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एक रात जो अब भी मेरे भीतर उजाला करती है

स्मृतियाँ सचमुच कभी नहीं मरतीं। वे हमारे भीतर किसी गहरे, अदृश्य तह में चुपचाप बैठी रहती हैं—कभी धुँध की तरह, कभी उजाले की तरह और कभी किसी ऐसे सपने की तरह जो जागने के बाद भी पूरी तरह टूटता नहीं।

कुछ यादें ऐसी होती हैं जो सुबह की रोशनी के साथ फीकी पड़ जाती हैं और कुछ ऐसी होती हैं जो हर सुबह के साथ और साफ़ और चमकीली होती जाती हैं। मेरे लिए वह रात भी कुछ ऐसी ही थी—एक ऐसी रात जिसे मैं चाहूँ तो भूल सकता हूँ और चाहूँ तो उसे जीवन भर अपने भीतर संजोए रख सकता हूँ।

यह कोई ऐसा प्रश्न नहीं है जिस पर दार्शनिक बहस की जाए, न ही इतना भारी कि उस पर ठहरकर विचार किया जाए; यह बस एक साधारण-सा, निजी-सा द्वंद्व है—याद रखूँ या भूल जाऊँ।

वह रात समुद्र के ऊपर उगते हुए पूर्णिमा के चाँद जैसी थी—धीरे-धीरे फैलती हुई, अपनी रोशनी में सब कुछ समेटती हुई। चाँद की चाँदी जैसी उजास जब समुद्र की लहरों पर गिरती थी, तो पानी गुलाबी से चाँदी में बदलता हुआ प्रतीत होता था, मानो प्रकृति ने ख़ुद को किसी अदृश्य कलाकार के हाथों सजा लिया हो। उस रात को याद करते हुए मुझे वही दृश्य बार-बार घेर लेता है—एक ऐसा दृश्य जिसमें समय जैसे ठहर गया हो और मैं उसमें बस एक दर्शक की तरह मौजूद हूँ।

एक ऐसी रात बरसों पहले मैंने जी थी, जब हम इलाहाबाद विश्वविद्यालय के कैंपस के भीतर बैठकर सुबह होने का इंतज़ार कर रहे थे—सूरज के उगने तक, बिना कहीं गए, बिना कुछ किए, बस उस क्षण को जीते हुए। दोस्तों की एक मंडली थी और हम सब कुलपति कार्यालय के सामने वाली सड़क पर बैठे थे।

न जाने कितनी बातें थीं, कितनी हँसी, कितनी भावनाएँ—सब कुछ एक साथ बह रहा था। हम उन भावनाओं में डूबते-उतराते रहे, जैसे कोई नदी अपने प्रवाह में सब कुछ बहा ले जाती है। वह रात अब भी वैसी ही ताज़ा है, जैसे हमने उसे कल ही जिया हो। फिर ऐसी रात कभी नहीं आई‌ लेकिन क्या पता था कि वह रात तब आएगी जब मैं स्मृतियों के बोझ तले दबकर कराह रहा होऊँगा।

बसंत का समय था—फागुन का महीना—और होली के आस-पास का वह दौर, जब प्रकृति अपने पूरे शबाब पर होती है। वह रात भी उसी शबाब की चरम अवस्था थी। चाँद अपने पूर्ण वैभव में था, समुद्र अपने उफान में और वह शहर भी किसी उत्सव की तरह जीवंत था। जिस जगह हम थे, वहाँ हर चीज़ जैसे अपने चरम सौंदर्य पर थी।

जब हम वहाँ पहुँचे, तो भीड़ मेरी अपेक्षा से कहीं अधिक थी। एक क्षण को लगा कि यह भीड़ मुझे असहज कर देगी, शायद मेरे अनुभव को तोड़ देगी। मुझे पिछले वर्ष का महाकुंभ याद आ गया—वह विराट भीड़, वह उफान, वह अराजकता। लेकिन तुरत ही मन ने तसल्ली दी कि यह भीड़ उस भीड़ जैसी नहीं हो सकती। यहाँ एक सहजता थी, एक लय थी, जिसमें मैं ख़ुद को सहज पा सकता था।

