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कहानी : प्रोजेक्ट एक्रिडोथेरेस : डिफ़ॉल्ट सेटिंग हैपीनेस

इतनी रात को क्या कर रहे हो?

इंतिज़ार...

दोस्त का...

दोस्त? हाँ, दोस्त ही तो...

ट्रेन का इंतिज़ार करते, लास्ट मिनिट ब्लिंकइट ऑर्डर का इंतिज़ार करते, सेलरी का इंतिज़ार करते, किसी विशेष मैसेज या कॉल का इंतिज़ार करते जैसे हम टहलते हैं, गुनगुनाते हैं, झुँझलाते हैं, अटकलें लगाते हैं, सिगरेट सुलगाते हैं... सपने बुनते हैं... वैसे ही सब दिनचर्या मृत्यु के इंतिज़ार में रचा दिल-बहलाव ही तो है। मैं प्लेटफ़ॉर्म पर खड़ा हूँ। आख़िरी मेट्रो आने ही वाली है, फिर भी मैंने सिगरेट सुलगा ली है। कोई हादसा नहीं होता, हम ख़ुद ही अपनी क़ब्र खोदते हैं। पहला कश, इंजन की आवाज़ और धुएँ के भँवर में घिरा मैं पटरी की ओर खींचा जा रहा हूँ। रेल, मैं, रेल की पटरियाँ तेज़ी से घूमते हुए भँवर की नाभि में धँसने वाले हैं। सपनों में हम मज़बूत होने का छलावा नहीं करते। मैं पसीना-पसीना हो उठा हूँ। हमारे अवशेष हवा के सुपुर्द कर भँवर ग़ायब हो गया। मेरे उड़ते हाथ को कोई कोमलता छू रही है। मैंने हौले से आँखें खोलीं। मेरे हाथ-पैर सलामत हैं, कहीं कोई दर्द नहीं, घाव नहीं, बस शरीर को लकवा मार गया है।

खिड़की में बैठे बिल्ला की चमकती आँखें मुझ पर टिकी हैं। मैंने कुछ गहरी साँस भरी, शिराओं में बहता रक्त महसूस होने लगा। जाग इतना नहीं थकाती, जितना इन दिनों नींद जटिल हो चली है। बिल्ला ने काँच पर पंजा मार मेरा ध्यान चाहा। जानता हूँ, उसे मुझसे कोई हमदर्दी नहीं, वह बस हर रात अंडे के लालच में चला आता है। मैंने आहिस्ता से खिड़की खोली और उसकी ओर बासी ब्रेड खिसका दी। उसने हिक़ारत से मुझे देखा और ब्रेड बिना सूँघे नीचे कूद गया। बिल्ला बड़ा स्वाभिमानी और ऑर्गेनाइज्ड बिल्ला है। इसके लोग बँधे हैं। किसके हाथ से दूध लेना है, किसके कमरे से बिस्किट चुराने हैं, कौन कैट फ़ूड खिलाएगा... कोई हेरा-फेरी नहीं, सब तय है।

खिड़की से आती ठंडी हवा तन को भा रही है। शुरुआती दिनों में मैं खिड़की को हमेशा खुला ही रखता था, भले ही हवा के साथ कई मर्तबा उसकी हमजोली बारिश भी आ, उत्पात मचा जाती थी। भीगा बिस्तर अलग-सी बास देने लगता था, फिर बास तो यह पूरी इमारत ही देती है।

कुछ दिन बाद यह बिल्ला भी खिड़की से भीतर आ, पलंग पर पसरा मिला। यूँ वह दरवाज़े से भी आ सकता था, पर खिड़की से आने में उसे अधिक हीरोगीरी महसूस होती थी। उसमें वैसा ही एटीट्यूड था जैसा मेरे क़स्बे के अनपढ़ विधायक में। मैंने उसे समझाया कि वह यहाँ सो सकता है, पलंग के ऊपर लेटने पर मुझे आपत्ति नहीं है, लेकिन मौक़ा मिलते ही पलंग के नीचे जो गंद छोड़ जाता है, वह नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है, मेरे लिए नहीं, उन दीदी के लिए जो प्रतिदिन की सफ़ाई हफ़्ते में एक बार करने आती हैं। वह भली महिला लगती हैं, बस धूल-गंदगी देख चिल्लाने लगती हैं। अगर उनके आने से पहले हम अपने कमरों का झाड़ू-पोंछा कर रखें तो वह निश्चित ही हमसे मुस्कुराकर बात करेंगी। बहुत संभव है कि स्नेह भाव से हमें चाय-मैगी बना लाने का आदेश भी दे डालें।

बिल्ला ने अँगड़ाई ली और पंजे से अपना कान खुजाते हुए बोला—तुमसे भी कोई कम लोग नाराज़ नहीं हैं। मैंने अविश्वास से उसकी ओर देखा। उसने खिड़की की ओर इशारा किया। जो कचरा तुम खिड़की से नीचे फेंकते हो, वह सो रही रूहों को कष्ट देता है। मैंने घबराकर खिड़की से नीचे झाँका। हमेशा आकाश की ओर उठी मेरी नज़रों ने पहली बार जाना कि सातवीं मंज़िल की मेरी यह खिड़की क़ब्रिस्तान की ओर खुलती है। क्या इसी कारण बड़ी उदारता से मुझे खिड़की के साथ का पलंग दे दिया गया था। रूठी दीदी या रूठी रूह? एक अजीब-सा भय मेरे भीतर भर गया। दीदी की ड्यूटी तो दिन में ख़त्म हो जाती है, दिन में सब बिगाड़ सँभाला जा सकता है, रूहों से कौन लड़ाई मोल ले। मैं कूड़ा पलंग के नीचे फेंकने लगा। फिर भी कई मर्तबा रात में मुझे लगता है कि अँधेरे से उकताई हुई कोई आत्मा रोशनी के मोह में काँच से झाँक रही है।

मैं विज्ञान का छात्र हूँ, सो परलोक में वैसा पुख़्ता विश्वास नहीं रखता कि कमरा छोड़ दूँ, बस रात को खिड़की बंद रखने लगा हूँ। कभी मन में आता है कि बिल्ला से पूछूँ, क्या उसकी दूसरी दुनिया में आवाजाही है? लौकिक समस्याओं में उलझा मैं किसी अलौकिक करिश्मे के इंतिज़ार में हूँ।

हर सुबह की तरह आज भी ऑफ़िस कार छूट गई है। मुझे पहले ही ‘No show’ की चेतावनी दी जा चुकी है। मेरी कार सर्विस निरस्त होनी तय है। दो ओला ने राइड कैंसिल कर दी है। पैदल ऑफ़िस निकल रहा हूँ। टीम मैनेजर रेवंत को ठीक 10.30 पर स्प्रिंट चाहिए। पिछले साल भाग्य ने मेरा साथ दिया था और मेरी इंटर्नशिप ऐसी कंपनी में लगी थी; जहाँ खाना, नहाना, सुस्ताना सबकी व्यवस्था कंपनी में थी और बहुत ज़रूरी होने पर ही मैं अपने दबड़ेनुमा कमरे में जाता था। इसी बीच कई सीमाओं पर छिड़े युद्धों के कारण कंपनियों ने छँटनी शुरू कर दी और हममें से केवल दो इंटर्न पीपीओ (प्री प्लेसमेंट ऑफ़र) पा सके। बाकी फिर से मल्टीराउंड इंटरव्यू के अंतहीन दिखते चक्र में फँस गए। लंबी कहानी का सार यह है कि एक नई कंपनी में मैं साल भर की इंटर्नशिप पाने में सफल रहा और अब पहले से आधी तनख़्वाह पर टीम मैनेजर रेवंत की घड़ी की सुइयों संग चौबीस घंटे दौड़ रहा हूँ।

