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कहानी : गश्ती

चाईं उर्फ निशू भाई के पास कमाल का गुण था—वह सड़क पर चलती, खड़ी, इठलाती, इतराती, मुस्काती लड़की को देखकर बता देता था, ‘यह गश्ती है, चल भाई लपक लिया जाए...’

अपने जादुई अनुमान पर वह कभी फ़ेल नहीं हुआ। अक्सर शाम को मूड बनने पर बाधवानी के सिल्वरओक बार से निकलकर शीबा होते हुए वह गेलार्ड मोड़ पर खड़ा हो जाता। ‘भरी हुई’ सिगरेट सुलगाता। चेलों को चैलेंज करता हुआ बताता, “अबे देख वह पोनी टेल वाली... वो परकटी... वो लाल स्कर्ट वाली... शर्तिया गश्ती है। दो मिनट में चल देगी...” और लगभग यही होता, उसकी काली वैगनार में गश्ती उचककर सवार हो जाती। निशू भाई का एक नंबर और बढ़ जाता। उसका दावा था कि गश्तियों के मामले में वह हॉफ़ सेंचुरी मार चुका है। शायद ही कोई नस्ल छोड़ी हो। उसकी क़िस्मत पर किसे ना रश्क होता। बस, उसे एक ही मलाल रहता, उसके हाथ अभी तक कोई मद्रासन गश्ती नहीं आई। जावेद कालिया उर्फ़ सबलू अक्सर कहता था—“भूतनी के, मद्रासन गंगा-जमुना के चकलेघर में मिलेगी। एक से एक मलंग, लाल मिर्ची खाने वाली गरम मद्रासनें...।” पर उसकी हिम्मत नहीं हुई। एक तो वह जानमार बीमारी से डरता था। दूसरे, उसने सुन रखा था, गंगा-जमुना की मरदख़ोर मल्लू और मद्रासन लूट लेती हैं। एकदम नंगाझोरी करके लौटाती हैं कस्टमर को।

निशू को सचमुच उस दिन बड़ी ख़ुशी हुई थी, जब पता चला कि यूनिवर्सिटी चुनाव के दौरान युवा वानरसेना ने गंगा-जमुना में घुसकर तगड़ा कांड कर दिया और रंडियों में हाहाकार मच गया। कस्टमर लदर-फदर भागे। थोड़ी-सी हिंदी-मराठी सीखी चुकी नेपालन चीखे चली जा रही थीं। ग़नीमत थी मौक़े पर आकर पुलिस ने उन्हें बचा लिया। वानरसेना को एक पार्टी के आला नेता नरेंद्र रमेश सुर्वे ने बचा लिया।

बहरहाल आज बल्ले भंडारी का मन हुआ कि वह भी निशू भाई का हुनर आजमाएगा। पर अचूक गुरुमंत्र लेना भी तो ज़रूरी था। उसने पूछा, “भाई कैसे हंड्रेड परसेंट गेस कर लेते हो... बड़ा रिस्की है ना भाई। ग़लत नंबर डायल हो गया तो चप्पल पड़ने की नौबत भी आ सकती है।”

मंगलवारी परवरिश के मारे निशू ने महान् गश्ती ज्ञान प्रगट करते हुए कहा, “इस आर्ट में चूतियापना नहीं चलता रे भाऊ... पूरा स्टडी की है अपन ने आस-पास। देख गश्ती की पहचान होती है—चंचला पोट्टी के हाथ में एक चमकीला पर्स होगा, होठों पर लाली, स्कर्ट, मिडी जो भी होगा तीखा रंग वाला, लाल, मैरून, हरा वैसा ही टॉप-कुर्ता वगैरह… वह किसी खंबे, पेड़, गेट के पास टिकी दिख जाएगी। चाल लहरी, चेहरे पर पुताई। अगर सिगरेट हाथ में हो तो ज़ियादा कन्फ़र्म करने की ज़रूरत नहीं। ‘रंगीला रे’ स्टाइल में सीधे बोलने का—‘रज्जो चलती क्या?’ वह फट से चल देगी... अगर पहले से बुक है तो बोल देगी—‘फुट्ट ले ल**, ये सेंडिल देखी क्या’?”

