Font by Mehr Nastaliq Web

बेला

साहित्य और संस्कृति की घड़ी

08 जनवरी 2025

‘किसे आवाज़ दूँ जो मुझे इस जाल से निकाले!’

‘किसे आवाज़ दूँ जो मुझे इस जाल से निकाले!’

14 दिसंबर 2024 इच्छाएँ बेघर होती हैं, उन्हें जहाँ भी चार दीवार और एक छत का आसरा दिखता है, वो वहीं टिक जाना चाहती हैं। मनुष्य का मन इच्छाओं का पहला घर है, चारों तरफ़ भटकने के बाद पहली बार उसे मनुष्य

07 जनवरी 2025

द वेजिटेरियन : हिंसा और अन्याय से मुक्ति का स्वप्न

द वेजिटेरियन : हिंसा और अन्याय से मुक्ति का स्वप्न

“मुझे एक स्वप्न आया था” कोरियाई लेखिका हान कांग के उपन्यास ‘द वेजिटेरियन’ के मूल में यही वाक्य है, जो उपन्यास की पात्र योंग-हे निरंतर दुहराती रहती है। यह वाक्य साधारण ध्वनित कर सकता है लेकिन यह शो

05 जनवरी 2025

एक आवाज़ के ख़याल में उलझा जीवन

एक आवाज़ के ख़याल में उलझा जीवन

मेरे ख़याल से उससे मेरी पहली मुलाक़ात किशोरावस्था के दौरान हुई थी। यह मुलाक़ात इतनी संक्षिप्त थी कि मुझे याद नहीं हमने उस दौरान क्या-क्या बातें की। कहते हैं ख़याल में वही रहते हैं जो कभी मिलते नहीं,

04 जनवरी 2025

काश! बचपन में हम बड़े होने का सपना न देखते

काश! बचपन में हम बड़े होने का सपना न देखते

पूर्व बाल्यावस्था में मिट्टी जीवन का सबसे अनमोल रत्न था। हम पूरे दिन मिट्टी में सने रहते थे। पैदा हुए तो मिट्टी से पेट भर लिया करते थे। थोड़ा और बड़े हुए तो मिट्टी के खेल-खिलौने बना लेते। हमारी गाड़ि

03 जनवरी 2025

कुसुमपुर के एक बूढ़े आदमी की कथा

कुसुमपुर के एक बूढ़े आदमी की कथा

कुसुमपुर के वृद्ध फ़क़ीरचंद जाएँगे बड़ाबाबू के पास। उनकी पीठ पर एक छड़ी है, जिसमें एक छोटी-सी पोटली लटकी हुई है। बूढ़ा आदमी थोड़ा झुक कर चलता है। अब प्रकाश होने का समय है, इस चैत माह की सुबह में पृथ्व

01 जनवरी 2025

मुझे नए वर्ष की शुभकामना देने में इसीलिए डर लगता है!

मुझे नए वर्ष की शुभकामना देने में इसीलिए डर लगता है!

साधो, बीता साल गुज़र गया और नया साल शुरू हो गया। नए साल के शुरू में शुभकामना देने की परंपरा है। मैं तुम्हें शुभकामना देने में हिचकता हूँ। बात यह है साधो कि कोई शुभकामना अब कारगर नहीं होती। मान लो कि

31 दिसम्बर 2024

...इस साल का आख़िरी ख़त

...इस साल का आख़िरी ख़त

एमजे के लिए इस साल का आख़िरी ख़त एक बीत गए में कुछ जोड़ना जितना मुश्किल है, उतना ही मुश्किल है उसे याद करना। एक ताख़े पर कुछ किताबें जुड़ जाती हैं, जैसे उनका कुछ ख़ुद से जुड़ जाता है। एक मन होत

29 दिसम्बर 2024

बिल्लियों की बेपरवाही पर आप क्या सोचते हैं!

बिल्लियों की बेपरवाही पर आप क्या सोचते हैं!

न जाने कितनी सदियों से अब तक आदमी कुत्तों, बैलों, घोड़ों, मुर्ग़ों और अन्य जानवरों से घिरा रहा; लेकिन बिल्लियाँ इस पूरे इतिहास के ऊपर बैठकर, नीमबाज़ आँखों से धूप सेंक रही हैं।     बिल्लियाँ चलता-धड़कत

28 दिसम्बर 2024

साहित्य के दरवाज़े के द्वारपाल की भूमिका में

साहित्य के दरवाज़े के द्वारपाल की भूमिका में

एक ‘टके सेर भाजी टके सेर खाजा’ एक लोक कहावत है जिससे हिंदी साहित्य के पाठक संभवतः भारतेंदु के नाटक ‘अंधेर नगरी’ के माध्यम से परिचित हुए (कुछ पहले भी रहे होंगे)। भारतेंदु के नाटक ‘अंधेर नगरी’ का यह

25 दिसम्बर 2024

नए लेखकों के लिए 30 ज़रूरी सुझाव

नए लेखकों के लिए 30 ज़रूरी सुझाव

पहला सुझाव तो यह कि जीवन चलाने भर का रोज़गार खोजिए। आर्थिक असुविधा आपको हर दिन मारती रहेगी। धन के अभाव में आप दार्शनिक बन जाएँगे लेखक नहीं।  दूसरा सुझाव कि अपने लेखक समाज में स्वीकृति का मोह छोड़