यह ऐसी बड़ी सफलता नहीं थी। इस कंपनी ने हमारे कॉलेज से मास हायरिंग की थी। साथ खड़े कर दिए जाएँ तो डेढ़ सौ इंजीनियर, डेढ़ सौ मजदूर जैसा एहसास कराएँगे। कोडिंग के अथाह सागर में वाई-फ़ाई के चप्पू के सहारे समस्याओं के छोटे-छोटे जहाज़ों को खेते डिजिटल मज़दूर! ढलते-उगते सूरज से अनजान, सीपीयू और सर्किट के ताप से अपनी आँखें और रातें जलाते हुए! हमारे ‘क़ुली शिप’ वातानुकूलित ज़रूर हैं; लेकिन हमारी सुविधा के लिए कम, मशीनों का दिमाग़ ठंडा रखने के लिए अधिक!

क़िस्मत ने इतना साथ ज़रूर दिया था कि मुझे वही शहर मिल गया। दुबारा आने पर जाना कि कुछ शहरों का परायापन कभी फीका नहीं पड़ता। यह शहर भी रेवंत जैसा ज़िद्दी है, अपनी चाबी ही नहीं सौंप रहा मुझे। मैं रोज़ नई खिड़की बना दाख़िल होता हूँ, रोज़ किसी जादू से नई दीवार खड़ी हो जाती है। भटकते-भटकते गला सूखने लगा है। अपना लो यार, कब तक बेगाना मानोगे! थक रहा हूँ। पानी का गिलास सामने दिख रहा है। हाथ बढ़ाता हूँ। मेज़ ऊपर उठने लगी है। मैं बौना साबित हो रहा हूँ। प्यास गले से रूह में उतर रही है... ऊँचा उठो... तुम हार नहीं सकते... हार नहीं सकते... मोटिवेशन का दबाव बढ़ता जा रहा है। ‘हिम्मत करो’ किनारे पर खड़े हुए चिल्लाना कितना आसान है। पगलाई लहरों के बीच नाव उतारकर बचाने आना मुश्किल। किनारे पास लाने की बौखलाहट में मैंने मेज़पोश खींच दिया है। पानी का गिलास ज़मीन पर पड़ा झनझना रहा है और मैकबुक को मैंने अंतिम क्षण पर पकड़ लिया है। दो लाख पिचासी हज़ार! मैं पसीने में भीग उठा। स्प्रिंट मीटिंग में शामिल हर नज़र मुझ पर ठहर गई।

“ठीक हो तुम?” मैनेजर रेवंत के चेहरे पर उलझन उतर आई।

मैंने हाँ में सिर हिलाया। लज्जित, सकुचाया-सा महीन सॉरी।

रेवंत आदतन लंबा बोल रहा है, जिसका सार है कि पिछले दो सालों में 20 परसेंट उपभोक्ताओं ने ऐप लॉगआउट किया है... पेसिव उपभोक्ताओं का नंबर और ज़्यादा है। क्या कारण है कि हमारे बिछाए एल्गोरिथम के जाल में न फँस चिड़िया फुर्र हो जा रही है... लॉग-आउट कर जा रही है। मैं मीटिंग से ज़ोन आउट कर छोटे भाई की फीस के बारे में सोच रहा हूँ।

“...अंशुमन, तुम्हें क्या लगता है?”

“मैं... जी... मैं ज़्यादा इस्तेमाल नहीं करता।”

“यू मोरोन... हलवाई अपनी मिठाई चखेगा नहीं तो बेहतर कैसे बनाएगा। क्यों नहीं करते इस्तेमाल?”

“मन ख़राब होता है।” मैंने झेंपते हुए कहा। इन सबके बीच मैं अक्सर देहाती साबित हो जाता हूँ।

“मन ख़राब होता है? बढ़िया... बढ़िया... मन बाँधने का ही तो खेल है। क्यों ख़राब होता है मन?”

कौन नहीं जानता वहाँ हुंकारते हुए छुट्टल साँड घूमते हैं। हर किसी को सींग मारते, पैरों तले रौंदते। कौन तन-मन घायल करे, जबकि और दूसरे रोचक ऐप उपलब्ध हैं। ऐसे ही सर्वविदित तथ्यों को जानने ये लोग घंटों मीटिंग करते हैं।

“बोलो...” रेवंत की नज़र अभी भी मुझ पर टिकी है।

“बहुत कड़वाहट है उधर।” मैंने गहरी साँस भरी।

“यस सर... सॉरी रेवंत।” इंटर्न फाल्गुनी का सेमल की रुई-सा हल्का दख़ल।

“ये देबोजीत जैसे लोग जो जुड़ गए उधर। ख़ुशियाँ साझा करने ऐप बनाया गया और ये वहाँ युद्ध के झंडे लहरा रहे हैं।” चैत्र हँस रहा है। अपनी सूखी आँखों में दो बूँद नमी की डालते देबोजीत का हाथ रुक गया, चेहरा लाल।

“आज बुलंद आवाज़ में वाहियात बातें इसीलिए कर पा रहे हो कि कभी कोई इस मान को बचाए रखने लड़ा था... सीने पर गोलियाँ खाई थीं...” उत्तेजना में सदा की तरह देबोजीत की मुट्ठी तन गई है। आई ड्रॉप की बोतल का कचूमर निकल गया होगा।

“बढ़िया... बढ़िया... I like it... जैसे हममें से कुछ लोग चैत्र और देबोजीत की लड़ाई से ऊब गए हैं, वैसे ही उधर भी...”

“नो रेवंत... बल्कि असहमतियों से ट्रैफ़िक बढ़ता है। जितनी ज़्यादा लड़ाई होती है, उतना ज़्यादा इंगेजमेंट होता है।” हमेशा की तरह इंटर्न अन्वेषा की मुखर असहमति। ज़िरह करते उसके गले की हरी नस उभर आती है और गालों पर लाली छा जाती है। इस नस को छूने की अदम्य लालसा मेरे भीतर भरती जाती है, हालाँकि उसके बिना कहे ही मैं जानता हूँ कि मेरे आस-पास होने से भी उसका ‘औरा’ डिस्टर्ब होने लगता है। बेख़याली में मैं उसे देखने लगा हूँ, तभी तो उसने इशारे से पूछा है—“क्या?” मैं झेंपकर रेवंत को सुनने लगा।

“सही है... सही है... लेकिन हम उन कुछ लोगों को भी खोना नहीं चाहते, जिन्हें यह नहीं भा रहा। राइट?”

