यश पर उद्धरण
यश का अर्थ किसी व्यक्ति,
वस्तु, स्थान आदि का नाम या सुख्याति है। इस चयन में यश को विषय बनाती कविताओं को शामिल किया गया है।
रूप, गुण, आयु और त्याग—ये चार साधन मनुष्य को सौभाग्यशाली बनाते हैं।
दिवंगत होने पर भी सत्काव्यों के रचयिताओं का रम्य काव्य-शरीर; निर्विकार ही रहता है और जब तक उस कवि की अमिट कीर्ति पृथ्वी और आकाश में व्याप्त है, तब तक वह पुणयात्मा देव-पद को अलंकृत करता है।
यश-प्रतिष्ठा और रचना का मूल्य अच्छा लिखने से नहीं, यश और मूल्य देने वाले लोगों की इच्छा के अनुसार लिखने से मिलता है।
यश का उन्माद बहुत बुरा होता है। नार्मल यशोकामना रहे और नार्मल तरीक़े से यश मिले तो ठीक है। सब यश चाहते हैं, मगर कुछ लोग ज़्यादा उस्ताद होते हैं। वे जानते हैं कि साधारण तरीक़े से हमारा सीमित यश फैलेगा, इसलिए वे ऐसे तरीक़े अपनाते हैं, जिनसे उनकी हँसी उड़े।
गुणवान् व्यक्ति समाज में आदर का पात्र होता है। गुण विरूप व्यक्ति को भी सौभाग्यशाली बना देते हैं।
सफलता होगी ही, ऐसा मन में दृढ़ विश्वास कर, सतत विषाद-रहित होकर तुझे उठना चाहिए, सजग होना चाहिए और ऐश्वर्य की प्राप्ति कराने वाले कार्यों में लग जाना चाहिए।
निष्कलंक का जीवन ही जीवन है। यशहीन का जीवन मरण-तुल्य है।
यदि युद्ध को छोड़ने पर मृत्यु का भय न हो तब तो अन्यत्र भाग जाना उचित है। किंतु प्राणी की मृत्यु अवश्य ही होती है। तो फिर यश को व्यर्थ क्यों कलंकित कर रहे हो?
जो कार्य करने से न तो धर्म होता हो और न कीर्ति बढ़ती हो और न अक्षय, यश ही प्राप्त होता हो, उल्टे शरीर को कष्ट होता हो, उस कर्म का अनुष्ठान कौन करेगा?
गोष्ठियों में लोकप्रचलित सरल भाषा में काव्य, कला-विषयक चर्चा करता हुआ नागरक—लोक में सर्वमान्य होता है।
कृतघ्न को यश कैसे प्राप्त हो सकता है? उसे कैसे स्थान और सुख की उपलब्धि हो सकती है? कृतघ्न विश्वास के योग्य नहीं होता। कृतघ्न के उद्धार के लिए शास्त्रों में कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया है।
कला को कभी भी लोकप्रिय बनने का प्रयत्न नहीं करना चाहिए।
जिसकी रचना को जनता का हृदय स्वीकार करेगा उस कवि की कीर्ति तब तक बराबर बनी रहेगी जब तक स्वीकृति बनी रहेगी।
प्रायः समान विद्या वाले लोग एक-दूसरे के यश से ईर्ष्या करते हैं।
जीवन काल में लोकप्रियता पा लेना या मरने के दसों वर्षों के पश्चात; लोकपूजित होना भी जीवन की महत्ता और सत्यपरता का द्योतक अवश्य है, परंतु इस प्रकार जीवन-काल में और मरणोपरांत भक्ति-भाव को अपनी ओर खींचे रहना, जिस पुरुष के व्यक्तित्व का एक सहज गुण हो, उसकी उच्चता में किसी को संदेह हो ही नहीं सकता।
कवि का भोजन है प्रेम और यश।
प्रेम और यश के साथ; अर्थ की आकांक्षा रखने वाली वेश्याओं को, सर्वगुणसंपन्न नायक से संबंध स्थापित करना चाहिए।
संग्राम में मारे जाने मर स्वर्ग प्राप्त होता है और जीतने पर यश मिलता है। लोक में दोनों ही माननीय हैं। अतः युद्ध करने में निष्फलता नहीं है।
यश तो अहं की तृप्ति है।
जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धर अर्जुन हैं, वहाँ श्री, विजय, वैभव और ध्रुवनीति रहेंगे, यह मेरा मत है।
सत्कार्य के लिए मरने वाला कीर्ति-काया में जीता है।
चरित्र-रक्षा एक प्रकार की संदली ज़मीन है, जिस पर यशः सौरभ इत्र के समान बनाए जा सकते हैं।
देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि—इन पाँचों की पूजा करने वाला मनुष्य शुद्ध यश प्राप्त करता है।
किसी के द्वारा न किया गया असाधारण कार्य ही मनुष्य के लिए यश का कारण होता है।
राजन्! अन्नदान करने वाले मनुष्य के बल, ओज, यश और कीर्ति तीनों लोकों में सदा बढ़ते रहते हैं।
यशस्वियों को अपना यश अपने शरीर से भी अधिक प्रिय होता है, फिर इंद्रियों की भोग्य वस्तुओं से तुलना की तो बात ही क्या!
निर्मल यश ही नित्य धन है।
चरित्र एक पेड़ की तरह है और प्रसिद्धि उसकी परछाईं। परछाईं वह है जो हम सोचते हैं, और पेड़ असली चीज़ है।
धर्मात्मा पुरुष को चाहिए कि वह यश के लोभ से, भय के कारण अथवा अपना उपकार करने वाले को दान न दे।
जैसे भस्म हुआ कपूर अपनी सुगंध से जाना जाता है उसी प्रकार प्राणी शरीर के टूक-टूक होकर भस्मावशेषता को प्राप्त होने पर भी, अपनी ख्याति से ही जाना या पहचाना जाता है।
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