‘धूप कोठरी के आइने में खड़ी’ : शमशेर की कविता पढ़ते हुए एक स्मृति-चित्र
अनस ख़ान
13 जुलाई 2026
बचपन से बड़े होने के स्कूली क्रम में कुछ नौ-दस साल की उम्र में बाजी (दादी) के घर में ऐसे अनुभवों से भरी गर्मियों की न जाने कितनी दुपहरें आती थीं। पुराना घर था। आगे के हिस्से में चार कमरे और एक बरामदे की पक्की बनावट थी। बाहरी बरामदे से घर में दाख़िल होते हुए एक छोटा बरोठा था। बरोठे के कोने में मिट्टी की एक चक्की लगी हुई थी, जिस पर कभी-कभी दालें दरी जाती थीं। आँगन के पार पिछले हिस्से में तीन कोठरियाँ बनी हुई थीं। मिट्टी की कोठरियाँ। मिट्टी से बनी होने और उनमें अँधेरे की रिहाइश होने की वजह से ही शायद उन्हें कोठरियाँ कहा जाता था। उनकी एक विशेषता ज़रूर कोठरी-संबंधी परिभाषा में नहीं अँट पाती थी, वह यह थी कि ये तीनों कोठरियाँ आकार में अच्छी-ख़ासी बड़ी थीं। वहाँ कोठरी का उच्चारण ऐसे नहीं होता था जैसे मानक (कथित) खड़ी बोली में होता है या जैसे आप अभी पढ़ते हुए कर रहे हैं या मैं लिखते हुए पढ़ रहा हूँ। वहाँ ‘को’ की ध्वनि को जल्दी से अदा करते हुए ‘ठ’ पर हलंत के लट्ठ-मार प्रयोग से उत्पादित संयुक्त प्रभाव से उसका उच्चारण होता था—‘कोठ्-री।’
तो ये तीन कोठरियाँ थीं। अगल-बग़ल की दो कोठरियों में सामान भरा हुआ था। दाईं कोठरी अपेक्षाकृत थोड़ी छोटी थी और उसमें खेती के साज़-ओ-सामान मसलन कुदालें, फावड़े, हँसिए, दरातियाँ और सरकारी ट्यूबवेल का सामान रखा रहता था। बाईं कोठरी बाजी का भानुमती का पिटारा थी। उसमें अनगिन गंधों का घुल-मिल बसेरा था। एक बार वहाँ रखे बड़े बक्से से ख़ुर्शीद अंकल की शादी के वक़्त की पंद्रह साल पुरानी चीनी, जो कि पीतल की एक सुराही में रखी हुई छूट गई थी, बरामद हुई थी। इसके अलावा वहाँ बहुत-सी फुटकल चीज़ों के साथ लकड़ी की एक बड़ी भारी अलमारी थी। उसमें कपड़ों से लेकर दालों, मसालों से भरे मर्तबान, ईद में सेंवई परोसने के डिस्पोज़ेबल कटोरी-चम्मच-गिलास, ख़ाली बोरियों और एक बहुत पुरानी तलवार, जिसके इस्तेमाल के बारे में यह पारिवारिक किवदंती चली आती थी कि पुरखों में से कोई ख़ाँ साहब किसी ज़माने में उस तलवार से जंगल में शेर का शिकार करने जाया करते थे और शेर का माँस अपने साहबज़ादों को लाकर खिलाते थे ताकि वे बड़े होकर जलाली, बेख़ौफ़ और जंडैल बन सकें—रखी रहती थी। बाजी के यह क़िस्सा सुनाने के क्रम में जैसे ही तलवार वाले ख़ाँ साहब और शेर के यकायक सामने आने का रोमांच कहानी में आता था, मेरे दिल में इस तेग़-ए-सितम से पैदा हुआ ख़ौफ़ तुरत बता देता था कि यह क़िस्सा सच्चा नहीं है।
बीच की कोठरी बाजी का रहवास थी। उस कोठरी को याद करूँ तो वहाँ आमने-सामने दो मसहरियाँ पड़ी हुई थीं। नीचे दरवाज़े के बाईं तरफ़ नमाज़ पढ़ने की एक चौकी थी। चौकी के ऊपर पीतल के एक डिब्बे में पानी में भीगते पान पड़े रहते थे। बग़ल में एक बड़ा बक्सा था जिस पर पीले रंग की पल्ली ओढ़ाई रहती थी और उसके ऊपर छोटी आँटी के दहेज़ की डाइनिंग टेबल औंधे मुँह पड़ी गर्द फाँक रही होती थी। बक्से के बाईं तरफ़ चौकी के ऊपर दीवार में छोटी टीवी लगी हुई थी। शक्तिमान का दौर तब तक ख़त्म हुआ ही था।