“भाई नार्मल पोट्टी निकली तो! आजकल तो कॉलेज, स्कूल की भी सिगरेट फूँकती दिख जाती हैं।”—भंडारी बोला।

“अबे ग**, वो अकेले नहीं पीती, ब्वॉयफ़्रेंड साथ में होएँगा ना।” निशू ने आत्मविश्वास से कहा।

“पाइंट नोटेड भाई... अपन जीरो हैं इस मामले। बोले तो फट्टू बटे लट्टू।”

भंडारी ने गहरी साँस लेकर मोर्चा सँभाल लिया। दो सिगरेट पीकर ताज़ादम हुआ। आज पहला शिकार था ना, इसलिए निशू पीछे, दूर से गाइड की भूमिका निभा रहा था। साथ में अकील नाईक और सुयश तलपड़े। तय हुआ था कि भंडारी छोकरी यानी गश्ती को रिक्शा से लेकर गांधी चौराहे की तरफ़ जाएगा। वहीं से निशू सबको अपनी वैगनार में ले लेगा और बीयर के साथ हाईवे की तरफ़ ले जाकर ऐश होगी। हाईवे में रिस्क हुआ तो रमेश पतरे के फ़्लैट में चला जाएगा। रमेश ने ऐसे अवसरों के लिए एक चाभी निशू भाई को दे रखी थी।

वह ज़्यादातर आमदार निवास में अपने चाचा हर्षुल भाई जांत्रे के पास रहता था। उसकी शर्त होती थी, निशू जब भी गश्ती पटाकर लाएगा, उसे भी बुला लेगा। इसे वह सर्विस टैक्स कहता था।

आज वाक़ई सोमेश उर्फ़ बल्ले भंडारी का इम्तिहान था। शाम के संधिकाल की रोशनी में वह चौथी कैवेंडर सुलगाकर गश्ती के इंतज़ार में लग गया। थिएटर से भीड़ निकलने का भी यह वक़्त था। इस भीड़ को उसकी निगाह भेदती जा रही थी। गश्ती जैसी शक्ल तो कहीं थी ही नहीं। बला की ख़ूबसूरत, ख़ुशबूदार लड़कियाँ थीं, या गजरे से सजी एकदम घरेलू औरतें। उसे लगा कि गश्ती बाईचांस ही मिलती होगी। मन किया कि एक बार निशू भाई को बोलकर कह दे कि ‘गुरु तू अपना मंतर दिखा। मुझ अनाड़ी से ना होगा यह।’

उसने पीछे गुरु की तरफ़ मुड़कर बस देखा ही था कि निशू ने इशारा कर दिया, “अबे और आगे जा... देख एक रंगबिरंगी पोट्टी निकल गई। ओ भाई कपड़ों से नहीं, पीछे से भी पहचान हो जाती है। आशा पारेख वाले हिचकोले तो देख... आह!”

भंडारी आगे बढ़ चला। अचानक उसकी आँखें चमक गईं। जैसा गश्ती-सम्मत नख-शिख-परिधान वर्णन उसने सुन रखा था, वैसा ही तो सामने था। पर सब पीछे से ही देख पा रहे थे। उस छबीली ने मुड़कर भी नहीं देखा। जैसे किसी लक्ष्य की ओर वह बढ़ रही थी। जैसे उसे मालूम था कि बावला शिकार छुछुवाते हुए पीछे लग चुका है। वह चाहती तो वहीं रुक सकती थी, पर किसी बाँके दिलफुक्के को तड़पाने-तरसाने का भी तो अपना मज़ा है, यह वह अपने धंधे से सीख चुकी थी।

एकबारगी तो मचलते भंडारी का मन हुआ कि वह ‘ऐ-ऐ’ करके, आवाज़ देकर रोक ले, पर हिम्मत नहीं हुई। जवानी के नशे में खोया वह तो बस चाल का अनुगामी था। आज ना जाने क्यों मौसम भी नशीला था, हल्की फुहार पड़ते ही हवा भी मदभरी हो गई थी। आधी बीयर का नशा तो इस मौसम ने ही कर डाला था। उस मौसम में निशू भाई के गश्ती-सूत्र से मेल खाती मतवाली चाल तो उसका जियरा धकधकाए जा रही थी। मन ही मन उसने कहा, ‘पलट तो जालिम...!’

