अपने गुप्त अंगों पर अंकित नखक्षतों को देखकर; नायिका का प्रेम संबंध बहुत दिनों से छूट जाने पर भी कोमल प्रीति नवीन-सी हो जाती है।
नायिका को अपनी ओर आकृष्ट करने के लिए, नायक नायिका की विश्वासपात्र सहेलियों तथा धाय की लड़की से मेल-जोल बढ़ाए। क्योंकि वे नायिका के मनोभावों को अच्छी तरह समझकर, उससे नायक के गुणों की प्रशंसा कर, नायक की ओर उसे आकृष्ट कर सकती हैं।
जब नायक को यह विश्वास हो जाए कि मनोभिलाषित कन्या मुझे चाहती है, तो वह उस कन्या की प्राप्ति के लिए उपाए करे।
नायक के धन से सारे शरीर पर अलंकार योग अर्थात् ख़ुद के लिए आभूषण आदि बनवाना, भवन को कलात्मक ढंग से सजाना, क़ीमती बरतनों को ख़रीदवाना, परिचारकों द्वारा घर को स्वच्छ रखना—ये रूपाजीवा नायिका के विशेष लाभ हैं।
जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के पीछे की ओर बैठकर; एक-दूसरे की ठुड्डी पकड़कर थोड़ा पीछे की ओर घुमाकर चुम्बन करते हैं, तो उसे 'उद्भ्रांत' चुम्बन कहते हैं।
नायक के अन्यमनस्क रहने पर, कलह की स्थिति में होने पर अथवा दूसरी ओर ध्यान लगाए हुए हो, अथवा सोने की स्थिति में होने पर, नायक को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए अथवा निद्रा-भंग करने के लिए नायिका द्वारा किया गया चुम्बन 'चलितक' चुम्बन कहलाता है।
रात्रि में देर से घर लौटे हुए नायक के द्वारा, शय्या पर सोती हुई नायिका का चुम्बन—'प्रातिबोधिक' चुम्बन कहलाता है।
नायक और नायिका के राग (प्रेम) को बढ़ाने वाला, कोई और दूसरा सशक्त साधन नहीं है—जितना नखक्षत और दंतक्षत से उत्पन्न कामोत्तेजना।
भक्ति, वीरता और सैक्स की मिली-जुली मानसिकता; फ़िल्मी हीरो को नेता, उद्धारक और पथ-प्रदर्शक बना देती है।
जो नायक अपने प्रति प्रीति उत्पन्न करना, स्त्रियों का आदर-सम्मान करना और नवोढ़ा कन्या में विश्वास उत्पन्न करना जानता है—वह स्त्रियों का अत्यंत प्रिय होता है।
जैसे सुअर किसी वस्तु को चबा ले, वैसे ही नायक नायिका के स्तनों के एक भाग को चबा लें, फिर दूसरी जगह पर दांत गड़ाए, फिर तीसरी जगह। इस तरह एक साथ लगे हुए लंबे-लंबे, ताम्रवर्ण के दंतक्षत के निशान पंक्तिबद्ध रूप में बने हों, तो ऐसा दंतक्षत 'वराहचर्वितक' कहलाता है।
जब नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे के अधरों का कसकर चुम्बन करते हैं, तो 'अवपीड़ितक' चुम्बन कहलाता है।
परदेश जाते समय नायक, नायिका के स्तनों और जंघाओं पर स्मृतिस्वरूप जो तीन-चार रेखाएँ खींच देता है, उसे 'स्मारणीयक' नखक्षत कहते हैं।
चुम्बन की बाज़ी में यदि स्त्री हार जाए; तो वह सिसकती हुई हाथ को इधर-उधर कंपित करे, नायक को ठेलकर दूर कर दे, दाँतों से काटे और करवट बदल ले। यदि नायक ज़बरदस्ती अपनी ओर करना चाहे, तो उससे विवाद करे और कहे कि फिर से बाज़ी लगा लो और उसमें भी यदि हार जाए, तो दुगुना हाथ-पैर पटके और रोने लगे। इस प्रकार के चुम्बन-कलह से रागोद्दीपन होता है।
नायक के साथ संभोग की कामना करने वाली नायिका के स्तनों के अग्रभाग अर्थात् कुचाग्रों की ओर, पाँचों नखों को मिलाकर जो रेखा खींची जाती है—उसे 'शशप्लुत' नामक नखक्षत कहते हैं।
चुम्बन की बाज़ी में नायक के विश्वास के साथ असावधान हो जाने पर, मौक़ा पाकर नायिका नायक के अधर को पकड़कर, अपने दाँतों के अंदर दबोच कर अपनी जीत पर हँसे, ज़ोर से चिल्लाए, धमकाए, ताना मारे, व्यंग्य कसे और नाचने लगे तथा भौहों को नचाती, चंचल नेत्रों से हँसती हुई, मुख से बार-बार, तरह-तरह के व्यंग्य वचन बोले। इस प्रकार के प्रणय-कलह से कामेच्छा जागृत होती है और अनुराग में वृद्धि होती है।