हम दर्शन के लिए पंक्ति में लगे। मंदिर उस रात खुला था और भीड़ लगातार बढ़ रही थी। उस भीड़ में हर तरह के लोग थे—ग़रीब, मध्यवर्गीय, संपन्न, बच्चे, बूढ़े, महिलाएँ, पुरुष। कोई भजन गा रहा था, कोई थककर बैठ गया था, कोई जयकारे लगा रहा था, कोई अपने पैरों को सहला रहा था। हर किसी का अपना-अपना संसार था, लेकिन सब एक ही दिशा में बढ़ रहे थे।

मैं भी उसी प्रवाह में शामिल हो गया। तभी एक हाथ मेरी ओर बढ़ा—उसका हाथ। उसने कहा, “पकड़े रहना, नहीं तो छूट जाओगे।” क्योंकि हमारे मोबाइल जमा हो चुके थे।‌ बिछड़ने का मतलब था, खो जाना। उस भीड़ में यह बात केवल चेतावनी नहीं थी, एक तरह का आश्वासन भी थी। मैंने उसका हाथ थाम लिया। उस स्पर्श में एक अलग-सी गर्माहट थी—न प्रेम का आग्रह, न आकर्षण का आवेग—बस एक सहज, अभिभावक-सा भरोसा।

जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते गए, वह मुझे हर जगह इशारा करती—यहाँ प्रणाम करो, यहाँ झुको, यहाँ कुछ माँग लो। और मैं, जो अपने आपको एक तरह से नास्तिक मानता आया था, उसके कहे अनुसार करता चला गया। इलाहाबाद के दिनों में मैं वामपंथी छात्र राजनीति से जुड़ा रहा, जहाँ धार्मिक आस्थाएँ अक्सर प्रश्नों के घेरे में होती हैं। मूर्ति पूजा या मंदिर मेरे लिए कभी आकर्षण का केंद्र नहीं रहे, लेकिन प्रकृति—गंगा, यमुना, संगम—उन्होंने मेरे भीतर कहीं न कहीं आस्था की एक छोटी-सी लौ बचाए रखी थी।

शायद वही लौ उस रात काम आ रही थी।

उसका हाथ पकड़कर चलते हुए मुझे केदारनाथ सिंह की पंक्तियाँ याद आईं—

उसका हाथ
अपने हाथ में लेते हुए मैंने सोचा
दुनिया को
हाथ की तरह गर्म और सुंदर होना चाहिए।

सचमुच, वह हाथ वैसा ही था—गर्म, नम और आश्वस्त करने वाला।

भीड़ बढ़ती जा रही थी। हम धीरे-धीरे मुख्य द्वार की ओर बढ़े। रास्ते में मूर्तियाँ थीं, लोग प्रणाम कर रहे थे, और मैं भी वैसा ही कर रहा था—जैसा मैंने छात्रावास के दिनों में सीखा था—हल्का-सा झुककर, दाहिना हाथ सीने पर लाकर। मेरे भीतर का नास्तिक और उस क्षण का सहभागी—दोनों एक साथ चल रहे थे।‌ मैं सोचता दोस्ती-यारी में क्या आस्तिकता और क्या नास्तिकता।

जब हम उस काले पत्थर तक पहुँचे, उसने कहा—“इस पर चढ़कर कुछ माँगना।” मैंने क्या माँगा, यह अब धुँधला है, लेकिन इतना याद है कि मैंने उस हाथ को ही माँगा था—अगली बार भी वही हाथ मेरे साथ हो। मुझे नहीं पता था कि वापसी के बाद वह मेरे हाथ होगा या मुझसे छूट जाएगा।

