साल, मगर कभी भी वालिद स्कूल नहीं गए, प्रिंसिपल से मिलकर हमारे रिज़ल्ट के बारे में नहीं पूछा, एडमिशन में होने वाली परेशानियों को दूर करने की कोशिश नहीं की। जब तक हालात ठीक चले, फ़ीस जाती रही, जब बिगड़े तो तीस-चालीस रुपये महीने की फ़ीस देने के लिए हमें परेशान होना पड़ता था। ऐसे में पढ़ाई छूट गई और हम सूखी हुई तीलियों की तरह बिखरने लगे। हालात जब अधमरी हालत में फेफड़े पिचकाकर औंधे मुँह लेटे, तो अम्मी ने सारी ज़िम्मेदारी सँभाल ली। अपने दम पर भाग-दौड़ कर इम्तिहान दिलवाए, कर्ज़दारों को सँभाला, घर चलाया और ऐसे ही हालात में एक पाँचवें बच्चे को जन्म भी दिया।

हमारे वालिद ने ज़िंदगी में इश्क़ और शादी दोनों एक ही दफ़ा ज़रूर किए थे, मगर औरतें उनकी ज़िंदगी का एक लाज़मी हिस्सा रही थीं। उनके बहुत-सी औरतों के साथ रिश्ते रहे और अपने बदन की ताक़त पूरी तरह कम होने तक उन्होंने अलग-अलग औरतों से अफ़ेयर भी किए। इनमें आज कुछ महिलाएँ बहुत मशहूर भी हैं और कुछ गुमनाम भी। औरतें तो ठीक, लेकिन दिल्ली में मैंने अपने वालिद के पास कई लड़कियों को भी मौजूद देखा। अब जब वह हमारी अम्मी से मोहब्बत का दम भरते हैं और उनकी जुदाई का एक पल भी बर्दाश्त नहीं करते, तो मुझे बॉलीवुड के उस आदर्श हीरो का ध्यान आता है, जो तमाम तरह की आवारागर्दी के बाद अपनी बीवी के पास लौट आता है, उससे माफ़ी माँगता है और उसकी शादीशुदा ज़िंदगी एक हल्के तीखे और मीठे ढोकले की तरह फिर से हरी-भरी हो जाती है।

मुझे उनसे बहुत-सी शिकायतें ज़रूर हैं और हर औलाद को होती हैं, लेकिन इन शिकायतों के बावजूद सोचता हूँ कि उन्होंने दुनिया को जितना कुछ दिया, उसके बदले में आधा भी हासिल न कर सके। उनके पास ऐसे कई लोग आए, मर्द भी और औरतें भी, जिन्होंने मुशायरों में नाम चमकाने के लिए उनसे ग़ज़लें लिखवाईं, उनकी चापलूसी की। उनके हाथ-पैर दबाए, घर के काम किए। उनकी झूठी तारीफ़ें कीं और अपनी किताबों के संग्रह तैयार करवाकर चले गए। उन्होंने अगर कभी किसी से इस काम के लिए एक नया पैसा नहीं माँगा, तो किसी ने उन्हें इसके बदले में कुछ देना ज़रूरी भी नहीं समझा। बल्कि जो लौट गए वह वापस तब भी न आए, जब ज़िंदगी का दामन हाथ से छूटने लगा, बीमारी ने घेरा और बदन की तमाम ताक़तों ने साथ छोड़ दिया, हड्डियाँ और आँखें एक साथ बाहर की तरफ़ निकल आईं।