गोष्ठियों में लोकप्रचलित सरल भाषा में काव्य, कला-विषयक चर्चा करता हुआ नागरक, लोक में सर्वमान्य होता है।
नायक-नायिका दोनों में जो पहले अधर को पकड़ ले, उसी की जीत होती है।
अपने प्रेम को प्रदर्शित करने के लिए, संभोगेच्छा प्रकट करने के लिए दर्पण में, दीवार में अथवा जल में प्रतिबिम्बित नायक या नायिका की छाया का चुम्बन करना 'छाया-चुम्बन' कहलाता है।
नायक के प्रति संकेतों के द्वारा; अपने प्रेमभाव को प्रकट करती हुई संवाहिका नायिका का, चुम्बन की इच्छा न रखने वाली अकामा नायिका के समान भाव प्रदर्शित करती हुई, नींद के बहाने नायक के जाँघों पर अपना मुख रखना और जाँघों का चुम्बन करना प्रेमवर्द्धक होता है।
यदि कठोर शब्दों या अपशब्दों का प्रयोग करने के बावजूद भी; नायिका नायक से प्रेम संबंध जोड़ना चाहती है, तो उसे पुनः वश में करने का प्रयत्न करना चाहिए।
नखक्षत से उच्छिष्ट स्तनों वाली युवति नायिका को दूर से ही देखकर, परपुरुष के मन में उसके प्रति सम्मान और प्रेम-भावना अर्थात् संभोग की कामना उत्पन्न हो जाती है।
काम-भावना को प्रकट करने के लिए जैसा पुरुष करे, वैसा ही स्त्री को भी करना चाहिए। जिस प्रकार नायक नायिका पर ताड़ना या आघात करे, उसी प्रकार नायिका भी पुरुष को ताड़ित करे। जिस प्रकार नायक जिस अंग से; नायिका के जिस अंग का चुम्बन करे, उसी प्रकार नायिका भी उसी अंग से पुरुष के उसी अंग का चुम्बन करे।
जो आत्मबल से युक्त है, मित्र संपत्ति से संपन्न है, जो नागरकवृत्ति से युक्त है, जो मनोभावों को समझने वाला है और देश-काल की परिस्थितियों का ज्ञाता है—वह नायक अनायास ही अलभ्या नायिका को प्राप्त कर लेता है।
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यदि राग (प्रेम) के आयतन अर्थात रूप, यौवन और गुण को याद दिलाने वाला नखक्षत; नायिका के शरीर पर विद्यमान न हो, तो बहुत दिनों से प्रेम संबंध के छूट जाने पर प्रीति पराजित हो जाती है अर्थात् नष्ट हो जाती है।
सोए हुए नायक के मुख को देखती हुई नायिका; जब किसी विशेष अभिप्राय से चुम्बन करती है, तो उसे 'रागदीपन' चुम्बन कहते हैं।
रागावस्था में भी विचित्रता की अपेक्षा रहती है और संभोग क्रिया में इसी विलक्षणता-विचित्रता के कारण, नायक-नायिका में राग (प्रेम) उत्पन्न होता है।
नायिका को अपने प्रियतम की छाती से लिपट कर, मुख उठाकर गले में बाँहें डाल; 'मणिमाला' तथा अन्य प्रकार के दंतक्षतों का प्रयोग करना चाहिए।
नायक-नायिका अत्यधिक कामांध होकर; किसी प्रकार की हानि की परवाह न करके, एक ही पलंग पर नायिका नायक की गोद में बैठकर अथवा एक-दूसरे के आमने-सामने बैठकर; परस्पर एक-दूसरे से इस प्रकार चिपट जाएँ, मानो एक-दूसरे के अंदर समा जाना चाहते हों, तो इस प्रकार के आलिंगन को 'क्षीरजलक' आलिंगन कहते हैं।
नायक के शरीर के अंगो पर नखों से अंकित नखचिंहों को देखकर, स्थिर चित्त वाली सदाचारिणी नायिका का भी चित्त प्राय: चंचल हो जाता है।
जब नायक नायिका के दोनों होंठों को अपने होंठों में समेटकर चुम्बन करे, तब नायिका को भी प्रत्युत्तर में नायक के दोनों होंठों को अपने होंठों से पकड़कर चुम्बन करना चाहिए। अगर नायक के मुख पर मूँछें न हों तो चुम्बन करना चाहिए, यदि नायक के मुख पर मूँछें हों, तो नायिका को चुम्बन नहीं करना चाहिए। इस प्रकार के चुम्बन को ‘सम्पुटक’ कहा जाता है।
रात्रि में नाटक देखने के समय, अथवा किसी सामाजिक उत्सव में पास में आई हुई नायिका के हाथ-पैर की उँगलियों का चुम्बन करना—'अँगुलि-चुम्बन' कहलाता है।
नायिका के स्तनपृष्ठ तथा कटिभाग पर कमलपत्र के समान नखों से जो चिन्ह बनाया जाता है, उसे 'उत्पलपत्रक' कहते हैं।