“आपसी लड़ाई ही नहीं। मर्डर, बलात्कार... इतनी नेगेटिव ख़बरें कि डर लगने लगता है।” एसडी 2 शिवांगी ने सिहरते हुए कहा तो नज़र उधर गई। अगले माह उसकी शादी है, उसके ससुराल वालों को कामकाजी बहू नहीं चाहिए। वह नौकरी छोड़ दुबई जा रही है। वह दिन में दस बार पूछती है—“मैं उन्हें नौकरी के लिए मना सकूँगी न? प्लीज़ प्रे फ़ॉर मी।”

“...कीप द बॉल रोलिंग। मन ख़राब होता है... डर बढ़ता है... और?” रेवंत ने लहराते पंजे की दो उँगलियाँ मोड़ ली हैं।

“हमें हरेक उपभोक्ता को यह ऑप्शन देना है कि वह चाहे तो विमर्श, लड़ाई, डरावनी ख़बरें सब उसके लिए ऐप से छू मंतर हो जाए। ऐसा यूटोपिया परोसना है जो उसे दिलासा देता रहे।” एसडी 4 प्रांजल अपनी दाढ़ी सहलाते हुए बोले। उनके पास हर समस्या का हल है। वह किसी टाइम मशीन के जरिए आदिम युग से सीधे डिजिटल दुनिया में उतर आए लगते हैं—इल्म के शांत तेज़ से दमकते हुए। उनके आभामंडल के लिए यही सही शब्द हैं। उनकी बौद्धिकता असहज नहीं करती, बल्कि गोपनीय राग-सी चेतना को सहलाती है। वह ऑफ़िस में काउंसलर के नाम से प्रसिद्ध हैं। अपनी गहरी आवाज़ और दार्शनिकता के ज़रिये नैतिक-अनैतिक के भेद को ख़त्म कर देना उनके लिए कभी मुश्किल नहीं रहा। वह कहते हैं कि अंततः मंज़िल मृत्यु ही है, रास्तों के लिए तनाव नहीं लिया जाना चाहिए। वह कंपनी के अघोषित लीगल काउंसलर भी माने जाते हैं, पर अभी उनका नाम इस समाधान से जोड़ देना बेमानी है। प्रोजेक्ट पूरा होने तक क्रेडिट में नाम बदल जाते हैं। समावेशी टेक्निकल प्रांजल की जगह ‘दंभी’ नॉन-टेक्निकल रेवंत टीम लीडर बन जाता है, जो अनअप्रोचेबल टारगेट और डेडलाइन तय कर सबकी ‘वाट’ लगाए रहता है। तो अभी आवाज़ें सुनते रहें बस। क्रेडिट जो रिपोर्ट सबमिशन के समय स्क्रीन पर दिखाई देगा, वही मान्य होगा।

“बढ़िया... बढ़िया...” रेवंत का चेहरा खिल उठा, We are committed to your mental well-being... आपके मानसिक स्वास्थ्य के लिए प्रतिबद्ध! बढ़िया है... बढ़िया। रेवंत का झूमता सिर।

“अनफ़्रेंड... ब्लॉक के विकल्प तो पहले ही हैं।”

“यह अलग है। हमारी तनाव झेलने की क्षमता सदा एक-सी नहीं होती। कभी हम पूरी दुनिया से टकरा जाना चाहते हैं, कभी अपने साये से भी बचना। हम एक क्लिक में ऐप को कस्टमर की मनोस्थिति के अनुरूप बना रहे हैं।”

“मतलब ऐसा बटन जिसे दबाने से तनाव देता कंटेंट दिखे ही नहीं। देबोजीत की कविताएँ दिखें, लड़ाइयाँ नहीं।”

सम्मिलित हँसी।

“अ हैप्पी मोड ऑप्शन... जिस पर क्लिक करने से वे सभी पोस्ट जिनमें दुख, अवसाद, ग़ुस्सा, हिंसा, गालियाँ हैं... ज़िरह के लंबे थ्रेड हैं..., अंधभक्त, पप्पू, बुद्धिजीवी, मृत्यु, हत्या जैसे कीवर्ड हैं, हाइड हो जाएँ।”

“बढ़िया... बढ़िया... आई लाइक इट। अंशुमन और चैत्र इस पर काम करेंगे। प्रोजेक्ट एक्रिडोथेरेस... जो हमारे मानसिक स्वास्थ्य को नुक़सान पहुँचाते टिड्डों को चुन-चुनकर खा जाएगा।”

डायनासोर जैसे दिखने वाले भारी-भरकम एक्रिडोथेरेस शब्द से आप लोग घबराइए नहीं, हर सरल को जटिल बनाकर कहना यहाँ कूल माना जाता है। यह परिचित मैना का वैज्ञानिक नाम है। उफ़्, देखिए तो, रेवंत अभी भी बोल रहा है। मीटिंग कैसी थकाऊ होती हैं, उबाऊ भी! फिर एक नहीं होती, दिन भर होती हैं। देबोजीत के चेहरे पर तनाव दिख रहा है। वह अपने बाएँ हाथ से दाएँ हाथ की हथेली का दर्द सहला चिल्ला रहा है—

“लोग समझ नहीं रहे कि चोंच से दुख के कीड़े बीनते पंछी के पंखों से अवसाद के अनगिनत निषेचित अंडे झर रहे हैं। यूटोपिया एक ब्लैक होल है। इसके चक्र में फँसने वाले हरेक को ग्रस लेगा यह।”

वह बिना श्रोता बोल रहा है। इतनी लंबी मीटिंग के बाद लोग मरने को तैयार हैं, लेकिन सुनने को नहीं। उनका दोष नहीं! काम की चर्चा इतनी होती है कि दिन में काम कम ही हो पाता है, तिस पर कॉफ़ी-ब्रेक बहुत हैं। बिना तनख़्वाह ही रात कंपनी ने ख़रीद रखी है। ‘काम से पहले जाम’ चैत्र का दिया नारा है। सो देर शाम टीम का फ़न ज़ोन जाना तय हुआ है। पिछली कंपनी में (उफ़्, इस पिछली कंपनी की उदारता छीन जाने का दुख कालसर्प योग-सा मेरे सुख से लिपट गया है।) इन टीम आउटिंग्स के लिए बाक़ायदा बजट था। यहाँ बिल स्प्लिट होता है। मुझ जैसे ग़रीबों के मसीहा प्रांजल हैं। रेवंत और चैत्र Dance Maniac zone के चमकते काँच पर खड़े, सामने की स्क्रीन पर दिखते नीले-गुलाबी तीरों के निर्देशानुसार उछल रहे हैं। रेवंत डिफ़िकल्ट लेवल पर है और चैत्र एक्सपर्ट। चैत्र की फ़िटनेस और मोहक व्यक्तित्व से रेवंत की ईर्ष्या टीम ज़ाहिर है।

“तुम नहीं गए?”