बाजी को मैंने कभी पक्के कमरों में लेटते-बैठते नहीं देखा था। दुपहर तक वह आँगन में छाए छप्पर में पड़े पलंग पर रहती थीं। नीचे पीतल का एक पानदान और पानी पीने का लोटा एक कटोरे से ढँका हुआ रखा रहता था। ऐसी दुपहरों में गाँव-मुहल्ले की औरतों की टोली अपने दैनिक कार्यों से निवृत्त होकर बाजी के पास घूमने और बातें करने आ धमकती थी। बाजी की उम्र उस वक़्त कम-ओ-बेश अस्सी हो रही होती थी और उनके पास कहने-सुनने को एक व्यापक अनुभव-संसार कुलाँचे मार रहा होता था। कुछ उम्र का तक़ाज़ा था और कुछ बाहरी दुनिया में औरतों का प्रवेश-निषेध भी, कि घूमने आईं औरतें बाजी के लिए रेडियो बन जाया करती थीं। आज सोचता हूँ तो जानता हूँ कि दैनंदिन-कार्यों के उबाऊ और एकरसीय चरित्र की यांत्रिकता से कुछ देर ही सही, मुक्ति पाने के लिए वे औरतें आस-पास की घटनाओं का ब्यौरेवार रूप में कितना जीवंत और ‘विविड डिस्क्रिप्शन’ देकर उन पलों में अपने ख़ाली जीवन को भरती थीं। बाजी द्वारा किसी ख़ास बात की टोह लेने पर अगर कोई औरत अपनी अनभिज्ञता प्रकट करती थी तो खट् से उनका जवाब आता था, “पता तो तुम्हें तीनो तिरलोक हैं।” इन घूमने आने वाली सारी औरतों में सायदा फुफ्फी बहुत देर तक बैठने के लिए कुख्यात थीं। इतनी कि उनसे जाने के लिए कहना पड़ता था। बाजी कहतीं कि सायदा आती है तो खटिया ही पकड़ लेती है।
उसी छप्पर के नीचे पलंग पर वह दुपहर का खाना खाती थीं। मैं जब कभी उस वक़्त इत्तिफ़ाक़न वहाँ मौजूद होता, उनके लिए नल से कटोरे में पानी ले आता था। मैंने उन्हें कभी खाने के बाद की दुआ पढ़ते हुए नहीं सुना। पता नहीं उन्हें वह मालूम भी थी या नहीं—यह मैं उनसे कभी पूछ नहीं सका। दुआ की जगह वह खाना खाकर कटोरे से पानी पीते हुए—“या अल्लाह अन्न-धन सबका दिहेउ” का उच्चारण करती थीं। उनकी देखा-देखी मैंने भी खाने की दुआ के बाद इसका नियमित उच्चारण करना अपनी आदत में शुमार कर लिया। बहुत वर्षों बाद यूनिवर्सिटी के शुरुआती दिनों में वह अरबी दुआ मुझसे छूट गई जिसमें ख़ुदा के खिलाने-पिलाने और मुसलमान बनाने का शुक्रिया अदा किया जाता था। ‘मिनल मुस्लिमीन’ पे फ़ख़्र करना उन्हीं दिनों से छूट गया था।
दुपहर के खाने के बाद वह कोठरी में आ जातीं। कोठरी की सामने वाली दीवार पर एक आईना टँगा रहता था। ऊपर किसी शहतीर के चौखटे में छुटी ख़ाली जगह से धूप दुपहर के एक ख़ास वक़्त में आईने पर पड़ती। ‘धूप कोठरी के आइने में खड़ी हँस रही है।’
आगे इस कविता में इस तरह के कुछ और प्रकृति-संबंधी दृश्य-बिंब आते हैं जो ऊपर से एक-दूसरे से बिल्कुल असंबद्ध प्रतीत होते हुए भी कविता के समवेत प्रभाव में एक-दूसरे से संबद्ध दिखते हैं।
यह गर्मियों के दिन होते थे। कोठरी के बाहर मई-जून का तपतपाता आँगन फैला रहता था। आसमान से गिरते पारदर्शी धूप के पर्दों वाला दुपहर का साँय-साँय करता फिर भी मौन, आँगन। झिलमिलाहट की मुस्कुराहट से मुस्कुराते धूप के पर्दे। बीच में हवा का कोई गर्म झोंका मुस्कुराहट के इस जादू को थोड़ी देर के लिए ग़ायब कर देता था।