जब नवोढ़ा नायिका; नायक के मुख में अपना होंठ रख देती है या नायक, नायिका के मुख में अपना होंठ डाल देता है, तब वह थोड़ी-सी लज्जा को धारण करती हुई; चुम्बन के लिए अपने ओठ को कुछ हिलाती है, किंतु लज्जावश चुम्बन नहीं कर पाती—उसे 'स्फ़ुरितक' चुम्बन कहा जाता है।
दिन में लोगों की भीड़-भाड़ में, यदि नायक नायिका द्वारा किए गए दंतक्षतादि घावों को प्रदर्शित करे, तो नायिका को अपने को छिपाकर; अपने द्वारा किए गए चिह्नों को लक्ष्य कर हँसना चाहिए। खुले आम प्रेम प्रदर्शित करने का यही सर्वोत्तम तरीका है।
यदि नायिका नायक के अधर को चूमने लगे, तो नायक को भी नायिका के ऊपरी होंठ को चूमना चाहिए। यह चुम्बन 'उत्तरचुम्बित' कहलाता है।
जो युवक नायक दरिद्र होते हुए भी वश में रहने वाला हो, गुणहीन होने पर भी अपनी जीविका चला लेता हो—वह वरण के योग्य है, किंतु गुणों से युक्त होने पर भी अनेक पत्नियों वाला पति विवाह के योग्य नहीं होता।
शाल वृक्ष पर लिपटती हुई लता के समान, नायिका जब नायक का मुख चूमने के लिए उसके मुख को थोड़ा झुकाए, फिर उठाकर सी-सी करती हुई; उससे लिपटकर उसके मुख-सौंदर्य को देखे, तो यह आलिंगन 'लतावेष्टितक आलिंगन' कहलाता है।
जब दीवार या खंभे को दोनों ओर से पकड़ कर; नायक-नायिका परस्पर एक-दूसरे को ज़ोर से दबाएँ, तो वह 'पीड़ितक' आलिंगन कहलाता है।
किसी गोष्ठी या उत्सव में जाने के लिए तैयार होकर नायक, नायिका के जूड़े में खोसे हुए सुगंधित फूलों को नायिका से माँगे।
नायक के आग्रह करने पर चुम्बन के लिए तैयार कन्या मुख पर मुख तो रख देती है, किन्तु लज्जावश चूमने की चेष्टा नहीं करती। इस प्रकार के चुम्बन को 'निमित्तक' चुम्बन कहते हैं।
सर्वत्र अर्थात् कन्या, विवाहिता—सभी नायिकाओं को प्राप्त करने के लिए स्वयं उपाय करना, दूती की अपेक्षा अधिक उत्तम होता है। यदि स्वयं उपाय करने में असमर्थ हों, तो दूती का प्रयोग करना चाहिए।
जहाँ पर जिस घर में नायिका का पति किसी दूसरी स्त्री से प्रेम करता हो, उस घर में नायक आसानी से मिलने वाली होने पर भी अपनी प्रेमिका से न मिले।
कुछ स्त्रियाँ कई बार प्रेमी से मिलने के बाद भी उसका तिरस्कार कर देती हैं, उससे मिलना छोड़ देती हैं, संभोग नहीं करतीं और न इनकार करती हैं, ऐसा करने से ही अपना गौरव समझती है। उससे अधिक परिचय बढ़ाकर उसे सिद्ध करें अथवा उसके मर्म को समझने वाली चतुर दूती द्वारा सिद्ध करे।
जब नायक-नायिका परस्पर शतरंज आदि खेल-खेल रहे हों, तो नायक नायिका से किसी बात पर बनावटी झगड़ा कर ले और झगड़ते हुए उसका हाथ इस प्रकार पकड़ ले कि मानो उसका पाणिग्रहण (विवाह) कर रहा।
यदि नायिका किसी कारण से पुरुष के आलिंगन, अंगस्पर्श को अनजान की तरह सहन कर लेती है, तो उसे दुविधा में फँसी हुई समझ कर धीरतापूर्वक निरंतर प्रयत्न द्वारा वश में करना चाहिए।
नायक-नायिका जब एक-दूसरे के सामने बैठकर या लेट कर, परस्पर एक-दूसरे के ओठों का चुम्बन करते हैं तो वह 'सम' चुम्बन कहलाता है।
अनेक अभियोक्ताओं में वरण करने वाले नायकों में, गुणों में समानता होने पर एक नायक ही वरण के योग्य है। उन अभियोक्ताओं में जो अधिक अनुराग करता हो, वह श्रेष्ठ होता है।
दूती बनकर नायिका के पास जाने वाली धाय की लड़की, नायिका को समझाए कि और वरों की अपेक्षा, यह वर सब वरों में श्रेष्ठ और विवाह करने के योग्य है। इसके साथ विवाह करके तुम अखंड सुख प्राप्त करोगी।
जब नायिका अपने अंगों के हाव-भाव दिखा; सद्भाव प्रकट कर चुकी हो, तो निशानी के तौर पर अपनी कोई प्रिय वस्तु उपभोग के लिए नायिका को दे, और नायिका की कोई प्रिय वस्तु स्वयं उपभोग के लिए ले लेना चाहिए।