बियर का एक छोटा घूँट भरते प्रांजल ने पूछा है।

“मैं तो बिगिनर राउंड में भी तुरंत बाहर हो जाऊँगा।” एक बड़ा घूँट भरते हुए मैंने अपनी क़ाबिलियत बताई।

सुनकर वह हल्का-सा मुस्कुराए हैं, “वे भी बाहर हो जाएँगे, लेकिन हाँफकर। यह ऐसा खेल है जहाँ जीत का बस मायाजाल है।”

“प्रयास तो करना चाहिए अंशुमन... खेलने की ख़ुशी और ऊर्जा... इसे मत भूलो।” देबोजीत ने कड़ी आपत्ति दर्ज की।

प्रांजल की मुस्कान गहरी हो उठी है। वे दोनों अब बहस में उलझेंगे। अधीर, आक्रोशित देबोजीत अपने शुष्क लंबे तर्कों के साथ और स्थिरचित्त प्रांजल अपनी मोहक सूक्तियों के साथ।

दोनों खेलों को देखता मैं सोच रहा हूँ कि काश जीवन में भी रम का गिलास हाथ में लिए दर्शक बने रहने की सहूलत होती। यह तो निरंतर ऐसे नुकीले भाले-छुरे गिराता रहता है कि बचाव के लिए बिना संगीत ही नाचना पड़ रहा है।

महफ़िल का अंत हमेशा की तरह देबोजीत के रो उठने से होगा—“आपने कभी मेरा साथ नहीं दिया है दादा, आप हमेशा... हमेशा रेवंत के साथ खड़े हुए हैं... हमेशा!”

चौंकिए मत, इन ईमानदार आक्षेपों से कुछ नहीं बदलेगा। प्रांजल अब सबकी ड्रिंक का भुगतान करेंगे। देबोजीत को ख़ुद घर छोड़ेंगे। अगले दिन ऑफ़िस में देबोजीत चार बार बोलेगा कि तमाम वैचारिक मतभेद के बावजूद वह प्रांजल की बेहद इज़्ज़त करता है, उनकी प्रतिभा का क़ायल है। पार्टियों और मज़लिसों से दूर वीकेंड पर भी काम में डूबे रहने वाले एसडी 4 हेमंत पहली बार सुनकर एक गहरी साँस भरेंगे, दूसरी बार कुछ कहते-कहते रुक जाएँगे, तीसरी बार उनकी आँखों में एक गहरी उदासी उतर आएगी, चौथी बार होने से पहले के किसी क्षण में वह इस टीम से दूर ऑफ़िस की किसी अपरिचित डेस्क पर काम में डूबे होंगे। ख़ुशियों की चाबी बनाने वालों के अवसादी अध्याय जाने कब दर्ज होंगे!

“हेमंत को नौकरी बदल लेनी चाहिए।” मैंने पास बैठे चैत्र से बुदबुदाया। मेरा मन सच में कुछ कच्चा-सा हो चला है।

“नरभक्षी समय में मेमनों की चिंता करोगे तो रोज़ उधेड़े जाओगे।” चैत्र ने एक घूँट में गिलास ख़ाली करते हुए कहा।

हमारी टीम का काम मल्टी मॉडल मशीन लर्निंग के जरिए सेंटिमेंट एनालिसिस करना है। हमारी पाइपलाइन टेक्स्चुअल डेटा, विज़ुअल कंटेंट, इमोजी और डेटा साइंस टीम से मिले अनेक पैरामीटर्स को फ़्यूज़ करके एक मॉडल ट्रेन करेगी जो ह्यूमन इमोशंस को डिटेक्ट और क्लासिफ़ाई कर सके।

मशीन भोली है, शातिर इंसान तक गच्चा खा जाते हैं—भावनाओं को समझने में। मशीन की निस्पृहता बड़ा गुण है। वह तनाव नहीं लेती। न शर्मिंदा होती है, न गर्वित। वह उस अविवेकी, आज्ञाकारी, कर्मठ व्यक्ति की तरह है जिसे बताया जाता है कि पत्रपेटी लाल रंग की है, उसकी टोपी काली है, वह थाने के ठीक सामने है, उसका मुँह खुला हुआ होगा जिसके भीतर पत्र डालना है, व्यक्ति जाता है और लाल कपड़े, काली टोपी पहने सिगरेट पीते व्यक्ति के खुले मुँह में पत्र ठूँस देता है। ऐसे ठूँसे हुए पत्रों को कम करने के लिए नए कमांड, नई कोडिंग के साथ मशीन को बार-बार ट्रेन किया जाता है।

बिल्ला अपने नियत समय पर आ गया। आज रात उबाले दोनों अंडे मैंने उसे ही दे दिए। मेरा पुराना पेट दर्द उभर आया है। कमज़ोर लिवर और कमज़ोर आर्थिक स्थिति, दोनों की दोहरी मार लगातार मुझ पर बनी है। दोस्तों की उदारता में आप मुफ़्त शराब तो पा सकते हैं, लेकिन स्वास्थ्य नहीं। फिर दोष केवल मेरी संगत का नहीं, मेरे जींस का भी है। कुछ के पास पुश्तैनी धन होता है, कुछ के पास पुश्तैनी बीमारियाँ। पिछले साल मरणासन्न हो, एक हफ़्ता कॉर्पोरेट अस्पताल में बिताने के बाद शिवाय की सलाह पर पीजी छोड़ मैं उसके और उज्ज्वल के साथ एक 3 BHK फ़्लैट में शिफ़्ट हो गया था। यहाँ हमारे कमरे निजी थे, रसोई और लिविंग रूम आदि कॉमन। एक बूढ़ा नेपाली रसोइया आकर बेमन से खाना बना जाता था, एक युवा तमिल लड़का आकर बेमन से सफ़ाई-बर्तन कर जाता। दोनों की हिंदी उनके काम से भी ख़राब थी, सो बहुत ज़रूरत पड़ने पर हम लोग इशारों में बात करने की कोशिश करते और फिर थक कर उस काम को ख़ुद ही कर लेते। बहुत ख़राब व्यवस्था में भी वह फ़्लैट पीजी से बहुत अच्छा था। मुझे पहली कंपनी में नौकरी पक्की होने का यक़ीन था। मेरे काम को सराहा गया था। नौकरी न मिलने पर जब मैं अपने शहर लौटने लगा, तब काग़ज़ों का एक बड़ा पुलिंदा मेरे सामने रख दिया गया। कुछ तनख़्वाह के और कुछ घर से मँगा एक लाख रुपये मैंने फ़्लैट के सिक्योरिटी डिपॉजिट में जमा कराए थे, जो कमरा छोड़ने पर वापस मिलने थे। जब मैंने कमरा छोड़ना चाहा तो पाया कि कमरे ने मुझे जकड़ रखा था। इस पैसे को मकानमालिक से वापस पाने हम तीनों को एक साथ कमरा छोड़ना होगा, वह भी तीन महीने का नोटिस देकर। दूसरा विकल्प था कि मैं कोई लड़का ढूँढ़ूँ जो मेरी जगह इस कमरे में रहने, किराया देने को तैयार हो और उससे ज़मानत का पैसा प्राप्त करूँ।

मैं किसी लड़के को फँसाने में जुट गया। पंद्रह दिन बाद पीजी से उकताया एक लड़का मिल भी गया, बल्कि कहना चाहिए कि लड़के को मैं मिल गया। विवान ख़ौफ़ज़दा-सा मेरे पास आया था। उसके दोनों रूममेट उसकी उपस्थिति में ही प्रणयरत हो जाते थे। वह गाँव-देहात से होता तो ऐसे दृश्यों से मरणासन्न न हो जाता। वह हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग का शिकार मासूम (भोंदु, हालाँकि यह भी सही शब्द नहीं है) लड़का था।

