साहित्य और संस्कृति की घड़ी
दूर तक फैले कीकर और बबूल के पेड़ों के बीच कच्ची पगडंडी पर सीताफल के दो पेड़ थे। उसी कच्ची पगडंडी पर चलते हुए ज़रा पीछे की ओर गरदन मोड़ लो तो सरकारी स्कूल का फाटक दिखने लगता था। लड़का-लड़की छुट्टी के घ
मैं अब किसी से प्रेम नहीं कर पाती हूँ। मैं इसे समझ पा रही हूँ कि मैं क्यों किसी से प्यार नहीं कर पा रही हूँ, लेकिन लोग इसे समझ नहीं पा रहे हैं। मेरी आँखों में अब किसी के लिए आँसू नहीं आते। सिर्फ़ एक
‘‘अगर तुम किसी के लिए अच्छा नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहना...’’ अज्ञात-काया में जाने किस तरह की रोशनी होती है। इन दिनों कथाकार की ज़िंदगी अधलिखी पंक्तियों जैसी है। उसके सपनों की ज़मीन पर अनहोनी क
कई अनुपस्थितियों से अन्य हाज़िरियों का पंचांग मज़बूत हो जाता है, कई रविवासरीय दर्ज करने के सुयोग बनते हैं। यह हाज़िरी किताब पर लगी। पढ़ने के बाद आख़िरी पन्ने पर। ब-तर्ज़ ‘ब्रुक्स वॉज़ हेयर’ पेंसिल से
09 फरवरी 2026
मैं पहली बार शहर आए किसी गँवई किसान-सा निहारता था चीज़ों को अलबत्ता देखे थे कई शहर जीवन के धूप-छाँव में यात्राएँ कहीं पीछे छूट जाती हैं। जीवन में आने वाली समानांतर समस्याएँ समझौते करने को वि
हर आदमी को फ़रवरी मयस्सर नहीं होती। कितना भी झींख लो, रो लो, कलप लो—एहसास-ए-फ़रवरी नहीं बदा तो कहाँ से मिलेगा। टापते रहिए इधर से उधर, फ़रवरी नहीं आएगी, बदनामी ज़रूर हो जाएगी। फ़रवरी महीना नहीं, मनोदश
शीत और शाक का संबंध घनिष्ठ है। जाड़े से जैसा निकटस्थ जुड़ाव इन सब्ज़-रंग भाजियों का है, वैसा शायद ही किसी और का हो। सर्दियों की आगत केवल और केवल एक मौसमी करवट भर नहीं है, बल्कि ऋतुचक्र का यह घूमता पह
जाड़े में हैंडिल जितना चलाओ, नलके से उतना गरम पानी आता है। सितली फुआ दुकान जाने से पहले लोटा भरकर ताज़ा पानी सूर्य देवता को चढ़ाकर, सुखशंकर की बहु लीला के पास आती है। रिश्ते में दोनों पड़ोसी और ननद-भावज
03 फरवरी 2026
गाँव-देहात वाला घर-दुआर। यहाँ हिस्सा लेने-देने का मसला गंभीर होता है और बहुत जटिल भी। यह दोधारी तलवार है। तमाम लोग तो हैं कि बिना कुछ किए केवल पैतृक विरासत होने के नाते पाई-पाई का हिस्सेदार होना चाहत
साहित्य ‘में’, या साहित्य ‘से’ किसी क़िस्म की कोई बदमाशी होती नहीं, या हो नहीं सकती—ऐसी कोई बात अगर कही जाती है, तो मैं तो कम से कम ठीक-ठीक नहीं ही कह सकता कि इस बात में किसकी तौहीन ज़्यादा है, बदमाश