हाथ को ध्यान से देखो तो तुम्हें दिखेगा कि वह आदमी की सच्ची तस्वीर है, वह मानव-प्रगति की कहानी है, संसार की शक्ति और निर्बलता का माप है।
चेखव की किसी कहानी या बाल्ज़ाक के उपन्यास में ऐसे रहस्य मिले जो, जहाँ तक उन्हें पता था, किसी जासूसी थ्रिलर में भी मौजूद नहीं थे।
संसार की सच्ची कहानी को भीतर तैयार हुए एकालाप में कहो।
कहानी और कविता के बीच एक महत्त्वपूर्ण भेद यह है कि कहानी प्रायः घटनाओं का क्रमबद्ध विवरण भर होती है, जहाँ समय, स्थान, परिस्थितियाँ और कार्य-कारण संबंध ही मुख्य सूत्र बने रहते हैं। इसके विपरीत, कविता मानवीय प्रकृति के शाश्वत स्वभाव के अनुरूप ऐसी घटनाओं की सृष्टि करती है, जैसी वे सृजनकर्ता की चेतना में विद्यमान होती हैं और जो समग्र मानव-मन का प्रतिबिंब बन जाती हैं।
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अगर आप लंबे समय तक यात्रा करते हैं, तो हर कहानी उपन्यास बन जाती है।
लोग प्यार में पड़ जाते हैं अपने दुखों के, पीछे नहीं छोड़ पाते—बिल्कुल अपनी सुनाई कहानियों की तरह… हम ख़ुद अपने बंदी हैं।
किसी बेहूदा जासूसी कहानी में कही गई बात किसी बेहूदा दार्शनिक द्वारा कही जाने वाली बात से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण और स्पष्ट होती है।
अगर आपमें कोई कहानी है, तब उसे सामने आना चाहिए।
जीवन के उत्पीड़न और विनाश के चलते ऐसा होता है—हमारे दोस्त अपनी कहानियों को पूरा नहीं कर पाते।
बच्चों की जिस कहानी का आनंद केवल बच्चे ही उठा सकते हैं, वह बच्चों की अच्छी कहानी बिल्कुल भी नहीं है।
मुझे बस अपने कथानकों के विफल होने का डर है।
समकालीन भारतीय यथार्थ, जिसे मैं सभ्यता (सिविलिजेशन) कहता हूँ—से शुरू होकर साहित्य का संस्कृति तक पहुँचना—कथा-साहित्य को पर्याप्तता प्रदान करता है।
एक स्त्री के रूप में मेरी पूरी कहानी : सीढ़ियों से नीचे उतरना और हर क़दम पर पीछे हटना है।
किसी ने भी उसकी अपनी कहानी के सिवाय कोई और कहानी नहीं सुनाई है।
जादू अनुभव से अधिक पुराना है। कहानी अभिलेख से बहुत पहले की है।
जिस वासना की धरती पर कथा-लोक की जड़ है, वह धर्म की भी धरा है। कथा में भाव ही नहीं, कर्म भी होता है। बिना इतिवृत्त, चरित, या दूसरे में बिना कर्म के कथा नहीं हो सकती।
जिस समाज में प्रत्येक व्यक्ति का महत्त्व होता है, उस समाज में कथा-साहित्य फलता-फूलता है।
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तुम्हारी जेब में एक पैसा है, वह कहाँ से और कैसे आया है, वह अपने से पूछो। उस कहानी से बहुत सीखोगे।
आज के भावुकतापूर्ण कथाकारों ने न जाने किससे सीखकर बार-बार कहा है कि दुःख मनुष्य को माँजता है! बात कुल इतनी नहीं है, सच तो यह है कि दुःख मनुष्य को पहले फींचता है, फिर फींचकर निचोड़ता है, फिर निचोड़कर उसके चेहरे को घुग्घू-जैसा बनाकर, उस पर दो-चार काली-सफ़ेद लकीरें खींच देता है। फिर उसे सड़क पर लंबे-लंबे डगों से टहलने ले लिए छोड़ देता है।
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भाषा कथा-साहित्य का महत्त्वपूर्ण तत्त्व है।
सभी जानते हैं कि हमारे कवि और कहानीकार वास्तव में दार्शनिक हैं और कविता या कथा-साहित्य तो वे सिर्फ़ यूँ ही लिखते हैं।
कल्पना सत्य की बड़ी बहन है। स्पष्टतः जब तक किसी ने कहानी नहीं कही थी तब तक संसार में कोई नहीं जानता था कि सत्य क्या है। अतः यह सबसे प्राचीन कला है, यह इतिहास की जननी है।
कथाकार यदि सचमुच जीवन का गहरा और व्यापक ज्ञान रखता है, तो वह प्रसंग-स्थिति में बद्ध मनुष्य की संवेदनात्मक प्रतिक्रियाओं को ही महत्त्व नहीं देगा वरन् उस स्थिति से संबंध रखने वाले जो वस्तु-सत्य हैं, उनको बनाने वाले तत्त्वों पर अर्थात् व्यक्ति-स्वभाव की विशेषताओं, वास्तविकता की पेचीदगियों और अब तक चलते आए इन सबके विकास-क्रम पर, इन सब पर अवश्य ही ध्यान देकर, इस प्रसंग-स्थिति के वस्तु-सत्य के सारे ताने-बाने (कलात्मक प्रभावशाली रूप से, भोंड़े ढंग से नहीं) प्रस्तुत करेगा।
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कोई भी कहानी कभी छोटी नहीं होती। मानवीय अनुभव के ताने-बाने में, हर तंतु सम्पूर्णता का भार रखता है।
मेरी कहानियाँ उन महिलाओं के बारे में हैं जिनसे धर्म, समाज और राजनीति—बिना किसी सवाल के आज्ञाकारिता की माँग करते हैं और ऐसा करते हुए उन पर अमानवीय क्रूरता करते हैं, बल्कि उन्हें केवल अधीनस्थ बना देते हैं।
महिलाओं का दर्द, पीड़ा और असहाय जीवन—मेरे भीतर एक गहरी भावनात्मक प्रतिक्रिया पैदा करता है। मैं व्यापक शोध नहीं करती हूँ ; मेरा दिल ही मेरा अध्ययन क्षेत्र है।
जब हम कहानी शुरू करते हैं कायान्तरण हो चुका होता है।
सारी बातें जो घटित होती हैं; अगर उन्हें नाम दिया जा सके, तो कहानियों की कोई ज़रूरत नहीं रहेगी।
श्रम या थकान के पश्चात मनुष्य कथाओं में रमना चाहता है।
कथा-साहित्य जीवन को चेतना देता है।
जो समाज भाषा के सुख को समझता है, उस समाज में कथा-साहित्य फूलता-फलता है।
कथालेखन में मैं जीवन के कुछ मूलभूत नैतिक मूल्यों से प्रतिबद्ध होते हुए भी यथार्थ के प्रति बहुत आकृष्ट हूँ।
पढ़कर आनंद के अतिरेक से आँखें यदि गीली न हो जाएँ तो वह कहानी कैसी?