हेलीकॉप्टर पैरेंटिंग शब्द को मैंने यहीं आकर अन्वेषा से जाना। जब फाल्गुनी ने प्रिंटर से एक A4 शीट उसकी कमर के सामने लहराते हुए कहा था—“Bro! कुछ इंच और कम करने होंगे।” उसके चेहरे पर आषाढ़ के काले बादल उतर आए थे। फिर तुरंत ही बिजली-सी कौंधी और अपने पर्स में से लिपस्टिक निकाल कॉलर बोन के गड्ढे पर टिकाकर दिखाते हुए वह चहकी थी—लेकिन देख, मैं Fish test में पास हो गई। सबने ताली बजाई थी। अन्वेषा ने इस उपलब्धि पर रील बनाने अपना फ़ोन उठाया था और फ़ोन हिटलर मॉम शीर्षक संग जगमगाने लगा था। उसने आँखें चढ़ाते कहा था—I am ‘seriously’ fed up with their helicopter parenting!

मेरे ऊपर भी अन्वेषा का ख़याल किसी हेलीकॉप्टर-सा मँडराता रहता है। इसके बावजूद उससे हाँ की उम्मीद कम होने के कारण मैंने फाल्गुनी को कॉफ़ी के लिए पूछना बेहतर समझा। जवाब में जिस तिरस्कार से फाल्गुनी ने मुझे देखा था, मुझे पूरी स्त्री जात से नफ़रत हो चली है और नफ़रत प्रेम-सी अस्थायी हरगिज़ नहीं होती। वैसी ही, बल्कि उससे कहीं ज़्यादा नफ़रत मुझे अब विवान से है।

बहरहाल, तो मैं बता रहा था कि विवान इतना घबरा गया कि अगली सुबह ही अपना सब सामान बटोरकर ऑफ़िस आ बैठा था। मुझसे पूरी बात सुने-समझे बिना ही उसने मकान-मालिक के नंबर पर पैसा भेज दिया, सबकी तरह बिना पढ़े काग़ज़ साइन किए और उसी शाम से कमरे में मेरे साथ रहने लगा। देखा जाए तो अब कमरे का मालिक वह था और मैं उसके साथ रह रहा था।

मैं कमरे के स्वामित्व से गया, पैसे से गया और महीने के अंत में नौकरी से भी। मकान-मालिक ने कहा कि मेरे बाथरूम की दीवार में सीलन है और फ़र्श पर धब्बे, रिपेयर का ख़र्चा काटकर ही वह सिक्योरिटी वापस करेगा। इस सबमें 2 से 3 महीने लग सकते हैं।

दो महीने बाद उसी शहर में मिली नई इंटर्नशिप में पैसा बहुत कम है, लेकिन शहर इसका कोई लिहाज़ नहीं करता। एचएसआर लेआउट के नए दफ़्तर के पास एक पुरानी इमारत में चल रही बॉयज पीजी की छत पर बने दो कमरों में से एक में हम तीन लड़के रह रहे हैं। इसकी हालत हमारे सपनों से भी जर्जर है। तीन दीवारों के साथ एक-एक सँकरा पलंग है जिस पर करवट लेने पर नीचे गिर जाने का डर है। सुझाव और शिकायत-पेटी कहीं लगी होती, तो मैं पत्र लिखता—‘कृपया सुरक्षा की दृष्टि से हर पलंग में एक बेल्ट लगवा दीजिए।’ चौथी दीवार में दरवाज़ा और उससे सटी लोहे की दो जंग खाई अलमारियाँ हैं। दो पलड़े वाली अलमारी को आधा-आधा दो लड़कों को बाँटना होता है। एक पलड़े वाली अलमारी थोड़ी ऊँची है, सो उसका निचला खुला भाग तीनों इस्तेमाल कर सकते हैं। कई कमरों में इन अलमारियों को लेकर बड़ा क्लेश है, लेकिन हम तीनों ही सुविधा के लिहाज़ से अपना कुछ सामान बिस्तर पर और बहुत अधिक दरवाज़े के पीछे टाँगे रहते हैं। इतना कि यह कमरे का दरवाज़ा न हो, ऑफ़िस टाइम की किसी लोकल का दरवाज़ा लगता है। बस पैसे और मोबाइल ग़ायब नहीं होते हैं। कोई गिर जाता है तो परिवार में रोना-पीटना नहीं मचता।

अव्यवस्था का एक आत्मीय धागा हमें बाँधे रखता है। हमारी क़द-काठी एक-सी होने से कपड़ों की कुछ अदला-बदली हो जाने पर हम जान भी नहीं पाते। पलंग और अलमारियों के बाद कमरे में जैसे-तैसे प्लास्टिक के दो स्टूल अटाए गए हैं, जिन पर पानी और बियर की बोतलें और घर से जबरन लाद दिए गए अचार-मुरब्बे आराम पाते हैं। तीनों के सोने-जागने, आने-जाने के समय अलग होने से कमरे को कभी चैन नहीं मिलता। दीवार पर लगी घड़ी की तरह वह सक्रिय बना रहता है। दीवार घड़ी को यूके का समय बताने लगाया गया है, क्योंकि उत्पल की अधिकतर मीटिंग वहाँ के समयानुसार होती हैं। उत्पल अपने बिस्तर से उसे देख सके, इसके लिए उसे मेरी खिड़की के ऊपर लगाया गया था। मुझसे पहले रह रहे लड़के ने इसकी टिकटिक से तंग आ कमरा छोड़ा था। यह जान पीजी के मालिक ने घड़ी उसकी दीवार पर लगाने का आदेश दे दिया था। अब ऊर्ध्वमुख श्वानासन किए बग़ैर वह समय नहीं देख सकता। यह घड़ी किसी के काम की न बची है, सिवाय उस मकड़ी के जो उसके पीछे अपना आशियाना बना घड़ी का अस्तित्वबोध बचाए रखे है।

“भाई, मुझे निहारिका को बता देना चाहिए।” उत्पल ने आज फिर औक़ात के बाहर पी ली है।

“क्या?” लैपटॉप पर खटखट उँगलियाँ दौड़ाते शोभम की सहज जिज्ञासा।

“मैं उसे धोखा दे रहा हूँ। दिल पर बोझ-सा लगता है।”

“धोखा देना बंद कर दो। बोझ अपने आप कम हो जाएगा।” शोभम ने अपनी दुखती गर्दन को दाएँ-बाएँ करते हुए सहलाया।

“नहीं यार, मुझे बताना चाहिए।” उसने फ़ोन मिला लिया है।

“क्या...?” वह चिल्लाता हुआ बिस्तर से खड़ा हो गया।

“ऐसा कैसे कर सकती हो तुम?”

...

“मैंने तुम्हें सच्चे दिल से चाहा…”

...

“अब बता रही हो?”

...