इतने में रंगीन फ़व्वारे वाला चौराहा आ गया। वह समझ गया, गश्ती यहाँ विराम लेने वाली है। चौराहा इसलिए भी बदनाम था कि शाम के धुँधलके में भीड़ उमड़ते ही, धंधेवाली लड़कियाँ-औरतें रेलिंग का एक कोनहटा थाम लेती थीं। ठुल्ले डंडा पटककर इधर से उधर भगाते तो कोई ना कोई बोल पड़ती, हे भाई , आधार कार्ड दिखाऊँ क्या। सिकुड़ी वर्दी वाले ठुल्ले भी मज़ा लेते, गौरमेंट से बोल ना, धंधे का लाइसेंस बना दे, थाईलैंड की तरह। उनकी चुहुल ऐसे ही चलती थी। ठुल्ले भी पैसे के यार थे। थोड़ा बहुत झटक ही ले जाते। कभी-कभी अनाड़ी कस्टमर को सही जगह पहुँचा भी देते, इस हिदायत के साथ, ‘दूर निकल ले… कहीं झाड़ की तरफ़।’

शिकारियों की मदद के बहाने रोज़ पचास-सौ ठुल्लों के भी बन जाते। वैसे फ़व्वारे चौराहे के पास अक्सर रेड भी पड़ती, मगर तभी, जब कोई नया कप्तान आता। कुछ दिन वीरानी छाई रहती। फिर अफ़सर भी समझ जाता, यह रीत बदलने वाली नहीं। थाने भी यहीं से रौनक होते हैं।

भंडारी अब भी उत्साही आखेटक की तरह उसे पछियाए था। दो बार उसने मुड़कर देखा, जिससे भंडारी को तसल्ली भी हो गई कि सूरत भली है। पर यह भी लगा कि शक्ल पहचानी-सी क्यों लग रही है! गोंदिया से लौटते वक़्त एक बीयर बार में ऐसी ही लड़की उसने देखी थी। उसने टिप में बीस रुपए देकर उससे पूछ लिया था, दूसरी सर्विस भी है क्या...

वह ऐसे ही लटक झटककर बोली थी, “ना बाबा...बस बार सर्विस है।” उसके ईमान पर वह डोल गया था और सलाह देने लगा, “शादी-वादी करके घर बसा ले...।” इस पर वह हँसकर बोली, “सर मैरीड हूँ, एक बच्चा है। आदमी से सेप्रेशन हो गया है, इसलिए बार में नौकरी कर रही हूँ।” भंडारी का सारा झाग उतर गया और ‘सॉरी-सॉरी’ करने लगा।

भंडारी उस मैरीड को याद करके आज की शाम इस लड़की की ओर देख रहा था। ग़ज़ब, अब तो वह चमकीले दाँत दिखाकर मुस्कराई थी। आगे के दो नुकीले दाँत उसे दिल में तीरे-नीमकश की तरह लगे। उसने आँखों पर आई घुँघराली लट को पीछे करके एक झटका भी दिया था। वह शायर होता तो कुछ लिख सकता था। हाँ, वह गाना ज़रूर याद आ गया—ना झटको ज़ुल्फ़ से पानी कि मोती टूट जाएँगे...। पता नहीं क्यों उसे दूर से ही नारियल के तेल जैसी ख़ुशबू आई।

निशू भाई के फ़ॉर्मूले उसे कारगर लगे। कम से कम यह डर ख़त्म हो गया कि चप्पल-सैंडिल पड़ सकती हैं। दो-तीन गश्ती भी मोर्चे पर थीं। बीच में एक-दो साँवले, पसीनेदार सेंट से गंधाते खुसरे भी टकराते हुए निकले थे। इसका मतलब, उन्हें पसंद करने वाला भी एक वर्ग होगा। एक ने भंडारी के बग़ल से गुज़रकर जुमला कसा भी, ‘ओय मेरे छुआरे जैसे जैकी श्राफ़, गोल्डमैरी छोड़ गोलकुंडा भी ट्राई कर लिया कर... कब्बी... गारेंटी नो रिस्क... क़सम छोटी लाइन की...।’ बेचारा भंडारी एकदम घबरा गया, हकलाने लगा, “क्या मतलब, मैं तो ऐसे ही खड़ा हूँ...।” उसकी घबराहट देख गश्ती को जैसे हँसी आ गई। उसने आँख से इशारा भी किया, क़रीब आने का। वह घबराहट को गुटकते हुए उसके पास चला गया और एक बार में ही बोल पड़ा, “इधर से फौरन चलने को है...।” गश्ती ने पलटकर कहा, “अकेला तो दिखता है... सच्ची में टोटल कितने हैं।”

