Font by Mehr Nastaliq Web

कहानी : काजल की कोठरी

दिन के सवा ग्यारह बज रहे हैं और कमरे में गहरा अँधेरा छाया हुआ है। पर्दे गिराए हुए, दो-दो खिड़कियाँ लेकिन दोनों बंद। फ़र्श एकदम चिकट, कमरे के बाहर एक सड़े हुए कपड़े को डोरमैट के रूप में बिछाया हुआ है। अलमारियों के ऊपर कई-कई जाले लटक रहे हैं। निचले ड्रॉर में एक एल्युमिनियम का डिब्बा है, जिसमें ताली लगी है—मतलब छोटा ताला। उस डिब्बे में हैं—तीन गाउन, एक नैपकीन, दो पैजामे, दो बनियान और एक बिल्कुल साफ़ बड़ा-सा टॉवेल। ये कपड़े इतने साफ़ है कि कपड़ों में से राजूगोटा साबुन—जो किलो के भाव से पंसारी की दुकान पर मिलता है—की गंध दूर से ही आ रही है। पूरे कमरे में अगर कुछ साफ़ है तो बस वहाँ पड़े कुछ कपड़े। कमरे में एक सफ़ेद पंखा भी लटक रहा है। वह पंखा जितना सफ़ेद है, उतनी ही काली गर्द की परत उस पर जमी हुई है। दो सिंगल दीवान और हैं, जिस पर पति-पत्नी दिनभर सोये रहते हैं। पलंग के नीचे दो अलग-अलग मग्गे भी रखे हैं।

“मग्गे?”

“जी देव बाबू! बाथरूम में नहाने के काम आने वाले मग, जो ज़र्दा और कफ़ थूकने के लिए रखे गए हैं। दोनों के पेशाब करने के लिए दो यूरीन पॉट भी हैं। बाक़ी पैराशूट तेल की वो नीली वाली बड़ी बोतल है, जिसे दोनों दिनभर एक-दूसरे की देह पर मलते रहते हैं।”

“कई बार तो शर्म के मारे मैं बाहर निकल आता हूँ, दोनों की कई हरकतें शर्मनाक हैं।”

“अरे क्या बक रहे गौरी भाई?”

“सही कह रहा हूँ, बिल्कुल आँखों देखा। आप उस कमरे में दो मिनट खड़े नहीं हो सकते, इतनी तेज़ बदबू रहती हैं कि आप वहीं उल्टी कर देंगे।”

“इससे साफ़ तो जेलों की कोठरियाँ होती होंगी, गौरी भाई”

“बिल्कुल देबू भैया, मेरा मतलब देव भैया”

“हाहाहा... तुम मुझे कुछ भी पुकार सकते हो। तो तुम चाय-पानी देने भी कई बार कमरे में जाते ही होंगे?”

“जाना पड़ता है, खाना और नाश्ता समय-समय पर देने”

“टीवी-रेडियो कुछ नहीं है कमरें में?”

“है, लेकिन बुढ़िया चालू नहीं करने देती।”

“तो क्या दोनों दिनभर चुप रहते हैं?”

“नहीं, जब-जब जागते हैं अपना अतीत याद करते हैं। गालियाँ देते हैं, पहले झगड़ा फूल कँवर भाभीसा से शुरू होता है, फिर गालियों के पत्थर हर जगह पड़ते हैं”

“क्या दोनों पानी-वानी लेने भी नहीं उठते हैं?”

“नहीं, बुढ़ऊ कई बार बोतल भरने उठ जाया करता है और तेल मलने तो उठता ही है। दोनों के पास एक-एक बोतल है—प्लास्टिक की नीली बोतल, जिसके तल और किनारों पर हरी काई की कई-कई लकीरें जम रही हैं”

“तो तुम साफ़ क्यों नहीं करते?”

“क्यों भई, मैं क्यों साफ़ करूँगा? मुझे उस नरक में रहने के दस हज़ार मिलते हैं, मैं साँस भी नीचे लॉबी में जाकर लेता हूँ। पूरा कमरा दवाई, बाम, विक्स, पेशाब और कफ़ की मिश्रित गंध से दिनभर भभकता है। वो कोई साधारण कमरा नहीं है, काजल की कोठरी है... कुछ देर बाद तो मुझसे भी बदबू आने लगती है।”

“भैया, आप क्यों इतना चाव दिखा रहे हो दो बूढ़ों की ज़िंदगी में?”