'कहानी का नेपथ्य' दैनिक जीवन के नेपथ्य जैसा नहीं है। दैनिक जीवन के नेपथ्य में ख़ुराफ़ात होती है, मंत्रणा होती है।
कहानियाँ—भोजन की तरह—अगर जल्दी में पकाई जाएँ तो अपना स्वाद खो देती हैं।
प्रेमचंद का समूचा साहित्य भारतीय किसान की महागाथा है, राष्ट्रीय पूँजीवाद की गौरवगाथा नहीं है।
कहानी का आकर्षण बुनियादी स्वभाव का अंग है और इस अंग का विकास बचपन में अपने आप शुरू हो जाता है।
कहानी का स्थान महज़ साहित्य की दृष्टि से केंद्रीय नहीं है, मनुष्य की सभ्यता में भी केंद्रीय है। सभ्यता की चर्चा करनी हो तो हमें एक कहानी के रूप में करनी होगी।
कहानी पढ़ते हुए हम उसी में बस जाते हैं। पुस्तक का आवरण, चार दीवारों और एक छत जैसा लगने लगता है। आगे जो कुछ होने वाला है; वह कहानी की चार दीवारों के भीतर ही होगा और यह इसलिए संभव है, क्योंकि कहानी का स्वर हरेक चीज़ पर नियंत्रण कर लेता है।
कई बार ऐसा होता है कि हम पढ़ी हुई रचना को दुबारा पढ़ते हैं तो उतनी तेज़ रफ़्तार से नहीं पढ़ते जिस तरह पहली बार पढ़ी थी। हमारा दिमाग़ इस बार उन छोटी-छोटी चीज़ों का पूरा मज़ा लेना चाहता है जो पहली बार में हमें इस कारण नहीं दिखी थीं कि हम जल्दी से जल्दी कहानी के अंत तक पहुँचकर जान लेना चाहते थे कि आख़िर में होता क्या है।
हम जैसे ही कहते हैं कि 'पहले' ऐसा था बाद में ऐसा हुआ तो हम एक कहानी कह रहे होते हैं। कहानी का मुख्य भाव ही चीज़ों, स्मृतियों या अनुभवों को समय के क्रम से रखना है।
पंचतंत्र में शामिल ज़्यादातर लोककथाओं की संरचना में ज़िंदगी के अलावा संसार को पलट देने की तरक़ीबें निबद्ध हैं। विधा के रूप में लोककथा इतनी संक्षिप्त और कसी हुई होती हैं कि संसार को पलटने वाले चरित्र की ज़िंदगी पर रोशनी डालने का समय नहीं देती।
कहानी हो या विज्ञान, स्कूलों और अन्य संस्थानों में हर पढ़ी हुई चीज़ पर चर्चा करना एक ज़रूरी औपचारिकता बन गई है। संभवतः ऐसी चर्चा से कुछ भाषागत लक्ष्य हासिल होते हैं, पर वे अन्य अवसरों व तरीक़ों से प्राप्त किए जा सकते हैं।
यदि हम किसी बड़े कहानीकार से सीखना चाहते हैं कि कहानी कैसे लिखी जाती है, तो भी हम धीरे-धीरे पढ़ेंगे, उसकी कला के औज़ारों पर ध्यान देते हुए आगे बढ़ेंगे।
कहानी के नेपथ्य में कुकर्मी भी धैर्यपूर्वक इस बात की प्रतीक्षा करता है कि उसके द्वारा सताया गया नायक अपने प्रतिकार का प्रबंधन कर सके।
कुछ ज़बरदस्त सूक्तियाँ जिनमें कहानी के सूत्र तक पाए जा सकते हैं—आदमी की त्रिशंकु स्थिति की ओर इशारा करती हैं।
अराजक देश में व्यवहार करने वालों के मनोरथ पूरे नहीं होते। कथाप्रिय लोग कथा कहने वालों के साथ प्रेम नहीं रखते।
जहाँ कहानी का अंत होता है, जीवन का अंत वहीं नहीं होता। जीवन विस्तृत-व्यापक होता है।
कभी-कभी मैं कोई कहानी किसी स्मृति, किसी क़िस्से से शुरू करती हूँ; लेकिन वे बीच में खो जाते हैं और आमतौर पर कहानी ख़त्म होने पर पहचाने भी नहीं जाते हैं।
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