वह जैसे याद करते हुए बोला, “तीन बंदे मेरे को लेकर। आगे मिलेंगे... गांधी चौराहे पर। अपन रिक्शा करके चलते हैं। सब जेंटल लोग हैं, डौंट वरी।”

गश्ती हँसी, “आदमी और जेंटल... क्यों मज़ाक़ करने के लिए कोई और नहीं मिला। पर भाई रहम किए रहना...”

गश्ती ने आगे कहा, “रोकड़े की बात कर लो, हुए बाद में सब चूतिए झाड़झूड़ के किचकिच करते हैं।”

भंडारी ने अपनी जेब की औक़ात देखकर कहा, “तीनों मिलकर तीन सौ देंगे, ख़ुश हुए तो अलग से।”

(तब सौ रुपए की भी क़ीमत थी। दस रुपए लीटर पेट्रोल था और बातें काले वाले फ़ोन पर ही होती थीं)

गश्ती की तरह रिक्शा भी पहले से तैयार था। यह उनका रोज़ का काम था। उसने गद्दी पोंछकर दोनों को बैठाने के साथ ऊपर से ढक भी दिया, क्योंकि यह उसकी सेवा का हिस्सा था। पाँच रुपए किराया उसने पहले ही बोल दिया।

सवारियों की ओर बिना देखे संतभाव से वह रिक्शा चलाता जा रहा था। सवारियों की चहकती, गंदी-फंदी बातों पर भी उसने कान नहीं लगाए। यही तो उसकी पेशेगत ईमानदारी थी। प्राथमिक मरदाना पहल के तहत गश्ती को चूमते हुए भंडारी बावलों की तरह उसाँसें भरता अंड-बंड बोले जा रहा था। सरे-राह गुज़रते लोगों का ज़रा-सा भी भय-लिहाज़ ना रहा। लेकिन होशमंद गश्ती ने उसे दो बार झटककर इशारा किया, “इधर मेनरोड पे चेकिंग चलता रहता है भाई। ठिकाने पर चलकर कर लेना, कहीं भाग नहीं रही हूँ। छि, कितना थूक लगा दिया रे...” भंडारी ने फट से अपने होंठ पर मुट्ठी फेरकर झेंप मिटाई और शराफ़त से उसका हाथ लेकर खेलने लगा। गश्ती के लिए इत्ता टाइम-पास तो बनता ही था।

रिक्शा चलता जा रहा था और हाँफते हुए पूछता जा रहा था, “किधर रोकना है भइया जी।”

भंडारी तो निशू भाई की वैगनार का इंतज़ार कर रहा था। वह डर भी रहा था कि कहीं रिक्शेवाला लड़ने ना लगे, क्योंकि वह जगह तो निकल गई थी, जहाँ उतरना था।

चौराहे से आगे उसने एक किनारे रिक्शा रुकवा लिया। गश्ती सब्रवान थी, बस इतना ही बोली, “ओ भाई घर भी लौटना है। देर होने पर गली के कुत्ते और वर्दी वाले मामू दोनों पीछे लग जाते हैं। टाइम भी ख़राब है इधर। सुबै अख़बार देखे क्या... वर्धा रोड पर कल एक को नंगा छोड़ गए। पुलिस वाले कपड़े ला के दिए।”

उसकी परेशानी में शामिल होने की बजाय भंडारी के चेहरे पर हल्की हँसी आई, “डौंट फ़िकर मेरी जान, अपने कमरे ले चलूँगा... घर में बुड्ढी से बोल दूँगा, गर्लफ़्रेंड को लेकर आया हूँ। देखना, ख़ुश होकर खाना भी खिलाएगी, बिस्तर भी देगी, अपन मौज करते ना... होल नाइट।”

“ओय होय गर्लफ़्रेंड, एक घंटे में बना डाली... शाम खोटी कर देगा क्या।” आदतन उसने फिर लट झटकी।

भय जाने और थोड़ा एतबार क़ायम होते ही अब दोनों में दोस्ताना बातें होने लगीं। उसने पूछ भी लिया, “छोकरी नाम बताएगी क्या...?”

