भारतीय पातिव्रत्य की नैतिकता को चुनौती देकर, राधा ने एकनिष्ठ प्रीति का चाँदनी से भरा हुआ पूरा सौंदर्य उद्घाटित किया।
मानव-स्वभाव की कुरूपताएँ तभी तक मर्यादा में रहती हैं, जब तक उनके सामने कोई सीमा-रेखा खिंची हो।
कोई व्यक्ति किसी राष्ट्र या किसी समाज की स्वतंत्रता की भावना को कैसे समझ सकता है, जबकि घर में तो वह अपने बीवी-बच्चों का तानाशाह बना बैठा है।
जिसे आज 'स्त्री का स्वभाव' कहा जाता है, वह एक नक़ली चीज़ है और कुछ दिशाओं में बाध्यतापूर्ण दमन, और कुछ दिशाओं में अप्राकृतिक फैलाव का परिणाम है।
हम पुरुषों की वर्गीय तहों के जितना नीचे जाएँगे, उतना ही पुरुषों का 'पुरुष होने का घमंड' बढ़ता दिखेगा। और यह सबसे ज्यादा उन पुरुषों में मिलेगा, जिनमें पत्नी और बच्चों को छोड़कर और किसी पर राज करने की न तो हिम्मत है, न योग्यता।
यह पूजा-परस्ती जो आज की सबसे झूठी पूजाओं में से एक है; शायद तब तक क़ायम रहेगी, जब तक कोई ठोस मनोविज्ञान इस 'इंस्टिंक्ट' का पर्दाफ़ाश नहीं कर देता, जिसे 'प्रकृति का इरादा' और 'ईश्वर का आदेश मान कर नतमस्तक हुआ जा रहा है।
पुरुष अगर अपनी पूरी सत्ता का इस्तेमाल करता है तो स्त्री निसंदेह कुचली जाती है, पर अगर वह भरपूर लाड़-प्यार में सत्ता स्त्री के हाथों में सौंप देता है, तो स्त्री द्वारा अधिकारों की अतिक्रमण की कोई सीमा नहीं रहती।
आधुनिक सभ्यता और शिक्षा ने मानवीय विकास में जो भूमिका निभाई है; वह तब तक अधूरी और अपूर्ण ही रहेगी, जब तक कि ताक़त के क़ानून वाली पुरानी सभ्यता के गढ़ पर हमला नहीं किया जाता। और वह गढ़—गृहस्थ और दांपत्य-जीवन है।
स्त्रियों को पुरुषों के साथ खुली प्रतियोगिता न करने देना, अन्यायपूर्ण और एक तरह का सामाजिक अपराध है।
हमें उन पुरुषों की भावनाओं का सुराग़ भी मिल जाता है, जो स्त्रियों की समान स्वतंत्रता के नाम से चिढ़ते हैं। मेरे ख़्याल में उन्हें डर लगता है, इस बात से नहीं कि स्त्रियाँ विवाह से इन्कार कर देंगी—क्योंकि मुझे नहीं लगता कोई सचमुच ऐसा सोचेगा, बल्कि इस बात से कि वे चाहेंगी कि विवाह बराबरी की शर्तों पर तय हो।
हिंदी क्षेत्र में अभी सामंती मूल्यों और रूढ़ियों का जितना अधिक प्रभाव है, उतना देश के किसी अन्य भाग में शायद ही कहीं हो। इसलिए यहाँ स्त्रियों का जैसा शोषण, दमन और उत्पीड़न है—वैसा अन्यत्र कहीं नहीं।
मेरा विश्वास है कि अधिकारों की समानता के बाद; स्त्री की आत्म-आहुति का बढ़ा-चढ़ाकर बनाया गया मिथक ज़मीन पर उतरेगा, और तब एक श्रेष्ठ स्त्री श्रेष्ठतम पुरुष से ज़्यादा त्यागमयी नहीं होगी, पर साथ ही तब पुरुष भी आज की तुलना में ज़्यादा निस्वार्थ और आत्म-त्यागी होंगे, क्योंकि उन्हें बचपन से यह नहीं सिखाया जाएगा कि उनकी ज़िद दूसरों के लिए क़ानून के समान है।
पुरुषों और स्त्रियों के बीच अगर कोई मानसिक अंतर है भी, तो वह उनकी शिक्षा और हालत के अंतर का स्वाभाविक परिणाम है—उसमें प्रकृति प्रदत अंतर बहुत कम है।
लिंगों के बीच अधिकारों की असमानता का स्रोत कुछ और नहीं, सिर्फ़ 'सबसे ताक़तवर का क़ानून' है।
चाहे कोई किसी भी धर्म का हो—यह स्वीकार किया जाता रहा है कि पत्नी; पति की सबसे आज्ञाकारी नौकरानी, उसकी बंधुआ मज़दूर होती है।
