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प्रयाग शुक्ल

1940 | कोलकाता, पश्चिम बंगाल

सातवें दशक में उभरे कवि। अनुवाद, कला-आलोचना और संपादन में भी सक्रिय।

सातवें दशक में उभरे कवि। अनुवाद, कला-आलोचना और संपादन में भी सक्रिय।

प्रयाग शुक्ल की संपूर्ण रचनाएँ

कविता 31

निबंध 1

 

उद्धरण 21

आदमी का मन कभी-कभी 'अकेलेपन' का अनुभव भले करे, लेकिन अपनी शारीरिक उपस्थिति में कोई चीज़ कभी 'अकेली' नहीं होती।

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देखने के साथ सोचना जुड़ा हुआ है। हम जो कुछ भी देखते हैं, उस पर किसी-न-किसी रूप में सोचते ज़रूर हैं।

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पिकासो की ग्राफ़िक-कृतियों में से कई ऐसी हैं, जिनमें चित्रित आकृतियाँ 'काल्पनिक' हैं, लेकिन इनमें मानवीय-स्थितियाँ या अनुभव इस तरह एकत्र हुए हैं कि काल के गर्त में बिला गए हज़ारहा लोगों का 'प्रतिनिधित्व' करने में वे समर्थ हैं।

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पूरा देखना वही होता है, जिसमें हम किसी वस्तु के इर्द-गिर्द की सारी चीज़ें देखते हैं।

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मेज़ पर एक ही गिलास रखा हो, तो क्या वह अकेला होता है? उसके साथ मेज़ होती है; कमरे की दीवारें होती हैं और वह रोशनी होती है, जिसमें हम उसे देखते हैं।

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