उसने लंबा ‘हूँ...’ करके बोला, “बबीता...।”

“ओह, बबीता रानी...”
“नहीं बबीता, ओन्ली।”
“इधर, किधर से आती है?”
“सदर के आगे सब्ज़ी मंडी के आगे से... मंगलवारी समझ ले... सारे लुक्के उधर ही हैं ना...।”
“ओह राइट, उधर का कारपोरेटर राजा भाई केसवानी मेरा दोस्त है।” 
“ओ हाँ, वो नंबर वन हरामी... अलका थिएटर में नंगे नाच कराने में पकड़ा गया था।”
“अरे भक्क, कैबरे बोल। नंगा नाच क्या होता है!”
“लाइसेंस नहीं मिलता इधर, पर उसके बाद भी...”

भंडारी ने उसका मुँह बंद करते हुए कहा, “छोड़ ना, वो पुरानी बातें हैं। अभी तो भुसावल के पास इंजीनियरिंग कॉलेज चला रहा है, बढ़िया। डोनेशन की कमाई है। महाराष्ट्र में रैंकिंग है उसकी।”

पर गश्ती तो पीछे ही पड़ी थी, “मेरे एक बड़े भाई के साथ टॉकीज़ के बाहर पहले टिकट ब्लैक करता था, फिर बंगलूर से कैबरे डांसर लाकर सप्लाई करने लगा। अभी तो बड़ा सेठ है... मेरा ब्लैकिया भाई उसके साथ सट लिया है।”

भंडारी ऊबने लगा था। लड़की कुछ ज़्यादा ही खुल रही थी। वह झंट होने लगा। सारी गर्मी, सारा नशा उड़ने लगा... कमर ढीली पड़ गई। फिर चौंककर बोला, “यार बबीता रानी इतनी बात के बाद तो इरादा पोस्टफ़ोन करने का मन करने लगा, तेरी क़सम। कोई नहीं आ रहा, कहीं फँस गए साले...। आज लगन सही नहीं है।”

गश्ती भी उदास होने लगी थी, प्यारी सी, महकदार उबासी लेकर बोली, “मुझे जाने दे... घर से बहाना करके आना पड़ता है।”

भंडारी ने कहा, “बस पाँच मिनट डियर... सॉरी डियर बोल दिया।”

“चलता है, बस एक का रेट दे दे और वहीं छोड़ दे।”

भंडारी का बचाखुचा नशा भी उतर चुका था। एक सिगरेट सुलगाई और सभ्यता के साथ उसे भी ऑफ़र की। वह नुकीले दाँत से निचले होंठ का कोना काटती हुई बोली, “इसी से दो पफ़ मार लूँगी... ज़्यादा हैबिट नहीं है।”

उसकी इस अदा पर भंडारी को प्यार आ गया। मन किया सिर पर हाथ फेरकर चूम ले। ना जाने क्यों लग रहा था कि गश्ती से पुरानी पहचान है! पर यह रोशनी वाली जगह थी और फुलौरी जैसी लाल नाक वाला टीकाधारी पानवाला दोनों को बड़ी तन्मयता से देखने में लगा था।

भंडारी ने सहज होने के लिए उससे दो सिगरेट और ख़रीद लीं और पूछा, “दुकान कितने बजे बंद होती है दादा।” पानवाले की नज़रें ताड़ चुकी थीं कि अनाड़ी लौंडे ने गश्ती पकड़ तो ली है, पर निपटाने का ठिकाना नहीं मिल रहा है।

उसने भी पूछ लिया, “बड़ी देर से किसी का इंतज़ार हो रहा है।”

भंडारी ने बचते हुए कहा—“हाँ भाई, दोस्त आ रहे हैं, लग रहा है गाड़ी ख़राब हो गई है।”