किसी स्त्री ने न्यायसूत्र या वात्स्यायनभाष्य जैसा कोई शास्त्रग्रंथ रचा हो, ऐसा प्रमाण नहीं मिलता। उपनिषत्काल के बाद शास्त्रार्थ में स्त्री विस्मृत हाशिए पर है। किसी कोने से उसकी आवाज सुनाई देती है, पर वह जब कभी अपने अवगुंठन से बाहर निकल कर आती है तो एक विकट चुनौती सामने रखती है और दुरंत प्रश्न उठाती है।
हिंदुस्तान की औरतों को एक और काम भी करना है; और वह यह कि मर्दों के बनाए रीति-रिवाजों और क़ानूनों के अत्याचार से अपने को कैसे भी आज़ाद करें।
जिसे आज 'स्त्री का स्वभाव' कहा जाता है, वह एक नक़ली चीज़ है, और कुछ दिशाओं में बाध्यतापूर्ण दमन और कुछ दिशाओं में अप्राकृतिक फैलाव का परिणाम है।
शास्त्रीय वाङ्मय ही नहीं; रामायण, महाभारत, कालिदास, भवभूति और बाणभट्ट जैसे कतिपय महाकवियों को छोड़ दें, तो लगभग सारा का सारा संस्कृत साहित्य ही पुरुषवादी दृष्टि और पुरुष के वर्चस्व के आख्यान से रचा हुआ है।
औरत पर संस्कृति का आतंक, हज़ारों साल पहले अग्नि-परीक्षा और चीरहरण जैसे प्रसंगों से स्थापित हो गया था।
जो पुरुष पत्नी के साथ बहुत विनम्रता से पेश आते है। उनके बाहरी संसार और मित्रों, सगे-संबंधियों से जुड़े मामलों में पत्नी के अनुचित प्रभाव की बहुत ज़्यादा संभावना रहती है।
महिलाएँ अक्सर पुरुषों की तुलना में महिलाओं के साथ ज़्यादा सख़्त होती हैं। वे पुरुषों की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले लेती हैं और महिलाओं पर अत्याचार करने के लिए अपनी रणनीति अपनाती हैं—जिस तरह वरिष्ठ अपराधी, दूसरे दोषियों के पर्यवेक्षक बन जाते हैं।
पुरुष स्त्री-जाति को एक ओर से दबाता है, अज्ञान में रखता है, उसकी अवगणना और निंदा करता है।
जिन समाजों में नारी अपनी मुक्ति के लिए छटपटा रही थी, उनमें द्रौपदी को अपने लिए प्रेरणा और मुक्ति का प्रतीक माना गया।
सीता, तारा और मंदोदरी, पुरुषों के वर्चस्ववाले समाज में अपने वाणी की ऊर्जा से अपने लिए स्थान बनाती हैं।
धर्मशास्त्र में तीन ऋण बताए गए : देवऋण, पितृऋण और ऋषिऋण, पर मातृऋण भी हो सकता है—इस पर कहीं कोई विचार धर्मशास्त्रकारों ने नहीं किया।
संस्कृत के समाज में शास्त्रार्थ की शताब्दियों की परंपरा है; पर उसमें स्त्री की भूमिका पर बात कम हुई है, स्त्री की भूमिका भी कहीं है तो वह उपेक्षित रही है।
पर्दा एक वहशियाना ज़माने की वह बदनुमा निशानी है, जो हमारी जाने कितनी बहनों के जिस्म और दिमाग़ को क़ैद रखती है।
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उपनिषदों और महाभारत के काल के बाद सामंतीय समाज में, स्त्री की स्थिति निरंतर गौण होती गई।
आदर्श विवाह की अन्य सभी अवधारणाएँ, आदिम बर्बरता को नए चोलों में परोसने की कोशिशें भर हैं।
स्त्री जाति के प्रति रखा गया तुच्छ भाव, हिंदू समाज में घुसी हुई सड़न है—धर्म का अंग नहीं है।
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रोमांस का आधुनिक विकास पितृ-प्रधान समाज के बिना असंभव ही माना जाएगा।
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सारे धर्मशास्त्र पुरुषों के द्वारा लिखे गए, सारी स्मृतियाँ पुरुषों की रची हुई हैं।
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