भीड़, आवाज़ें, जयकारे—सब कुछ एक साथ घुलते जा रहे थे। “जय जगन्नाथ” की गूँज पूरे वातावरण में फैली हुई थी। उस भीड़ में एक बच्चा था, अपने पिता के कंधे पर बैठा हुआ, रोता हुआ, नींद से जूझता हुआ। उसके माता-पिता उसे जगाए रखने की कोशिश कर रहे थे—दर्शन के लिए। मैं उसे देखता रहा और सोचता रहा कि यह स्मृति उसके भीतर किस रूप में बसेगी—अभी तो वह कष्ट है, लेकिन शायद एक दिन वही स्मृति उसे मुस्कुराने पर मजबूर करेगी।

हम गर्भगृह के और निकट पहुँचे। अब भीड़ इतनी घनी थी कि साँस लेना भी कठिन लग रहा था। हर क़दम धक्कों के साथ आगे बढ़ रहा था। मैंने उसका कंधा कसकर पकड़ लिया था—जैसे कोई बच्चा अपने पिता को पकड़ता है, खो जाने के डर से।

और फिर वह क्षण आया—जब मेरी नज़र भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा और बलराम की मूर्तियों पर पड़ी। बस कुछ सेकंड और उतने ही समय में भीड़ ने मुझे आगे धकेल दिया।

“देखा?” उसने पूछा।

“हाँ” मैंने कहा।

उस छोटे-से उत्तर में जो कुछ था, उसे शब्दों में बाँधना शायद संभव नहीं।

मैं मंदिर के उस गर्भगृह से बाहर आया तो ऐसा लगा मानो किसी ऐसे बंद, घुटन भरे संसार से निकलकर खुली हवा में आ गया हूँ, जहाँ साँस लेना भी एक सुख है। अभी कुछ क्षण पहले तक जिस भीड़ में मैं अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जद्दोजहद कर रहा था, वही भीड़ अब पीछे छूटती जा रही थी और सामने खुला आकाश, ठंडी हवा और एक अजीब-सी शांति थी।

मेरे हाथ अब मुक्त थे, पर भीतर कहीं एक आदत-सी बन गई थी उस हाथ को थामे रहने की। मैंने फिर से उसका हाथ पकड़ लिया—जैसे कोई फूल हाथ में आ जाए तो उसे यूँ ही छोड़ देने का मन नहीं करता।

हम दोनों कुछ देर तक बिना कुछ बोले चलते रहे। थकान हमारे भीतर उतर चुकी थी—शारीरिक भी और मानसिक भी। उस थकान में एक अजीब-सी तृप्ति घुली हुई थी। उसने मुझे एक और मंदिर की ओर इशारा किया, जहाँ लोग सिक्के चिपकाकर कुछ माँग रहे थे। उसने कहा—“कुछ माँगोगे?”

मैंने पहले तो टालना चाहा, लेकिन फिर उसके कहने पर आगे बढ़ गया। वहाँ जाकर मैंने भी एक सिक्का चिपकाया। क्या माँगा, यह अब धुँधला है, लेकिन इतना याद है कि उसने मुझसे कहा था—“मेरे लिए कुछ माँग लेना”—और शायद मैंने वही किया था।

उस समय भी मैं अपने भीतर के उस द्वंद्व को महसूस कर रहा था—एक ओर वह व्यक्ति जो अपने को नास्तिक मानता है और दूसरी ओर वह क्षण जहाँ वह बिना किसी तर्क के, बिना किसी प्रतिरोध के, उसी प्रवाह में बहता चला जा रहा है। शायद यह आस्था नहीं थी, शायद यह सिर्फ़ उस क्षण की सच्चाई थी, जिसमें मैं था।

भीड़ अब भी कम नहीं हुई थी, लेकिन उसके भीतर की तीव्रता थोड़ी कम लग रही थी। हम धीरे-धीरे चलते हुए मंदिर के उस हिस्से में पहुँचे जहाँ से शिखर साफ़ दिखाई दे रहा था। चाँद अब भी आकाश में था—पूर्ण, उज्ज्वल और स्थिर। उसने मुझे बताया कि मंदिर की ध्वजा जिस भी दिशा से देखो, उसी दिशा में लहराती प्रतीत होती है। मैंने उसे परखने की कोशिश नहीं की, बस उस बात को वैसे ही स्वीकार कर लिया जैसे उस रात की हर बात को स्वीकार करता जा रहा था।