“आइंदा कॉल मत करना मुझे…”

वह अपना बोझ उतारे, उससे पहले उसकी प्रेयसी ने अपना बोझ उतार दिया है। वह उसे ‘benching’ में इस्तेमाल कर रही थी। वह अपने कॉलेज सीनियर के साथ ‘सच्चे प्रेम’ में थी। बेचारा उत्पल अमर प्रेम-कथा में साइड हीरो बनकर रह गया। मैं अनचाहे मुस्कुरा उठा हूँ। उत्पल रो रहा है। हाँ, शराब के नशे में ही। नशा उतरते ही कहीं और soft launching शुरू हो जाएगी। उत्पल प्रेयसी को गालियाँ दे रहा है और शोभम उत्पल को। ख़ासा रोचक दृश्य चल रहा है। हर ब्रेकअप के बाद उत्पल की आँसुओं की झड़ी और लंदन घड़ी पर नज़र न डालना मैं बहुत पहले सीख चुका हूँ। इस अभ्यास में बिल्ला ने मुझे मदद की। बिल्ला की तरह मैं भी अपना कान खुजा रहा हूँ। गालियों का स्टॉक ख़ाली होने पर वे दोनों सिगरेट पीने छत पर चले गए हैं। उत्पल ने शायद दुबारा फ़ोन मिला लिया है। उसके चिल्लाने की आवाज़ आ रही है। फ़ोन उठ गया है, मतलब नंबर ब्लॉक नहीं हुआ। खेल अभी लंबा चलेगा। बिल्ला और मैं गूगल कर रहे हैं—How to date multiple people... जब तक हम पाएँगे नहीं, खोने के दर्द को कैसे समझेंगे!

गूगल से टिप्स लेते हुए याद आया कि घर पर पैसे भेजने हैं। छोटे भाई के कॉलेज एडमिशन की फ़ीस जानी है, अंतिम तारीख़ पास आती जा रही है। मैं पुराने मकान-मालिक कुंतल को मैसेज भेजता हूँ। कोई उत्तर नहीं। मैं जिससे भी सिक्योरिटी वापस न मिलने का दर्द बताता हूँ, वह बड़े सहज भाव कहता है कि यहाँ सिक्योरिटी खा जाने का चलन है। मैं घबराकर कुंतल को दुबारा मैसेज करता हूँ, वह कहता है कि अभी प्लंबर और मिस्त्री रिपेयर का एस्टीमेट बना रहे हैं। वे मेरा दंड निर्धारित कर रहे हैं, जबकि असल दोषी वही हैं। मैं आज तक समझ नहीं पाया कि ऊपर वाले फ़्लैट से रिस रहे पानी का ख़ामियाज़ा मुझसे क्यों भरवाया जा रहा है। माराथली के पूरे इलाक़े में आने वाले खारे पानी का दोष मैं क्यों सहूँ? मैं यह प्रश्न भी कुंतल को भेजता हूँ। Rules are Rules, उसका संक्षिप्त उत्तर। शहर के सारे मकान-मालिकों ने मिलकर एकतरफ़ा नियम बना लिए हैं, जिनसे किसी एक किरायेदार की भी पूर्ण सहमति नहीं है। मैं घबराकर कॉन्ट्रैक्ट का पीडीएफ़ खोलता हूँ। कहीं इन रूल्स ने मेरी भावी संततियाँ गुलाम तो नहीं लिखवा ली हैं। उस फ़्लैट के सामने से गुज़रती कोई ट्रेन ट्रैक छोड़ बिल्डिंग में घुस आएगी तो उसका ख़ामियाज़ा भी शायद किरायेदारों को ही भरना पड़ेगा। आग लग जाने पर भी, भूकंप आने पर भी, परमाणु बम गिर जाने पर भी। ऐसी स्वार्थी लालची दुनिया पर गिर ही जाए बम!

बिल्ला मुझे शांत रहने के लिए कह रहा है, उसके पास बदला लेने के कुछ सुझाव हैं। वह दीवारें खरोंच सकता है, फ़र्नीचर ख़राब कर सकता है, बदबू फैला सकता है और मेरी ख़ातिर कुछ मरे चूहे किसी अलमारी की दराज़ में छुपा सकता है। बिल्ला को लादकर ले जाने में कैसा जुलूस निकलेगा, वह नहीं जानता या शायद जानता है और मेरे मज़े ले रहा है। मैंने इस युद्ध को एक दिन अकेले लड़ा था। देर रात फ़्लैट पर जा, उन तीनों से कहा था कि वे दो महीने का किराया कुंतल को न दें, मुझे दे दें तो मेरी सिक्योरिटी निकल आएगी। उन्होंने मेरे प्रपोज़ल को एकमत हो नकार दिया था। मैंने ‘भोंदु’ विवान की गर्दन पकड़ ली तो वह काँपने लगा था। “अहसानफ़रामोश, तुझे जगह न दी होती तो तेरे रूममेट तेरी टिकट काट दिए होते। मुझसे दगा की है, तेरा वो जनाज़ा निकलेगा…” इसके बाद के लंबे वाक्यों में गालियाँ ही गालियाँ थीं। लड़कों से भरे, (एडिट; हताशाओं से भरे) गलियारों की इस कहानी में गालियों की भरपूर रासलीला आरंभ से चल रही है, बस मैंने बिना सूचना एडिट कर आप तक पहुँचने नहीं दी है। मैं नहीं चाहता कि गालियों का स्क्रीन-शॉट लिए पुलिस की गाड़ियाँ मेरे आगे-पीछे घूमे। वरना गाली खाने लायक़ लक्षण तो उनमें ऐसे थे कि बचे दो में से किसी एक ने सिक्योरिटी गार्ड को बुला मुझे बाहर फिंकवा दिया था। आइंदा वहाँ दिखने पर पुलिस रिपोर्ट की धमकी भी दे डाली है। ‘घोंचू’ हैं सबके सब! हमारी टीम भले ही अलग हो। ऑफ़िस तो एक है। बिना उस मनहूस सोसायटी में पैर रखे मैं तीनों को ठिकाने लगा सकता हूँ।

बिल्ला मुझे देख हँस रहा है। रूहानी ताक़तों से इसका राब्ता न होता तो इसे आम होने का दर्द समझ आता। मैंने उसे घूरा तो वह तुरंत पैंतरा बदल मेरा हाथ चाट माफ़ी माँगने लगा, फिर क़ब्रिस्तान से कुत्तों के रोने की आवाज़ सुन एक लंबी जम्हाई ले बाहर निकल गया।

खिड़की बंद कर, वापस टिप्स पढ़ता मैं हैरत में हूँ; जितना स्ट्रैटेजिक लोग बेवफ़ाई में हो रहे हैं, उतना तो हमारी टीम का स्क्रम बोर्ड भी नहीं है।

स्लैक पर नोटिफ़िकेशन है। रेवंत ने अपडेट माँगा है। रेवंत पूरी टीम की गर्दन दोनों हाथों से जकड़े रहता है। हर मिनिट का अपडेट चाहिए इस ‘सनकी’ को। देखिए, आपकी आपत्तियों के मद्देनज़र मैं कितनी जगह भाषा बदलते चल रहा हूँ। कभी एक एसडी-2 ने अपडेट में ‘pile of poo’ इमोजी भेज दी थी, वह क़िस्सा आज भी हर नए ज्वाइनी को सुनाया जाता है। हैप्पी मोड ऑन कर रेवंत अपनी फ़ीड से वह क़िस्सा हटा सकेगा, लेकिन भीतर गहरी पैठी स्मृतियों का क्या! क्या उसके लिए भी कभी कोई ‘प्रोजेक्ट कौआ’ आएगा जो पूरे धैर्य संग हमारी स्मृतियों के खुरदुरे कंकड़ चुन डालेगा!

