अथ सुचित्रा कथा! जिसे कथाकार पूरा न कह सका...
अतुल तिवारी
12 फरवरी 2026
‘‘अगर तुम किसी के लिए अच्छा नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहना...’’
अज्ञात-काया में जाने किस तरह की रोशनी होती है। इन दिनों कथाकार की ज़िंदगी अधलिखी पंक्तियों जैसी है। उसके सपनों की ज़मीन पर अनहोनी की चादर बिछी है जिस पर भविष्य के बजाय केवल स्मृतियाँ फिसल रही हैं। सुचित्रा दीदी कहाँ हैं? यह कथाकार को नहीं पता। ...और कथाकार को जो नहीं पता—शायद, आश्वस्ति और यक़ीन शिल्प में―वह सबसे सुंदर है।
कॉलेज के दिनों में सुचित्रा दीदी अच्छी पेंटर थीं। वह मन के सीलन से रंग उठाती थीं। एक बार हॉस्टल की दीवार पर उन्होंने पेड़ बनाया और फिर देखा कि पेड़ के भीतर निकलने को ही बैठी एक चिड़िया भी है। सुचित्रा दीदी को सुरों की क्लासिकल परख नहीं थी। उनकी आवाज़ लता मंगेशकर जैसी नहीं थी, फिर भी वह बहुत सुंदर गाती थीं। वह समझदार थीं—उस क़िस्म की नहीं जिसे हम नौकरी और व्यवहार की भाषा में मापते हैं। वह बच्चों और बिल्लियों को बिना आदेश और बिना दया के प्यार करती थीं। सुचित्रा दी ने कई बार गिलहरियों को भी ‘छोटकी’ कहा है।
कथाकार उन्हें याद करते हुए बहुत कुछ कहता है। मसलन वह आज भी कंडक्टर से दो रुपये के लिए लड़ रही होंगी। आज भी उन्हें आइसक्रीम वाले की ठगी बर्दाश्त नहीं होगी। वह कॉलेज के दिनों की तरह आज भी बिहार के किसी दुर्दांत रलेवे स्टेशन पर अकेले निकल जाती होंगी। साहस और सहजता की जटिल परत थीं सुचित्रा दी। कथाकार को लगता है कि शायद अब वह कम से कम तीस हज़ार की नौकरी तो करती ही होंगी। ...और इस भीषण महँगाई में सारे चैलेंज को अच्छे से हैंडल भी कर लेती होंगी। उन दिनों उन्हें मेकअप की समझ नहीं थी। लैकमे वाली सेल्सगर्ल उन्हें हर बार मैनिपुलेट कर ले जाती थी। कथाकार कहता है कि उनकी शादी अरेंज होगी। ...और शादी के तीसरे महीने वह पति से कहेंगी―“पहले की ज़िंदगी कौन-सी बहुत शानदार थी जो अब कोई अफ़सोस हो।” ...और उस वाक्य में कोई कड़वाहट नहीं होगी।
सुचित्रा दीदी किसी को पानी की बोतल देते हुए उसके ढक्कन को कस कर बंद नहीं करती थीं। उन्हें पता था कि कुछ उँगलियाँ कमज़ोर होती हैं। वह चुप रहती और भरोसे में जीती थीं। भरोसा उनका प्रिय हथियार था और उनकी पराजय भी। आगे कथाकार ने लंबे एकालाप और उपसंहार-वाक्य में बताया कि सुचित्रा दीदी एनिमेटेड फ़िल्मों की वह मासूम बैंबी हैं जो सिखाती हैं, “अगर तुम किसी के लिए अच्छा नहीं कह सकते, तो कुछ भी मत कहना।”
वह दुकानदार को ‘भइया’, रिक्शावाले को ‘आप’ और गार्ड को ‘दादा’ कहकर काम चला लेती थीं। इससे उनकी दुनिया थोड़ी नरम हो जाती थी। शब्दों के कोनों से धार हट जाती थी। उनकी बहुत-सी बातें तब समझ नहीं आती थीं। अब भी पूरी तरह नहीं आतीं। बच्चों से ऐसे बात करती थीं, जैसे बच्चे उनसे बड़े हों। और बड़ों से ऐसे जैसे वे थके हुए बच्चे हों। यह एक दुर्लभ संतुलन था। दुख में भी अजीब तरह से स्थिर रहने, हर दिन दुनिया को थोड़ा कम दोष देने और चुप्पी को एक भाषा की तरह इस्तेमाल करने का संतुलन भी कम दुर्लभ नहीं था।
कई छोटे-छोटे दृश्य हैं। कोई एक तस्वीर नहीं। चाय के कुल्हड़ को दोनों हाथों से थामे। सड़क किनारे किसी बच्चे के जूते बाँधती और रात में हॉस्टल की छत पर लेटी हुई। बेकार की बहस में बीच में हार मानकर हँस देती हुई। कोशिश को परिणाम से ज़्यादा ज़रूरी मानती हुई सुचित्रा दी के कई दृश्य याद हैं। वह कथाकार की आदत, वाक्य, चेतावनी और दिलासे में हैं। ...और पेन, रूमाल, चप्पल का एक जोड़ा और कभी-कभी पूरी की पूरी दिशा―चीज़ों को खो देने की असाधारण निपुणता में भी हैं।
कथाकार की नींद अब गहरी हो रही है। उसने आज फिर सुचित्रा दी को याद किया। वह कथाकार की नींद से ठीक पहले की कोई बेहद निजी छवि, स्मृति, भाषा और कल्पना में हैं। सुचित्रा दी जहाँ भी होंगी, चल रही होंगी—अपनी साधारण चप्पलों में। खुद को अनावश्यक कठोरता और बारिश से बचाते हुए।
•••
अतुल तिवारी को और पढ़िए : फ़ैटी लिवर प्रतीक्षा की बीमारी है | पिन-कैप्चा-कोड की दुनिया में पिता के दस्तख़त | बीएड वाली लड़कियाँ | सिट्रीज़ीन : ज़िक्र उस परी-वश का और फिर बयाँ अपना
'बेला' की नई पोस्ट्स पाने के लिए हमें सब्सक्राइब कीजिए
कृपया अधिसूचना से संबंधित जानकारी की जाँच करें
आपके सब्सक्राइब के लिए धन्यवाद
हम आपसे शीघ्र ही जुड़ेंगे
बेला पॉपुलर
सबसे ज़्यादा पढ़े और पसंद किए गए पोस्ट