हम वहाँ बैठ गए—एक चबूतरे पर, जहाँ और भी लोग थे। कोई थककर लेटा हुआ था, कोई बात कर रहा था, कोई चुपचाप आसमान देख रहा था। उस जगह में एक अजीब-सी स्वतंत्रता थी—जैसे लोग अपने-अपने छोटे-छोटे संसार लेकर वहाँ आए हों और कुछ देर के लिए उन्हें खुला छोड़ दिया हो।

मेरे बग़ल में बैठी वह लड़की और उसके साथ के लोग आपस में बातें कर रहे थे। कभी-कभी वह मेरी ओर भी देख लेती और हल्की-सी मुस्कान दे देती। उस मुस्कान में कोई औपचारिकता नहीं थी, बस एक सहजता थी—जैसे हम दोनों एक ही अनुभव के सहभागी हों।

उसी समय एक छोटी-सी बच्ची बार-बार हमारे पास आ रही थी। वह आती, रुकती, मुस्कुराती और फिर भाग जाती। उसके पीछे उसकी माँ थी, जो उसे बार-बार पुकार रही थी। वह बच्ची तरह-तरह की आवाज़ें निकाल रही थी—जानवरों की, पक्षियों की—और उसकी माँ उसे प्रोत्साहित कर रही थी। मैं उसे देखता रहा और सोचता रहा कि यह ज्ञान, यह सहजता, यह प्रकृति से जुड़ाव—यह सब कहाँ से आता है। शायद यह वही जीवन है जिसमें कृत्रिमता कम और अनुभव ज़्यादा होता है।

धीरे-धीरे रात गहराती गई। समय का अंदाज़ा लगाना मुश्किल था, लेकिन घड़ी ने जब बारह बजने का संकेत दिया, तभी अचानक वातावरण में एक हलचल हुई। दूर से ढोल-नगाड़ों की आवाज़ आने लगी। लोग नाचते हुए, अबीर उड़ाते हुए मंदिर परिसर में प्रवेश कर रहे थे। “हरे गोविंदा, हरे गोपाला” की गूँज पूरे वातावरण में फैल गई। मैं उस दृश्य को समझने की कोशिश कर रहा था, लेकिन वह समझ से ज़्यादा अनुभव का विषय था।

उसने मुझे बताया कि यह परंपरा है—होली की शुरुआत यहीं से होती है। लोग सात परिक्रमा करते हैं, नाचते हैं, गाते हैं। मैंने देखा कि रोशनी होने के बावजूद कुछ लोग मशाल लिए हुए थे। उसने बताया कि यह भी एक परंपरा है—जब बिजली नहीं होती थी, तब इसी तरह लोग रोशनी लेकर चलते थे, और आज भी वह परंपरा निभाई जाती है।

मैं उस दृश्य को बस देखता रहा—लोगों का वह सामूहिक उल्लास, वह ऊर्जा, वह रंग, वह आवाज़—सब कुछ एक साथ मिलकर एक ऐसा अनुभव बना रहे थे, जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

जब वह सब समाप्त हुआ, तो हम वहाँ से उठे। अब रात काफ़ी हो चुकी थी। कहीं-कहीं पानी बाँटा जा रहा था। मैंने पानी पिया और एक अजीब-सी राहत महसूस की। उसने पूछा—“अब क्या करोगे?” मैंने कहा—“जो तुम कहो।”

हम प्रसाद लेने गए। मेरे लिए यह भी एक नया अनुभव था। जीवन में पहली बार मैं किसी मंदिर से प्रसाद ले रहा था। मैं मना कर सकता था, लेकिन मैंने मना नहीं किया। शायद मैं उस पूरे अनुभव को बिना तोड़े जी लेना चाहता था।