‘मोम-सा पीला/ बहुत कोमल नभ’—इस पंक्ति को पढ़ते हुए इस कविता का अवसाद मुझे घेरने लगता है। यह उपर्युक्त बिंबों जैसा सहज और शामक बिंब नहीं है। ‘मोम-सा पीला’ में मोम की गर्म टिघलाहट और उससे उद्भूत तरल कोमलता की उलझन भरी नाज़ुक-बयानी है।
आगे आँगन में फूल के कुछ पौधे लगे हुए हैं। वे सदाबहार के कुछ गुलाबी, कुछ सफ़ेद रंगों वाले फूल हैं। पास में एक छुईमुई और मेहंदी का एक पौधा है। उन गर्मियों की दुपहरों में हम भाई-बहन घंटों बैठे छुईमुई के पौधों को छू-छूकर छुईमुई करते रहते थे। किन्हीं-किन्हीं दिनों में जब कोई त्योहार आने को होता या गाँव में कोई शादी होती, तब एक दिन पहले उन्हीं दुपहरों में हम मेहंदी की पत्तियाँ तोड़कर और उन्हें सिलबट्टे पर पीसकर अपनी हथेलियाँ और अँगुलियों के पोढ़ रंग लेते। बाद में मदरसे जाने पर ख़ासी परेशानी का सामना करना पड़ता था। मौलाना बहन को तो छोड़ देता पर मुझ पर तुल पड़ता—“लड़के होकर मेहंदी लगाते हो!” कहकर उसी दस्त-ए-हिनाई पर दो-दो छड़ियों की छाप बरसा देता। तब लगता कि लियाक़त अली ख़ान ठीक ही कहते हैं कि एक बार दीन के पीछे पड़ लो अगर मन न माने, पर मुल्ला-मौलवियों के पीछे मत पड़ो।
इन्हीं पौधों के पास गुलमोहर का एक बड़ा पेड़ हुआ करता था। गर्मियों में वह गहरे रंग के लाल फूलों से लद जाता था। हवा उसकी पत्तियों के बीच से सर-सर सरगोशी करती गुज़रती थी। उस पेड़ पर मधुमक्खियों, तितलियों, चिड़ियों और गिलहरियों के जत्थे के जत्थे आते थे। एक मधुमक्खी हिलाकर फूल को, बहुत नन्हे फूल को, उड़ जाती है। ध्यान देने की बात है कि कवि यहाँ तितली की जगह मधुमक्खी का प्रयोग करता है। तितली—जो कि रंगीनी, कोमलता, जीवंतता और फिर भी क्षणभंगुरता (झलक के अस्तित्व की) के प्रतीक की तरह कविताओं में प्रयुक्त होती रही है। ‘हिलाकर फूल को/ बहुत नन्हा फूल’—यह ऐसा बिंब है जिसमें एक ही क्षण में हृदय के अंदर के भाव एक कोमल सांगीतिक अन्विति में जुड़ते हैं और फिर बिखर जाते हैं—‘उड़ गई।’ बहुत नन्हे फूल को हिलाकर मधुमक्खी के उड़ने के क्षणिक दृश्य से लैंडस्केप में जो हलचल और ख़ालीपन पैदा होता है, वहाँ कविता में बचपन की वह याद रिस आती है जो अब तक भाषा की पकड़ से छूट-छूट, बिंबों की असंबद्ध संबद्धता से गुज़रते हुए कहीं बाहर थी—‘आज बचपन का/ उदास माँ का मुख/ याद आता है।’ इस पंक्ति के आते ही यकायक कविता में चित्रित सभी पूर्व-बिंब माँ के उदास मुख की अर्थ-छाया से लैस हो जाते हैं और पूरी कविता माँ से जुड़ी हुई किसी दुखदाई स्मृति की कविता बन जाती है।
मई-जून की कोई दुपहर है। मैं अपने घर से छोटी आँटी के लिए खाने का कुछ सामान लेकर गया हूँ। मौन आँगन में चिलचिलाती धूप फैली है। बरोठे में पड़ा पर्दा सरका कर वहीं से आँटी को आवाज़ लगाता हूँ। वह कोठरी में हैं। कोठरी हमेशा की तरह अप्रत्याशित रूप से ठंडी है। मैं सामने की मसहरी पर जाकर बैठ जाता हूँ। आँटी सलमा आग़ा के बारे में बात कर रही हैं। ऊपर शहतीर के चौखटे से आईने पर धूप पड़ने का वक़्त क़रीब आ रहा है। बाहर कोई कौवा नल पर रखी पानी भरी कटोरी हिलाकर उड़ जाता है। मैं उठकर आँगन की तरफ़ देखता हूँ। बाजी बरोठे से कौवे को हाँकने के लिए उठती हैं और मेरे देखते-देखते ग़ायब हो जाती हैं।
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट