किसी के शब्दों की लय में झूलना एक सुखद, लेकिन अचेतन निर्भरता हो सकती है।
अगर किसी चीज़ को हम अमर मानकर चलें, तो जड़ता पैदा होगी और हर जड़ता से लड़ना होता है।
जिज्ञासा की शिथिलता ही मन की जड़ता है।
तुम जड़तत्त्व का एक भी परमाणु अथवा शक्ति की एक भी इकाई घटा या बढ़ा नहीं सकते। अतएव क्रमविकास कभी शून्य से नहीं होता। तब फिर वह हुआ कहाँ से? इसके पूर्व के क्रमसंकोच से।
सार्त्र ने लिखा है : जब व्यक्ति की चेतना सुषुप्त अवस्था में होती है, तो उसके लिए बाहरी दुनिया भी सोई होती है।
मनुष्य की अचेतन क्रिया की यंत्रवत कारीगरी और यांत्रिक साधन ही आगे चलकर स्वतंत्र कलाओं में परिणत होते गए।
जड़ीभूत सौंदर्याभिरुचि; एक विशेष शैली (को) दूसरी शैली के विरुद्ध स्थापित करती है।
-
संबंधित विषय : गजानन माधव मुक्तिबोधऔर 1 अन्य
कला जड़-चेतन के बीच भी एक पुल बनाती है, और जड़ को भी अपनी ओर से एक चेतना प्रदान करती है।
भाषा का निर्माण उसकी सजग चेतना का परिणाम नहीं, उसकी अचेतन क्रिया का अगोचर प्रयास है।
चैतन्य को जड़शक्ति का औद्धत्य लील जाने को व्याकुल है।
सिर्फ़ खाने, पीने, हँसने, सोने में व्यस्त रहने से जीव को मौत भूल जाती है। मौत के भूलने से प्रभु-पति को विस्मृत करके, जीव वो काम करता रहता है जो उसके दुःख का कारण बनते हैं।
जड़ से चेतन की उत्पत्ति होती हो और चेतन से जड़ की उत्पत्ति होती हो—ऐसा अनुभव कभी किसी को नहीं होता।
अपने संबंध में 'अतिचेत' (over conscious) होना ही न होने का लक्षण है। सहज-पंथ के पथिक का लक्षण ही है—अपने विषय में अचेत रहना।
संदेह से ही अविश्वास आता है, और अविश्वास ही है जड़त्व।
अचेतन उतना ही तुच्छ और बेतुका है जितना कि चेतन।