मैं डेटिंग छोड़ अपडेटिंग पर फ़ोकस कर रहा हूँ। रेवंत के तंज से आहत हुआ मैं इतनी मिठाई चख रहा हूँ कि डायबिटीज का शिकार हो सकता हूँ। ख़ब्तीपने में दस फ़ेक अकाउंट बना, उनमें से दो परस्पर विरोधी में विवादी कंटेंट डाल पुकारा है—आओ... आओ... मुझे गालियाँ दो! मुझे सेलिब्रिटी बनाओ। एक में पिता को कैंसर से मारा है, एक में माँ को हार्ट अटैक से, एक में मेरा नवजात बच्चा और बीवी अस्पताल की गलती से मर गए हैं। यहाँ संवेदनाओं की रुदाली से बाढ़ आने को है। लोग अस्पताल के नाम की अटकलें लगा रहे हैं। मुझे डर है कि मेरठ के किसी अस्पताल में पत्थरबाज़ी न कर आएँ ये लोग! एक में मैं चाइल्डहुड ट्रॉमा से जूझ रहा हूँ। एक में ग़ज़ा युद्ध की मार्मिक तस्वीरें भर रहा हूँ। इन तमाम अवसादी मसालों को घर-परिवार-फूल-चिड़िया की तस्वीरों से तरल बनाता चल रहा हूँ। तस्वीरों में गुलमोहर से लदी सड़कों को देख लोग बावले हो रहे हैं। मैंने लिखा—यहाँ किसे फ़ुर्सत है इन्हें निहारने की। सब कोमलता यूँ ही जाया होती रहती है। इस कमेंट पर भी लोग दिल लुटा रहे हैं। कितनी जल्दी दोस्त बन जाते हैं इस छद्म दुनिया में। बिल्ला की प्रोफ़ाइल पिक्चर वाले अकाउंट में तो अभी से नोटिस आने लगा है—you can’t accept new friend requests! कुछ चोरी और कुछ चैट जीपीटी के सहयोग से मैं छोटा-मोटा पेसोआ बनने के रोमांच से भर उठा हूँ। हाँ, हाँ, कुछ में स्त्री भी बना हूँ और वह अनुभव भी कम उन्मादी नहीं! छद्म आवरणों में हम कैसे दुस्साहसी हो उठते हैं, यह मैं जान रहा हूँ। एक अकाउंट तो उत्पल की तस्वीर संग उसकी प्रेम गाथा का भी बना डाला है। अरे, ऐसा नीच दोस्त नहीं हूँ मैं, शक्ल नहीं दिखाई उसकी, लंबे बालों से चेहरा ढक गया है। जी हाँ, लंबे बाल और आप क्या उत्पल दत्त के चक्कर में उसे खल्वाट इमेजिन कर चले थे। जलवा है मेरे यार का। हजारों में लाइक-कमेंट आते हैं उधर। कई प्रेम गुरु आकर सलाह देते हैं, बहस करते हैं। मशीन को कोई ऐसा अकाउंट दिखाओ तो वह सबको अवसादी जान हाइड कर, ‘बेचारे’ दुख-विक्रेता का कारोबार ठप्प करा देगी। कंज्यूमर फ़्रेंडली बनने के लिए मशीन को प्लांड धूसर पोस्ट से जुड़ी इनबॉक्स की रंगीनियों को भी समझना होगा।

बाहर बारिश के साथ ओले गिरने लगे हैं। बिल्ला खिड़की पर खरोंच मार रहा है। मैंने खिड़की खिसकाई और वह भीतर आ अपना फर सुखाने लगा। जीभ न हुई टर्किश कॉटन से बुना तौलिया हो गई। बदमाश बिल्ला पूरा झक्क सफ़ेद है, बस उसकी बाईं आँख के इर्द-गिर्द काला घेरा है, जिसके कारण वह किसी समुद्री लुटेरे-सा दिखता है। ऐसा ही एक घेरा पूँछ की नोंक पर है, जो उसकी मर्दानगी को कम कर उसे किसी दयनीय मसख़रे में बदल देता है, इसी कारण पीजी में घूमने वाली किसी बिल्ली को देखते ही वह दुम दबा लेता है। इसके बावजूद वह एक शानदार और रोबीला बिल्ला है, उसकी प्रोफ़ाइल पिक्चर पर आए कमेंट इस बात की तस्दीक़ करते हैं कि कुछ दिनों बाद जब मैं उसे एक रोड एक्सीडेंट में मरा बताऊँगा तो काफ़ी लोग विलाप करेंगे। हैप्पी मोड ऑन करने पर मशीन के ऊपर दायित्व होगा कि उसे तस्वीर में सोया हुआ न जाने, कैप्शन और कमेंट में उतरे दुख को खँगाले और उस पोस्ट को हाइड कर, केवल जीवंतता से भरी उमंगित करती पोस्ट मुझे दिखाए। 

श्रद्धांजलि और RIP पढ़ना, समझना मशीन के लिए सरल होगा। असली समस्या लाएँगे ‘मेरा प्यारा बिल्ला’, ‘ओहो’ और ‘लव इमोजी’ जैसे कमेंट, जो सुखद और दुखद दोनों स्थितियों में लिखे जा सकते हैं। लोगों को ज़रा दायित्वबोध के साथ रियेक्ट-कमेंट करने चाहिए।

चाइल्डहुड ट्रॉमा वाले मेरे प्रोफ़ाइल में मैंने हैप्पी मोड ऑन किया है। वहाँ आई अधिकतर फ्रेंड रिक्वेस्ट फ़ेक अकाउंट हैं, जिनमें दैहिक संबंधों के लिए खुले निमंत्रण हैं। इस अकाउंट को टैग करके एक चित्र पोस्ट किया गया है, जहाँ एक अधेड़ उम्र का आदमी एक छोटी बच्ची से सटा हुआ बस में खड़ा है। आदमी के चेहरे पर कुटिल मुस्कान है, लड़की भय से सफ़ेद। इस पोस्ट का टैग स्वतः हट जाना चाहिए था, पर वह टाइमलाइन पर टँग गया है।

मशीन को विपरीत भावनाओं में से हिंसक और अवसादी भावनाओं को तत्परता से चुनकर हटाना सिखाना होगा। मैं ऐसी कई तस्वीरें मशीन की ट्रेनिंग के लिए डाउनलोड कर रहा हूँ। बिल्ला मेरे कंधे पर लेटा सो गया है। मैं पेट पर लैपटॉप लादे ऊँघ रहा हूँ।

रेवंत का फ़ोन है, वह पागलों की तरह SEV-2 SEV-2 चिल्ला रहा है। उसको दौरे पड़ना आम है। मुझे समझने में समय लगा कि स्टोरेज S3 बकेट से कंटेंट मॉडरेशन के लिए डाउनलोड की जा रही तस्वीरें बाल यौन-शोषण के दायरे में आने के कारण प्रतिबंधित हैं और हर तस्वीर के साथ कंपनी की सिक्योरिटी टीम को वार्निंग टिकट जारी हो रहे हैं।