“गौरी भाई! बात यह है कि आजकल स्कूल की छुट्टियाँ चल रही है, सो फ़्री हूँ, कुछ लेख लिखने में व्यस्त हूँ। सिगरेट ख़त्म होती है तो नीचे आ जाता हूँ, तुम्हारा और मेरा नीचे आने का समय लगभग एक ही है। बस इसलिए तुमसे कुछ गप्प हो जाती है। वैसे बड़ा दिलचस्प है इन बूढ़ों के क़िस्से सुनना। पहले एक दया का भाव आया करता था किसी वृद्ध-अकेले व्यक्ति को देखकर, लेकिन अब पूरा दृष्टिकोण बदल गया है।”

“आपको उन दोनों के क़िस्से सुनने मिलते हैं, रोटी बनाने का काम भी दे दीजिए। उस घर में कुछ ज़्यादा काम तो करने को है नहीं, दोनों की सुबह की चार रोटी-सब्ज़ी और रात का भी बस उतना ही खाना बनाना होता है। आप भी खाना बनाने का काम दे दीजिए, कुछ पैसा-वैसा कम भी दे देंगे तो चलेगा।”

“नहीं भाई! एक साधारण स्कूल मास्टर और असफल हिंदी लेखक के पास इतनी सुविधा नहीं होती कि एक  कुक रख सकें। लेकिन तुम मुझे उस घर का वृतांत बताते रहो। थोड़ा बहुत... तुम्हारे चाय-पानी-बीड़ी का ख़र्चा तो मैं उठा ही लूँगा।”

ग्राउंड फ़्लोर की लॉबी में गौरी और देव बाबू ने एक साथ चिल्लाने की आवाज़ सुनी।

गौरी भाई तुम्हारा बुलावा आ गया, इतना बोलकर देव बाबू अपने फ़्लैट की ओर चल दिए।

“एय गोरी आज नासता अच्छा नहीं बणाया तुमने, मिर्ची फूँक रखी थी कोरी।”

“चंदन आज पखाना उतरा नहीं लगता है, थोड़ा ईसबगोल ले ले। कभी तो मेरी बात माण जाया कर”

“आग लगे तुम्हारे ईसबगोल को, मेरी तो वही पुरानी दवाई मँगवा दो”

“रे गोरी सुण एक ज़माना था पूरा मोहल्ला थर-थर काँपता था इस बुढ़िया से।” बूढ़ा-बूढ़ी दोनों फिस्स-फिस्स कर हँसने लगे।

“चंदन तुम्हें याद है, बड़ी बहू के परिवार की ऐसी की तैसी कर दी थी तूने। रे गोरी यह वही चंदन है, जिसके अजगर लिपटे रहते हैं। अजगर का ज़हर भर गया है इसके अंदर। फूल कँवर पर दो बार पीपा भरा किरासिन उड़ेल दिया था इसने। उस बिचारी को हर जगह आग दिखने लगी थी, ताप के मारे उसका बदन जलता था, मगर इस डाकण ने उसे डॉक्टर को नहीं दिखाया।”

राठौड़ साहब हँसने लगे तो उसकी बुढ़िया भी मुस्कुराने लगी।

“हाँ तो क्या ग़लत किया, सोने की चेन के नाम पर पूरे मोहल्ले में तमासा बन गया था। उस दिन तीली चासने में थोड़ी देर कर दी। मेरे दिनमान ख़राब थे। मैंने ऐसा भी कुछ नहीं किया, जिस बात का इतना बतंगड़ बन जाए, हो गया झाळ में। तुम्हारी बताऊँ?”

“तुमने क्या-क्या किया कह दूँ तो कान से ख़ून बहने लगे”

“ज़बान खींच लूँगा ज़्यादा बोली तो हरामख़ोर लुगाई”

“आए बड़े राठौड़-राजपूत, देख्यां थारा जिसा घणा। बिंदणी की पेली ओलाद मेरा पोता नहीं मेरा देवर था, और सुणो सारे मोहल्ले को पता थी ये बात। वो तो मैं थी सब देखकर भी आँखों की पट्टी कभी खोली ही नहीं। खुद री माँ डाकण किण लागे। अपने आदमी की बात रखणी पड़ती है, पता ही था गर्मी जादा है मेरे खसम में। खुद की बोले तो अपनी ही जांघ उघाड़नी पड़ती है।”

“तू चुप कर। डाकण तू। क्या तूने कभी कुछ नहीं किया। ईर्ष्या के कारण तूने भरपेट रोटी न दी उसने”

“की बात की रोटी… दो-दो खसम हा”

“सरम कर ले रे मालजादी, सबको खा गई, तेरे जोग ही इधर पड़े हैं”

“क्यों? की बात की सरम? मेरी सास कदे मन दी न भरपेट रोटी। फिर बहु किस बात की? बिका दो खसम हा।”

इतने में गेट की घंटी बजती है।

“रे गोरी मर गया के दरवाज़ा खोल।”

गौरीनाथ गेट पर देखते ही स्तब्ध हो जाता है। भाभीसा के माँ-बाप, वो भी बिना बताए। गौरीनाथ अचरज में था कि इस घर में सज्जन भाईसा के अलावा कोई आता नहीं और अचानक भाभीसा के मायके वाले।

गौरीनाथ दरवाज़े पर उनको छोड़कर अंदर बताने जाता है।

“अंदर इसी कमरे में बुला ला। लेकिन ये पिसाब का डिब्बा थोड़ा पलंग के पीछे खसका दे।”

गौरीनाथ, राठौड़ साहब की छड़ी से दोनों डिब्बे पीछे करते हुए पूछता है, “थोड़ा पर्दा इक तरफ़ कर दूँ?”