पानवाले ने ‘हूँ’ कहकर वार्तालाप को स्थगित कर दिया। भंडारी गश्ती को लेकर थोड़ा आगे बढ़ गया और जेब से सौ का नोट भी निकाल लिया। इसे लड़की को देने का मन बना लिया था उसने। 
तय कर लिया था कि गश्ती को सुरक्षित रास्ते में छोड़कर वह घर निकल जाएगा। भले ही उसका काम नहीं बना, पर लड़की से बातचीत करके भी उसे काफ़ी तसल्ली हो गई थी। एक गुदाज अपनापन-सा जाग उठा था।

उसका नरम हाथ पकड़े-पकड़े ही भंडारी ने गहरी साँस लेकर कहा, “तो चलते हैं वापस।” अब दोनों रिक्शा रोकने के लिए हाथ हिलाने लगे। दस मिनट इसी में चले गए। गश्ती थकी धुन में बोली, “पैदल ही चलते हैं उधर तक... ऑटो मिल जाएगा।” भंडारी ने सहमति में सिर हिलाया। अब दोनों हमराही बन गए थे। एक भरोसा भी अंकुवा उठा था।
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पर पता नहीं होता कि संयोग कौन-सी करवट लेने वाला है, या कहाँ लाकर पटकने वाला है! कई बार लगता है, दुनिया संयोग और हादसों का लासानी रंगमंच है। अविश्वसनीय किंतु सत्य जैसे हालात, क़िस्से।

एक अस्थाई आत्मीयता के साथ वे दोनों आगे बढ़े ही थे कि पीछे से तेज़ रोशनी फेंकती गाड़ी उनके पीछे आ लगी। उसने हॉर्न भी नहीं दिया। पहले भंडारी ने मुड़कर देखा, “अबे यार कहाँ रह गए थे! लौंडिया तो जा रही थी, फिर से रिक्वेस्ट करते हैं। बेचारी ठंडी पड़ गई है।”

निशू भाई ने कहा, “मेरी जान, जाने वाले को कौन रोक पाया है। पन तूने तो तेरी क़सम हंड्रेड में हंड्रेंड ला दिए, अब हमें ट्रेनिंग देना घंटू साईं...। भैंचो, क्या लड़की मस्त लग रही है...पीछे से।” सचमुच निशू गश्ती का चेहरा अब भी नहीं देख पाया था।

दो-तीन आवाज़ें सुनकर अपने में खो चुकी, अलकसाई गश्ती ने अब जाकर चेहरा मोड़ा था। उसके होठों की सारी लाली भंडारी पहले ही सुटुक चुका था। क़सम से तमाम फ़िल्मी संयोग भी हार जाएँ इस दृश्य से...

निशू भाई पर जैसे पेशेवर जल्लाद के कोड़े बरस पड़े थे। पहली बार उसका चेहरा इतना सुर्ख और लतख़ोर लग रहा था। धरती फटे और वह समा जाए, ऐसा सिर्फ़ वह सोच पा रहा था।

बेचारे आज के रंगरूट आखेटक भंडारी की तो हालत और भी ख़राब। उसने निशू भाई के कान में मुँह लगाकर पूछा, “कुछ ग़लत हुआ क्या भाई! गश्ती जमी नहीं क्या... पहचान की है क्या...?”

एक साथ इतने सवाल से भड़भड़ाए निशू भाई ने माथा पीटते हुए कहा, “अबे चोप्प गा** यह गश्ती-वश्ती नहीं मेरी कजिन है... बहन। पता नहीं इस लाइन पर कैसे...।”

“ओ तेरी की...!” भंडारी के तो होश उड़ गए। समझ ही नहीं पा रहा था कि इधर देखें या उधर, कि चमकते आसमाँ की ओर। इतना ही बोला, “हाय री हमारी झंडूबाम किस्मत... चल भाई मंज़िल तक छोड़ आते हैं आपकी बबीता बहना को।”

घोर सन्नाटे में समाया निशू भाई तो इस हद तक सोचने लगा था कि कभी ना कभी करम फल सामने आ ही जाते हैं। हालाँकि करम फल पर कभी उसने भरोसा नहीं किया था। सारे गश्ती ज्ञान की बधिया बैठ गई।

आज किसी गश्ती का अन्वेषी बनने लायक़ नहीं छोड़ा इस लड़की ने।

वक़्त-वक़्त की बात है।

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