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समकालीन पर उद्धरण

वर्तमान दौर के लिए भी

प्रासंगिक रहे और आधुनिक इतिहास के नियत परिप्रेक्ष्य से संबंधित रचनाओं से एक चयन।

समकालीनता की मारी आज की हिंदी आलोचना ने, कबीर को आध्यात्म-प्रेमी विदेशियों तथा उनके देशी सहयोगियों को सौंप दिया है, और तुलसीदास को 'जय श्रीराम' का नारा लगाने वाले शाखामृगों की मर्ज़ी पर छोड़ दिया है।

मैनेजर पांडेय

आलोचना की समकालीनता का एक पक्ष यह भी है कि वह अतीत की महत्त्वपूर्ण रचनाओं की वर्तमान अर्थवत्ता की खोज करे।

मैनेजर पांडेय

जो सार्थक है, वही समकालीन है—वह नया हो या पुराना।

मैनेजर पांडेय

हिंदी के लेखक अँधेरे में भले ही भटकते हों, किंतु यह नहीं कह जा सकता कि युग-धर्म की जो पहेलियाँ अपने विश्लेषण के लिए सामने उपस्थित हैं, उनकीओर हिंदी का साहित्य क्षेत्र उदासीन है।

गणेश शंकर विद्यार्थी

कविता में इतिहास का होते हुए भी अपने समय का होना पड़ता है।

लीलाधर जगूड़ी

यदि लेखक आज ईमानदार है, तो उसे अपने प्रति और अपने युग के प्रति अधिक उत्तरदायी होना होगा।

गजानन माधव मुक्तिबोध

प्रतिभाशाली ग्रंथकार या कवि; अपने काल, जाति और स्थिति की प्रकृति द्वारा निर्मित ही नहीं होता, वह उसका निर्माण भी करता है। वह केवल उनसे प्रभावान्वित होने वाला ही नहीं, उन पर प्रभाव डालने वाला भी है।

श्यामसुंदर दास
  • संबंधित विषय : कवि

हिंदी में प्रेम के नाम पर लिखा बहुत कुछ जाता है पर उसका ताल्लुक़, ज़्यादातर, कर्तव्य, मोह या श्रद्धा से होता है

मृदुला गर्ग

प्रत्येक सद्ग्रंथ में दो तरह की बातें हुआ करती हैं, एक सामयिक, नश्वर, देशविशेष और कालविशेष से संबंध रखनेवाली और दूसरी शाश्वत, अविनश्वर, सब कालों और देशों के लिए समान रूप से उपयोगी और व्यवहार्य।

श्री अरविंद

समकालीन उपन्यासों ने पहचाना है कि माँ पोषक हो सकती है तो शोषक भी। समकाल के कई उपन्यासों में माँ की कुटिलता और क्षुद्रता का अद्भुत चित्रण मिलता है।

मृदुला गर्ग
  • संबंधित विषय : माँ

हमारे वर्तमान दार्शनिक अध्ययन का मुख्य उद्देश्य, कठमुल्लावादी विचार को दूर करना ही होना चाहिए।

माओ ज़ेडॉन्ग

आजकल ऐसा बहुत साहित्य लिखा जा रहा है जिसे मैं 'स्त्री-रिझाऊ’ कहता हूँ; जिसको सुन करके औरतें बुल-बुल हो जाती हैं कि देखिए! हमारे अधिकारों की बात की जा रही है।

नामवर सिंह

परख भी समकालिकता और समबोध से अनुशासित होती है।

त्रिलोचन