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समर्पण पर उद्धरण

हमारी आँखें सामने हैं, पीछे नहीं। सामने बढ़ते रहो और जिसे तुम अपना धर्म कहकर गौरव का अनुभव करते हो, उसे कार्यरूप में परिणत करो।

स्वामी विवेकानन्द

अभ्यास के बिना साध्य की प्राप्ति हो, यह संभव नहीं है।

संत तुकाराम

पहली नज़र को प्रेम मानकर समर्पण कर देना भी पागलपन है।

रघुवीर चौधरी

पहली नज़र को प्रेम मानकर समर्पण कर देना भी पागलपन है।

रघुनाथ चौधरी

हर चीज़ के लिए समर्पित रहो, हृदय खोलो, ध्यान देकर सुनो।

जैक केरुआक

अकेले रहने पर ही मैं अधिक अच्छी तरह से कार्य कर सकता हूँ, और जब मैं संपूर्णतः निःसहाय रहता हूँ, तभी मेरी देह एवं मन सबसे अधिक अच्छे रहते हैं।

स्वामी विवेकानन्द

कार्य करने की अटूट शक्ति होनी चाहिए। जो कुछ तुम करते हो, उस समय के लिए उसे अपनी पूजा समझो।

स्वामी विवेकानन्द

पहले समर्पण करो और फिर देखो।

रमण महर्षि

जो स्वेच्छापूर्वक अपने मस्तक आगे बढ़ा देते हैं, वे अनेक यातनाओं से मुक्ति पा जाते हैं और जो बाधा उपस्थित करते हैं, उन्हें बलपूर्वक दबाया जाता है एवं उनको कष्ट भी अधिक भोगना पड़ता है।

स्वामी विवेकानन्द

सत्, चित् और आनंद-ब्रह्म के इन तीन स्वरूपों में से काव्य और भक्तिमार्ग 'आनंद' स्वरूप को लेकर चले। विचार करने पर लोक में इस आनंद की दो अवस्थाएँ पाई जाएँगी—साधनावस्था और सिद्धावस्था।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल

कार्य-सिद्धि के उपायों में लगे रहने वाले भी असावधानी से अपने कार्यों को नष्ट कर देते हैं।

माघ

आदर्श की प्राप्ति समर्पण की पूर्णता पर निर्भर है।

सुभाष चंद्र बोस

कार्य करने वाले में थोड़ा कट्टरपन हुए बिना तेजस्वी कार्य नहीं हो सकता।

राल्फ़ वाल्डो इमर्सन

कल कोई पूछता था: ‘मैं क्या करूँ?’ मैंने कहा: ‘क्या करते हो, यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है जितना कि कैसे करते हो।

ओशो