उत्पल के सिरहाने रखी रम गुटककर मैं छत पर आ गया हूँ। हवा में हल्की सिहरन है जो भा रही है। नामालूम-सा, नाज़ुक-सा एक ख़याल मुझे छू कर गुज़रा है। आकाश की गर्दन पर नीली बिजली दमकी है। छत पर तारों का जाल फैला है, जिन पर फैलाए गए कपड़े हवा संग इधर-उधर झूल भुतहा नाच कर रहे हैं। पल-पल बदलते मौसम वाले इस शहर में सूखते कपड़ों की स्थिति सुनसान सड़क पर निकली अकेली लड़की जैसी अनप्रेडिक्टेबल है—कपड़े भीग जाते हैं, उड़ जाते हैं, खो जाते हैं, नए धब्बे पा जाते हैं…. हाँ, कभी अपहरण नहीं होता, जीवित बचे रहते हैं, इस मामले में छत सड़क से अधिक ईमान वाली है।

अब मेरी नज़र हवा से नीचे गिर धूल में सन गए कपड़ों पर है। छत पर एक ओर रखीं तीन वाशिंग मशीनों ने दिन भर जी-तोड़ मेहनत कर इन्हें धोया होगा। दो मशीन अभी भी काम पर लगी हैं। कोई चार साल पहले मेरे बैच का एक लड़का अपने धुले कपड़ों की यह दुर्दशा देख छत से कूद गया था। छत पर ताला लगा दिया गया था, जो लड़के उसे सताते थे, ब्लैकमेल करते थे, वे खुले घूमते रहे थे। मैं बेध्यानी में वाशिंग मशीन के पास चला आया। साबुन के भभके मिली बासी हवा ने मुझे चिकोटी काटी और मैं करुणा रथ से उतर लिफ़्ट की ओर बढ़ गया।

ग्राउंड फ़्लोर पर बनी कॉमन रसोई में मैंने चाय का पानी चढ़ाया है। कोई न कोई धर्मात्मा चाय लायक़ दूध फंगस से भरे फ्रिज में छोड़ ही देता है। बिल्ला अँगड़ाई लेता मेरे पास आ खड़ा हुआ है। हमेशा की तरह सिंक के नीचे से चूहों की तीखी आवाज़ें आ रही हैं, पर बिल्ला उनमें कोई रुचि नहीं दिखाता। इस रसोई की हालत देख लगता है कि बिल्ला से ज़्यादा कॉक्रोच-चूहे गुपचुप तरीक़ों से हम खा चुके हैं। मेरे पेट में दर्द की तीखी मरोड़ उठी। मैंने एक गहरी नज़र बिल्ला पर डाली। बचा दूध एक कटोरी में बिल्ला को देते मैंने उसे छेड़ा—“क्यों बे लुटेरा, यह सब तुम्हारी साज़िश है न!”

पता नहीं किसने और कब उसे यह नाम दे डाला। उसे इस नाम से पुकारा जाना सख़्त नापसंद है। वह ग़ुर्रा रहा है। रंगा-बिल्ला कहने पर तो उसने एक लड़के का मुँह नोच लिया था। ब्लैक पर्ल पुकारने पर ज़रूर वह अदा से अपनी पूँछ लहराने लगता है; लेकिन नौकरी, दोस्तों, घर-परिवार, मकान-मालिक, प्रेमिकाओं और EMI से जूझते लड़कों के जीवन में इन मुलायमियतों के लिए समय न के बराबर है।

मैं उसे चिढ़ाने के लिए बार-बार लुटेरा पुकार रहा हूँ। हँस रहा हूँ। बिल्ला संग छेड़-छाड़ का यह वीडियो अपलोड कर दिया है। बिल्ला की हल्की ग़ुर्राहट की असहमति पढ़ना मशीन को सीखना होगा।

इस बार वह मेरे साथ लिफ़्ट से ही ऊपर आया है। हो सकता है कुछ समय बाद हमारा यह छोटा-सा वीडियो देखते बिल्ला चिढ़े नहीं, बल्कि हँसने लगे। मशीन के लिए मनोभावों की पेचीदगी एक क्लिक में समझना हरगिज़ सरल नहीं है। बारिश और तेज़ हो गई है, पर ओले रुक चुके हैं। छत से कुछ ओले उठा मैंने हथेली में रख लिए हैं। उनकी तस्वीर एक प्रोफ़ाइल पर पोस्ट की है और घर पर व्हाट्सएप भी।

चाय की चुस्कियाँ कई दफ़ा अफ़ीमी हो जाती हैं मेरे लिए। मैं वापस रसोई में गया हूँ। सबसे तेज़ छुरी एहतियात से बरमूडा की लंबी जेब में रखी है। ऊँघता हुआ माराथली अपार्टमेंट मेरे सामने है और पीछे से धड़धड़ाती हुई ट्रेन गुज़र रही है। मैं दोनों की ओर खिंचता हुआ अंततः विवान के बिस्तर के पास खड़ा हँस रहा हूँ। उज्ज्वल और शिवाय के चेहरे का रंग उड़ा है। उनकी फटी आँखों का पीछा करता मैं विवान की अधकटी गर्दन को देख उछल पड़ा हूँ। इस उछलने में सिर दीवार से टकरा गया है। मैं सिर सहलाता उठ बैठा हूँ। बिल्ला किसी गेंद-सा गोल हुआ सो रहा है। कप स्टूल पर टिका मैं फोन देखने लगा। कुंतल का कोई संदेश नहीं। रेवंत को प्रोजेक्ट पर कल वन-टू-वन मीटिंग चाहिए। भाई ने पर्सनल पर फ़ीस याद दिलाई है। फ़ैमिली ग्रुप पर घर से दो तस्वीरें आई हैं। एक खेत में बैठ गई फ़सल की और दूसरी बैठक की ढह गई छत की। घर से दस किलोमीटर दूर बहने वाली नदी घर के सामने से बह रही है। कौन-सा जादुई बटन मेरी त्रासद हक़ीक़तों को हाइड कर सकेगा? मैंने दोनों तस्वीर कुंतल को फ़ॉरवर्ड की हैं। जानता हूँ, उसका उत्तर आएगा—I am not responsible for your loss.

दर्द की कई तरंगें एक साथ मेरे सिर में, पेट में उठ रही हैं। बिल्ला को घसीटते हुए कमरे से बाहर कर, मैंने दरवाज़ा बंद कर दिया है। सोते हुए उत्पल के ऊपर से अपना कंबल खींच लिया है। मेरी जलती नज़रें खिड़की पर टिकी हैं। कंबल ओढ़े, धड़धड़ करती ट्रेनें, खिड़की से लगातार निकलती जा रही हैं। रेल, मैं, रेल की पटरियाँ और खिड़की तेज़ी से घूमते हुए भँवर की नाभि में धँसने वाले हैं। बीच कमरे में रखे स्टूल में पूरी ताकत से लात मारते हुए मैं चिल्लाया हूँ—हैप्पी मोड की माँ की... आँख!

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