“नहीं, रोशनी आँखों पर पड़ती है। लाइट का बटन चास दें और चाय चढ़ा दे।”

फूल कँवर भाभीसा के आधे बूढ़े, आधे जवान पिता ने जवान दिखने के प्रयास में मूँछों को ताव दे रखा था। सफ़ारी सूट में तन के कुर्सी पर बैठते ही नाक सिकोड़ते हुए, रुमाल नाक के पास धरा तो राठौड़ साहब और उनकी पत्नी ने ऐसे घूरकर देखा कि उन्होंने रुमाल चुपचाप जेब में धर लिया। उनकी पत्नी गूँगी गुड़िया-सी बिल्कुल फूल भाभीसा की तरह दोनों हाथ जुड़े हुए, नाक तक साड़ी का पल्लू खींच बैठी थी।

चाय की चुस्कियाँ दोनों तरफ़ ख़त्म हुई। फूल भाभी के पिताजी गला खकाराते हुए बोले, “जो भी हुआ आदमियों के बीच होता ही रहता है। जहाँ लुगाइयाँ होंगी, वहाँ राड हुए बिना कोई बात नहीं हो सकती। बेटी तो हमने ब्याह दी, वह अब आपकी हुई। आप हमारी खींचोगे या हम आपकी, नंगे हम दोनों ही होंगे। आप इस उम्र में अकेले पड़े हो, गाँव-गुवाड़ तक बात पूग ही जाती है। दोनों तरफ़ थू-थू हो रही है।”

डोकरी बीच में उछल पड़ी, “आपकी फूल ससुराल में कितने खसम बणा रखी थी, ठा है कि नइ?”

“चुप कर रांड! मुँह बंद रखा कर। देख समधन जी किस तरह भाईजी के सामने शांत है।”

“बग़ल में बैठी हुई फूल भाभी की माँ की आँखों में पानी भरा था, लेकिन मजाल कि वो बह जाएँ। देव बाबू उनकी पलक भी शायद तँवर साहब से पूछकर झपकती होंगी।”

गौरी, देव बाबू को आगे की घटना बताने लगा।

“तँवर साहब आपकी लड़की हमारे घर की बिंदणी है और इधर-उधर मोटयारों में थोड़ी बहुत ऊँच-नीच हो ही जाती है। आपने भी रेगिस्तानी बालू का ख़ूब स्वाद चखा है, थे तो कुँवारी हो या व्यावली, किसी थाली को अलुणा नहीं छोड़ा, आपके सुकर्म भी किसी से छाना नहीं है। बेहतर होगा अपनी बाई को समझाएँ कि हमारी बुढ़ापे कि इज़्ज़त रखें। आप इस डोकरी को देख ही रहे हैं, कैसे बुद्धि में पाले पड़ गए हैं।”

“दो ठाकुर आमने-सामने, एक तँवर और एक राठौड़। एक जो इस घर की ब्यावली बहु को अपने पास बैठा रखा है और एक ससुर जो उसे खा गया। आज कैसे अपने पापों की सामटुणी कर रहे हैं।”

“अरे मरांड चुप होज्या। ये छड़ी से तेरा मुँह एक दिन हमेशा के लिए बंद कर दूँगा।”

देव बाबू ने गौरी को रोका—“बाप रे! गौरी भाई और सुना नहीं जाएगा। आप रहने दो।”

“देव बाबू आप तो अंत सुनो, हमारी नौकरी अब हो गई पूरी। अब वापस अपने गाँव जाएँगे। आपको पता है—अंत में फूल भाभी की माँ, दोनों बूढ़े और बुढ़िया को एक-एक मोटा लिफ़ाफ़ा पकड़ा गई। अब ये दोनों दानवों के पास फूल कँवर भाभी रहेंगी।”

“नहीं गौरी भाई उनकी कहानी बताना अब ख़त्म करो, कालिख़ मुझ पर भी चढ़ने लगेगी। मुझे अपने पुरुष होने पर घिन्न आने लगी है। फिर कभी मिलेंगे। याद रखिएगा।”

'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए

Incorrect email address

कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें

आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद

हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे

बेला लेटेस्ट