हम मंदिर के एक ऊँचे स्थान पर पहुँचे, जहाँ से पूरा शहर दिखाई दे रहा था। वहाँ कुछ देर हम खड़े रहे—चुपचाप। फिर उसने कहा—“चलो।”

हम बाहर निकले और एक रास्ते पर चलने लगे जो समुद्र की ओर जाता था। रात धीरे-धीरे सुबह में बदल रही थी। हवा में नमी थी, और एक हल्की-सी धुँध छाई हुई थी। चलते-चलते हम उस जगह पहुँचे, जहाँ से समुद्र दिखाई देता था।

पहली बार मैंने समुद्र को इतने क़रीब से देखा—उसका विस्तार, उसकी लहरें, उसकी आवाज़। वहाँ रेत पर छोटे-छोटे घोंघे थे। मैं उन्हें उठाकर देखने लगा। वे रेत में गहरे धँसे हुए थे, जैसे अपनी जगह से हटना नहीं चाहते हों। मैं उन्हें निकालकर समुद्र में फेंक देता और लहरें उन्हें अपने साथ ले जातीं।

अचानक एक तेज़ लहर आई और मेरे पैरों को भिगो गई। मैं चौंक गया, लेकिन उस क्षण में भी एक अजीब-सी ख़ुशी थी—जैसे समुद्र ने ख़ुद आकर मुझे छुआ हो।

सूरज निकलने वाला था, लेकिन धुँध इतनी थी कि उसका उगना दिखाई नहीं दिया। जब धुँध छंटी, तब वह ऊपर आ चुका था—लाल, लेकिन पूरी तरह लाल नहीं; गुलाबी, लेकिन पूरी तरह गुलाबी नहीं—एक ऐसा रंग जिसे शब्दों में बाँधना कठिन है।

वह अपने दोस्तों के साथ फ़ोटो खिंचवा रही थी और मैं समुद्र को देख रहा था। कभी-कभी मैं उससे कुछ कह देता, कभी समुद्र से ही बात करने लगता—कविताएँ, शेर, जो भी याद आता।

फिर हम वहाँ से चले। रास्ते में कोणार्क का मंदिर दूर से दिखाई दिया। समय कम था, इसलिए हम रुके नहीं। उसने कहा—“अगली बार आना, तब देखना।”

मैंने बस सिर हिला दिया।

थकान अब अपने चरम पर थी। गाड़ी में बैठते ही उसने कहा—“सो जाओ।” मैंने कोशिश की, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। फिर अनजाने में मैंने अपना सिर उसकी गोद में रख दिया। उसने कुछ नहीं कहा। कुछ ही देर में मुझे नींद आ गई—गहरी, सुकून भरी नींद।

जब मैं जागा, तो महसूस हुआ कि उसका हाथ मेरे बालों में था—धीरे-धीरे सहलाता हुआ। उसने मुझे उठाया और कहा—“हम पहुँच गए हैं।”

हम होटल गए, सामान लिया और फिर एयरपोर्ट की ओर चले। वहाँ जाकर पता चला कि मेरी फ़्लाइट निकल चुकी है। अब मुझे अगली फ़्लाइट लेनी थी।

वह मुझे छोड़ने आई। विदा का वह क्षण भारी था। मैं उसे गले लगाना चाहता था—और मैंने लगाया। उस आलिंगन में न जाने कितनी बातें थीं—अकथ, अनकही, अनसुनी।

जब मैं उससे अलग हुआ, तो लगा कि मेरे भीतर कुछ हल्का हो गया है—जैसे कोई बोझ उतर गया हो, जैसे कोई अपराधबोध ख़त्म हो गया हो।

मैं एयरपोर्ट के भीतर चला गया—एक नई शुरुआत की ओर।

और जो कुछ उस यात्रा में घटा, वही सब अब स्मृति बनकर मेरे भीतर जीवित है—एक ऐसी स्मृति, जिसे मैं चाहूँ तो भूल सकता हूँ और चाहूँ तो जीवन भर जी सकता हूँ।

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