यह ज़रूर था कि मेरे वालिद को हर इंसान की फ़ितरत का अंदाज़ा था। वह समझते थे कि कौन आदमी क्या काम निकलवाने के लिए क्या चाल बुनकर आया है, मगर अजीब तरह का लिहाज़ था कि उन्होंने आगे बढ़कर ख़ुद लोगों के चेहरों पर पड़ा हुआ दिखावे का नक़ाब नहीं उठाया। इतनी ग़ज़लें बाँटीं, नज़्में बाँटीं। दरियादिली की इंतिहा यह है कि अपने तअल्लुक़ात को सँभालकर नहीं रखा, दोनों हाथों से उन ज़रियों को गँवाते रहे, जहाँ से ख़ुद के लिए बड़े रास्ते बनाए जा सकते थे। आज भी बहुत से लोग हैं, जो हिंदुस्तान और विदेश में गला खंखारकर ग़ज़लें पढ़ रहे हैं, उनके नाम मेरी याददाश्त की मुट्ठी में क़ैद हैं, मैंने उन्हें अपने बाप के आगे गिड़गिड़ाते देखा है। लेकिन नाम के सिक्के एक बार चमक जाएँ तो और दस तरह के रिश्ते बन जाते हैं, लोगों को धक्के देकर आगे बढ़ने का हुनर ख़ूब आता है। जोड़-तोड़ की तरक़ीबें याद होती हैं और शहरों में रहने का तो ख़ैर तरीक़ा ही यही है। लेकिन मेरे वालिद के अंदर से वह शाहजहाँपुर कभी निकला ही नहीं, जिसके आस-पास बहती दो नदियाँ, गर्रा और खन्नौत अब भी उनके लहू में बह रही हैं।

उन्होंने रिश्ते-नाते, घर और एक शानदार मुस्तक़बिल को दाँव पर लगाकर अपने ख़ानदान को बचाया था, अपनी अम्मी का कहा माना था। शायद यही वजह है कि आज भी दिल में उनकी इस ख़ता से मुझे बहुत लगाव है। उन्होंने मौलवियों वाले दिखावे से सजी हुई थाली को लात मारकर क़लम से रोज़ी पैदा करने की कोशिश की थी, शायद इसीलिए वह मेरी ज़िंदगी में हमेशा एक आदर्श बने रहेंगे। मैं उनसे लड़ता-झड़ता हूँ, उन्हें आज के ज़माने में एक अंधविश्वासी, आगे की न सोचने वाला और हल्का-फुल्का अय्याश इंसान होने का ताना भी देता हूँ, मगर जानता हूँ कि वह मेरे लिए इल्म के दरिया की एक ऐसी लहर भी हैं, जिनसे मैंने बहुत कुछ सीखा है, जिनकी इकट्ठा की हुई किताबों को कलेजे से लगाया है, जिनकी शायराना फ़ितरत से अपने पसंदीदा रंग चुनकर, सीने में भर लिए हैं, जिनकी दिन-ब-दिन पिघलती हुई आँखों से निकलने वाली रोशनी को मैं दिमाग़ में उतार रहा हूँ, और जो कुछ भी मैं सोच सकता हूँ, समझ सकता हूँ, बग़ावत की हिम्मत कर सकता हूँ, उसके लिए उनका इस हद तक शुक्रगुज़ार हूँ कि उन्होंने ऐसे हालात पैदा किए, जिनकी वजह से मेरा ज़ेहन लाखों-करोड़ों की तरह एक जंग लगे पुर्ज़े में बदलने से बच गया।

लेकिन जो बात मुझे उनकी सबसे ज़्यादा पसंद है, वह मेरी ख़ुदगर्ज़ी के अलावा और कुछ नहीं, मैं जब पढ़ते-पढ़ते कहीं अचानक अटक जाता हूँ और डिक्शनरी देखने का दिल नहीं चाहता, तो ज़ोर से आवाज़ लगाकर पूछता हूँ, “अब्बा! इस लफ़्ज़ का तलफ़्फ़ुज़ क्या होगा।” और फिर मैं टूटे हुए हर्फ़ उनके आगे डाल देता हूँ, जिनसे वह मुझे एक ज़िंदा, चलता-फिरता और जगमगाता हुआ लफ़्ज़ जोड़कर वापस कर देते हैं।

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